हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 271–280

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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] | ( ) ४. संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता २६१ है और मन सहित जब शब्दका विलय होजाताहै तब शब्दरहित जो परब्रह्महै वही परमात्मा शब्दसे कहाजाताहै अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंका लय होनेपर जो स्वरूपसे स्थित है वही परब्रह्म परमात्मास्वरूप है ॥ १०१ ॥

यत्किचित्रादरूपेण श्रूयते शक्तिरेव सा ॥ यस्तो निराकारः स एव परमेश्वरः ॥ १०२ ॥

यकिंचिदिति ॥ नादरूपेणानाहतध्वनिरूपेण यत्किचिच्छ्रयते आकर्ण्यते सा शक्तिरेव यस्तत्वान्तस्तत्त्वानामंतो लयो यस्मिन् सः तथा निराकार आकाररहितः स एव परमेश्वरः सर्ववृत्तिक्षये स्वरूपाव- स्थितो यः स आत्मेत्यर्थः । काष्ठे प्रवर्तितो वह्निरित्यादिभिः श्लोकैः राजयोगापरपर्यायोऽसंप्रज्ञातः समाधिरुक्तः ॥ १०२ ॥

भाषार्थ -जो कुछ नाटरूपसे सुनाजाता है वह शक्तिही है और जिसमें तत्त्वोंका लय होताहै वह निराकार परमेश्वर है अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंका क्षय होनेपर जो स्वरूपावस्थित है वही आत्मा है - इन पूर्वोक्त पांचश्लोकोंसे राजयोग नामकी असंप्रज्ञातसमाधि कही है ॥ १०२ ॥

सर्वे हठलयोपाया राजयोगस्य सिद्धये ॥ राजयोगसमारूढः पुरुषः कालवंचकः ॥ १०३ ॥

सर्वे इति ॥ हठश्च लयश्च हठलयौ तयोरुपाया हठलयोपाया हठोपाया आसनकुंभकमुद्रारूपा लयोपाया नादानुसंधानशांभवी- मुद्रादयः । राजयोगस्य मनसः सर्ववृत्तिनिरोधलक्षणस्य सिद्धये निष्प- तये प्रोक्ता इति शेषः । राजयोगसमारूढः सम्यगारूढः प्राप्त- चान् यः पुरुषः स कालवंचकः कालं मृत्युं वचयति जयतीति तादृशः स्यादिति शेषः ॥ १०३ ॥

भाषार्थ--हठ और लयके जो संपूर्ण उपाय हैं अर्थात् आसन कुंभक मुद्रा आदि हठके उपाय और नादानुसंधान शांभवीमुद्रा आदि-लयके उपाय हैं वे संपूर्ण मनकी संपूर्ण वृत्तियोंका निरोधरूप जो राजयोग उसकी सिद्धिके लियेही

पृष्ठ 272

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( ) | [ २६२ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः कहे हैं और उस राजयोगमें भलीप्रकार आरूढ ( प्राप्त ) जो पुरुष है वह कालका वंचक अर्थात् मृत्युका जीतनेवाला होजाताहै ॥ १०३ ॥

तत्त्वं बीजं हठः क्षेत्रमौदासीन्यं अलं त्रिभिः ॥ उन्मनी कल्पलतिका सद्य एव प्रवर्तते ॥ १०४ ॥

तत्त्वमिति ॥ तत्त्वं चित्तं बीजं बीजवदुन्मन्यवस्थांकुराकारेण परिणममानत्वात् । हठः प्राणापानयोरैक्यलक्षणः प्राणायामः क्षेत्र इव प्राणायामे उन्मनी कल्पलतिकोत्पत्तेरौदासीन्यं परवैराग्यं जलं तस्या उत्पत्तिकारणत्वात् । परवैराग्यहेतुकः संस्कारविशेषश्चित्त- स्यासंप्रज्ञात इति तल्लक्षणात् । एतैस्त्रिभिरुन्मन्यसंप्रज्ञातावस्था सैव कल्पलतिका सकलेष्टसाधनत्वात्सद्य एव शीघ्रमेव प्रवर्तते प्रवृत्ता भवति उत्पन्ना भवति ॥ १०४ ॥

भाषार्थ-तत्त्व ( चित्त ) ही बीज है. क्योंकि चित्तही उन्मनीअवस्थारूप जो अंकुर है उसके आकारसे परिणामको प्राप्त होताहै और प्राण अपानकी एकतारूप जो हठ है. वही क्षेत्रहै क्योंकि क्षेत्रके समान प्राणायाममेंही उन्मनी- रूप कल्पलता उत्पन्न होती है और उदासीनता ( परम वैराग्य ) जलहै क्योंकि उदासीनताही उन्मनी कल्पलताकी उत्पत्तिका कारण है क्योंकि, असंप्रज्ञात समाधिका यह लक्षण कहा है कि, परम वैराग्यका हेतु जो चित्तका संस्कारवि- शेष है वही असंप्रज्ञात समाधि है -इन बीज, क्षेत्र, जल, रूप पूर्वोक्त तीनोंसे असंप्रज्ञात अवस्थारूप उन्मनी कल्पलता शीघ्रही उत्पन्न होजाती है - संपूर्ण इष्टकी साधक होनेसे उन्मनीको कल्पलता कहते हैं ॥ १०४ ॥

सदा नादानुसंधानात्क्षीयंते पापसंचयाः ॥ निरंजने विलीयेते निश्चितं चित्तमारुतौ ॥ १०५॥

सदेति ॥ सदा सर्वदा नादानुसंधानान्नादानुचिंतनात्पापसंचयाः पापसमूहाः क्षीयंते नश्यंति निरंजने निर्गुणे चैतन्ये निश्चितं ध्रुवं चित्तमारुतौ मनःप्राणौ विलीयेते विलीनौ भवतः ॥ १०५ ॥

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २६३ भाषार्थ - सदैव नादके अनुसंधानसे पापके समूह क्षीण होते हैं और निर्गुण चैतन्यमें चित्त और पवन ये दोनों अवश्य लीन होजाते हैं अर्थात् मन और प्राण इनदोनोंका ब्रह्ममें लयहोजाताहै ॥ १०५ ॥

शंखदुंदुभिनादं च न शृणोति कदाचन ॥ काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ॥ १०६ ॥

उन्मन्यवस्थां प्राप्तस्य योगिनः स्थितिमाहाष्टभिः -शंखदुंदुभीति ॥ शंखो जलजो दुंदुभिर्वाद्यविशेषस्तयोर्नादं घोषं कदाचन कस्मिंश्चिदपि समये न शृणोति । शंखदुंदुभीत्युपलक्षणं नादमात्रस्य । उन्मन्यव- स्थया देहो ध्रुवं काष्ठवज्जायते । निश्चेष्टत्वादित्यर्थः ॥ १०६ ॥

भाषार्थ- अब आठश्लोकोंसे उन्मनी अवस्थाको प्राप्त जो योगी है उसकी स्थितिका वर्णन करतेहैं कि, वह योगी शंख-दुंदुभी- इनके शब्दको कदा- चित्भी नहीं सुनताहै यहां शंख दुंदुभी -शब्दमात्रके उपलक्षक हैं-और उन्मनी अवस्थासे देह काष्ठके समान चेष्टारहित होजाताहै ॥ १०६ ॥

सर्वावस्थाविनिर्मुक्तः सर्वचिंताविवर्जितः ॥ मृतवत्तिष्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ॥ १०७ ॥

सर्वेति ॥ जाग्रत्स्वमसुषुप्तिमूर्च्छामरणलक्षणाः पंच व्युत्थानाव- स्थास्ताभिर्विशेषेण मुक्तो रहितः सर्वा याचिंता: स्मृतयस्ताभिर्विव- जिंतो विरहितो यः योगः सकलवृत्तिनिरोधोऽस्यास्तीति योगी तुर्या- वस्थावान् स मुक्तो जीवन्नेव मुक्तः । सकलवृत्तिनिरोधे आत्मनः स्वरूपावस्थानात् । तदुक्तं पातंजलसूत्रे - 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' इति । स्पष्टमन्यत् ॥ १०७ ॥

भाषार्थ -और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, मरणरूप जो पांच व्युत्था- नावस्था हैं उनसे विशेषकरके रहित होताहै और संपूर्ण चिंताओंसे विवर्जित जो योगी है अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंके निरोधरूप योगमें स्थित है वह जीवन्मुक्त

पृष्ठ 274

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( ) | [: २६४ हठयोगप्रदीपिका उपदेश है इसमें संशय नहीं है-क्योंकि संपूर्ण वृत्तियोंके निरोधमें आत्मा अपने स्वरू ' पमें स्थित होजाताहै सोई पातंजल सूत्रमें कहाहै कि, उससमय द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित होताहै ॥ १०७ ॥

खाद्यते न च कालेन बाध्यते न च कर्मणा ॥ साध्यते न स केनापि योगी युक्तः समाधिना १०८ खाद्यत इति ॥ समाधिना युक्तो योगी कालेन मृत्युना न खाद्यते न भक्ष्यते । न हन्यत इत्यर्थः । कर्मणा कृतेन शुभेनाशुभेन वान बाध्यते जन्ममरणादिजनने न क्लिश्यते । तथा च समाधिप्रकरणे पातंजलसूत्रम् । 'ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः' इति । केनापि पुरुषांतरेण यंत्रमंत्रादिना वा न साध्यते साधयितुं शक्यते ॥ १०८ ॥

भाषार्थ -समाधिसे युक्त योगीको मृत्युभी भक्षण नहीं करता है और शुभ -अशुभ रूप किये हुये कमसे जन्म मरण आदि क्लेशमी नहीं होतेहैं और न वह योगी किसी उपायसे साध्य होसकताहै अर्थात् कोई पुरुष यंत्र मंत्र आदिसे साध -नहीं सकता- सोई समाधिप्रकरणमें पतंजलिका सूत्र है कि, उस समाधिके समय केशकी निवृत्ति होती है ॥ १०८ ॥

न गंधं न रसं रूपं न च स्पर्श न निःस्वनम् ॥ नात्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना ॥ १० ९ ॥ न गंधमिति ॥ समाधिना युक्तो योगी गंध सुरभिमसुरभिं वा नरसं मधुराम्ललवणकटुकषायतिक्तभेदात् षड्विधं न रूपं शुक्लनील- पीतरक्तहरितकपिशचित्रभेदात्सप्तविधं न स्पर्श शीतमुष्णमनुष्णा- शीतं वा न निःस्वनं शंखदुंदुभिजलधिजीमूतादिनिनादं बाह्यमाभ्यंतरं वान आत्मानं देहं न परं पुरुषांतरं वेत्तीति सर्वत्रान्वेति । 'आत्मा देहे धृतौ जीवे स्वभावे परमात्मनि' इत्यमरः ॥ १० ९ ॥ भाषार्थ-समाधिसे युक्त योगी सुरभि, असुरभिरूप गंध और मधुर, आम्ल, ` लवण, कटुक, कषाय तिक्तरूप छः प्रकारका रस और शुक्ल, नील, पीत, रक्त,

पृष्ठ 275

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २६५ हरित, कपिश, चित्ररूप सातप्रकारका रूप और शीत, उष्ण, अनुष्णाशीतरूप, तीनप्रकारका स्पर्श और शंख, दुंदुभी, समुद्र, मेघ इनका बाह्य शब्द, और नाद-रूप भीतरका शब्द और अपना देह अन्य अन्य पुरुष इन पूर्वोक्त गंध आदिको नहीं जानताहै ॥ १० ९ ॥ चित्तं न सुप्तं नो जाग्रत्स्मृतिविस्मृतिविवर्जितम् ॥ न चास्तमेति नोदेति यस्यासौ मुक्त एव सः॥ ११० ॥

चित्तमिति ॥ यस्य योगिनश्चितमंतःकरणं न सुप्तम् । आवरकस्य तमसोऽभावात्रिगुणेऽतःकरणे यदा सत्त्वरजसी अभिभूय समस्तकर- णावरकं तम आविर्भवति तदांतःकरणस्य विषयाकारपरिणामाभावा- तत्सुप्तमित्युच्यते । नो जाग्रत् इंद्रियैरर्थग्रहणाभावात् । स्मृतिश्च विस्मृतिश्च स्मृतिविस्मृती ताभ्यां वर्जितम् । वृत्तिसामान्याभावादु- द्रोधकाभावाच्च स्मृतिवर्जितम् । स्मृत्यनुकूल संस्काराभावाद्विस्मृतिव-जितम् । न चास्तं नाशमेति प्राप्नोति । संस्कारशेषस्य चित्तस्य सत्त्वात् । नोदेत्युद्भवति । वृत्त्यनुत्पादनात् । सोऽसौ मुक्त एव जीव- उन्मुक्त एव ११० ॥ भाषार्थ -जिस योगीका चित्त आच्छादक तमोगुणके अभावसे सोवता न हो, क्योंकि त्रिगुण अंतःकरणमें जिस समय सत्रगुण और रजोगुणका तिर- स्कार करके सब इंद्रियोंका आच्छादक तमोगुण अधिक होताहै उस समय अंतःकरणका विषयाकाररूप परिणाम न होने से सुप्त अवस्था ( शयन ) कहाती है और इंद्रियोंसे विषयोंका ग्रहण होनेसे योगीको जाग्रत्भी न हो, और स्मरण विस्मरणसे वर्जित हो, अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंके और उद्बोधक के अभावसे स्मृति- रहित हो और स्मृतिका जनक जो संस्कार उसके अभावसे विस्मृतिसे रहित हो और संस्कारशेष चित्तके होनेसे नाशकोभी प्राप्त न हो और वृत्तियोंकी उत्प- त्तिके अभावसे उदय ( उत्पन्न ) भी न होताहो वहभी योगी मुक्तही है ॥ ११० ॥

पृष्ठ 276

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( ) | [ २६६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः न विजानाति शीतोष्णं न दुःखं न सुखं तथा ॥ न मानं नापमानं च योगी युक्तः समाधिना॥ १११ ॥

न विजानातीति ॥ समाधिना युक्तो योगी शीतं च उष्णं च शीतोष्णम् । समाहारद्वंद्वः । शीतमुष्णं वा पदार्थं न दुःखं दुःखजनकं परकृतं ताडनादिकं न सुखं सुखसाधनं सुरभिचंदनाद्यनुलेपनादि- कम् । तथा चार्थे । मानं परकृतं सत्कारं न अपमानमनादरं च न विजानातीति क्रियापदं प्रतिवाक्यमन्वेति ॥ १११ ॥

भाषार्थ -समाधिसे युक्त योगी शीत, उष्ण पदार्थको और ताडना आदि दुःखको और सुरभि चंदनआदिके लेपनरूप सुखको और मान अपमानको अर्थात् दूसरेके किये सत्कार और अनादरको नहीं जानताहै ॥ १११ ॥

स्वस्थो जाग्रदवस्थायां सुप्तवद्योऽतिष्ठते ॥ निःश्वासोच्छ्रासहीनश्च निश्चितं मुक्त एव सः ११२ ॥ स्वस्थ इति ॥ स्वस्थः प्रसन्नेंद्रियांतःकरणः । एतेन तंद्रामूर्च्छा- दिव्यावृत्तिः । जाग्रदवस्थायामित्यनेन स्वप्नसुषुप्त्योर्निवृत्तिः । सुप्त- वत् सुप्तेन तुल्यं कायेंद्रियव्यापारशून्यो यो योगी अवतिष्ठते स्थितो भवति । 'समवप्रविभ्यः स्यः' इत्यात्मनेपदम् । निश्वासोच्छ्वासहीनः बाह्यवायोः कोष्ठे ग्रहणं निश्वासः कोष्ठस्थितस्य वायोर्बहिर्निःसारण- मुच्छ्रासस्ताभ्यां हीनश्वावतिष्ठत इत्यत्रापि संबध्यते । स निश्चितं निःसंदिग्धं मुक्त एव । जीवन्मुक्तस्वरूपमुक्तं दत्तात्रेयेण-'निर्गुणध्या-नसंपन्नः समाधिं च ततोऽभ्यसेत् | दिनद्वादशकेनैव समाधिं समवाप्तु-यात् ॥ वायुं निरुध्य मेधावी जीवन्मुक्तो भवेदुद्भवम् ॥ ' इति ॥ ११२॥

भाषार्थ -जो योगी स्वस्थ अवस्थामें अर्थात् इंद्रिय और अंतःकरणकी प्रस- तामें स्थित होकर जाग्रत् अवस्थामेंभी देह और इंद्रियों के व्यापारसे शून्य सुप्तके समान और बाहिरकी वायुका देहमें ग्रहणरूप निःश्वास और देहमें स्थित वायुका बाहिर निकासनेरूप उच्च्छास इन दोनोंसे रहित होकर निश्चल टिकताहै वह

पृष्ठ 277

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २६७ योगी निश्वयसे मुक्तही है और दत्तात्रेयने जीवन्मुक्तका रूप यह कहा है कि, निर्गुणके ध्यानमें संपन्न मनुष्य समाधिका अभ्यास करे फिर बारह दिनसेही समाधिको प्राप्त होताहै और बुद्धिमान् मनुष्य वायुको रोककर निश्चयसे जीव- मुक्त होताहै ॥ ११२ ॥

अवध्यः सर्वशस्त्राणामशक्यः सर्वदेहिनाम् ॥ अग्राह्यो मंत्रयंत्राणां योगी युक्तः समाधिना ११३ ॥ अवध्य इति ॥ समाधिना युक्तो योगी । सर्वशस्त्राणामिति संबंधसामान्ये षष्ठी । सर्वशस्त्रैरित्यर्थः । अवध्यो हेतुमशक्य इत्यर्थः। सर्वदेहिनामित्यत्रापि संबंधमात्रविवक्षायां षष्ठी । अशक्यः सर्वदेहिभिः बलेन शक्यो न भवतीत्यर्थः । मंत्रयंत्राणां वशीकरणमारणोच्चाटना- दिफलैर्मत्रयंत्रैरग्राह्यः वशीकर्तुमशक्यः । एवं प्राप्तयोगस्य योगिनो. विघ्ना बहवः समायांति । तन्निवारणार्थं तज्ज्ञानस्यापेक्षितत्त्वात्तेऽपि प्रदर्श्यते । दत्तात्रेयः-'आलस्यं प्रथमो विघ्नो द्वितीयस्तु प्रकथ्यते । पूर्वोक्तधूर्तगोष्ठी च तृतीयो मंत्रसाधनम् ॥ चतुर्थो धातुवादः स्या-- दिति योगविदो विदुः' इति । मार्कडेयपुराणे-'उपसर्गाः प्रवर्तते दृष्टा ह्यात्मनि योगिनः । ये तांस्ते संप्रवक्ष्यामि समासेन निबोध मे । काम्याः क्रियास्तथा कामान्मनुष्यो योऽभिवांछति । स्त्रियो दानफलं विद्यां मायां कुप्यं धनं वसु ॥ देवत्वममरेशत्वं रसायनवयः क्रियाम् । मेरुं प्रयतनं यज्ञं जलाग्न्यावेशनं तथा ॥ श्राद्धानां शक्तिदानानां फलानि नियमास्तथा । तथोपवासात्पूर्त्ताच्च देवपित्रर्चनादपि ॥ अति- थिभ्यश्च कर्मभ्य उपसृष्टोऽभिवांछति । विघ्नमित्थं प्रवर्तेत यत्नाद्योगी निवर्तयेत् ॥ ब्रह्मासंगि मनः कुर्वन्नुपसर्गैः प्रमुच्यते ॥ ' इति । पद्म- पुराणे-' दैभिरंतरायैर्न क्षिप्यतेऽस्य हि मानसम् । तदाग्रे मवाि परं ब्रह्मातिदुर्लभम् । ' योगभास्करे - 'सात्त्विकीं धृतिमालव्य योगी सखेन सुस्थिरः । निर्गुणं मनसा ध्यायन्नुपसगैः प्रमुच्यते ॥ एवं

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( ) | [: २६८ हठयोगप्रदीपिका उपदेश योगमुपासीनः शक्रादिपदनिस्पृहः । सिद्धयादिवासनात्यागी जीव- मुक्तो भवेन्मुनिः ॥ विस्तरस्य भिया नोक्ताः संति विघ्ना ह्यनेकशः । ध्यानेन विष्णुहरयोर्वारणीया हि योगिना' इति ॥ ११३ ॥

भाषार्थ - और समाधिसे युक्त योगी संपूर्णशस्त्रोंसे बध करनेके अयोग्य होता है और सब देहधारियों को वश आदि करनेमें अशक्य है और वशीकरण, मारण, उच्चाटन हैं फल जिनके ऐसे मंत्र यंत्रोंसे भी वशमें करने अयोग्य है इसप्रकारके योगीको अनेकप्रकारके जो विघ्न होतेहैं उनको दिखातेहैं -दत्तात्रेयने कहाहै कि, पहिला विघ्न आलस्य और दूसरा धूतोंकी सभा और तीसरा मंत्रसाधन और चौथा धातुवाद ये योगके ज्ञाताओंने विघ्न कहे हैं और मार्केडेयपुराणमें ये विघ्न कहे हैं कि, योगीकी आत्मामें देखनेसे जो विघ्न होतेहैं उनको मैं तेरे प्रति संक्षेपसे कहताहूँ तू उनको सुन–कामनाकेलिये कर्म और कामनाओंकी जो मनुष्य वांछा करताहै स्त्री, दानका फल, विद्या, माया, गुप्त और प्रकट धन, देव, और इंद्र होना और रसायनरूप देहकी क्रिया, मेरु, यत्न, यज्ञ, जल और अभिमें प्रवेश, श्राद्ध और शक्तिसे दान, फल और नियम और उपवास, वापीकूपतडागादि पूर्त, देव और पितरोंका पूजन, अतिथि और कर्म इनसे युक्त हुआ योगी जो कुछ वांछा करताहै उसके योगमें विघ्न प्रवृत्त हो जाता है इससे योगी यत्नोंसे विघ्नको निवृत्त करें, ब्रह्ममें आसक्त मनको करताहुआ योगी विघ्नोंसे छूटताहै और पद्म- पुराणमें लिखाहै कि, जब इन विघ्नोंसे जिस योगीके मनमें विक्षेप न हो वह अति दुर्लभ उस परब्रह्मको प्राप्त होताहै, योगभास्करमें लिखा है कि, सात्त्विकी धीर- ताको करके सत्त्वगुणसे भलीप्रकार स्थिर और मनसे निर्गुणका ध्यान करता हुआ योगी" विघ्नोंसे अवश्य छूटताहै इसप्रकार योगका उपासक और इंद्र आदिकेपदकी इच्छासे रहित और सिद्धि आदिकोंकी वासनाका त्यागी मुनि जीवन्मुक्त होताहै. विघ्न अनेक प्रकारके हैं परंतु विस्तारके भयसे यहां नहीं कहे हैं और वे सब विघ्न विष्णु और शिवजीके ध्यानसे योगियोंको निवारण करने योग्य हैं ॥ ११३ ॥

यावन्नैव प्रविशति चरन्मारुतो मध्यमार्गे यावद्विदुर्न भवति दृढप्राणवातप्रबंधात् ॥

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] - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २६ ९ यावद्वयाने सहजसदृशं जायते नैव तत्त्वं तावज्ज्ञानं वदति तदिदं दंभमिथ्याप्रलापः ॥ ११४ ॥

इति श्रीसहजानंदसंतानचिंतामणिस्वात्माराम योगींद्र- विरचितायां हठयोगप्रदीपिकायां समाधिलक्षणं नाम चतुर्थोपदेशः ॥ ४ ॥

हठयोगप्रदीपिका समाप्ता ॥ अयोगिनां ज्ञानं निराकुर्वन्योगिनामेव ज्ञानं भवतीत्याह -याव-दिति ॥ मध्यमार्गे सुषुम्नायां चरन् गच्छन् मारुतः प्राणवायुः यावत्या- वत्कालपर्यंतं न प्रविशति प्रकर्षेण ब्रह्मरंध्रपयर्त न विशति ब्रह्मरंध्रं गतस्य स्थैर्याद्ब्रह्मरंध्रं गत्वा न स्थिरो भवतीत्यर्थः । सुषुम्नायामसंचरन् वायुर- सिद्ध इत्युच्यते । तदुक्तममृतसिद्धौ-' यावद्धि मार्गतो वायुर्निश्चलो नैव मध्यगः । असिद्धं तं विजानीयाद्वायुं कर्मवशानुगम् ॥ ' इति । प्राणयति जीवतीति प्राणः स चासौ वातश्च प्राणवातः तस्य प्रबंधारकुंभकेन स्थिरीकरणाद्विदुर्वी दृढः स्थिरो न भवति प्राणवातस्थैर्ये बिंदुस्थैर्य- मुक्तमत्रैव प्राक् । ‘मनःस्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिंदु: स्थिरो भवेत् । ' इति । तदभावे त्वसिद्धत्वं योगिनः । उक्तममृतसिद्धौ-'तावद्वद्घोs- सिद्धisit नरः सांसारिको मतः । यावद्भवति देहस्थो रसेंद्रो ब्रह्मरूपकः ॥ असिद्धं तं विजानीयान्नरमब्रह्मचारिणम् । जरामरणस- कीर्ण सर्वक्शसमाश्रयम् ॥ ' इति । यावत्तत्त्वं चित्तं ध्याने ध्येय- चित्तं न सहजसदृशं स्वाभाविकध्येयाकारवृत्तिप्रवाहो नैव जायते नैव भवति प्राणवातप्रबंधादिति देहलीदीपकन्यायेनात्रापि संबध्यते । वायु- स्थैर्य चित्तस्थैर्यमुक्तममृतसिद्धौ -'यदासौ श्रियते वायुर्मध्यमां मध्य- योगतः । तदा बिंदुश्च चित्तं च म्रियते वायुना सह ॥ ' तदभावेऽह्य- सिद्धत्वमुक्तममृतसिद्धौ - 'यावत्प्रस्यंदते चित्तं बाह्याभ्यंतरवस्तुषु । असिद्धं तद्विजानीयान्चित्तं कर्मगुणान्वितम्॥ ' इति । तावद्यज्ज्ञानं शाब्द

पृष्ठ 280

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( ) | [ २७० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः -वदति कश्चित् तदिदं ज्ञानं कथं दंभमिथ्याप्रलापः दंभेन ज्ञानकथनेनाहं -लोके पूज्यो भविष्यामीति धिया मिथ्याप्रलापो मिथ्याभाषणं दंभपू- र्वकं मिथ्याभाषणमित्यर्थः । प्राणबिंदुचित्तानां जयाभावे ज्ञानस्या- भावात्संसृतिर्दुर्वारा । तदुक्तममृतसिद्धौ -'चलत्येष यदा वायुस्तदा बिंदुश्चलः स्मृतः । बिंदुश्चलति यस्यांगे चित्तं तस्यैव चंचलम् ॥ चले बिंदौ चले चित्ते चले वायौ च सर्वदा ॥ जायते म्रियते लोकः -सत्यं सत्यमिदं वचः ॥ ' इति । योगबीजेऽप्युक्तम्-'चित्तं प्रनष्टं यदि भासते वै तत्र प्रतीतो मरुतोऽपि नाशः । न वा यदि स्यान्न तु तस्य शास्त्रं नात्मप्रतीतिर्न गुरुर्न मोक्षः ॥ ' इति । एतेन प्राणबिंदुमनसां जये तु ज्ञानद्वारा योगिनो मुक्तिः स्यादेवेति सूचितम् । तदुक्तममृत- सिद्धौ -'यामवस्थां व्रजेद्वायुर्विदुस्तामधिगच्छति । यथाहि साध्यते वायुस्तथा बिंदुप्रसाधनम् ॥ मूच्छितो हरति व्याधिं वृद्धः खेचरतां नयेत् । सर्वसिद्धिकरो लीनो निश्चलो मुक्तिदायकः ॥ यथावस्था भवे- द्विदश्वित्तावस्था तथा तथा ॥ ' नतु -' योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ ' इति भगवदुक्तास्त्रयो मोक्षोपायास्तेषु सत्सु कथं योग एव मोक्षोपाय- नोक्त इति चेन्न । तेषां योगांगेष्वंतर्भावात् । तथाहि-'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः' इति श्रुत्या परमपुरुषार्थसाधनात्मसाक्षात्कारहेतुतया श्रवणमनननिदिध्यासनान्यु-क्तानि तत्र श्रवणमनने नियमांतर्गते स्वाध्यायेंऽतर्भवतः । स्वाध्यायश्च मोक्षशास्त्राणामध्ययनम् । स च तात्पर्यार्थनिश्चयपर्यवसायो ग्राह्यः । तात्पर्यार्थनिर्णयश्च श्रवणमननाभ्यां भवतीति श्रवणमननयोः स्वाध्या- तर्भावः । नियमविवरणे याज्ञवल्क्येन -'सिद्धांतश्रवणं प्रोक्तं वेदा- तश्रवणं बुधैः' इति स्पष्टमेव श्रवणस्य नियमांतर्गतिरुक्ता-'अधी- तवेदं सूत्रं वा पुराणं सेतिहासकम् । पदेष्वध्ययनं यश्च सदाभ्यासो जपः स्मृतः ॥ ' इति युक्तिभिरनवरतमनुचिंतनलक्षणस्य सदाभ्या- सरूपस्य मननस्यापि नियमांतर्गतिरुक्ता । विजातीयप्रत्ययनिरोध-