हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 41–50

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३१ अथ मयूरासनमाह - धरामिति ॥ करद्वयेन करयोर्द्वयं युग्मं तेन वरां भूमिमवष्टभ्यावलंव्य प्रसारितांगुली भूमिसंलग्नतलौ सन्निहितौ करौ कृत्वेत्यर्थः । तस्य करद्वयस्य कूर्परयोर्भुजमध्यसंधिभागयोः स्थापिते धृते नाभेः पार्श्वे पार्श्वभागौ येन स उच्चासन उच्चमुन्नतमा-सनं यस्यैतादृशः । खे शून्ये दंडवद्दंडेन तुल्यमुत्थित ऊर्ध्वं स्थितो यत्र भवति तन्मायूरं मयूरस्येदं तत्संबंधित्वात्तन्नामकं प्रवदंति । योगिन इति शेषः ॥ ३० ॥

भाषार्थ--अब मायूरासनको कहते हैं कि, दोनों हाथोंसे भूमिका अवलं-वन करके अर्थात् फैलाये हुये हाथोंसे भूमिका स्पर्श करके और उन हाथोंका जो कूर्पर ( भुजा, करका संधिभाग ) जिसको मणिबंध वा गट्टा कहते हैं उसके ऊपर नाभिके दोनों पार्श्वभागोंको स्थापितकरके वह दंडके समान ठठा हुआ उच्चासन होताहै इस आसनको योगीजन मायूर कहते हैं अर्थात् मयूरके समान इसमें स्थिति होतीहै ॥ ३० ॥

हरति सकलरोगानाशु गुल्मोदरादी- नभिभवति च दोषानासनं श्रीमयूरम् ॥ बहु कदशनमुक्तं भस्म कुर्यादशेषं जनयति जठराग्निं जारयेत्कालकूटम् ॥ ३१ ॥

मयूरासनगुणानाह-हरतीति ॥ गुल्मो रोगविशेषः उदरं जलों- दरं ते आदिनी येषां प्लीहादीनां ते तथा तान्सकलरोगान् सकला ये रोगास्तानाशु झटिति हरराते नाशयति । श्रीमयूरमासनमिति सर्वत्र संबध्यते । दोषान्वातपित्तकफा नालस्यदांश्चाभिभवति तिरस्करोति । बह्वतिशयितं कदशनं कदन्नं यदुक्तं तदशेषं समस्तं भस्म कुर्या- पाचयेदित्यर्थः । जठराग्निं जठरानलं जनयति प्रादुर्भावयति । काल- कूटं विषं कालकूटवदपकारकान्नं समस्तं जारयेजीणं कुर्यात्पाचयेदि- त्यर्थः ॥ ३१ ॥

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( ) [: ३२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश भाषार्थ-- अब मयूरासनके गुणोंको कहते हैं कि, गुल्म और जलोदर आदि और जो प्लीहा तिल्ली आदि सब रोग हैं उनको शीघ्र हरताहै और संपूर्ण जो वात पित्त कफ आलस्य आदि दोष हैं उनका तिरस्कार करताहै । और अधिक घा कुत्सित अन्न जो भक्षण करलिया होय तो उस संपूर्णको भस्म करताहै और जठराग्निको बढाताहै और कालकूट ( विष ) को भी जीर्ण करताहै अर्थात् विषके समान अपकार करनेवाला जो अन्न है उसकोभी पचाताहै ॥ ३१ ॥

उत्तानं शववद्भूमौ शयनं तच्छवासनम् ॥ शवासनं श्रांतिहरं चित्तविश्रांतिकारकम् ॥ ३२ ॥

शवासनमाहाघेंन-उत्तानमिति ॥ शवेन मृतशरीरेण तुल्यं शवव- दुत्तानं भूमिसंलग्नं पृष्ठं यथा स्यात्तथा शयनं निद्रायामिव सन्निवेशो यत्तच्छवासनं शवाख्यमासनम् । शवासनप्रयोजनमाह । उत्तरार्धेन । शवासनंश्रांतिहरं श्रांति हठाभ्यासश्रमं हरतीति श्रांतिहरं चित्तस्य विश्रांतिर्विश्रामस्तस्याः कारकम् ॥ ३२ ॥

भाषार्थ -अब शवासन और उसके फलको कहते हैं कि, शव ( मृतके समान ) भूमिपर पीठको लगाकर उत्तान ( सीधा ) शयन निद्राके तुल्य जिसमें हो वह शवासन होताहै । और यह शवासन हठयोगके परिश्रमको हरताहै और चित्तकी विश्रांति ( विश्राम ) को करताहै अर्थात् इसके करनेसे चित्त स्थिर होजाताहै ॥ ३२ ॥

चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि च ॥ तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम् ॥ ३३ ॥

वक्ष्यमाणासनचतुष्टयस्य श्रेष्ठत्वं वदन्नाह-चतुरशीतीति ॥ शिवे-नेश्वरेण चतुरधिकाशीतिसंख्याकान्यासनानि कथितानि चकाराच्चतुर- शीतलक्षणानि च । तदुक्तं गोरक्षनाथेन -'आसनानि च तावंति

यावत्यो जीवजातयः । एतेषामखिलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः ॥

चतुरशीतिलक्षाणि एकैकं समुदाहृतम् । ततः शिवेन पीठानां षोडशोनं

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३३ शतं कृतम् ॥ ' इति । तेभ्यः शिवोक्तचतुरशीतिलक्षासनानां मध्ये प्रशस्तानि यानि चतुरशीत्यासनानि तेभ्य आदाय गृहीत्वा । सारभूतं श्रेष्ठभूतं चतुष्कमह ब्रवीमीत्यन्वयः ॥ ३३ ॥

भाषार्थ--अब चार आसनोंकी श्रेष्ठताका वर्णन करते हैं कि, शिवजीने चौरासी आसन कहे हैं और चकारके पढनेसे उनके चौरासी लाख लक्षण कहे हैं सोई गोरक्षनाथने कहाहै कि, जितनी जीवोंकी जाति हैं उतनेही आसन हैं इनके संपूर्ण भेदोंको शिवजी जानतेहैं उनमेंभी एक २ चौरासी लक्ष कहाहै तिससे शिवजीने चौरासी आसनही किये हैं, उनमें श्रेष्ठ जो चौरासी आसन हैं उनमेंसे लेकर श्रेष्ठ जो चार आसन हैं उनको मैं कहताहूँ ॥ ३३ ॥

सिद्धं पद्मं तथा सिंह भद्रं चेति चतुष्टयम् ॥ श्रेष्ठं तत्रापि च सुखे तिष्ठेत्सिद्धासने सदा ॥ ३४ ॥

तदेव चतुष्कं नाम्ना निर्दिशति-सिद्धमिति । सिद्धं सिद्धासनम् । पद्मं पद्मासनम्, सिंहं सिंहासनम्, भद्रं भद्रासनम् इति चतुष्टयं श्रेष्ठ-मतिशयेन प्रशस्यं तत्रापि चतुष्टये सुखे सुखकरे सिद्धासने सदा तिष्ठेत् एतेन सिद्धासनं चतुष्टयेप्युत्कृष्टमिति सूचितम् ॥ ३४ ॥

भाषार्थ-उन चारोंकेही नामोंको दिखातेहैं कि, सिद्धासन -पद्मासन-सिंहासन और भद्रासन ये चार आसन अत्यंत श्रेष्ठ हैं । उन चारोंमें सुखका कर्ता जो सिद्धासन है उसमें सदैव योगी टिकै-इससे यह सूचित किया कि, इन चारोंमेंभी सिद्धासन उत्तम है ॥ ३४ ॥ [

योनिस्थानक मंत्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसे- न्मेद्रेपादमथैकमेव हृदये कृत्वा हनुं सुत्थिरम् ॥ स्थाणुः संयमितेंद्रियोऽचलदृशा पश्येद्ध्रुवोरंतरं ह्येतन्मोक्षकपाटभेदजनकं सिद्धासनं प्रोच्यते॥ ३५ ॥

आसनचतुष्टयेप्युत्कृष्टत्वात्प्रथमं सिद्धासनमाह-योनिस्थानक- मिति ॥ योनिस्थानमेव योनिस्थानकम् | स्वार्थे कप्रत्ययः । गुदोपस्थ- ३

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( ) | [ ३४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः योर्मध्यमप्रदेशे पदं योनिस्थानं तत् अंधिर्वामश्चरणस्तस्य मूलेन पाष्णिभागेन घटितं संलग्नं कृत्वा । स्थानांतरं एकं पादं दक्षिणं पादं मेढेंद्रियस्योपरिभागे दृढं यथास्यात्तथा विन्यसेत् । हृदये हृदयसमीपे हनुं चिबुकं सुस्थिरं सम्यक्कस्थिरं कृत्वा हनुहृदययोश्चतुरंगुल मंतरं यथा भवति तथा कृत्वेति रहस्यम् । संयमितानि विषयेभ्यः परावृत्ता- नींद्रियाणि येन स तथा । अचला या हक दृष्टिस्तथा भ्रुवोरंतरं मध्यं पश्येत् । हि प्रसिद्धं मोक्षस्य यत्कपार्ट प्रतिबंधकं तस्य भेदं नाशं जनयतीति तादृशं सिद्धानां योगिनाम् । आस्तेऽत्रास्यतेऽनेनेति वा आसनं सिद्धासननामकमिदं भवेदित्यर्थः ॥ ३५ ॥

भाषार्थ - अब चारों आसनोंमें उत्तम जो सिद्धासन उसके स्वरूपका वर्णन करतेहैं कि, गुंदा और लिंग इन्द्रियका मध्यभाग जो योनिस्थान है उससे वाम चरणके मूल ( ऐडी ) को मिलाकर और दक्षिण दूसरे पादको दृढ रीतिसे लिंग इन्द्रियके ऊपर रक्खै और हृदयके समीपभागमें हनु ( चिबुक घा ठोडी ) को भलीप्रकार स्थिर करके अर्थात् हनु और हृदयका चार अंगुलका अंतर रखकर भली कार विषयोंसे रोकी हैं इंद्रियें जिसने ऐसा स्थाणु ( निश्चल ) योगी अपनी अचल ( एकरस ) दृष्टिसे भ्रुकुटीके मध्यभागको देखता रहै । यह मोक्षके कपाट ( अवरोध वा रोक ) का जो भेदन ( नाश ) उसका करनेवाला योगिजनोंने सिद्धासन कहाहै— अर्थात् सिद्धयोगी इस आसनसे बैठते हैं ॥ ३ ९ ॥ मेद्रादुपरि विन्यस्य सव्यं गुल्फं तथोपरि ॥ गुल्फांतरं च निक्षिप्य सिद्धासनमिदं भवेत् ॥ ३६ ॥

मत्स्येंद्रसंमतं सिद्धासनमुक्त्वाऽन्यसंमतं वक्तुमाह -मतांतरे त्विति॥ तदेव दर्शयति-मेद्रादिति ॥ मेंद्रादुपस्थादुपर्यूर्ध्वभागे सव्यं वामगु- ल्फं विन्यस्य तथा सव्यवदुपरि मुख्यपादस्योपरि न तु सव्यगुल्फस्य । गुल्फांतरं दक्षिणशुल्कं च निक्षिप्य वसेदिति शेषः । इदं सिद्धासनं मतांतराभिमतमित्यभेद इत्यर्थः ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 45

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३५ भाषार्थ--अब मत्स्येंद्रके संमत सिद्धासनको कहकर अन्य योगियोंके संमत सिद्धासनको कहते हैं कि, मतांतरमें तो यह लिखाहै कि, लिंग इंद्रियके ऊपरके भागमें वामगुल्फको रखकर और तैसेही सव्य ( वाम ) पादके ऊपर दक्षिण गुल्फ-को रखकर बसै तो यह भी किसी २ ने सिद्धासन कहा है ॥ ३६ ॥

एतत्सिद्धासनं प्राहुरन्ये वज्रासनं विदुः ॥ मुक्तासनं वदत्येके प्राहुर्गुप्तासनं परे ॥ ३७ ॥

तत्र प्रथमं महासिद्धसंमतमिति स्पष्टीकर्तुमस्यैव मतभेदान्नामभेदा-नाह-एतदिति ॥ एतत्पूर्वोक्तं सिद्धासनं सिद्धासननामकं प्राहुः । केचिदित्यध्याहारः । अन्ये वज्रासनं वज्रासनसंज्ञकं विदुः जानंति । एके मुक्तासनं मुक्तासनाभिधं वदंति । परे गुप्तासनं गुप्तासनाख्यं प्राहुः । अत्रासनाभिज्ञाः । यत्र वामपादपाणियोनिस्थाने नियोज्य दक्षिणपादपाणिमेद्रादुपरि स्थाप्यते तत्सिद्धासनम् । यत्र वामपाद-पाणि योनिस्थाने नियोज्य दक्षिणपादपाणिर्मेद्रादुपरि स्थाप्यते तद्वज्रासनम् । यत्र तु दक्षिणसव्यपाष्णिद्वयमुपर्यधोभागेन संयोज्य योनिस्थानेन संयोज्यते तन्मुक्तासनम् । यत्र च पूर्ववत्संयुक्तं पाणि- इयं मेादुपरि निधीयते तद्गुप्तासनमिति ॥ ३७ ॥

भाषार्थ-इसकोही कोई सिद्धासन कहतेहैं और कोई वज्रासन कहते हैं और कोई मुक्तासन और कोई गुप्तासन कहतेहैं अर्थात् इस सिद्धासनके ही ये भी नाम हैं और आसनके जो भलीप्रकार ज्ञाता हैं वे इन चारों आसनोंमें यह भेद ( फरक ) कहते हैं कि जिसमें वाम पादकी पाष्णि को लिंगके स्थानपर लगाकर और दक्षिणपादकी पाणि ( एडी ) को लिंगके ऊपर रखकर स्थित हो वह सिद्धासन कहाताहै और जहां घाम पाष्णिको लिंगके स्थानमें और दक्षिण पादकी पार्ष्णिको लिंगके ऊपर लगाकर स्थिति करै वह वज्रासनभी कहाताहै अर्थात् इन दोमें भेद नहीं हैं और जहां दक्षिण और वाम पादकी दोनों पाणियोंको ऊपर नीचे मिलाकर योनिके स्थानमें लगाकर स्थितहो

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( ) | [" ३६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः वह मुक्तासन कहाताहै और जहां पूर्वोक्त रीतिसे मिलाई दोनों पाणियोंको लिंगसे ऊपर रखकर स्थितहो वह गुप्तासन कहाताहै ॥ ३७ ॥

यमेव मिताहारमहिंसां नियमेष्विव ॥ मुख्य सर्वासनेष्वेकं सिद्धाः सिद्धासनं विदुः॥ ३८॥

अथ सप्तभिः श्लोकः सिद्धासनं प्रशंसति-यमेष्वित्यादिभिः ॥ मेषु मिताहारमिव । मिताहारो वक्ष्यमाणः ' सुस्निग्धमधुराहारः इत्यादिना । नियमेषु अहिंसामिव । सर्वाणि यान्यासनानि तेषु सिद्धाः एकं सिद्धासनं मुख्यं विदुरिति संबंधः ॥ ३८ ॥

भाषार्थ--अब सात श्लोकोंसे सिद्धासनकी प्रशंसा करते हैं कि, जैसे दश प्रकारके यमोंमें प्रमित भोजन मुख्यहै और नियमोंमें अहिंसा मुख्य है इसीप्रकार संपूर्ण आसनोंमें सिद्धासन सिद्धोंने मुख्य कहाहै । और प्रमित भोजन इस वचनसे कहेंगे कि, भली प्रकार स्निग्ध ( चिकना ) और मधुर आदि जो भोजन वह मिताहार कहताहै ॥ ३८ ॥

चतुरशीतिपीठेषु सिद्धमेव सदाभ्यसेत् ॥ द्वासप्ततिसहस्राणां नाडीनां मलशोधनम् ॥ ३ ९ ॥ चतुरशीतीति ॥ चतुरधिकाशीतिसंख्याकानि यानि पीठानि तेषु सिद्धमेव सिद्धासनमेव सदा सर्वदाभ्यसेत् । सिद्धासनस्य सदाभ्यासे हेतुगर्भं विशेषणम् । द्वासप्ततिसहस्राणां नाडीनां मल- शोधनं शोधकम् ॥ ३ ९ ॥ भाषार्थ -चौरासी जो आसन हैं उनमें सदैव सिद्धासनका अभ्यास करै क्योंकि यह आसन बहत्तर नाडियोंके मलोंका शोधक है ॥ ३ ९ ॥ आत्मध्यायी मिताहारी यावद्वा दशवत्सरम् ॥ सदासिद्धासनाभ्यासाद्योगी निष्पत्तिमाप्नुयात्॥४० ॥

आत्मध्यायीति ॥ आत्मानं ध्यायतीत्यात्मध्यायी मित आ- हारोऽस्यास्तीति मिताहारी यावंतो द्वादश वत्सराः यावद्वादशव-

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३७ त्सरम् | ' यावदवधारणे ' इत्यव्ययीभावः समासः । द्वादशवत्सर- पर्यंत मित्यर्थः । सदा सर्वदा सिद्धासनस्याभ्यासाद्योगी योगाभ्यासी निष्पत्ति योगसिद्धिमाप्नुयात्प्राप्नुयात् । योगांतराभ्यासमंतरेण सिद्धासनाभ्यासमात्रेण सिद्धिं प्राप्नुयादित्यर्थः ॥ ४० ॥

भाषार्थ-आत्माके ध्यानका कर्ता और मिताहारी होकर दशवर्ष पर्यंत सदैव सिद्धासनके अभ्यास करनेसे योगी योगकी सिद्धिको प्राप्त होता है अर्थात् अन्य-योगोंके अभ्यासके विनाही केवल सिद्धासनकेही अभ्याससे सिद्धिको प्राप्त होताहै ॥ ४० ॥

किमन्यैर्बहुभिः पीठैः सिद्धे सिद्धासने सति ॥ प्राणानिले सावधाने बद्धे केवलकुंभके ॥ ४१ ॥

किमन्यैरिति ॥ सिद्धासने सिद्धे सत्यन्यैर्वहुभिः पीठैरासनैः किम् । न किमपीत्यर्थः । सावधाने प्राणानिले प्राणवायौ केवलकुंभके बद्धे सति ॥ ४१ ॥

भाषार्थ -सिद्धासनके सिद्ध होनेपर अन्य बहुतसे आसनोंसे क्या फल है अर्थात् कुछ नहीं है और इस सिद्धासनसे सावधान प्राणवायुके केवल कुंभक प्राणायाम बँधनेपर अन्य सब आसन वृथा समझने ॥ ४१ ॥

उत्पद्यते निरायासात्स्वयमेवोन्मनी कला ॥ avata ढे सिद्धे सिद्धासने सति ॥ बंधत्रयमनायासात्स्वयमेवोपजायते ॥ ४२ ॥

उत्पद्यत इति ॥ उन्मनी उन्मन्यवस्था सा कलेवाह्लादकत्वाच्चंद्र-लेखेव निरायासादनायासात्स्वयमेवोत्पद्यत उदेति-तथेति । तथोक्त- प्रकारेणैकस्मिन्नेव सिद्धे दृढे बद्धे सति बंधत्रयं मूलबंधोड्डीयानबंध-जालंधरबंधरूपमनायासात् ' पाष्णिमार्गेण संपीड्य योनिमाकुंचयेहु-दम् ' इत्यादिवक्ष्यमाणमूलबंधादिष्वायासस्तं विनैव स्वयमेवोपजायते स्वत एवोत्पद्यत इत्यर्थः ॥ ४२ ॥

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( ) [ ३८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः भाषार्थ और इस सिद्धासनके प्रतापसेही चंद्रमाकी कलाके समान उन्मनी कला बिनापरिश्रम उत्पन्न होजाती है और तिसीप्रकार एक दृढ सिद्धासनके सिद्ध होनेपर मूलबंध उड्डीयानबंध जालंधरबंधरूप तीनों बंध विनाश्रम स्वयंही होजातेहैं । अर्थात् पाष्णिके मार्गसे योनि ( लिंग ) को भली प्रकार दबाकर गुदाका संकोच करै इत्यादि वचनोंसे जो मूलबंध आदिमें परिश्रम कहा है उसके किये बिनाही तीनों बंध सिद्ध होजाते हैं । ४२ ॥ नासनं सिद्धसदृशं न कुंभः केवलोपमः ॥ न खेचरीसमा मुद्दा न नादसदृशो लयः ॥ ४३ ॥

नासनमिति ॥ सिद्धेन सिद्धासनेन सदृशमासनम् । नास्तीति शेषः । केवलेन केवलकुंभकेनोपमीयत इति केवलोपमः कुंभः कुंभको

नास्ति । खेचरीमुद्रासमा मुद्रा नास्ति । नादसदृशो लयो लयहेतु- नास्ति ॥ ४३ ॥

भाषार्थ -सिद्धासनके समान अन्य आसन नहीं है और केवल कुंभकके समान कुंभक नहीं है और खेचरी मुद्राके समान मुद्रा नहीं है और नादके समान अन्य ब्रह्ममें लयका हेतु नहीं है ॥ ४३ ॥

अथ पद्मासनम् ॥ वामोरूपरि दक्षिणं च चरणं संस्थाप्य वामं तथा दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढम् ॥ अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबुकं नासाग्रमालोकये- देतद्वयाधिविनाशकारि यमिनां पद्मासनं प्रोच्यते४४ पद्मासनं वक्तुमुपक्रमते अथेति ॥ पद्मासनमाह-वामोरूप- रीति ॥ वामो य ऊरुस्तस्योपरि दक्षिणम् । चकारः पादपूरणे । संस्थाप्य सम्यगुत्तानं स्थापयित्वा वामं सव्यं चरणं तथा दक्षिणचरण- वद्दक्षो दक्षिणो य ऊरुस्तस्योपरि संस्थाप्य पश्चिमेन भागेन पृष्ठभागे-नेति । विधिर्विधानं करयोरित्यर्थात् । तेन कराभ्यां हस्ताभ्यां दृढं

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३ ९ यथा स्यात्तथा पादांगुष्ठौ धृत्वा गृहीत्वा । दक्षिणं करं पृष्ठतः कृत्वा । वामोरुस्थितदक्षिणचरणांगुष्ठं गृहीत्वा वामकरं पृष्ठतः कृत्वा । दक्षिणो-रुस्थितवामचरणांगुष्ठं गृहीत्वेत्यर्थः । हृदये हृदयसमीपे । सामीपिका-धारे सप्तमी । चिबुकं हनुं निधायोरसश्चतुरंगुलांतरे चिबुकं निधायेति रहस्यम् । नासाग्रं नासिकाग्रमालोकयेत्पश्येद्यत्रैतद्यमिनां योगिनां व्याधेर्विनाशं करोतीति व्याधिविनाशकारि पद्मासनमेतन्नामकं प्रोच्यते सिद्धैरिति शेषः ॥ ४४ ॥

भाषार्थ- अब पद्मासनको कहते हैं कि, वाम जंघाके ऊपर सीधे दक्षिण चरणको भलीप्रकार स्थापन करके और तिसीप्रकार सीधे वाम चरणको दक्षिण जंघाके ऊपर भलीप्रकार स्थापन करके और पृष्ठभागसे जो विधि उससे दोनों हाथोंसे दृढ रीति चरणोंके अँगूठोंको ग्रहण ( पकड ) कर अर्थात् पृष्ठपर किये दक्षिणहाथसे वाम जंघापर स्थित दक्षिण चरणके अँगूठेको ग्रहण करके और पृष्ठपर किये वाम हाथसे दक्षिण जंघापर स्थित वाम चरणके अँगूठेको ग्रहण करके और हृदयके समीप चार अंगुलके अंतर चिबुक ( हनु वा ठोडी ) रखकर अपनी नासिकाके अग्रभागको देखता है अर्थात् ऐसी स्थिति जिसमें हो यह योगियोंकी संपूर्ण व्याधियोंका विनाशकारक पद्मासन सिद्धोंने कहाहै अर्थात् इस आसनके लगानेसे संपूर्ण व्याधि नष्ट होती हैं ॥ ४४ ॥

उत्तान चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः ॥ उरुमध्ये तथौत्तानो पाणी कृत्वा ततो दृशौ ॥४५ ॥

मत्स्येंद्रनाथाभिमतं पद्मासनमाह-उत्तानाविति ॥ उत्तानौ ऊरु- संलग्नपृष्ठभागौ चरणौ पादौ प्रयत्नतः प्रकृष्टाद्यत्नादूरुसंस्थावूर्वीः सम्यक् तिष्ठत इत्थूरुसंस्थौ तादृशौ कृत्वा । ऊर्वोर्मध्ये रुजमध्ये । तथा चार्थे | पाणी करावृत्तानौ कृत्वा । ऊरुसंस्थोत्तानपादोभयपा- ष्णिसंलग्नपृष्टं सव्यं पाणिमुत्तानं कृत्वा तदुपरि दक्षिणं पाणि चोत्तानं

कृत्वेत्यर्थः । ततस्तदनंतरं दृशौ दृष्टी ॥ ४५ ॥

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( ) [ ४० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः भाषार्थ- अब मत्स्येंद्रनाथके कहे पद्मासनको कहते हैं कि, उत्तान चर- णोंको बडे यत्नसे जंघाओंपर स्थित करके अर्थात् जंघाओंपर लगा है पृष्ठभाग जिनका ऐसे चरणोंको उत्तम यत्नसे जंघाओंपर स्थित करके और जंघाओंके मध्यमें उत्तान ( सीधे ) हाथोंको रखकर तात्पर्य यहहै कि, जंघाओंपर स्थित जो चरणोंकी दोनों पाष्णि उसमें लगा है पृष्ठभाग जिसका ऐसे वामहाथको उत्तान करके और उसके ऊपर दक्षिण पाष्णिको उत्तान करके और फिर दृष्टि ( नेत्रों ) को ॥ ४५ ॥

नासाग्रे विन्यसेद्राजदंतमूले तु जिह्वया ॥ उत्तंभ्य चिबुकं वक्षस्युत्थाप्य पवनं शनैः ॥४६॥

नासाग्र इति । नासाग्रे नासिकाग्रे विन्यसेद्विशेषेण निश्चलतया न्यसेदित्यर्थः ॥ राजदंतानां दंष्ट्राणां सव्यदक्षिणभागे स्थितानां मूले उभे मूलस्थाने जिह्वया उत्तंभ्य ऊर्ध्वं स्तंभयित्वा । गुरुमुखादवगं- तव्योऽयं जिह्वाबंधः चिबुकं वक्षसि निधायोत शेषः । शनैर्मदंमंद पवनं वायुमुत्थाप्य । अनेन मूलबंधः प्रोक्तः । मूलबंधोऽपि गुरुसु- खादेवावगंतव्यः । वस्तुतस्तु जिह्वाबधेनैवायं चरितार्थ इति हठर- हस्यविदः ॥ ४६ ॥

भाषार्थ -अपनी नासिकाके अग्रभागमें निश्चलरूपसे लगा दे और राज- दतों ( दाङ ) के मूलोंको जिह्वासे ऊपर स्तभंन (थांभना ) करके और चिबुकको वक्षस्थलपर रखकर यह जिह्नाका बंधन गुरुके मुखसे जानने योग्य है-और शनैः २ पवनको उठाकर इससे मूल बंध कहा है यह भी गुरुके मुखसेही जानने योग्यहै हठरहस्य ( सिद्धांत घा तत्व ) के ज्ञाता तो यह कहते हैं कि, जिह्वाके बंधसेही मूलबंध होसक्ता है ॥ ४६ ॥

इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधिविनाशनम् ॥ दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते भुवि ॥ ४७ ॥

इदमिति ॥ एवं यत्रास्यते तदिदं पद्मासनं पद्मासनाभिधानं प्रोक्तम् । आसनज्ञैरिति शेषः । कीदृशं सर्वेषां व्याधीनां विशेषेण