हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 31–40
हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 31–40
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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २१ सदा नित्यं योगमेवाभ्यसेत् । एवशब्देनाभ्यासांतरस्य योगे विघ्नक- रत्वं सूचितम् । तदुक्तं योगबीजे-' मरुज्जयो यस्य सिद्धस्तं सेवेत गुरुं सदा । गुरुवप्रसादेन कुर्यात्प्राणजयं बुधः ॥ ' राजयोगे-' वेदांततकक्तिभिरागमैश्च नानाविधैः शास्त्रकदंवकैश्च । ध्यानादिभिः सत्करणैर्न गम्यश्चिंतामणिकगुरुं विहाय ॥ ' स्कंदपुराणे-' आ-चार्याद्योगसर्वस्वमवाप्य स्थिरधीः स्वयम् । यथोक्तं लभते तेन प्राप्नोत्यपि च निर्वृतिम् ॥ सुरेश्वराचार्य:- गुरुप्रसादाल्लभते योग-अष्टांगसंयुतम् । शिवप्रसादालभते योगसिद्धिं च शाश्वतीम् ॥ यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रका- ' 7 शंते महात्मनः इति श्रुतिश्च आचार्यवान्पुरुषो वेदइति च ॥ १४ ॥
भाषार्थ - मठके लक्षण कहकर मठमें करने योग्य कमको कहते हैं कि, संपूर्ण चिंताओंसे रहित मनुष्य इसप्रकारके मठमें स्थित होकर गुरुने उपदेश किया जो मार्ग उससे सदैव योगका अभ्यास करे । और यहां एवं पदसे यह सूचित किया कि, अन्य कर्मका अभ्यास विन्नकारी होताहै. सोई योगबीजमें कहाहै कि, जिसने वायुको जीत रक्खाहो उस गुरुकी सदैव सेवा करे और बुद्धिमान् मनुष्य गुरुके मुखारविंदके प्रसादसे प्राणोंका जय करै । राजयोगमें भी लिखाहै कि, वेदांत और तर्कोंके वचन वेद और नाना प्रकारके शास्त्रोंके समूह और ध्यान आदि और वशीभूत इंद्रिये इनसे चिन्तामणि ( योग ) की प्राप्ति एक गुरुको छोड़कर नहीं होती अर्थात् गुरुके द्वारा हि योगकी प्राप्ति होती हैं । स्कंदपुराणमें भी लिखा है कि, स्थिर बुद्धि मनुष्य आचार्य गुरुसे योगके सर्वस्त्र ( पूर्ण ) को जानकर यथोक्त ( शास्त्रोक्त ) फलको प्राप्त होताहै और निर्वृत्ति ( आनंद ) कोभी प्राप्त होताहै. सुरेश्वराचार्यने भी कहाहै कि, गुरुके प्रसादसे अष्टांगसहित योगको प्राप्त होताहै और शिव- जीके प्रसादसे सनातनकी जो योगसिद्धि उसको प्राप्त होताहै, जिस- की देवतामें परभ भक्ति है और जैसी देवतामें है वैसी ही भक्ति गुरुमें है उस महात्माको शास्त्रमें कहे ये सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं और श्रुतिमें भी कहा है
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( ) [: २२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश कि, वही पुरुष जानताहै जो भाचार्य वालाहै 1। भावार्थ यह है कि, इस पूर्वोक्त प्रकारके मठमें स्थित होकर संपूर्ण चिंताओंसे रहित मनुष्य गुरुके उपदेश किये मार्गसे सदैव योगका अभ्यास करे ॥ १४ ॥
अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमग्रहः ॥ जनसंगश्च लौल्यं च षभियोगो विनश्यति॥ १५ ॥
अथ योगाभ्यासप्रतिबंधकानाह-अत्याहार इति ॥ अतिशयित आहारोऽत्याहारः क्षुधापेक्षयाधिकभोजनम् । प्रयासः श्रमजननानु- कुलो व्यापारः । प्रकृष्टो जल्पः प्रजल्पो बहुभाषणं शीतोदकेन प्रातःस्नाननक्तभोजनफलाहारादिरूपनियमस्य ग्रहणं नियमग्रहः । जनानां संगो जनसँगः । कामादिजनकत्वात् । लोलस्य भावः लौल्यं चांचल्यम् । षडृभिरत्याहारादिभिरभ्यासप्रतिबंधात् । योगो विन- यति विशेषेण नश्यति ॥ १५ ॥
भाषार्थ--अब योगाभ्यासके प्रतिबंधकोंको कहते हैं कि, अत्याहार अर्थात् क्षुधासे अधिक भोजन प्रयास अर्थात् परिश्रम जिसमें हो ऐसा व्यापार प्रजल्प ( बहुत बोलना ) नियमोंका ग्रहण अर्थात् शीतल जलसे प्रातःकालस्नान, रात्रिमें ही भोजन फलाहार आदिका नियम करना और जनोंका संग क्योंकि भी काम आदिको पैदा करताहै और चंचलता इन अत्याहार आदि छः इसे योग विशेषकर नष्ट होताहै ॥ १ ९ ॥ उत्साहात्साहसादैर्यात्तत्त्वज्ञानाच्च निश्चयात् ॥ जनसंगपरित्यागात्षद्भिर्योगः प्रसिद्ध्यति ॥ १६ ॥
अथ योगसिद्धिकरानाह-उत्साहादिति ॥ विषयप्रवणं चित्तं निरोत्स्याम्येवेत्युद्यमम् उत्साहः । साध्यत्वासाध्यत्वे परिभाव्य सहसा प्रवृत्तिः साहसम् । यावज्जीवनं सेत्स्यत्येवेत्यखेदो धैर्यम् । विषया मृगतृष्णाजलवदसंत:, ब्रह्मैव सत्यमिति वास्तविकं ज्ञानं तत्त्वज्ञानं योगानां वास्तविकं ज्ञानं वा । शास्त्रगुरुवाक्येषु विश्वासो निश्वयः
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] | ( ) १. संस्कृतटीका--भाषाटीकासमेता २३ श्रद्धेति यावत् । जनानां योगाभ्यासप्रतिकूलानां यः संगस्तस्य परि-त्यागात् । षडूभिरेभिर्योगः प्रकर्षेणाविलंबेन सिद्धयतीत्यर्थः ॥ १६ ॥
भाषार्थ -अब योग साधकोंको कहते हैं कि, विषयोंमें लगे चित्तकोभी रोकलूंगा यह उद्यमरूप उत्साह और साध्य असाध्यको विचार कर शीघ्र प्रवृत्ति -रूप साहस और धैर्य जीवन पर्यंतमें तो सिद्ध होहोगा इस खेदके अभावको धैर्य कहते हैं और मृगतृष्णाके जलकी तुल्य विषय मिथ्या है और ब्रह्मही सत्य है यह वास्तविक ( सत्य ) ज्ञानरूप तत्त्वज्ञान और निश्चय अर्थात् शास्त्र और गुरुके वाक्योंमें विश्वास श्रद्धा और योगाभ्यासके विरोधीजनोंका जो समागम परित्याग इन छः वस्तुओंसे योग शीघ्र सिद्ध होताहै ॥ १६ ॥
अथ यमनियमाः ।
" अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्य क्षमा धृतिः ॥
दयार्जवं मिताहारः शौचं चैव यमा दश ॥ १ ॥
तपः संतोष आस्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम् ॥
सिद्धांतवाक्यश्रवणं ह्रीमती च तपो हुतम् ॥ २ ॥
नियमा दश संप्रोक्ता योगशास्त्रविशारदैः ” ॥
भाषार्थ -हिंसाका त्याग, सत्य, चोरीका त्याग, ब्रह्मचर्य, क्षमा, धीरता- दया नम्रता, प्रमितभोजन और शुचिता ये दश यम कहाते हैं- और तप, संतोष, भास्ति- कता, ( परलोकको मानना )-दान, ईश्वरका पूजन, सिद्धांतवाक्योंका श्रवण, लज्जा, बुद्धि, तप और होम ये दश नियम योगशास्त्रके पंडितोंने कहे हैं ॥ २ ॥
ये अढाई श्लोक प्रक्षिप्त हैं ।
हठस्य प्रथमांगत्वादासनं पूर्वमुच्यते ॥
कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चांगल। घवम् ॥ १७॥
आदावासनकथने संगति सामान्यतस्तत्फलं चाह-हठस्येति ॥
हठस्य । ' आसनं कुंभकं चित्रं मुद्राख्यं करणं तथा । अथ नादा-
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( ) [ २४ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः नुसंधानम् ' इति वक्ष्यमाणानि चत्वार्थंगानि । प्रत्याहारादिसमा- तानां नादानुसंधानेंतर्भावः । तन्मध्ये आसनस्य प्रथमांगत्वा-त्पूर्वमासनमुच्यत इति संबंधः । तदासनस्थैर्य देहस्य मनसश्चाञ्चल्य-रूपरजोधर्मनाशकत्वेन स्थिरतां कुर्यात् । 6 आसनेन रजो हंति इति वाक्यात् | आरोग्यं चित्तविक्षेपकरोगाभावः । रोगस्य चित्त- विक्षेपकत्वमुक्तं पातंजलसूत्रे - ' व्याधिरुत्थानसंशयप्रमादालस्याविर- तिभ्रांतिदर्शनालब्धभूमिकत्वाऽनवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽतरायाः ' इति । अंगानां लाघवं लघुत्वं गौरवरूपतमोधर्मनाशकत्वमप्येतेनो- क्तम् । चकारात्क्षुद्वृदयादिकमपि बोध्यम् ॥ १७ ॥
भाषार्थ -प्रथम आसनके कथनमें संगतिको और आसनके फलको कहते हैं कि, हठयोगका प्रथम अंग होनेसे आसनको प्रथम कहते हैं कि, ये योगके चार अंग कहेंगे कि, आसन कुंभक ( प्राणायाम ) विचित्र मुद्राओंको करना और नादका अनुसंधान और प्रत्याहारसे समाधिपर्यतोंका अंतर्भाव नादमें है उन चारोंमें आसन प्रथम अंग है इससे उसकाही पहिले वर्णन करते हैं कि, तिस आसनकी स्थिरता इसलिये करै कि, देह और मनकी चंचलतारूप जो रजोगुणका धर्म उसका नाशक आसनहै क्योंकि इस वचनमें यह लिखाहै कि, योगी आसनसे रजोगुणको नष्ट करताहै और आरोग्यकारकहै अर्थात् चित्तको विक्षेपक रोग नहीं होताहै क्योंकि पतंजलिके इस सूत्रमें रोगकोभी चित्तका विक्षेपक कहाहै कि, व्याधि- उत्थान संशय -प्रमाद -आलस्य – अविरति-भ्रांति दर्शन -अलब्धभूमि ( पूर्वोक्त भूमियों का न मिलना ) अनवस्थित ( चंचलता ) ये चित्तके विक्षेपरूप विघ्न हैं और अंगोंका लावत्र क्योंकि वह लाघव गौरवरूप तमोगुणके धर्मका नाशक है और चकारके पढनेसे क्षुधाकी वृद्धि आदिभी समझने अर्थात् ऐसा आसन हो जो स्थिर नीरोग अंगका लावव उत्पन्नकरे और जिससे क्षुधा न वढै ॥ १७ ॥
वसिष्ठाद्यैश्च मुनिभिर्मत्स्येन्द्राद्यैश्व योगिभिः ॥ अंगीकृतान्यासनानि कथ्यते कानिचिन्मया ॥१८॥
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] ( ) १ संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेता । २५ वसिष्ठादिसंमतासनमध्ये श्रेष्ठानि मयोच्यंत इत्याह-वसिष्ठाद्यै- रिति ॥ वसिष्ठ आद्यो येषां याज्ञवल्क्यादीनां तैर्मुनिभिर्मननशीलैः । चकारान्मंत्रादिपरैः । मत्स्येंद्र आद्यो येषां जालंधरनाथादीनां तैः । योगिभिः हठाभ्यासिभिः । चकारान्मुद्रादिपरैः । अंगीकृतानि 'चतुरशीत्यासनानि तन्मध्ये कानिचित् श्रेष्ठानि मया कथ्यते । यद्य- प्युभयोराप मननहठाभ्यासौ स्तस्तथापि वसिष्ठादीनां मननं मुख्यं मत्स्येंद्रादीनां हठाभ्यासो मुख्य इति पृथग्ग्रहणम् ॥ १८ ॥
भाषार्थ -वसिष्ट आदिकोंके संमत जो आसन हैं उनमें श्रेष्ठ २ आसनोंके वर्णनकी प्रतिज्ञा करते हैं कि, वसिष्ट है आदिमें जिनके ऐसे मननके कर्ता मुनि- योंने और चकारके पढनेसे मंत्रके ज्ञाताओंने और मत्स्येंद्रहै आदिमें जिनके ऐसे योगियों ( जालंधरनाथ आदि ) ने अर्थात् हठयोगके अभ्यासियोंने और चकार के पढनेसे मुद्रा आदिके ज्ञाताओंने अंगीकार किये जो चौराशी ८४ आसन हैं उनमें कितनेक श्रेष्ठ आसनोंको मैं कहताहूँ यद्यपि दोनोंको मनन और हठयोगका अभ्यास था तथापि वसिष्ठ आदिकोंका तो मनन मुख्य रहाऔर मत्स्येंद्र आदि--कोंका हठयोगका अभ्यास मुख्य रहा इससे दोनोंको पृथक् पृथक् पढाहै ॥ १८ ॥
जानूवरंतरे सम्यकृत्वा पादतले उभे ॥ ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥१ ९॥ तत्र सुकरत्वात्प्रथमं स्वस्तिकासनमाह -जानूर्वोरिति ॥ जानु च ऊरुश्च । अत्र जानुशब्देन जानुसंनिहितो जंघाप्रदेशो ग्राह्यः । घोवरिति पाठस्तु साधीयान् । तयोरंतरे मध्ये उभे पादयोस्तले प्रदेश कृत्वा ऋकायः समकायः यत्र समासीनो भवेत्तदासर्न स्वस्तिकं स्वस्तिकाख्यं प्रचक्षते वदंति । योगिन इति शेषः । श्रीधरे- णोक्तम्-' ऊरुजंघांतराधाय प्रपदे जानुमध्यगे । योगिनो यदव- स्थानं स्वस्तिकं तद्विदुर्बुधाः ॥ ' इति ॥ १ ९ ॥। भाषार्थ-स्वस्तिक आसनको कहते हैं कि जानु ( गोडे ) और जंघाओंके बीचमें चरणतल अर्थात् दोनों तरवाओंको लगाकर जो सावधानीपूर्वक बैठना उसे स्वस्तिकआसन कहतेहैं ॥ १ ९ ॥
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( ) | [ २६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः सव्ये दक्षिणशुल्कं तु पृष्ठपार्श्वे नियोजयेत् ॥ दक्षिणेsपि तथा सव्यं गोमुखं गोमुखाकृति ॥ २० ॥
गोमुखासनमाह - सव्य इति ॥ सव्ये वामे पृष्ठस्य पार्श्वे संप्रदा-मात्कटेरधोभागे दक्षिणं गुल्कं नितरां योजयेत् । गोमुखस्याकृतिर्यस्य तत्तादृशं गोमुखसंज्ञकमासनं भवेत् ॥ २० ॥
भाषार्थ -गोमुख आसनको कहते हैं कि, कटिके वामभागमें दहना गुल्फ टकना और दक्षिणभागमें बामटकनेको लगाकर जो गोमुखके समान आकार हो-जाताहै उसे गोमुखआसन कहते हैं ॥ २० ॥
एकं पादं तथैकस्मिन्विन्यसेदुरुणि स्थितम् ॥ इतरस्मिंस्तथा चोरुं वीरासनमितीरितम् ॥ २१ ॥
वीरासनमाह-एकमिति ॥ एकं दक्षिणं पादम् । तथा पादपूरणे । एकस्मिन्वामोरुणि स्थितं विन्यसेत् । इतरस्मिन्वामे पादे ऊरु
दक्षिणं विन्यसेत् । तद्वीरासनमितीरितं कथितम् ॥ २१ ॥
भाषार्थ- वीरासनको कहते हैं कि, एकचरणको वाम जंवापर और दूस- रेको दक्षिण जंघापर रखकर वीरासन होताहै ॥ २१ ॥
गुदं निरुद्ध गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमेण समाहितः ॥ कूर्मासनं भवेदेतदिति योगविदो विदुः ॥ २२ ॥
कूर्मासनमाह-गुदमिति ॥ गुल्फाभ्यां गुदं निरुद्धय नियम्य
व्युत्क्रमेण यत्र सम्यगाहितः स्थितो भवेत् । एतत्कूर्मासनं भवेत् ।
इति योगविदो विदुरित्यन्वयः ॥ २२ ॥
भाषार्थ-कूर्मासनको कहतेहैं दोनों टकनोंसे गुदाको विपरीत क्रमसे अर्थात् दक्षिणसे वामभाग वामसे दक्षिण भागको रोककर जो सावधानीसे बैठजाय उसे कूर्मासन कहते हैं ॥ २२ ॥
पद्मासनं तु संस्थाप्य जानुवरिंतरे करौ ॥ निवेश्य भूमौ संस्थाप्य व्योमस्थंकुक्कुटासनम्२३ ॥
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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २७ कुक्कुटासनमाह -पद्मासनं त्विति ॥ पद्मासनं तु ऊर्वोरुपरि उत्ता-नचरणस्थापनरूपं सम्यकू स्थापयित्वा । जानुपदेन जानुसंनिहितों जंघाप्रदेशः । तच्च ऊरुश्च जानूरू तयोरंतरे मध्ये करौ निवेश्य भूमौ संस्थाप्य । करावित्यत्रापि संबध्यते । व्योमस्थं खस्थं पद्मासन-सदृशं यत्तत्कुक्कुटासनम् ॥ २३ ॥
I भाषार्थ-अब- कुक्कुटासनको कहते हैं कि, पद्मासनको लगाकर अर्थात्. जंघाओंके ऊपर उत्तान ( खडे ) दोनों चरणोंको स्थापन करके और जानु ( गोडे ) और जंबाओंके मध्यभागमें दोनों हाथोंको लगाकर और उन दोनों हाथोंको भूमिमें स्थापन करके आकाशमें स्थित रहे पद्मासनके समान जो यह. आसन है सो कुक्कुटासन कहाताहै अर्थात् मुरगेके समान स्थिति करनी ॥२३॥
कुक्कुटासनबंधस्थो दोर्भ्यां संबध्य कंधराम् ॥ भवेत्कूर्मवदुत्तान एतदुत्तानकूर्मकम् ॥ २४ ॥
उत्तानकूर्मकासनमाह-कुक्कुटासनेति ॥ कुक्कुटासनस्य यो बंध: पूर्वश्लोकोक्तस्तस्मिन् स्थितः दोय बाहुभ्यां कंधरां ग्रीवां संबध्य कूर्मवदुत्तानो यस्मिन्भवेदेतदासनमुत्तानकूर्मकं नाम ॥ २४ ॥
भाषार्थ -अब कूर्मासनको कहतेहैं कि, कुक्कुटासनके बंधनमें स्थित होकर अर्थात् कुक्कुटासनको लगाकर और दोनों भुजाओंसे कन्धरा ( ग्रीवा ) को भली प्रकार बाँधकर कूर्म ( कच्छप ) के समान उत्तान ( सीधा ) हो जाय तो वह उत्तानकूर्मासन कहाताहै ॥ २४ ॥
पादांगुष्टौ तु पाणिभ्यां गृहीत्वा श्रवणावधि ॥ धनुराकर्षणं कुर्याद्धनुरासनमुच्यते ॥ २५ ॥
धनुरासनमाह--पादांगुष्ठौ त्विति ॥ पाणिभ्यां पादयोरंगुष्ठों गृहीत्वा श्रवणावधि कर्णपर्यंतं धनुष आकर्षणं यथा भवति तथा कुर्यात् । गृहीतांगुष्ठमेकं पाणि प्रसारितं कृत्वा गृहीतांगुष्ठमितरं पाणि
कर्णपर्यंतमाकुचितं कुर्यादित्यर्थः । एतद्धनुरासनमुच्यते ॥ २५ ॥
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( ) [: २८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश भाषार्थ--अब धनुरासनकी कहते हैं कि, दोनों पादोंके अंगूठोंको हाथोंसे पकडकर श्रवण ( कान ) पर्यंत धनुषके समान आकर्षण करै ( खींचें ) उसको धनुरासन कहते हैं ॥ २५ ॥
वामोरुमूलार्पितदक्षपादं जानोबहिर्वेष्टित- वामपादम् || प्रगृह्य तिष्ठेत्परिवर्तितांगः श्रीमत्स्यनाथोदितमासनं स्यात् ॥ २६ ॥
मत्स्येंद्रासनमाह-वामोर्विति ॥ वामोरुमूलेऽर्पितः स्थापितो यो दक्षपादः तं संप्रदायात्पृष्ठतोगतवामपाणिना गुल्फस्योपरिभागे परिगृह्य जानोर्दक्षिणपादजानोर्बहिःप्रदेशे वेष्टितो यो वामपादस्तं वामपाद- जानोर्वहिर्वेष्टितदक्षिणपाणिनांगुष्ठे प्रगृह्य । परिवर्तितांगः वामभा- गेन पृष्ठतो मुखं यथा स्यादेवं परिवर्तितं परावर्तितमंगं येन स तथा तादृशो यत्र तिष्ठेत् स्थितिं कुर्यात्तदासनं मत्स्येंद्रनाथेनोदितं कथितं स्यात् । तदुदितत्वात्तन्नामकमेव वदति । एवं दक्षोरुमूलार्पित- वामपादं पृष्ठतोमतदक्षिणपाणिना प्रगृह्य वामजानोर्वहिर्वेष्टितदक्षपादं दक्षिणपादजानोर्वहिर्वेष्टितवामपाणिना प्रगृह्य । दक्षभागेन पृष्ठतो मुखं यथा स्यादेवं परिवर्तितांगश्राभ्यसेत् ॥ २६ ॥
भाषार्थ--अब मत्स्येंद्रासनको कहतेहैं कि, वामजंघाके मूलमें दक्षिण पादको रखकर और जानुसे बाहर वाम पादको हाथसे लपेटकर और पकडकर और परिवर्तित अंग होकर अर्थात् वाम भागसे पीठकी तर्फ मुखको करके जिस आसनमें टिकै वह मत्स्येन्द्रनाथका कहा मत्स्येंद्रासन होताहै । इसीप्रकार दक्षिणजंघाके मूलमें वामपादको रखकर और पीठपर गये दक्षिण हाथसे उसको ग्रहण करके और वामजानुसे बाहर हाथसे लपेटे दक्षिणपादको दक्षिण पादकी जानुसे बाहर लपेटे फिर उसको वाम हाथसे ग्रहण करके और दक्षिण- भागसे पीठकी तरफ मुखको करके भी हठयोगका अभ्यास करे अर्थात् यह भी एक मत्स्येंद्रासन है ॥ २६ ॥
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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २९ मत्स्येंद्रपीठं जठरप्रदीप्तिं प्रचंडरुग्मंडल- खंडनास्त्रम् || अभ्यासतः कुंडलिनीप्रबोधं चंद्रस्थिरत्वं च ददाति पुंसाम् ॥ २७ ॥
मत्स्येंद्रासनस्य फलमाह- मत्स्येंद्रेति ॥ प्रचंडं दुःसहं रुजां रोगाणां. मंडलं समूहः तस्य खंडने छेदनेऽस्त्रमस्त्रमिव तादृशं मत्येंद्रपीठं मत्यें-द्रासनम् । अभ्यासतः प्रत्यहमावर्तनरूपादभ्यासात् पुंसां जठरस्य जठराग्नेः प्रकृष्टां दीप्ति वृद्धिं ददाति । तथा कुडलिन्या आधारशक्तेः प्रबोधं निद्राभावं तथा चंद्रस्य तालुन उपरिभागे स्थितस्य नित्यं क्षरतः स्थिरत्वं क्षरणाभावं च ददातीत्यर्थः ॥ २७ ॥
भाषार्थ -अब मत्स्येन्द्रासनके फलको कहतेहैं कि, यह मत्स्येंद्रासन जठ- - रानिका दीपन ( अधिक ) करताहै क्योंकि यह आसन प्रचंडरोगोंका जो समूह उसके नाशकेलिये अस्त्रके समानहै और कुण्डलिनी जो आधार शक्तिहै उसके प्रबोध ( जागरण ) अर्थात् निद्राके अभावको और तालुके ऊपरके भागमें स्थित जो चंद्र ( नित्यझरेहै ) उसकी स्थिरताको अर्थात् झरनेके अभावको पुरुषोंको देताहै अर्थात् करताहै ॥। २७ ॥ प्रसार्य पादौ भुवि दंडरूपौ दोर्भ्यां पदाद्वितयं गृहीत्वा ॥ जानूपरिन्यस्तललाटदेशो वसेदिदं पश्चिमतानमाडुः ॥ २८ ॥
पश्चिमतानासनमाह-प्रसार्येति ॥ भुवि भूमौ दंडस्य रूपमिक रूपं ययोस्तौ दंडाकारौ श्लिष्टगुल्फौ प्रसार्य प्रसारितौ कृत्वा । दोर्भ्या- माकुंचिततर्जनीभ्यां भुजाभ्यां पदोः पदयोश्चाये अग्रभागौ तयोर्द्वि- तयं द्वयमंगुष्ठप्रदेशयुग्मं बलादाकर्षणपूर्वकं यथा जान्वधोभागस्य भूमेरुत्थानं न स्यात्तथा गृहीत्वा । जानोरुपरिन्यस्तो ललाटदेशों
येन तादृशो यत्र वसेत् । इदं पश्चिमताननामकमासनमाहुः ॥ २८ ॥
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( ) | [ ३० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः भाषार्थ --अअब पश्चिमतानासनको कहतेहैं कि, दंडके समान रूप जिनका ऐसे और मिलेहें गुल्फ जिनके ऐसे दोनोंचरणोंको भूमिपर फैलाकर और आकुंचित ( सुकडी ) है तर्जनीजिनकी ऐसी भुजाओंसे दोनों पादोंके दोनों अग्रभागोंको ग्रहण करके अर्थात्अंगूठोंको इसप्रकार पकडकर जैसे जानुओंके अवोभाग भूमिसे ऊपर न उठें और जानुओंके ऊपर रक्खाहै ललाट ( मस्तक ) भाग जिसने ऐसा होकर जहां पुरुष वसे उस आसनको पश्चिमतान आसन कहतेहैं ॥ २८ ॥
इति पश्चिमतानमासनाग्र्यं पवनं पश्चिमवाहिनं करोति ॥ उदयं जठरानलस्य कुर्यादुदरे कार्थ्य- मरोगतां च पुंसाम् ॥ २९ ॥
अथ तत्फलम्-इतीति ॥ इति पूर्वोक्तमासनेष्वय्यं मुख्यं पश्चि -मतानं पवनं प्राणं पश्चिमवाहिनं पश्चिमेन पश्चिममार्गेण सुषुम्ना- मार्गेण वहतीति पश्चिमवाही तं तादृशं करोति । जठरानलस्य जठरे योऽनलोऽग्निस्तस्योदयं वृद्धिं कुर्यात् । उदरे मध्यप्रदेशे का कृशत्वं कुर्यात् । अरोगतामारोग्यं चकारान्नाडीवलनादिसाम्यं कुर्यात् ॥ २ ९ ॥ भाषार्थ - अब इस आसनके फलको कहतेहैं कि, संपूर्ण आसनोंमें मुख्य यह पश्चिमताननामका आसन प्राणरूप पवनको पश्चिमवाही करताहै अर्थात् सुषुम्ना नाडी मार्गसे प्राण बहने लगताहै और जठराग्मिको उत्पन्न कर-ताहै अर्थात् बढाताहै और उदरके मध्यमें कृशताको करताहै और पुरुषोंकी अरोगता ( रोगका अभाव ) करताहै और चकारसे नाडियोंके चलन आदिक समताको करताहै ॥ २९ ॥
घरामवष्टभ्य करद्वयेन तत्कूर्परस्थापितनाभि- पार्श्वः ॥ उच्चासनो दंडवदुत्थितः स्यान्मायूरमे- तत्प्रवदंति पीठम् ॥ ३० ॥