हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 61–70

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 61–70

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ५१ इति कप्प्रत्ययः । पंचानां शाकानां समाहारः पंचशाकम् । तदुक्तं वैद्यके-'सर्वशाकमचाक्षुष्यं चाक्षुष्यं शाकपंचकम् । जीवंतीवास्तुम्- ल्याक्षी मेघनादपुनर्नवा' ॥ इति । मुद्रा द्विदलविशेषा आदिर्यस्य तन्मुद्रादि आदिपदेन आढकी ग्राह्या । दिव्यं निर्दोषमुदकं जलम् । यम एषामस्तीति यमिनः तेष्विद्रो देवश्रेष्ठो योगींद्रस्तस्य पर्थ्य हितम् ॥ ६२ ॥

भाषार्थ-अत्र योगियोंके पथ्यका वर्णन करते हैं कि, गेहूँ शालि ( चावल ) जौ और षाष्टिक ( सांठी ) और पवित्र अन्न ( श्यामाक नीवार आदि ) दूध घी खांड नौनी घी सिता ( मिसरी ) मधुर ( सहत ) सूँठ पटोल फल ( पर- वल ) आदि, पांच शाक मूंग आदि, आदि पदसे आढकी और दिव्य जल अर्थात् निर्दोष जल ये योगियोंमें जो इंद्रहैं उनके पथ्य हैं वैद्यकमें भी ये पांच शाक पथ्य कहे हैं कि, संपूर्ण शाक अचाक्षुष्यहैं अर्थात् नेत्रोंको हितकारी नहीं हैं किंतु ये पांच शाकही चाक्षुष्य हैं कि, जीवन्ती वास्तु ( बथुवा ) मूल्याक्षि मेघनाद और पुनर्नवा ॥ ६२ ॥

पुष्टं सुमधुरं स्त्रिग्धं गव्यं धातुप्रपोषणम् ॥ मनोभिलषितं योग्यं योगी भोजनमाचरेत् ॥६३॥

अथ योगिनो भोजननियममाह-पुष्टमिति ॥ पुष्टं देहपुष्टि -करमोदनादि सुमधुरं शर्करादिसहितं स्निग्धं सघृतं गव्यं गोदुग्ध- वृतादियुक्तं गव्यालाभे माहिषं दुग्धादि ग्राह्यम् । धातुप्रपोषणं लड्डुकापूपादि मनोभिलषितं पुष्टादिषु यन्मनोरुचिकरं तदेव योगिना भोक्तव्यम् । मनोभिलषितमपि किमविहितं भोक्तव्यं नेत्याह -योग्य-मिति । विहितमेवेत्यर्थः । योगी भोजनं पूर्वोक्तविशेषेण विशिष्टमा- चरेत्कुर्यादित्यर्थः । न तु सक्तुभर्जितान्नादिना निर्वाहं कुर्यादिति भावः ॥ ६३ ॥

भाषार्थ - अब योगी भोजनोंका नियम कहते हैं कि ओदन आदि देह पुष्टिकारक और शर्करा आदि मधुर और घृतसहित भोजन और दुग्ध घृत

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( ) [ ५२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः आदि गव्य यदि गौके घृत आदि न मिले तो भैसके ग्रहण करने और धातुपोषक ( लड्डू पूआ आदि ) इनमें जो अपने मनको वाञ्छित हो उस योग्य अर्थात् शास्त्रविहित भोजनको योगी करे और सत्तु भुने अन्न आदिसे निर्वाह न करै ॥ ६३ ॥

युवा वृद्धोऽतिवृद्धो वा व्याधितो दुर्बलोऽपि वा ॥ अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति सर्वयोगेष्वतंद्रितः ॥६४ ॥

योगाभ्यासिनो वयोविशेषारोग्याद्यपेक्षा नास्तीत्याह- युवेति ॥ युवा तरुणः वृद्धो वृद्धावस्थां प्राप्तः अतिवृद्धोऽतिवार्द्धकं गतो वा । अभ्यासादासनकुंभकादीनामभ्यसनात्सिद्धि समाधितत्फलरूपामा- मोति । अभ्यासप्रकारमेव वदन्विशिनष्टि-सर्वयोगेष्विति । सर्वेषु योगेषु योगांगेष्वतंद्रितोऽनलसः । योगांगाभ्यासात्सिद्धिमाप्नोती- त्यर्थः । जीवनसाधने कृषिवाणिज्यादौ जीवनशब्दप्रयोगवत्साक्षा- परंपरया वा योगसाधनेषु योगांगेषु योगशब्दप्रयोगः ॥ ६४ ॥

भाषार्थ-अब इस बातका वर्णन करते हैं कि, योगके अभ्यासीको अवस्था विशेष और आरोग्य आदिकी अपेक्षा नहीं है कि, युवा हो वृद्ध बा अतिवृद्ध हो रोगी हो वा दुर्बल हो अभ्याससे आसन कुंभक आदिके करनेसे समाधि और उसके फलको प्राप्त होता है । अभ्यासके स्वरूपको कहते हैं कि, संपूर्ण जो योगके अंग उनमें आलस्य न करें यहां योगके साधन योगांगोंमें इसप्रकार योग शब्दका प्रयोग है जैसे जीवनके साधन कृषि वाणिज्य आदिमें जीवन - शब्दका प्रयोग होताहै ॥ ६४ क्रियायुक्तस्य सिद्धिः स्यादक्रियस्य कथं भवेत् ॥ न शास्त्रपाठमात्रेण योगसिद्धिः प्रजायते ॥ ६५ ॥

अभ्यासादेव सिद्धिर्भवतीति द्रढयन्नाह द्वाभ्याम्-क्रियायुक्त- स्येति ॥ क्रिया योगांगानुष्ठानरूपा तया युक्तस्य सिद्धिर्योगसिद्धिः स्यात् । अक्रियस्य योगांगानुष्ठानरहितस्य कथं भवेन्न कथमपीत्यर्थः ।

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ५३ ननु योगशास्त्राध्ययनेन योगसिद्धिः स्यान्नेत्याह-नेति ॥ शास्त्रस्य योगशास्त्रस्य पाठमात्रेण केवलेन पाठेन योग्यस्य सिद्धिर्न प्रजायते नैव जायत इत्यर्थः ॥ ६५ ॥

भाषार्थ- अब अभ्याससे सिद्धि होती है इस बातको दृढ करनेके लिये दो २ श्लोकोंको कहते हैं कि, योगांगोंके करनेमें जो युक्त उस पुरुषको योग-सिद्धि होती है और जो योगांगोंको नहीं करता उप्तको योगीकी सिद्धि नहीं होती कदाचित् कहो कि, योगशास्त्रके पढनेसे सिद्धि होजायगी सो ठीक नहीं क्योंकि योगशास्त्रके केवल पढनेसे योगसिद्धि नहीं होती ॥ ६५ ॥

न वेषधारणं सिद्धेः कारणं न च तत्कथा ।

क्रियैव कारणं सिद्धेः सत्यमेतन्न संशयः ॥ ६६ ॥

नेति ॥ वेपस्य काषायवस्त्रादेः धारणं सिद्धेर्योगसिद्धेः कारणं न । तस्य योगस्य कथा वा कारणं न । किं तर्हि सिद्धेः कारणमि- त्यत आह-क्रियैवेति ॥ ६६ ॥

भाषार्थ-गेरुसे रंगे वस्त्र आदिका धारण सिद्धिका कारण नहीं और योगशास्त्रकी कथा भी सिद्धिका कारण नहीं यह सत्य है इसमें संशय नहीं ॥ ६६ ॥

पीठानि कुंभकाश्चित्रा दिव्यानि करणानि च ॥ सर्वाण्यपि हठाभ्यासे राजयोगफलावधि ॥ ६७ ॥

इति श्रीसहजानंदसंतानचिंतामणिस्वात्मारामयोगी- न्द्रविरचितायां हठयोगप्रदीपिकायामासनवि- धिकथनं नाम प्रथमोपदेशः ॥ १ ॥

योगांगानुष्ठानस्यावधिमाह -पीठानीति ॥ पीठान्यासनानि चित्रा अनेकविधाः कुंभकाः सूर्यभेदादयः दिव्यान्युत्कृष्टानि कारणानि महामुद्रादीनि हटसिद्धी प्रकृष्टोपकारकत्वं कारणत्वं हठाभ्यासे सर्वाणि

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( ) | [ ५४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः पीठकुंभककरणानि राजयोगफलावधि राजयोग एव फलं तदवधि तत्पर्यतं कर्तव्यानीति शेषः ॥ ६७ ॥

इति श्रीहठप्रदीपिकायां ब्रह्मानंदकृतायां ज्योत्स्नाभिधायां टीकायां प्रथमोपदेशः ॥ १ ॥

भाषार्थ- अत्र योगांगोंके करनेकी अवधिको कहते हैं कि, पूर्वोक्त आसन और अनेक प्रकारके कुंभक आदि प्राणायाम महामुद्रा आदि दिव्य करण ये संपूर्ण हठयोगके अभ्यासमें राजयोगके फलपर्यंत करने योग्य हैं अर्थात् ये राजयोगमें प्रकृष्ट उपकारक हैं क्योंकि प्रकृष्ट जो उपकारक वही करण होताहै ॥ ६७ ॥

इति श्रीसहजानंदसंतानचिन्तामणिस्वात्माराम योगीन्द्रविरचितहठयोगप्रदी- पिकायां लाँखप्रामनिवासि पं० मिहिरचंद्रकृतभाषाविवृतिसहि- `तायामासनविधिकथनं नाम प्रथमोपदेशः ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोपदेशः २. अथासने दृढे योगी वशी हितमिताशनः ॥ गुरूपदिष्टमार्गेण प्राणायामान्समभ्यसेत् ॥ १ ॥

अथासनोपदेशानंतरं प्राणायामान्वक्तुमुपक्रमते -अथेति ॥ अथेति मंगलार्थः । आसने दृढे सति वशी जिताक्षः हितं पथ्यं च तन्मितं च पूर्वोपदेशोक्तलक्षणं तत्तादृशमशनं यस्य स हितमिताशनः गुरुणीप- दिष्टो यो मार्गः प्राणायामाभ्यासप्रकारस्तेन प्राणायामान् वक्ष्यमाणा- न्सम्यगुत्साहसाहसधैर्यादिभिरभ्यसेत् । दृढे स्थिरे कक्कुटादिविवर्जिते सिद्धासनादाविति वा योजना ॥ १ ॥

भाषार्थ-आसनोंके उपदेशको कहकर प्राणायामोंके कहनेका प्रारंभ करते हैं । इस लोक अथशब्द मंगलके लिये है वा अनंतरका वाचकहै इसके अनंतर आसनोंकी दृढता होनेपर जीती हैं इंद्रियें जिसने हित ( पथ्य ) और पूर्वोक्त

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ५५ प्रमित है भोजन जिसका ऐसा योगी गुरुके उपदेश किये मार्गसे आगे घर्णनकिये प्राणायामोंका भलीप्रकार अभ्यास करे -अर्थात् उत्साह-साहस - धीरता आदिसे प्राणायामोंके करनेमें मनको लगावै ॥ १ ॥

चले वाते चलं चित्तं निश्वले निश्चलं भवेत् ॥ योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत् ॥२॥

' प्रयोजनमनुद्दिश्य न मंदोऽपि प्रवर्तते इति महदुक्तेः प्रयोजना-भावेन प्रवृत्त्यभावात्प्राणायामप्रयोजनमाह- चले वात इति ॥ वाते चले सति चित्तं चलं भवेत् । निश्चले वाते निश्चलं भवेच्चित्तमित्यत्रापि संबध्यते । वाते चित्ते च निश्चले योगी स्थाणुत्वं स्थिरदीर्घजी- वित्वमिति यावत् । ईशत्वं वामोति । ततस्तस्माद्वायुं प्राणं निरो- धयेत्कुंभयेत् ॥ २ ॥

भाषार्थ -कदाचित् कहो कि, प्रयोजनके बिना मंद भी प्रवृत्त नहीं होता-इस महान् पुरुषोंके वचनसे प्रयोजनके अभावसे प्राणायामोंमें योगीकी प्रवृत्ति नहीं होगी — इसलिये प्राणायामोंका प्रयोजन कहते हैं कि, प्राणवायुके चलायमान होनेसे चित्तभी चलायमान होता है -और प्राणवायुके निश्चल होनेपर चित्त भी निश्चल होता है-और प्राणवायु और चित्त इन दोनोंके निश्चल होनेपर योगी स्थाणुरूपको प्राप्त होता है अर्थात् स्थिर और दीर्घ कालतक जीता है तिससे योगी प्राणवायुका निरोध करै अर्थात् कुंभकप्राणायामोंको करै ॥ २ ॥

यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते ॥ मरणं तस्य निष्क्रांतिस्ततो वायुं निरोधयेत् ॥ ३ ॥

यावदिति ॥ देहे शरीरे यावत्कालं वायुः प्राणः स्थितः ताव- कालपर्यंत जीवनमुच्यते लोकैः । देहप्राणसंयोगोस्यैव जीवनपदार्थ- त्वात् । तस्य प्राणस्य निष्क्रांतिर्देहाद्वियोगे मरणमुच्यते । ततस्त- स्माद्वायुं निरोधयेत् ॥ ३ ॥

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( ) | [ ५६ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः भाषार्थ--जजबतक शरीरमें प्राणवायु स्थित है तबतकही जगत् जीवनको कहता है क्योंकि देह और प्राणका जो संयोग है वही जीवन कहाता है और उस प्राणवायुका जो देहसे वियोग ( निकसना ) उसकोही मरण कहते हैं तिससे जीवनके लिये प्राणवायुके निरोध ( रोकना ) रूप प्राणायामको करै ॥ ३ ॥

मलाकुलासु नाडीषु मारुतो नैव मध्यगः ॥ कथं स्यादुन्मनीभावः कार्यसिद्धिः कथं भवेत् ॥ ४ ॥

मलशुद्धे ईटसिद्धिजनकत्वं व्यतिरेकेणाह-मलाकुलाविति ॥ नाडीषु मलैराकुलासु व्याप्तासु सतीषु मारुतः प्राणो मध्यगः सुषु- नामार्गवाही नैव स्यात् । अपि तु शुद्धमलास्वेव मध्यगो भवतीत्यर्थः । उन्मनीभाव उन्मन्या भावो भवनं कथं स्यान्न कथमपीत्यर्थः । कार्यस्य कैवल्यरूपस्य सिद्धिर्निष्पत्तिः कथं भवेन्न कथंचिदपीत्यर्थः ॥ ४ ॥

भाषार्थ- अब मलकी शुद्धि हठयोगसिद्धिका जनक है इस बातको निषेध- खसे वर्णन करते हैं कि, जबतक नाडी मलसे व्याकुल ( व्याप्त ) हैं तबतक प्राण मध्यग नहीं होसकता अर्थात् सुषुम्ना नाडीके मार्गसे नहीं चल सकता किंतु मलशुद्धि होनेपरही मध्यग होसकता है तो मलसेयुक्त नाडियोंके विद्यमान रहते उन्मनीभाव कैसे होसकता है और मोक्षरूप कार्यकी सिद्धि कैसे होसक्ती है अर्थात् नहीं होती । सुषुम्नानाडीके प्राणसंचार होनेको उन्मनीभाव कहते हैं ॥ ४ ॥

शुद्धिमेति यदा सर्वे नाडीचक्रं मलाकुलम् ॥ तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणे क्षमः ॥ ५ ॥

अन्वयेनापि मलशुद्धेर्हठसिद्धिहेतुत्वमाह -शुद्धिमेतीति ॥ यदा यस्मिन्काले मलैराकुलं व्याप्तं सर्वं समस्तं नाडीनां चक्रं समूहः शुद्धिं मलराहित्यमेति प्राप्नोति तदैव तस्मिन्नेव काले योगी योगाभ्यासी प्राणस्य ग्रहणे क्षमः समर्थोंजायते ॥ ५ ॥

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ५७ भाषार्थ -और मलोंसे व्याकुल संपूर्ण नाडियोंका समूह जब शुद्धिको प्राप्त होता है उसी कालमें योगी प्राणवायुके संग्रहण ( रोकना ) में समर्थ होता है, इस श्लोकसे यह बात वर्णनकी कि, अन्वयसेही मलशुद्धि-हठयोग सिद्धिकी हेतु है अर्थात् इन पूर्वोक्त अन्वयव्यतिरेक कारणोंसे योगी मलशु-द्धिकेलिये प्राणायामोंका सदैव अभ्यास करै ॥ १ ॥

प्राणायामं ततः कुर्यान्नित्यं सात्त्विकया धिया ॥ यथा सुषुम्नानाडीस्था मलाः शुद्धिं प्रयांति च ॥ ६ ॥

मलशुद्धिः कथं भवतीत्याकांक्षायां तच्छोधकं प्राणायाममाह-प्राणा-याममिति ॥ यतो मलशुद्धिं विना प्राणसंग्रहणे क्षमो न भवति ततस्त-स्मादीश्वरप्रणिधानोत्साहसाहसादिप्रयत्नाभिभूतविक्षेपालस्यादिराज- सतामसधर्मया सात्त्विकया प्रकाशमसादशीलया धिया बुद्धया नित्यं प्राणायामं कुर्यात् । यथा येन प्रकारेण सुषुम्नानाड्यां स्थिता मलाः शुद्धिमपगमं प्रयांति नश्यंतीत्यर्थः ॥ ६ ॥

भाषार्थ- अब मलशुद्धिके हेतु प्राणायामको कहते हैं जिसकारण योगी मलशुद्धिके विना कारणोंके संग्रहणमें समर्थ नहीं होता तिससे सात्त्विक बुद्धिसे प्राणायामको नित्य करे अर्थात् ईश्वरका प्रणिधान उत्साह साहस आदि यत्नोंसे तिरस्कारको प्राप्त भये हैं विक्षेप आलस्य आदि रजोगुणी धर्म जिसके ऐसी सात्विक अर्थात् प्रकाशमान और प्रसन्न बुद्धिसे सदैव प्राणायाममें उसप्रकार तत्पर रहै जिसप्रकारसे सुषुम्ना नाडीमें स्थित संपूर्ण मलशुद्धिको प्राप्त होय अर्थात् नष्ट होजाय ॥ ६ ॥

बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चंद्रेण पूरयेत् ॥ धारयित्वा यथाशक्ति भूयः सूर्येण रेचयेत् ॥ ७ ॥

मलशोधकप्राणायामप्रकारमाह द्वाभ्याम् बद्धपद्मासन इति ॥ बद्धं पद्मासनं येन तादृशो योगी प्राणं प्राणवायुं चंद्रेण चंद्रनाडचे- डया पूरयेत् । शक्तिमनतिक्रम्य यथाशक्ति धारयित्वा कुंभयित्वा ।

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( ) [: ५८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश भूयः पुनः सूर्येण सूर्यनाड्या पिंगल्या रेचयेत् । बाह्यवायोः प्रयत्न-विशेषादुपादानं पूरकः । जालंधरादिबंधपूर्वकं प्राणनिरोधः कुंभकः । कुंभितस्य वायोः प्रयत्नविशेषाद्गमनं रेचकः । प्राणायामांगरेचक- पूरकयोरेवेमे लक्षणे इति । ' भखावल्लोहकारस्य रेचपूरौ ससंभ्रमौ

इति गौणरेचकपूरकयोर्नाव्याप्तिः । तयोर्लक्ष्यत्वाभावात् ॥ ७ ॥

भाषार्थ--अब मलके शोधक प्राणायामके प्रकारको कहते हैं कि, बांधा पद्मासन जिसने ऐसा योगी प्राणवायुंको चंद्रनाडी ( इडा ) से पूर्ण करे अर्थात् चढावे फिर उसको अपनी शक्तिके अनुसार धारण करके अर्थात् कुंभक प्राणायाम करके फिर सूर्यकी नाडी ( पिंगला ) से प्राणवायुका रेचन करै अर्थात् छोडदे । बाहरकी वायुका जो प्रयत्न विशेषसे ग्रहण उसे पूरक कहते • हैं और जालंधर आदि बंधपूर्वक जो प्राणोंका निरोध उसे कुंभक कहते हैं और कुंभित प्राणवायुका जो प्रयत्न विशेषसे गमन उसे रेचक कहते हैं ये रेचक और पूरकके लक्षण उन्हीं रेचक पूरकोंके हैं जो प्राणायामोंके अंग हैं इससे वचनमें गौण रेचक पूरक कहे हैं उनमें अव्याप्ति नहीं क्योंकि वे लक्ष्यही नहीं कि लोहकारकी भस्त्राके समान रेचक और पूरकको संभ्रमसे करै ॥ ७ ॥

प्राणं सूर्येण चाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः ॥ विधिवत्स्तंभकं कृत्वा पुनश्चंद्रेण रेचयेत् ॥ ८ ॥

प्राणमिति ॥ सूर्येण सूर्यनाड्या पिंगल्या प्राणमाकृष्य गृहीत्वा शनैर्मदमंदमुदरंजठरं पूरयेत् । विधिवद्वंधपूर्वकं कुंभकं कृत्वा पुनर्भू- यश्चंद्रेणेडया रेचयेत् ॥ ८ ॥

भाषार्थ -और सूर्यकी नाडी पिंगलासे प्राणका आकर्षण ( खींचना ) करके शनैः शनैः उदरको पूरणकरे फिर विधिसे कुंभक ( धारण ) करके चंद्र-माकी इडा नामकी नाडीसे रेचन करै अर्थात् प्राणवायुको छोडदे ॥ ८ ॥

येन त्यजेत्तेन पीत्वा धारयेदतिरोधतः ॥ रेचयेच्च ततोऽन्येन शनैरेव न वेगतः ॥ ९ ॥

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ५ ९ उक्त प्राणायामे विशेषमाह- येनेति ॥ येन चंद्रेण सूर्येण वा त्यजेद्रेचयेत्तेन पीत्वा तेनैव पूरयित्वा । अतिरोधतोऽतिशायितेन •रोधेन स्वेदकंपादिजननपर्यंतेन । सार्वविभक्तिकस्तसिल् । येन पूरक- स्ततोऽन्येन शनै रेचयेन्न तु वेगतः । वेगाद्रेचने बलहानिः स्यात् । येन पूरकः कृतस्तेन रेचको न कर्तव्यः । येन रेचकः कृतस्तेनैव पूरकः कर्तव्य इति भावः ॥ ९ ॥

भाषार्थ--अब उक्त प्राणायाममें विशेष विधिको कहते हैं कि, ज चंद्रमा घा सूर्यकी नाडीसे प्राणवायुका त्याग ( रेचन ) करें उसी नाडीसे पान ( पूरन ) करके अत्यंतरोधन ( रोकना ) से अर्थात् स्वेद और कम्पके पर्यंत धारण करै । फिर जिससे पूरक कियाहो उससे अन्य नाडीसे शनैः शनैः रेचन करै वेगसे नहीं क्योंकि वेगसे रेचन करनेमें बहकी हानि होती है अर्थात् जिस नाडीसे पूरक किया हो उससे रेचक न करें और जिससे रेचक कियाहो उसीसे पूरकको तो करले ॥ ९ प्राणं चेदिडया पिबेन्नियमितं भूयोऽन्यया रेचये- पीत्वा पिंगलया समीरणमथो बद्धा त्यजेद्वामया ॥ सूर्या चंद्रमसोरनेन विधिनाभ्यासं सदा तन्वतां शुद्धानाडिगणा भवंति यमिनां मासत्रयादूर्ध्वतः १० बद्धपद्मासन इत्याद्यक्तमर्थ पिंडीकृत्यानुवदन्प्राणायामस्यावांतर-फलमाह -प्राणमिति ॥ चेदिडया वामनाड्या प्राणं पिबेत्पूरये-तार्ह नियमितं कुंभितं प्राणं भूयः पुनरन्यया पिंगलया रेचयेत् पिंगलया दक्षनाड्या समीरणं वायुं पीत्वा पूरयित्वा पूरणानंतरं बद्धा कुंभयित्वा वामयेडया त्यजेद्रेचयेत् । सूर्यश्च चंद्रमाश्च सूर्या-चंद्रमसौ तयोः " देवताद्वंद्वे च 77 इत्यानङ् । अनेनोक्तेन विधिना प्रकारेण सदा नित्यमभ्यासं चंद्रेणापूर्य कुंभयित्वा सूर्येण रेचयेत्सु-येणापूर्य कुंभयित्वा च चंद्रेण रेचयेदित्याकारकं तन्वतां विस्तारयतां

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( ) [ ६० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः यमिनां यमवतां नाडीगणा नाडीसमूहा मासत्रयादूर्ध्वतो मासानां त्रयं तस्मादुपरि शुद्धा मलरहिता भवंति ॥ १० ॥

भाषार्थ-पूर्वोक्त आठ श्लोकोंसे वर्णन किये तात्पर्यको एकत्र करके अनु-चाद करते हुए ग्रन्थकार प्राणायामके अवान्तर फलको कहते हैं, यदि योगी इडासे अर्थात् वामनाडीसे प्राणका पान ( पूरन ) करे तो नियमित कुंभित उस प्राणको फिर दूसरी पिंगला नाडीसे रेचन करै और यदि पिंगलासे प्राणको पीछे अर्थात् दक्षिण नाडीसे वायु पूरण करे तो उस प्राणवायुको चांधकर अर्थात् कुंभित करके इडारूप वामनाडीसे प्राणवायुका रेचन करै । इस पूर्वोक्त सूर्य और चंद्रमाकी विधि अर्थात् चंद्रमासे पूर्ण और कुंभक करके सूर्यसे रेचन करै और सूयसे पूरण और कुंमक करके चंद्रमासे रेचन करें । इस वक्त विधिले सदैव अभ्यास करते हुए योगिजनोंके नाडियोंके गण तीनमासके अनंतर शुद्ध होते हैं अर्थात् निर्मल होजाते हैं ॥ १० ॥

प्रातर्मध्यंदिने सायमर्धरात्रे च कुंभकान् ॥ शनैरशीतिपर्यंतं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥ ११ ॥

अथ प्राणायामाभ्यासकालं तदवधिं चाह-प्रातरिति ॥ प्रातररु- णोदयमारभ्य सूर्योदयाद्वटिकात्रयपर्यंते प्रातःकाले मध्यंदिने मध्याह्ने पंचधा विभक्तस्य दिनस्य मध्यभागे सायंसंध्या त्रिनाडीप्रमितार्का - स्तादधस्तादूर्ध्वं चेत्युक्तलक्षणे सन्ध्याकाले रात्रेरर्धमर्धरात्रं तस्मिन्नर्ध- रात्रे रात्रेर्मध्ये मुहूर्तद्वये च शनैरशीतिपर्यंतमशीतिसंख्यावधि चतुर्वारं वारचतुष्टयं 'कालाध्वनोरत्यंतसंयोगे' इति द्वितीया । चतुर्षु कालेष्वे- कैकस्मिन्कालेऽशीतिप्राणायामाः कार्याः । अर्धरात्रे कर्तुमशक्तचे- त्रिसंध्यं कर्तव्या इति संप्रदायः । चतुर्वारं कृतादिनेदिने ३२० विंशत्यधिकशतत्रयपरिमिताः प्राणायामा भवंति । वास्त्रयं कृताश्चेच्च-त्वारिंशदधिकशतद्वय २४० परिमिता भवंति ॥ ११ ॥

भाषार्थ--अअब प्राणायामके अभ्यास काल और उसकी अवधिको कहते हैं -कि, प्रातःकाल अर्थात् अरुणोदयसे लेकर- सूर्योदयसे तीन घडी दिनचढे