हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 71–80

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 71–80

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ६१ तक और मध्याह्नमें अर्थात् पांच भाग किये दिनके मध्य भागमें और सायंकाल अर्थात् सूर्यास्तसे पूर्व और सूर्यास्तके अनंतर तीन घडीरूप संध्याके समयमें और अर्द्धरात्रमें अर्थात् रात्रिके मध्यभागके दो मुहूतोंमें शनैः शनैः इन पूर्वोक्त चारों कालोंमें चारवार अशीति( ८० ) प्राणायाम करें यदि अर्द्धरात्रमें करनेको असमर्थ होय तो तीन कालमेंही अस्सी २ प्राणायाम करे, चारवार करे तो ( ३२० ) तीनसौ बीस प्राणायाम होतेहैं-तीनवार करै तो ( २४० ) दोसौचालीस होते हैं ॥ ११ ॥

कनीयसि भवेत्स्वेदः कंपो भवति मध्यमे ॥ उत्तमे स्थानमाप्रोति ततो वायुं निबंधयेत् ॥ १२॥

कनिष्ठमध्यमोत्तमानां प्राणायामानां क्रमेण व्यापकविशेषमाह -कनीयसीति ॥ कनीयसि कनिष्ठे प्राणायामे स्वेदः प्रस्वेदो भवेद्भ-वति । स्वेदानुमेयः कनिष्ठः । मध्यमे प्राणायामे कंपो भवति । कंपा- नुमेयो मध्यमः । उत्तमे प्राणायामे स्थानं ब्रह्मरंधमाप्नोति । स्थान- प्राप्त्यनुमेय उत्तमः । ततस्तस्माद्वायुं प्राणं निबंधयेन्नितरां बंधयेत् । कनिष्ठादीनां लक्षणमुक्तं लिंगपुराणे-"प्राणायामस्य मानं तु मात्राद्वा-दशकं स्मृतम् । नीचो द्वादशमात्रस्तु सकृदुद्धात ईरितः ॥ मध्यमस्तु द्विरुद्धातश्चतुर्विंशतिमात्रकः । मुख्यस्तु यस्त्रिरुद्धातः पत्रिंशन्मात्र उच्यते ॥ प्रस्वेदकंपनोत्थानजनकश्च यथाक्रमम् । आनंदो जायते चात्र निद्रा धूमस्तथैव च ॥ रोमांचो ध्वनिसंविज्ञिरंगमोटनकंपनम् । श्रमण- स्वेदजल्पाद्यं संविन्मूर्छा जयेद्यदा । तदोत्तम इति प्रोक्तः प्राणायामः सुशोभनः । " इति ॥ धूमश्चित्तांदोलनम् । गोरक्षोऽपि- ' अधमे द्वादश प्रोक्ता मध्यमे द्विगुणाः स्मृताः । उत्तमे त्रिगुणा मात्राः प्राणायामे द्विजोत्तमैः ॥ ' उद्धातलक्षणं तु-' प्राणेनोत्सर्पमाणेन अपानः पीड्यते. यदा । गत्वा चोर्ध्वं निवर्तेत एतदुद्धातलक्षणम् ।, मात्रामाह -याज्ञ- वल्क्यः -'अंगुष्ठांगुलिमोक्षं त्रिस्त्रिर्जानुपरिमार्जनम् । तालत्रयमपि प्राज्ञा मात्रासंज्ञां प्रचक्षते ॥ ' स्कंदपुराणे- एकश्वासमयी मात्रा प्राणायामो

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( ) [ ६२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः 'निगद्यते । एतद्वयाख्यातं योगचिंतामणी- निद्रावशंगतस्य पुंसो यावता कालेनैकः श्वासो गच्छत्यागच्छति च तावत्कालप्राणायामस्य मात्रेत्युच्यत इति ॥ अर्धश्वासाधिकद्वादशश्वासावच्छिन्नः कालः प्राणायामकालः । षडूभिः श्वासैरेकं पलं भवति । एवं च सार्धश्वासपल- द्वयात्मकः कालः प्राणायामकालः सिद्धः । सार्धद्वादशमात्रामितः याणायामो यः स एवोत्तमः प्राणायाम इत्युच्यते । न च पूर्वोदाहृत- लिंगपुराणगोरक्षवाक्यविरोधः । तत्र द्वादशमात्रकस्य प्राणायामस्या- धमत्वोक्तरिति शंकनीयं 'जानु प्रदक्षिणीकुर्यान्न द्रुतं न विलंबितम् । प्रदद्याच्छोटिकां यावत्तावन्मात्रेति गीयते ॥ ' इति स्कंदपुराणात् । 'अंगुष्ठांगुलिमोक्षं च जानोश्च परिमार्जनम् । प्रदद्याच्छोटिकां यावत्ता- वन्मात्रेति गीयते ॥ ' इति च स्कंदपुराणात् । 'अंगुष्ठो मात्रा संख्यायते तदा' ॥ इति दत्तात्रेयवचनाच्च । लिंगपुराणगोरक्षादिवाक्येष्वेकच्छोटि- कावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वेन विवक्षितत्वात् । याज्ञवल्क्यादिवाक्येषु छोटका यावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वेन विवक्षणात् त्रिगुणस्याधम- स्योत्तमत्वं तत्राप्युक्तमित्यविरोधः । सर्वेषु योगसाधनेषु प्राणायामो मुख्यस्तत्सिद्धौ प्रत्याहारादीनां सिद्धेः । तदसिद्धौ प्रत्याहाराद्य- सिद्धेश्व | वस्तुतस्तु प्राणायाम एव प्रत्याहारादिशब्दैर्निगद्यते । तथा चोक्तं योगचिंतामणी -प्राणायाम:एवाभ्यासक्रमेण वर्धमानः प्रत्या- हारध्यानधारणासमाधिशब्दैरुच्यत इति । तदुक्तं स्कंदपुराणे-"प्राणा- यामद्विषट्केन प्रत्याहार उदाहृतः । प्रत्याहारद्विषट्केण धारणा परिकीर्तिता ॥ भवेदीश्वरसंगत्यै ध्यानं द्वादशधारणम् । ध्यानद्वाद-anta समाधिरभिधीयते ॥ यत्समाधौ परं ज्योतिरनंतं स्वप्रका- शकम् । तस्मिन्दृष्टे क्रियाकांडयातायातं निवर्तते ॥ " इति ॥ तथा-' धारणा पंचनाडीभिर्ध्यानं स्यात्पष्टिनाडिकम् | दिनद्वादशकेन: प्राणसयमात् इति च । गोरक्षादिभिरप्येवमेवो-क्तम् । अत्रैवं व्यवस्था । किचिदूना चत्वारिंशद्विपलात्मकः कनिष्ठ-प्राणायामकालः । अयमेवैकच्छोटिकावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्व-

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ६३ विवक्षया द्वादशमात्रकः कालः । किंचिदूनचतुरशीतिविपलात्मको मध्यमप्राणायामकालः । अयमेकच्छोटिकावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रा- त्वविवक्षया चतुर्विंशतिमात्रकः कालः । पंचविंशत्युत्तरशतविपला-त्मक उत्तमः प्राणायामकालः । अयमेकच्छोटिकावच्छिन्नस्य कालस् मात्रात्वविवक्षया षटूत्रिंशन्मात्रककालः । छोटिकात्रयावच्छिन्नस्य कालस्य मात्रात्वविवक्षया तु द्वादशमात्रक एव । बंधपूर्वकं पंचविं-शत्युत्तरशतविपलपर्यंतं यदा प्राणायामस्यैर्थं भवति तदा प्राणो ब्रह्मरंध्रं गच्छति । ब्रह्मरंध्रं गतः प्राणो यदा पंचविंशतिपलपर्यंत तिष्ठति तदा प्रत्याहारः । यदा पंचघटिकापर्यंतं तिष्ठति तदा धा-रणा । यदा षष्टिघटिकापर्यंतं तिष्ठति तदा ध्यानम् । यदा द्वादश- दिनपर्यंतं तिष्ठति तदा समाधिर्भवतीति सर्वं रमणीयम् ॥ १२ ॥

भाषार्थ--अब कनिष्ठ मध्यम उत्तम रूप तीन प्रकारके प्राणायामोंमें क्रमसे व्यापक जो विशेष उसका वर्णन करते हैं कि कनिष्ठ प्राणायाममें स्वेद होता है अर्थात् प्राणायाम करते पसीना आजाय तो वह प्राणायाम कनिष्ठ ( निकृष्ट ) जानना और मध्यम प्राणायाममें कम्प होता है अर्थात् देहमें कम्प हो जाय तो वह प्राणायाम मध्यम होताहै -और उत्तम प्राणायाम करनेसे योगी ब्रह्मरंध्ररूप उत्तम स्थानको प्राप्त होता है-अर्थात् ब्रह्मरंध्रमें वायु पँहुच जाय तो उत्तम प्राणायाम जानना तिससे प्राणवायुका निरंतर बंधन करें अर्थात् रोके । कनिष्ठ आदि प्राणायामोंका लक्षण लिंगपुराणमें कहाहै कि, प्राणायामका प्रमाण द्वादश १२ मात्राका कहाहै. एकबार है प्राणवायुका उद्घात ( उठाना ) जिसमें ऐसा द्वादशमात्राका प्राणायाम नीच होता है और जिसमें दोवार उद्घातहो वह चौबीस मात्राका प्राणायाम मध्यम होताहै और जिसमें तीनवार उद्घात होय वह छत्तीस ३६ मात्राका प्राणायाम मुख्य होता है और तीनोंमें क्रमसे प्रस्वेद, कम्पन और उत्थान होते हैं । और प्राणायामोंमें आनंद निद्रा और चित्तका आंदोलन रोमांच ध्वनिका ज्ञान अंगका मोटन और कम्पन होते हैं और जब योगी श्रम स्वेद भाषण संवित् ( ज्ञान ) र्छा इनको

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( ) | [: ६४ हठयोगप्रदीपिका उपदेश जीतले तब वह शोभन प्राणायाम उत्तम कहा है । गोरक्षने भी कहाहै कि, अधमप्राणायाम द्वादश, मध्यममें चौवीस, उत्तममें ३६ छत्तीस मात्रा द्विजो-त्तर्मोने कही हैं । उद्वातका लक्षण तो यह कहा है कि, ऊपरको चढतेहुए प्राणसे जब अपानवायु पीडित होता है और ऊपरको गया प्राण लौटता है यह उदूघातका लक्षण है. मात्राकी संज्ञा याज्ञवल्क्यने यह कहीहै कि, अंगुष्ठ और अंगुलीको तीनवार मोक्ष ( वजाना वा त्याग ) और तीनवार जानुका मार्जन अर्थात् गोडेपर हाथफेरना और तीनताल इनको बुद्धिमान् मनुष्य मात्रा कहतेहैं । स्कंदपुराणमें लिखाहै कि, एक श्वासकी जो मात्रा उसे प्राणायाम कहतेहैं अर्थात् शयन करते हुए मनुष्यका श्वास जितने कालसे आवै वा जाय उतना काल प्राणायामकी मात्रा कहाता है । आधे श्वाससहित द्वादश श्वासके कालको प्राणा- यामका काल कहते हैं । छःश्वासका एक पल होता है इससे आधेश्वाससहित दो पलका जो काल वही प्राणायामका काल सिद्ध हुआ साढे बारह मात्राहै प्रमाण जिसका वही प्राणायाम उत्तम प्राणायाम कहाता है, कदाचित् कोई शंका करे कि, जिस पूर्वोक्तलिंगपुराणके वचनमें द्वादशमात्राका अधम प्राणायाम कहा है उसका विरोध होगया सो ठीक नहीं क्योंकि जानुको न शीघ्र न विलम्बसे प्रदक्षिणा करके एक चुटकी बजावे इतनेमें जितना काल लगे उतने कालको मात्रा कहते हैं अंगुष्ठ और अंगुलिका मोक्ष जानुका मार्जन और चुटकी बजाना जितने कालमें होंय उसे मात्रा कहते हैं । अंगुष्ठ जो है सो मात्राका बोधक है । इन स्कंदपुराण और दत्तात्रेयके वचनोंसे एक छोटिका ( शिखा ) युक्त जो काल वह मात्रा प्रतीत होता है और याज्ञवल्क्य आदिके वचनोंमें तीन छोटिका युक्त कालको मात्रा कहाहै इससे त्रिगुणितको त्रिगुणित अधमको उत्तमता वहां भी कहीहै इससे कुछ विरोध नहीं । संपूर्ण योगके साधनोंमें प्राणायाम मुख्य है क्योंकि प्राणायामकी सिद्धिमें प्रत्याहार आदि सिद्ध होते हैं और प्राणायामकी असिद्धिमें प्रत्याहार सिद्ध नहीं होते । सिद्धान्त तो यह है कि प्राणायामही प्रत्या- हार शब्दोंसे कहा जाता है । सोई योगचिंतामणिमें कहाहै कि, अभ्यासके क्रमसे बढता हुआ प्राणायामही प्रत्याहार ध्यान धारणा समाधि शब्दसे कहा जाताहै। सोई स्कंदपुराणमें कहा है कि, द्वादशप्राणायामोंका प्रत्याहार और द्वादश

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ६५ प्रत्याहारोंकी धारणा और ईश्वरके संगमके लिये द्वादश धारणाओंका एक ध्यान होता है और द्वादशध्यानोंकी समाधि इसलिये कहाती है कि, समाधिमें अनंत स्वप्रकाशक ज्योति ( ब्रह्म ) दीखता है जिसके दीखनेसे कर्मकाण्ड और जन्म मरण निवृत्त होजाते हैं । और पांच नाडियोंकी धारणा और छः नाडि ( घडि ) योंका ध्यान होताहै । और बारहदिन प्राणायाम करनेसे समाधि होतीहै इस वचनसे गोरक्षआदिनेभी ऐसेही कहा है । यहां यह व्यवस्था है कि जिसमें कुछ कम ४२ विपलहों यह कनिष्ठ प्राणायामका कालहै और यही एक छोटिक के कालको जब मात्रा कहते हैं तत्र द्वादश पलरूप होताहै और कुछ कम चौराशी ८४ विपलका मध्यम प्राणायामका कालहै और यही पूर्वोक्त मात्राके प्रमाणसे २४ चौवीसमात्राका होताहै और १२ ९ सवासौ विपलका उत्तम प्राणायामका काल होताहै और पूर्वोक्त मात्राके प्रमाणसे छत्तीस ३६ मात्राका होताहै और जब तीन छोटिकाके कालको मात्रा मानते हैं तबतो यहभी द्वादश मात्राका होताहै । जब बंधपूर्वक सवासौ विपल पर्यंत प्राणायामकी स्थिरता होजाय तब प्राण ब्रह्मरंध्रमें चला जाताहै ब्रह्मरंध्रमें गया प्राण जब २५ पल पर्यंत टिकजाय तब प्रत्याहार होताहै और जब पांचघटिका पर्यंत टिकजाय तत्र धारणा होती है और जब ६० घडी पर्यंत टिकजाय तक ध्यान होताहै और जब प्राण १२ बारह दिन तक ब्रह्मरंध्रमें टिकाय ब समाधि होती है इससे संपूर्ण रमणीय है अर्थात् पूर्वोक्त कोई दोष नहीं । भाषार्थ यह है कि कनिष्ठ प्राणायाममें स्वेद मध्यममें कंप होता है और उत्तम प्राणायाममें प्राण ब्रह्मरंध्रमें पहुँचताहै इससे योगी प्राणायामका बंधन करै ॥ १२ ॥

जलेन श्रमजातेन गात्रमर्दनमाचरेत् ॥ दृढता लघुता चैव तेन गात्रस्य जायते ॥ १३ ॥

प्राणायामानभ्यसतः स्वेदे जाते विशेषमाह-जलेनेति ॥ श्रमा त्प्राणायामाभ्यासश्रमाज्जातं तेन जलेन प्रस्वेदेन गात्रस्य शरीरस्य मर्दनं तैलाभ्यंगवदाचरेत्कुर्यात् । तेन मर्दनेन गात्रस्य दृढता दादर्य लघुता जाड्याभावो जायते प्रादुर्भवति ॥ १३ ॥

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( ) [ ६६ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः भाषार्थ -अब प्राणायामके अभ्याससे स्वेद होनेपर विशेष कहते हैं कि प्राणायामके परिश्रमसे उत्पन्न हुआ जो जल उससे अपने गात्रोंका मर्दन करै. उससे शरीरकी दृढता और लघुता होती है अर्थात् जडता नहीं रहती ॥ १३ ॥

अभ्यासकाले प्रथमे शस्तं क्षीराज्यभोजनम् ॥ ततोऽभ्यासे दृढीभूते न तादृनियमग्रहः ॥ १४ ॥

अथ प्रथमोत्तराभ्यासयोः क्षीरादिनियमानाह-अभ्यासकाल इति ॥ क्षीरं दुग्धमाज्यं घृतं तद्युक्तं भोजनं क्षीराज्यभोजनम् । शाक- पार्थिवादिवत्समासः । केवले कुंभके सिद्धेऽभ्यासो दृढो भवति । स्पष्टमन्यत् ॥ १४ ॥

भाषार्थ- अब पहिले और पिछले अभ्यासोंमें दुग्ध आदिके नियमोंका चर्णन करतेहैं कि, पहिले अभ्यासकालमें दुग्ध और वीसहित भोजन श्रेष्ठ कहा है फिर अभ्यासके दृढ होनेपर अर्थात् कुंभकके सिद्ध होनेपर पूर्वोक्त नियममें आग्रह न करै ॥ १४ ॥

यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्रश्यः शनैःशनैः ॥ तथैव सेवितो वायुरन्यथा इंति साधकम् ॥ १५ ॥

सिंहादिवच्छनैरेव प्राणं वशयेन सहसेत्याह- यथेति ॥ यथा येन प्रकारेण सिंहो मृगेंद्रो गजो वनहस्ती व्याघ्रः शार्दूलः शनैः शनैरेव बश्यः स्वाधीनो भवेन्न सहसा तथैव तेनैव प्रकारेण सेवितोऽभ्यस्तो वायुः प्राणो वश्यो भवेत् । अन्यथा सहसा गृह्यमाणः साधकमभ्या- सिनं हंतिसिंहादिवत् ॥ १५ ॥

भाषार्थ -सिंह आदिके समान शनैः २ प्राणको वशमें करै शीघ्र न करै इस बातका वर्णन करतेहैं जैसे सिंह गज ( वनका हाथी ) व्याघ्र ( शार्दूल ) ये शनैः २ ही वशमें होसकते हैं शीघ्र नहीं. तिसी प्रकार अभ्यास किया प्राण शनैः २ ही वशमें होताहै शीघ्रता करनेसे सिंह आदिके समान साधकको अपने समान नष्ट करदेता है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 77

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] - ( ) २. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ६७

प्राणायामादियुक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत् ॥

अयुक्ताभ्यासयोगेन सर्वरोगसमुद्भवः ॥ १६ ॥

युक्तायुक्तयोः फलमाह-प्राणायामेति ॥ आहारादियुक्तिपूर्वको जालंधरादिबंधयुक्तिविशिष्टः प्राणायामो युक्त इत्युच्यते । तेन सर्व- रोगक्षयः सर्वेषां रोगाणां क्षयो नाशो भवेत् । अत्युक्त उक्तयुक्तिरहितो योऽभ्यासस्तद्युक्तेन प्राणायामेन सर्वरोगसमुद्भवः सर्वेषां रोगाणां सम्यगुद्भव उत्पत्तिर्भवेत् ॥ १६ ॥

भाषार्थ- अब युक्त और अयुक्त प्राणायामोंके फल कहते हैं । आहार आदि और जालंधर आदि बंध इनकी युक्तियोंसहित जो प्राणायाम उसे युक्त कहते हैं । उस युक्त प्राणायामके करनेसे संपूर्ण रोगोंका क्षय होजाताहै और अयुक्त प्राणायामके अभ्याससे अर्थात् पूर्वोक्त युक्तिरहित प्राणायाम करनेसे संपूर्ण रोगोंकी उत्पत्ति होती है ॥ १६ ॥

हिक्का श्वासश्व कासश्च शिरःकर्णाक्षिवेदनाः ॥ भवंति विविधा रोगाः पवनस्य प्रकोपतः ॥१७॥

अयुक्तेन प्राणायामेन के रोगा भवतीत्यपेक्षायामाह-हिक्केति ॥ हिक्काश्वासकासा रोगविशेषाः शिरश्च कर्णौ चाक्षिणी च शिरः कर्णाक्षिशिरःकर्णाक्षिणि वेदनाः शिरःकर्णाक्षिवेदना विविधा नाना-विधा रोगा ज्वरादयः पवनस्य वायोः प्रकोपतो भवंति ॥ १७ ॥

आषार्थ- अब अयुक्त प्राणायाम करनेसे जो रोग होते हैं उनका वर्णन करते हैं कि हिक्का ( हुचकी ) श्वास कास और शिर नेत्र कर्ण इनकी पीडा और ब्वर आदि नानाप्रकारके रोग प्राणत्रायुके कोपसे होते हैं ॥ १७ ॥

युक्तं युक्तं त्यजेद्वायुं युक्तं युक्तं च पूरयेत् ॥ युक्तं युक्तं च बध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १८ ॥

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( ) [: ६८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश यतः पवनस्य प्रकोपतो विविधा रोगा भवत्यतः किं कर्तव्यमत आह- युक्तं युक्तमिति ॥ वायुं युक्तं त्यजेत् । रेचनकाले शनैःशनैरेव रेचयेन्न वेगत इत्यर्थः । युक्तं युक्तं न चाल्पं नाधिकं च पूरयेत् । युक्तं युक्तं च जालंधरबंधादियुक्तं बध्नीयात्कुंभयेत् । एवमभ्यसेचे-त्सिद्धिं हठसिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १८ ॥

भाषार्थ -जिससे वायुके कोपसे अनेकरोग होते हैं इससे जो योगीको कर्तव्यहै उसका वर्णन करतेहैं कि युक्तियुक्त प्राणवायुको त्यागे अर्थात् रेचनके समयमें शनैः २ ही प्राणका रेचन करें शीघ्र न करे और युक्त २ ही वायुको पूर्णकरै अर्थात् न अल्प न अधिक और जालंधर बंध आदि युक्त वायुको युक्त २ ही बांधे अर्थात् कुंभक करें इस प्रकार योगी अभ्यास करे तो हठयोगकी सिद्धिको प्राप्त होताहै ॥ १८ ॥

यदा तु नाडीशुद्धि: स्थात्तथा चिह्नानि बाह्यतः ॥ कायस्य कृशता कांतिस्तदा जायेत निश्चितम् १ ९ ॥ युक्तं प्राणायाममभ्यसतो. जायमानाया नाडीशुद्धेर्लक्षणमाह द्वाभ्याम् ॥ यदात्विति ॥ यदा तु यस्मिन्काले तु नाडीनां शुद्धिर्मल- राहित्यं स्यात्तदा बाह्यतो वाह्यानि । सार्वविभक्तिकस्तसिः । चिह्नानि लक्षणानि तथाशब्देनांतराण्यपि चिह्नानि भवतीत्यर्थः । तान्येवाह- कायस्यति ॥ कायस्य देहस्य कृशता कार्यं कांतिः सुरुचिर्निश्चितं जायेत ॥ १९ ॥

भाषार्थ-युक्त प्राणायामके अभ्यासीको जो सिद्धि होती है उसके लक्षण दोश्लोकोंसे कहते हैं कि जिस कालमें नाडियोंकी शुद्धि होती है उस समय बाह्य और भीतरके ये चिह्न होते हैं कि कायाकी कुशता और कांति ( तेज ) उस समय निश्चयसे होते हैं ॥ १ ९ ॥ यथेष्टधारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम् ॥ नादामिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधनात् २० ॥

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8.] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ६ ९ यथेष्टमिति ॥ वायोः प्राणस्य यथेष्टं बहुवारं धारणं कुंभकेषु । अनलस्य जठराग्नेः प्रदीपनं प्रकृष्टा दीप्तिर्नादस्य ध्वनेरभिव्यक्तिः प्राकट्यमारोग्यमरोगता नाडिशोधनान्नाडीनां शोधनान्मलराहित्या-ज्जायते ॥ २० ॥

भाषार्थ -यथेष्ट ( अनेकबार ) वायुका जो धारणहै वह जठराग्मिको भली प्रकार दीपनहै अर्थात् जठरामिके दीपनसे यथेष्ट वायुके धारणके अनुमान करना और नादकी जो अभिव्यक्ति अर्थात् अन्तर्धानिकी प्रतीति और रोगोंका अभाव यह नाडियोंके शोधनसे अर्थात् मलरहित करनेसे होताहै ॥ २० ॥

मेदःश्लेष्माधिकः पूर्वं षट्कर्माणि समाचरेत् ॥ अन्यस्तु नाचरेत्तानि दोषाणां समभावतः ॥२१ ॥

मेदआद्याधिक्ये उपायांतरमाह मेदःश्लेष्माधिक इति ॥ मेदश्च श्लेष्मा च मेदःश्लेष्माणौ तावधिको यस्य स तादृशः पुरुषः । पूर्व प्राणायामाभ्यासात्माङ्ग तु प्राणायामाभ्यासकाले । षट् कर्माणि वक्ष्य-माणानि समाचरेत्सम्यगाचरेत् । अन्यस्तु मेदःश्लेष्माधिक्यरहितस्तु तानि षट् कर्माणि नाचरेत् तत्र हेतुमाह-दोषाणां वातपित्तकफानां समस्य भावः समभावः समत्वं तस्माद्दोषाणां समत्वादित्यर्थः ॥ २१ ॥

भाषार्थ-मेदा आदि जिस पुरुषके अधिक हों उसके लिये अन्य उपायका वर्णन करते हैं कि, जिस पुरूषके मेदा और श्लेष्मा अधिक होय वह पुरुष प्राणायामके अभ्याससे पहिले छः कर्मोंको करे । और मेदा और श्लेष्माकी अधिकतासे जो रहितहो वह उन छः ६ कमोंके दोषोंकी समानता होनेसे न करें ॥ २१ ॥

धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा ॥ कपालभातिश्चैतानि षट् कर्माणि प्रचक्षते ॥ २२ ॥

षट् कर्माण्युपदिशति-धौतिरिति ॥ स्पष्टम् ॥ २२ ॥

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( ) | [ ७० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः भाषार्थ-छ: कमोंको वर्णन करतेहैं कि, धौती १ बस्ति २ नेति ३ त्राटक ४ नौलिक ५ और कपालभाति ६ बुद्धिमानोंने ये छः कर्म योगमार्गमें कहे हैं ॥ २२ ॥

कर्मषट्कमिदं गोप्यं घटशोधनकारकम् ॥ विचित्रगुणसंधायि पूज्यते योगिपुंगवैः ॥ २३ ॥

इदं रहस्यमित्याह -कर्मषट्कमिति ॥ घटस्थ शरीरस्य शोधनं मलापनयनं करोतीति घटशोधनकारकमिदमुद्दिष्टं कर्मणां षटुक

धौत्यादिकं गोप्यं गोपनीयम् । यतः ॥ विचित्रगुणसंधायीति ॥

विचित्रं विलक्षणं गुणं षट्कर्मरूपं संधातुं कर्तुं शीलमस्येति विचि- गुणसंधायि योगिपुंगवैयोंगिश्रेष्ठैः पूज्यते सत्क्रियते । गोपनाभावे तु षट्कर्मकमन्यैरपि विहितं स्यादिति योगिनः पूज्यत्वाभावः प्रसज्जे- तति भावः ॥ एतेनेदमेव कर्मषट्कस्य मुख्यं फलमिति सूचितम् । मेदःश्लेष्मादिनाशस्य प्राणायामैरपि संभवात् । तदुक्तम् । ' षटकर्म योगमाप्नोति पवनाभ्यासतत्परः । 7 इति पूर्वोत्तरग्रंथस्याप्येवमेव स्वारस्याच्च ॥ २३ ॥

भाषार्थ -ये छः कर्म गुप्त करने योग्य हैं और देहको शुद्ध करतेहैं और विचित्रगुणके संधानको करतेहैं इससे योगियोंमें श्रेष्ठ इनकी प्रशंसा करते हैं यदि ये गुप्त न रक्खे जाँय तो अन्यभी इनको करसकेंगे तो योगियोंकी पूज्यता न रहेगी-इससे योगियोंको सर्वोत्तम बनानाही षट्कर्मका फल है-क्योंकि मेदा श्लेष्माका नारा तो प्राणायामोंसेभी होसकता है सोई इस वचनमें लिखा है कि प्राणायामके अभ्यासमें तत्पर मनुष्य षट्कर्मके योगको प्राप्त होताहै । पूर्व और उत्तर ग्रंथकीभी इसी प्रकार संगति होसकती है ॥ २३ ॥

तत्र धौतिः ।

चतुरंगुलविस्तारं हस्त पंचदशायतम् ॥

गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्यसेत् ॥

पुनः प्रत्याहरेचैतदुदितं धौति कर्म तत् ॥ २४ ॥