कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 101–110

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 101 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥२७ ॥

रौद्रनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि तृतीयचरणं शिवे! कृतं नरेण यद्देवि पूर्वजन्मनि किल्बिषम्॥ १ ॥

भा० टी० - हे शिवे! अब आर्द्रा नक्षत्र के तीसरे चरण के कर्मफल को कहता हूँ, इसमें जन्म लेने वाले मनुष्य ने पूर्वजन्म में जो पाप किये हैं, वह सुनो ॥ १ ॥

अवन्तीपुरतोऽवात्सीत् शूद्र एको महाधनः ।

विक्रयं क्रियते छागमेषयोर्गृहवासिनोः ॥ २ ॥

भा० टी ० — उज्जैन नगरी में एक महाधनी शूद्र रहता था, वह घर में रहने वाले बकरी और मेंढ़कों को बेचने का व्यवहार करता था ॥२ ॥

गजमश्वं तथा रत्नं वस्त्राणि विविधानि च ।

एकदा सूर्यग्रहणं दृष्टं तेन वरानने!॥ ३ ॥

भा० टी ० – हाथी, घोड़ा, रत्न- अनेक प्रकार के वस्त्र- इन सब को बेचनें का व्यवहार करता था, हे वरानने! एक समय उसने सूर्य का ग्रहण देखा ॥ ३ ॥

गोसहस्त्रं कृतं दानं भार्यया सहितेन वै ।

नर्मदायां विशालाक्षि स्वर्णवस्त्रयुतं तथा ॥ ४ ॥

भा० टी ० — हे विशालाक्षि! तब स्त्री सहित उसने नर्मदा नदी पर जाकर सुवर्ण, वस्त्र से युक्त की हुई हजार गौओं का दान किया ॥४ ॥

तत्रैव चाभवत् पीड़ा मृत्युलोकसमुद्भवा ।

स्वर्णकारस्य वै द्रव्यं व्यवहारनिमित्तकम् ॥ ५ ॥

भा० टी० – वहीं उसको मृत्योलोक में होने वाली पीड़ा हुई ( वह दरिद्र हो गया ) तब उसने व्यवहार निमित्त एक सुनार से द्रव्य लिया ॥ ५ ॥

गृहीतं चैव नोदत्तं ततः शृणु वरानने! ततो बहुतेकाले शूद्रस्य मरणं ह्यभूत् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 102

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 102 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - सुनार से ग्रहण किया हुआ धन उसने वापस नहीं दिया । हे वरानने! सुनो, तदनन्तर बहुत-सा काल बीत चुका, तब उस शूद्र की मृत्यु हो गयी ॥६ ॥

ततोऽसौ नरके घोरे वर्षलक्षद्वयं तथा ।

तत्रैव बहुधा पीड़ां भुक्त्वा चैव स्वकर्मतः ॥ ७ ॥

भा० टी० — तदनन्तर वह दो लाख वर्षों तक नरक- वास करता हुआ वहाँ अपने कर्म से बहुत - सी पीड़ा भोगता रहा ॥७ ॥

पुनर्जातो मर्त्यलोके काकश्च महिषो बकः ।

मानुषत्वं ततो देवि कुले महति वै शुभे ॥ ८ ॥

भा० टी० – पश्चात् वह मनुष्य-लोक में काग हुआ, फिर भैंसा तथा बगुला हुआ । हे देवि! तदनन्तर महान् शुभ कुल में मनुष्य -योनि में पैदा हुआ है ॥ ८ ॥

स्वर्णकारस्य द्रव्यं वै गृहीतं पूर्वजन्मनि ।

न दत्तं वै ऋणं देवि पुत्रस्य मरणं ततः ॥ ९ ॥

भा० टी ० — उसने पूर्वजन्म में सुनार का द्रव्य ग्रहण किया था और वापस नहीं दिया, हे देवि! इसलिये के पुत्र की मृत्यु होती है॥९॥

युवरूपो यदा जातो व्याधिग्रस्ततनुस्तदा ।

देहार्द्धवातरोगश्च पुत्रस्य मरणं ततः ॥ १० ॥

भा० टी० — जब उसका पुत्र जवान हुआ, वह बीमारी से ग्रस्त हो गया, अर्द्धांग वात- रोग है पुत्र क मृत्यु हुई ॥ १० ॥

भार्याद्वयसमायुक्त एका प्रीतिमती भवेत् ।

पूर्वजन्मनि यत्कर्म पुण्यं पापं शरीरतः ॥ ११ ॥

भा० टी ० – उसकी दो स्त्रियाँ हैं, जिनमें से एक अत्यंत प्रीति वाली है पूर्वजन्म में जो कर्म पुण्य अथवा पाप शरीर से होता है ॥ ११ ॥

मर्त्यलोके मनुष्येण भुज्यते नात्र संशयः ।

अथातः संप्रवक्ष्यामि पापनिग्रहहेतवे ॥ १२ ॥

भा० टी० - मनुष्य द्वारा मृत्युलोक में वही फल भोगा जाता है, इसमें संदेह नहीं । अब पाप दूर करने के उपाय कहता हूँ ॥ १२ ॥

गायत्रीलक्षजाप्येन हरिवंशश्रुतेन च ।

रथाश्ववस्त्रदानेन ग्रामदानेन वै तथा ॥ १३ ॥

पृष्ठ 103

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 103 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कर्मविपाकसंहिता ९५ भा० टी० – गायत्री के एक लाख जप करने से, हरिवंश सुनने से, रथ, अश्व और ग्राम के दान से ॥ १३ ॥

तिलधेनुप्रदानेन सर्वपापक्षयो भवेत् ।

स्वर्णमुद्रासहस्त्रस्य प्रतिमां कारयेद्बुधः ॥ १४ ॥

भा० टी० — तिल और गाय के दान से संपूर्ण पाप नष्ट हो जाये, हजार सुवर्ण मुद्राओं से मूर्ति बनवायें ॥ १४ ॥

पूर्वोक्तेन विधानेन पूजयित्वा प्रदापयेत् ।

पार्थिवं पूजयेच्छंभुं तथा गोमयनिर्मितम्॥ १५ ॥

भा० टी० – फिर पूर्वोक्त विधि- विधान से उसका पूजन कर दान करें । पश्चात् पार्थिव शिव लिंग का अथवा गोबर से बनाये हुए शिव लिंग का पूजन करें ॥ १५ ॥

लक्षत्रयं प्रमाणं च पञ्चगव्येन पूजयेत् ।

पञ्चामृतेन भो देवि गोदुग्धेनैव पूजयेत् ॥ १६ ॥

भा० टी० - इसप्रकार तीन लाख प्रमाण पार्थिव शिव बनवा कर पंचगव्य से पूजन करें । हे देवि! पंचामृत और दुग्ध से पूजा करें ॥ १६ ॥

तथा च विविधैर्मन्त्रैः षडङ्गैर्वेदसंभवैः ।

मुच्यतेऽर्द्धाङ्गरोगेण नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ ॥

भा० टी० - अनेक प्रकार के वेदमन्त्रों और षडंग के मंत्रों से पूजन करने से अर्धाङ्ग रोग से छुटकारा मिल जायेगा, इसमें कुछ भी चिन्तनीय अर्थात् सन्देहास्पद नहीं है ॥ १७ ॥

बन्ध्यात्वं प्रशमं याति लभेत्पुत्रं न संशयः ।

मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रौद्रनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

भा० टी० – इससे वंध्यापन रोग दूर होता है, पुत्र उत्पन्न होता है, इसमे संदेह नहीं हैं । जिसकी संतान नहीं जीती हो उस स्त्री के गर्भ से चीरंजीवी, दीर्घायु उत्तम पुत्र उत्पन्न होता है ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० रौद्रनक्षत्रस्य चतुर्थ० प्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

पृष्ठ 104

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 104 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥२८ ॥

पुनर्वसुनक्षत्रस्य प्रथमचरणे प्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

ये नराः परद्रव्यं च हरन्ति सततं प्रिये! ।

तेरा दुःखितां यान्ति रोगेण च प्रपीडिताः ॥ १ ॥

भा० टी० – शिवजी कहते हैं - जो मनुष्य पराये द्रव्य को हरते हैं, हे प्रिये! वे मनुष्य निरंतर रोग से ग्रस्त हो कर दुःख को भोगते हैं ॥ १ ॥

ऋणं यस्य गृहीतं वै तदृणं न ददाति च ।

ऋणसंबन्धतो देवि पुत्रो भवति दारुणः ॥ २ ॥

भा० टी० -जिसका ऋण लिया हो उसको फिर वापस नहीं दिया हो तो हे देवि! ऋण के संबंध से दारुण पुत्र उत्पन्न होता है ॥ २ ॥

गृहीतमात्रं वै भग्नं धातुभग्नस्तथा नरः ।

कन्याघातात्तु पूर्वं हि फलं भवति तादृशम् ॥ ३ ॥

भा० टी ० – ग्रहण किया हुआ सब धन नष्ट हो जाये तथा धातु गिरने लग जाये, ऐसा यह फल कन्या को मारने से होता है ॥ ३ ॥

अवन्तीपुरतो देवि ख्यातं चैव सुशोभनम् ।

क्रोशमात्रं ततो देवि चोत्तरे नगरे तथा ॥ ४ ॥

भा० टी० — हे देवि! उज्जैन नगरी से उत्तर की तरफ एक कोश की दूरी पर पर सुंदर विख्यात नगर ॥ ४ ॥

वसन्तपुरमित्याख्यं वसन्ति बहवो जनाः ।

नाम्ना तन्मध्य आभीरो नन्दनो वसति प्रिये ॥ ५ ॥

भा० टी० – वसंतपुर है । हे प्रिये! वहाँ बहुत से जन रहते हैं । हे प्रिये! वहाँ नंदन नाम वाला एक ( आभीर ) अहीर जाति का व्यक्ति बसता था ॥ ५ ॥

तस्य भार्या तु विख्याता नाम्ना वै सुन्दरी प्रिये! सर्वथा च महादेवि कृपणः सह भार्यया ॥ ६ ॥

पृष्ठ 105

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 105 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कर्मविपाकसंहिता ९७ भा० टी० — हे प्रिये! उसकी पत्नी सुंदरी नाम की विख्यात स्त्री थी । हे महादेवि! वह स्त्री सहित अत्यन्त कृपण था ॥ ६ ॥

मित्रं तस्य महादेवि ब्राह्मणो वेदपारगः ।

स तिष्ठति पुरीमध्ये धनं तस्य स्थितं बहु ॥ ७ ॥

भा० टी० - एक वेदपाठी ब्राह्मण उसका मित्र था, वह भी उज्जैनपुरी में रहता था उसके पास बहुत -सा धन था ॥ ७ ॥

प्रत्यहं च परान्नेन भोजनं कुरुते स तु ।

यदा वृद्धत्वमायातः पुरीं चैव तदात्यजत् ॥ ८ ॥

भा० टी० — वह प्रतिदिन पराये अन्न से भोजन करता था जब वह वृद्ध अवस्था को प्राप्त हुआ उसने तब उज्जैनपुरी को त्याग दिया ॥ ८ ॥

आगतो मित्रपार्श्वे वै वसन्ते वै पुरे शुभे ।

आभीरेण गृहे वासं मित्रत्वाद्दत्तवान् स्वयम्॥ ९ ॥

भा० टी० - वसंतपुर में वह उस अपने मित्र के पास आया, तब उस अहीर ने मित्रभाव से उसको अपने घर में रोक लिया ॥ ९ ॥

बहुकालमवात्सीत् स तत्प्रीत्या सुरसुन्दरि! आभीरस्तु ततो देवि स्वर्णं दृष्ट्वा प्रहर्षितः ॥ १० ॥

भा० टी ० — हे देवि! वह ब्राह्मण उसकी प्रीति से आकर्षित हो, बहुत काल तक वहाँ वास करता रहा, वह अहीर सुवर्ण को देख अत्यंत प्रसन्न हुआ ॥ १० ॥

तस्य स्वर्णं समाहृत्य स्वगृहे स्थापितं तदा ।

ब्राह्मणेन महत्कष्टं कृतं द्रव्यस्य शोकतः ॥ ११ ॥

भा० टी ० – उसके सुवर्ण को ग्रहण करके उस अहीर ने अपने घर में रख लिया तब द्रव्य के शोक से ब्राह्मण ने अत्यंत कष्ट पाया ॥ ११ ॥

महाशोकसमायुक्तः काश्यां चैव समागतः ।

शरीरं चापि तत्त्याज स्वर्णशोकेन वै द्विजः ॥ १२ ॥

भा० टी० — वह महाशोक से युक्त हुआ और काशी में चला गया, उस ब्राह्मण ने सुवर्ण के चोरी के शोक से शरीर भी त्याग दिया ॥ १२ ॥

शूद्रेणैव महादेवि तस्य स्वर्णं प्रभुज्यते ।

ततो बहुगते काले मरणं तस्य चाभवत्॥ १३ ॥

पृष्ठ 106

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 106 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे महादेवि! उस शूद्र ने उसके सुवर्ण को भोगा, पश्चात् बहुत काल बीत जाने पर तब उसकी मृत्यु हो गई ॥ १३ ॥

नरके पातयामास यमदूतो यमाज्ञया ।

षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्ता नरकयातना ॥ १४ ॥

भा० टी० - धर्मराज के दूत ने यम की आज्ञा से उसे नरक में पटक दिया साठ हजार वर्षों तक उसने नरक की पीड़ा भोगी ॥ १४ ॥

ततस्तेन तु प्रेतत्वं भुक्तमब्दसहस्रकम् ।

उलूकत्वं वरारोहे कौशिक्या निकटे ततः ॥ १५ ॥

भा० टी० - पश्चात् उसने एक हजार वर्षों तक प्रेत योनि भोगी । हे वरारोहे! तदनन्तर कौशिकी नदी के निकट उल्लू के रूप में पैदा हुआ ॥ १५ ॥

शरय्वा उत्तरे कूले मानुषत्वं ततोऽभवत् ।

मध्यदेशे च भो देवि पल्या सह वरानने ॥ १६ ॥

भा० टी० - फिर शरयू नदी के उत्तर किनारे पर मनुष्य योनि में पैदा हुआ । हे देवि! मध्यदेश में वह अब स्त्री सहित है ॥ १६ ॥

धनधान्यसमायुक्तो राजसेवासु तत्परः ।

जातः पुनर्वसोर्देवि प्रथमे चरणे खलु ॥ १७ ॥

भा० टी ० — वह धनधान्य से युक्त है और राजा की सेवा में तत्पर है । हे देवि! वह पुनर्वसु के प्रथमचरण में जन्मा है ॥ १७ ॥

पूर्वजन्मनि भो देवि यतो गोशतदत्तवान् ।

भूपतित्वं ततो देवि धनाढ्यत्वं भवेत् खलु ॥ १८ ॥

भा ० टी० — हे देवि! उसने पूर्वजन्म में जो सौ गौओं का दान किया था, इसलिये वह राजकार्य में प्रवृत्त है और धनाढ्य है ॥ १८ ॥

ब्राह्मणस्य हृतं स्वर्णं स्वयं चौर्येण यत्पुरा ।

तेन पापेन भो देवि पुत्रस्य मरणं खलु ॥ १ ९ ॥

भा० टी० - पूर्वजन्म में उसने जो ब्राह्मण का सुवर्ण चुराया था, हे देवि! इसलिये उसके पुत्र की मृत्यु होती है ॥ १ ९ ॥ तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं शृणु पार्वति! गृहवित्ताष्टमैर्भागैः पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ २० ॥

पृष्ठ 107

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 107 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कर्मविपाकसंहिता ९९ भा० टी० — हे पार्वति! उसकी शांति को कहता हूँ, सुनो, घर के वित्त में से आठवें भाग को पुण्य के कार्य में खर्च करें ॥ २० ॥

गायत्रीजातवेदाभ्यां याः फलेति तथा प्रिये! लक्षत्रयं जपं कुर्याद्दशांशहवनं ततः ॥ २१ ॥

भा० टी० - हे प्रिये! गायत्री, तथा " जातवेदसे सुनवाम० याः फला० " इन मंत्रों से तीन लाख जप करायें फिर तद्दशांश हवन करायें ॥ २१ ॥

तर्पणं मार्जनं चैव दशांशः क्रमतस्तथा ।

हरिवंशस्य श्रवणं चण्डिकार्चनमेव च ॥ २२ ॥

भा० टी० – तर्पण तथा मार्जन भी दशांश क्रम से करायें, हरिवंश को सुनें, देवी का पूजन करें ॥ २२ ॥

शिवार्चनमशेषेण वापिकां चैव कारयेत् ।

कूपं चैव तडागं च पथि मध्ये च कारयेत् ॥ २३ ॥

भा० टी० – अच्छे प्रकार से शिवपूजन करें, बावड़ी खुदवायें, मार्ग में कुआँ खुदवायें और तालाब बनवायें ॥ २३ ॥

कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।

गङ्गामध्ये प्रदातव्यं शनौ चाश्वत्थपूजनम् ॥ २४ ॥

भा० टी० – कूष्मांड अर्थात् पेठे को पंचरत्न से भर कर गंगाजी में दान करें, शनिवार के दिन पीपल वृक्ष का पूजन करें ॥ २४ ॥

पलसप्तदशेनैव प्रतिमां कारयेद्बुधः ।

चतुष्कोणगतां वेदीं रौप्यैर्दशपलान्वितैः ॥ २५ ॥

भा० टी० - सतरह पल सुवर्ण की प्रतिमा बना कर फिर दशपल प्रमाण की चांदी की चतुष्कोण वेदी बनायें ॥ २५ ॥

तन्मध्ये प्रतिमां स्थाप्य सपुत्रस्य द्विजस्य तु ।

पूजां कुर्यात्तु वै भक्त्या मन्त्रेणानेन वै शिवे! ॥ २६ ॥

भा० टी० — हे शिवे! उसके ऊपर प्रतिमा को स्थापित कर पुत्र सहित उस ब्राह्मण की उस मूर्ति को भक्ति पूर्वक इस मंत्र से पूजें ॥ २७ ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । ॐ ब्रह्मणे नमः । ॐ अनन्ताय नमः । ॐ पुरुषाय नमः । ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।

पृष्ठ 108

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 108 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०० कर्मविपाकसंहिता

ॐ शार्ङ्गिणे नमः । ॐ पीताम्बराय नमः । ॐ चक्रपाणये नमः ।

ॐ अच्युताय नमः । ॐ गदाधराय नमः ॥

वासुदेवादिदशभिर्मन्त्रैरेभिः पृथक् पृथक् ।

पूजयेत्प्रतिमां तां तु ततो दद्याद्विजन्मने ॥ २७ ॥

भा० टी० – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय १, ॐ ब्रह्मणे नमः २, ॐ अनंताय नमः ३, ॐ पुरुषाय नमः ४, ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ५, ॐ शार्ङ्गिणे नमः ६, ॐ पीताम्बराय नमः ७, ॐ चक्रपाणये नमः ८, ॐ अच्युताय नमः ९, ॐ गदाधराय नमः १०- ऐसे इन वासुदेव के दश मंत्रों से पृथक् - २ उस प्रतिमा का पूजन कर पश्चात् ब्राह्मण को अर्थ दान कर दें ॥ २७ ॥

पूजयेद्देवदेवेशं सर्वपापापनुत्तये ।

ततः संप्रार्थ्य देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ २८ ॥

भा० टी० - संपूर्ण पाप दूर होने के लिए शंखचक्रगदाधारी विष्णु भगवान् देवेश की प्रार्थना कर विष्णु का पूजन करें ॥ २८ ॥

पीताम्बरं चतुर्बाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ।

वासुदेवं जगन्नाथं धराधरगुरो हरे! ॥ २ ९ ॥

भा० टी० - पीतांबरधारी, चतुर्भुज, कमलनेत्र, वासुदेव, जगन्नाथ - ऐसे उनकी प्रार्थना करें, हे धरणीधर! हे गुरो! हे हरे! ॥ २ ९ ॥ मम पूर्वकृतं पापं क्षम्यतां परमेश्वर! ततो गां कपिलां दद्यात्स्वर्णशृङ्गीं सनूपुराम् ॥ ३० ॥

भा० टी० — हे परमेश्वर! पूर्वजन्म में किये हुए मेरे पापों को क्षमा करो । ऐसे कह कर पश्चात् सुवर्ण के सींग और खुरों से युक्त की हुई कपिला गौ का दान करें ॥ ३० ॥

विधिवद्वेदविदुषे ब्राह्मणाय तपस्विने ।

दशवर्णास्ततो दद्याद्ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः ॥ ३१ ॥

भा० टी० - वेद को जानने वाले तपस्वी ब्राह्मण को दश प्रकार की गौओं का विधिपूर्वक दान करें तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन करायें ॥ ३१ ॥

भूमिदानं ततो दद्याद्विप्राय विदुषे ततः ।

एवं कृते न संदेहः पूर्वपापं विनश्यति ॥ ३२ ॥

भा० टी ० — पश्चात् वेद को जानने वाले ब्राह्मण को पृथ्वी का दान दें । ऐसा करने

से पूर्व में किये गये पाप नष्ट होते हैं । इसमें संदेह नहीं है ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 109

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 109 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

कर्मविपाकसंहिता १०१

सन्तानं जायते देवि रोगाणां संक्षयस्ततः ।

कन्यका नैव जायन्ते वन्ध्यत्वं च प्रणश्यति ॥ ३३ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पुनर्वसुनक्षत्रस्य प्रथमचरणे प्रायश्चित्तकथनं नामाष्टविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

भा० टी० - हे देवि! तदनन्तर संतान उत्पन्न होती है और रोगों का नाश होता है ।

और पुत्रियों की उत्पत्ति नहीं होती है । वंध्यत्व दूर होता है ॥ ३३ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे पुनर्वसुनक्षत्रस्य प्रथमचरणे प्रायश्चित्तकथनं नामाष्टविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

पृष्ठ 110

कर्म विपाक संहिता, पृष्ठ 110 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥२ ९ ॥ पुनर्वसुनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

अथातः संप्रवक्ष्यामि यत्कृतं पूर्वजन्मनि ।

अवन्तीपुरतो देव पूर्वे क्रोशप्रमाणतः ॥ १ ॥

भा० टी ० – शिवजी कहते हैं - हे देवि! अब पूर्वजन्म में किये गये कर्मों के विषय में कहता हूँ, उज्जैन पुरी से पूर्व दिशा में एक कोश के विस्तार में ॥ १ ॥

लक्ष्मणस्य पुरं ख्यातं तत्रैव बहवो जनाः ।

वसन्ति वैष्णवाः सर्वे वेदकर्मविचक्षणाः ॥२ ॥

भा० टी ० – लक्ष्मणजी का पुर विख्यात है । वहाँ बहुत से वैष्णव जन और वेद-कर्मों को जानने वाले वास करते हैं ॥ २ ॥

स्वर्णकारो वसत्येकः स्वकर्मनिरतः सदा ।

दामोदर इति ख्यातस्तस्य पत्नी प्रभावती ॥ ३ ॥

भा० टी० - जहाँ अपने कर्म को सदा करने वाला दामोदर नामक एक स्वर्णकार अर्थात् सुनार विख्यात हुआ और उसकी स्त्री का नाम प्रभावती था ॥३ ॥

विष्णुभक्तिरतः शान्तः सज्जनानां च सेवकः ।

पत्नी पतिव्रता तस्य पतिशुश्रूषणे रता ॥ ४ ॥

भा० टी० - वह विष्णु की भक्ति में प्रीति करने वाला, शांतचित्त वाला, सज्जनों का दास था जिसकी पतिव्रता स्त्री पति की सेवा करने वाली थी ॥ ४ ॥

तस्य पुत्रद्वयं जातं गुणज्ञं पितृसेवकम् ।

एका च बल्लवी तत्र निवासाय तदागता ॥ ५ ॥

भा० टी० - उस सुनार के पिता की सेवा करने वाले दो गुणवान् पुत्र उत्पन्न हुए और वहाँ एक बल्लवी अर्थात् गौओं का पालन करने वाली स्त्री वसने के लिए आयी ॥५ ॥