कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 111–120

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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कर्मविपाकसंहिता १०३

पुत्रद्वयसमायुक्ता बहुगोधनसंयुता ।

एको द्यूतरतः पुत्रो द्वितीयश्चोरसंमतः ॥ ६ ॥

भा० टी ० – वह दो पुत्रों से युक्त और बहुत से गोधन से युक्त थी । परंतु उसका एक पुत्र तो जुआ खेलने वाला था और दूसरा चोरों से मिला हुआ था अर्थात् चोर था ॥ ६ ॥

उपार्जितं महिषीस्वं गोधनं बहुधा तथा ।

चौरदूतोपचाराभ्यां धनाढ्यत्वमजायत ॥ ७ ॥

भा० टी० - महिषीधन और अनेक प्रकार की गौओं का धन उसने चोरी के कर्म से संचित किया तब वह धनाढ्य होता गया ॥ ७ ॥

दुग्धादिकं महादेवि भुज्यते प्रत्यहं तदा ।

स्वर्णकारो महाद्रव्यामाभीरीं सर्वसंयुताम्॥ ८ ॥

भा० टी ० - हे देवि! प्रतिदिन दूध आदि पदार्थों को भोगता था, फिर वह सुनार महाद्रव्य वाली सभी प्रकार के सुखसाधनों से युक्त उस अहीरी को ॥ ८ ॥

आनीतवान् स्वगेहे तां तदा च वरवर्णिनीम् ।

ततो बहुगते काले महामारीज्वरादिना ॥ ९ ॥

भा० टी०० - उस धनाढ्य स्त्री को अपने घर में ले आया, फिर बहुत दिन पश्चात् महामारी और ज्वर आदि के कारण ॥ ९ ॥

पुत्राभ्यां सममद्राक्षीद्बल्लव्या मरणं तदा ।

द्रव्यं तस्यास्तदा देवि स्वर्णकारो गृहीतवान्॥ १० ॥

भा० टी ० – पुत्रों सहित वह अहीरी मर गई, तब हे देवि! उसके द्रव्य को उस सुनार ने अधिगृहीत किया ॥ १० ॥

भुक्तं द्रव्यं च तत्सर्वं यावत्तिष्ठति भूतले ।

भार्यया सह पुत्राभ्यां महिषीगोधनादिकम् ॥ ११ ॥

भा० टी० — जब तक वह पृथ्वी-तल पर रहा (जीवन पर्यंत ) उसके संपूर्ण द्रव्य- महिषी और गोधन आदि को स्त्री- पुत्रों सहित भोगता गया ॥ ११ ॥

ततो वयोत्तरे देवि मृत्युस्तस्याभवत्किल ।

पत्नी तस्य मृता साध्वी ताभ्यां स्वर्गमभूत्पुरा ॥ १२ ॥

भा० टी ० — हे देवि! फिर अवस्था पूरी होने पर उसकी मृत्यु हो गई और वह पतिव्रता स्त्री भी मर गई, तब उन्हें पहले स्वर्ग प्राप्त हुआ ॥ १२ ॥

पृष्ठ 112

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१०४ कर्मविपाकसंहिता

पञ्च वर्षसहस्त्राणि स्वर्गे सुखमजीजनत् ।

पुनः पुण्यक्षये जाते मानुषत्वं भवेद्भुवि ॥ १३ ॥

भा० टी० – पाँच हजार वर्षों तक स्वर्ग में उनका वास रहा, फिर पुण्य क्षीण हो जाने पर मनुष्य शरीर उनको प्राप्त हुआ है ॥ १३ ॥

अयोध्यानगराद्देवि सरय्वा उत्तरे तटे ।

क्रोशद्वये विशालाक्षि पुरे देहलसंज्ञके ॥ १४ ॥

भा० टी० - हे देवि! सरयू नदी के उत्तर किनारे पर अयोध्या नगरी से दो कोश की दूरी पर देहल नामक पुर में ॥ १४ ॥

स्वकर्मनिरतः प्राज्ञः स्वविद्यायां विचक्षणः ।

स्वदेशे चैव विख्यातः शत्रूणां च विमर्द्दनः ॥ १५ ॥

भा० टी० — वह अपने कर्म में तत्पर विद्वान्, अपनी विद्या में निपुण, अपने देश में विख्यात शत्रुओं को नष्ट करने वाला व्यक्ति है ॥ १५ ॥

पुनर्विवाहिता पत्नी साध्वी या पूर्वजन्मनि ।

तस्य नेत्रे विशालाक्षि पूर्वजन्मफलाद्गते ॥ १६ ॥

भा० टी ० — जो पूर्वजन्म में उसकी पतिव्रता स्त्री थी, वही फिर इस जन्म में विवाही गई है, हे विशालाक्षि! पूर्वजन्म के कर्म फल से उसके नेत्र चले गये अर्थात् वह अंधा है ॥ १६ ॥

बाल्ये चैव तु पुत्रस्य नेत्रं वामं प्रणाशितम् ।

तेन पापेन भो देवि गतं नेत्रद्वयं शिवे! ॥ १७ ॥

भा० टी० — हे देवि! इसने बालक - अवस्था में पुत्र का वाम नेत्र नष्ट कर दिया था, हे शिवे! उस पाप से इसके दोनों नेत्र नष्ट हो गये हैं ॥ १७ ॥

भक्षितं तस्य तत्स्वर्णं न दत्तं ब्राह्मणाय वै ।

तेन पापेन भो देवि मृतः पुत्रो वरः शुभे! ॥ १८ ॥

भा० टी० - पूर्वजन्म में अहीरी का जो सुवर्ण इसने भोगा । ब्राह्मण को दान नहीं दिया, हे देवि! हे शुभे! उस पाप से इसका उत्तम पुत्र मर गया है ॥ १८ ॥

मित्रसंबन्धतः पापात् पुत्रपौत्रद्वयं मृतम् ।

पूर्वजन्मकृतं देवि शुभाशुभफलं तथा ॥ १ ९ ॥

भा० टी० – मित्र संबंधी पाप होने से पुत्र और पौत्र दोनों मर गये हैं हे देवि! पूर्वजन्म में किया हुआ शुभाशुभ फल ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 113

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कर्मविपाकसंहिता १०५

भुज्यते प्राणिभिः सर्वैस्तथा देवि विशेषतः ।

म्लेच्छसेवारतो नित्यं म्लेच्छस्यैव च संगतिः ॥ २० ॥

भा० टी० - संपूर्ण प्राणियों द्वारा विशेष करके इस जन्म में भोगा जाता है । हे देवि! पूर्वजन्म में नित्य यह म्लेच्छ की सेवा में रहता था, इसलिये म्लेच्छ की ही संगति हुई है ॥२० ॥

कुमार्गतो भवेद्देवि मर्त्यलोके जनिर्यदा ।

शान्तिं शृणु महादेवि पूर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ २१ ॥

भा० टी० — जब मृत्यु लोक में जन्म हुआ, तब से ही कुमार्ग में रहता है । हे देवि! पूर्व पापों को नष्ट करने वाली शांति को सुनो ॥ २१ ॥

गृहवित्ताष्टमैर्भागैः पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

गायत्रीजातवेदाभ्यां याः फलीत्र्यम्बकेण वा ॥ २२ ॥

भा० टी००.- घर के वित्त के आठवें भाग को पुण्य के कार्यों में खर्च करें ।

गायत्री, याः फली०, जातवेदसे सुन० अथवा त्र्यंबक मंत्र ॥ २२ ॥

विष्णोरराटमन्त्रेण जपं वै कारयेत्तथा ।

पञ्चलक्षप्रमाणेन यथा पापं प्रणश्यति ॥ २३ ॥

भा० टी० - अथवा विष्णोरराट००.- इन मंत्रों से पांच लाख प्रमाण तक जप करायें तब संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं ॥ २३ ॥

होमं वै कारयेद्देवि दशांशं विधिपूर्वकम् ।

ततो वै तर्पणं कुर्यान्मार्जनं तु विशेषतः ॥ २४ ॥

भा० टी० - विधिपूर्वक दशांश होम करायें, उसके अनंतर तर्पण और मार्जन करायें ॥ २४ ॥

प्रतिमां कारयेत्तद्वद्विष्णोश्चैव सदाशिवे! अष्टादशपलस्यैव सुवर्णस्य हरिं विभुम्॥ २५ ॥

भा० टी० - हे सदाशिवे! अठारह पल सुवर्ण की हरि- विष्णु भगवान् की मूर्ति बनवायें ॥ २५ ॥

तद्वदेव शिवस्यैव रजतस्य परं विभुम् ।

प्रतिमां पूजयेद्देवि मन्त्रेणानेन सुव्रते! ॥ २६ ॥

भा० टी ० — इसी तरह अठारह पल प्रमाण चांदी की शिव की मूर्ति बनवायें हे देवि! हे सुव्रते! पश्चात् इस मंत्र से पूजन करें ॥ २६ ॥

पृष्ठ 114

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१०६ कर्मविपाकसंहिता ॐ गरुडध्वजदेवेश चराचरगुरो हरे! वासुदेव जगन्नाथ पूर्वपापं विनाशय ॥ २७ ॥

भा० टी० – ॐ हे गरुडध्वज! हे चर और अचर के गुरु! हे हरे! वासुदेव! हे जगन्नाथ! मेरे पूर्व पापों को नष्ट करो ॥ २७ ॥

ॐ नन्दिकेश्वर भूतेश देवदेव सुरेश्वर! मम पूजां गृहाण त्वं पूर्वपापं प्रणाशय ॥ २८ ॥

भा० टी ० — ॐ हे नंदिकेश्वर! हे भूतेश! हे देवदेव! सुरेश्वर! तुम मेरी पूजा को ग्रहण करो । पूर्वजन्म के पापों को नष्ट करो ॥ २८ ॥

॥ ततः इन्द्रादिदशदिक्पालान्पूजयेत् ॥ ॐ इन्द्राय नमः ॐ अग्नये नमः ॐ यमाय नमः । ॐ निरृतये नमः ॐ वरुणाय नमः ॐ वायवे नमः ।

ॐ कुबेराय नमः ॐ ईशानाय नमः ॐ ब्रह्मणे नमः ।

ॐ अनन्ताय नमः ॥

गन्धपुष्पाक्षतैः सर्वान्पूजयेच्च पृथक् पृथक् ।

ततो गां कपिलां देवि स्वर्णशृङ्गीं प्रपूजयेत् ॥ २१ ॥

भा० टी० – तदनन्तर इंद्र आदि दशदिक्पालों का पूजन करें- ॐ इंद्राय नमः १, ॐ अग्नये नमः २, ॐ यमाय नमः ३, ॐ निर्ऋतये नमः ४, ॐ वरुणाय नमः ५, ॐ वायवे नमः ६, ॐ कुबेराय नमः ७, ॐ ईशानाय नमः ८, ॐ ब्रह्मणे नमः ९, ॐ अनंताय नमः १० —– ऐसे इनका नाम उच्चारण कर गंध, पुष्प, अक्षत आदि सभी को पृथक् - पृथक् पूजें । हे देवि! पश्चात् सुवर्ण के सींग से युक्त की हुई कपिला गौ का पूजन करें ॥ २ ९ ॥ मन्त्रेणानेन भो देवि सर्वपापहरां शुभाम् । ॐ नमो भगवत्यै कामेश्वर्यै मम पापं व्यपोहतु स्वाहा

पुरा मम कृतं पापं कामधेनो सुरेश्वरि! ।

कपिले त्वं जगन्मातर्मम कार्यं प्रसाधय ॥ ३० ॥

भा० टी ० — हे देवि! संपूर्ण पापों को हरने वाली शुभ कपिला गौ को इस मंत्र से पूजें, मंत्रः -ॐ नमो भगवत्यै कामेश्वर्यै मम पापं व्यापोहतु स्वाहा । पहले किये हुए मेरे पापों को दूर करो । हे कामधेनो! हे सुरेश्वरि!! हे कपिले!! तुम जगत् की माता हो । मेरे कार्य को सिद्ध करो ॥ ३० ॥

पृष्ठ 115

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कर्मविपाकसंहिता १०७

ततश्च दद्यानां देवि ब्राह्मणाय शिवात्मने ।

दशवर्णास्ततो दद्यात् पात्राणि विविधानि च ॥ ३१ ॥

वृषभं च ततो देवि नीलवर्णं सुसंस्कृतम् ।

ब्राह्मणाय प्रदद्यात्तु सर्वपापस्य संक्षयः ॥ ३२ ॥

भा० टी० — दे देवि! पश्चात् शिव स्वरूपी ब्राह्मण को उस गौ का दान कर दें पश्चात् दश प्रकार के वर्णों वाली गौओं का दान करें और अनेक प्रकार के पात्रों का दान करें । हे देवि! पश्चात् अलंकृत किये हुए नील वृषभ को ब्राह्मण को दान करें । तब पाप नष्ट होते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥

भोजयेद्विविधैरन्नैः पायसैश्च समोदकैः ।

ब्राह्मणान् शतसंख्याकान् रुद्रविष्णुस्वरूपिणः ॥ ३३ ॥

भा० टी० – अनेक प्रकार के अन्नों से, दूध के पदार्थ और लड्डू आदि से शिव-विष्णु स्वरूपी सौ ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥ ३३ ॥

प्रतिमां दापयेत्पश्चाद्ब्राह्मणाय वराय च ।

बन्धुभिः सह भुञ्जीत ततो विप्रविसर्जनम्॥ ३४ ॥

भा० टी ० – पश्चात् उस मूर्ति को उत्तम ब्राह्मण को दान दें और बंधुजनों से युक्त हो कर भोजन करें तदनन्तर ब्राह्मणों का विसर्जन करें ॥ ३४ ॥

यथाशक्ति प्रदद्याद्वै ब्राह्मणेभ्यश्च दक्षिणाम् ।

हरिवंशस्य श्रवणं पार्थिवस्य च पूजनम्॥ ३५ ॥

भा० टी० - शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा दें हरिवंश पुराण को सुनें, पार्थिव शिव का पूजन करें ॥ ३५ ॥

भूमिदानं विशेषेण ब्राह्मणाय च दापयेत् ।

एवं कृते वरारोहे पूर्वजन्मसमुद्भवम् ॥ ३६ ॥

भा० टी० – विशेष कर ब्राह्मण को पृथ्वी का ( भूमि का) दान दें हे वरारोहे! ऐसा करने से पूर्वजन्म का पाप दूर होता है ॥ ३६ ॥

पापं प्रशमयेच्छीघ्रं मम वाक्यं च नान्यथा ।

रोगादिविविधं दुःखं तत्सर्वं विलयं व्रजेत् ॥ ३७ ॥

भा० टी० - पाप शीघ्र ही शांत होता है, यह मेरा वचन अन्यथा नहीं है । रोग आदि जो अनेक दुःख हैं, वे सब शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ३७ ॥

पृष्ठ 116

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१०८ कर्मविपाकसंहिता वंशवृद्धिर्भवेद्देवि नात्र कार्या विचारणा । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पुनर्वसुनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ भा० टी० — हे देवि! वंश की वृद्धि होती है इसमें भी सन्देह नहीं है ॥ ३८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पुनर्वसु० द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 117

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॥३० ॥

पुनर्वसुनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

पुर्यामवन्तिकायां वै नापितो वसति प्रिये! ।

स्वकर्मणः परिभ्रष्टः कृषिकर्मरतः सदा ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! उज्जैन नगरी में एक नाई रहता था, वह अपने कर्म से भ्रष्ट था और सदा खेती का काम किया करता था ॥ १ ॥

पत्नी तस्य महादेवि परपुंसि रता सदा ।

कर्कशा नाम विख्याता दर्दुरा नाम नामतः ॥ २ ॥

भा० टी० - हे महादेवि! उसकी स्त्री सदा पर- पुरुष से रमण करती थी, वह कर्कशा थी । उसका नाम दुर्दरा था ॥ २ ॥

एकस्मिन् दिवसे देवि वैश्यो धनसमन्वितः ।

स्वर्णकोटिं च संगृह्य निकटे तस्य चागतः ॥ ३ ॥

भा० टी० — हे देवि! एक दिन एक धनाय वैश्य करोड़ों रुपयों के सुवर्ण को ले कर उसके पास आया ॥ ३ ॥

नापितेन ततो देवि वैश्यो धनसमन्वितः ।

अर्द्धरात्रे गते काले ततः खड्गेन वै हतः ॥ ४ ॥

भा० टी ० — हे देवि! तब उस नाई ने धन से युक्त उस वैश्य को अर्द्ध रात्रि के समय तलवार से मार दिया ॥ ४ ॥

द्रव्यं सर्वं गृहीत्वा तु तां पुरीं च ततस्त्यजन् ।

सर्वं स्वर्णं व्ययीकृत्वा न दानं च कृतं क्वचित्॥ ५ ॥

भा० टी०-० - फिर संपूर्ण द्रव्य को ग्रहण कर उस पुरी को त्याग कर संपूर्ण सुवर्ण को खर्च कर दिया और कुछ भी दान नहीं किया ॥५ ॥

एकदा समये देवि नापितेन सह स्त्रिया ।

प्रयागे मकरे मासि मासमेकं निरन्तरम्॥ ६ ॥

पृष्ठ 118

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११० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे देवि! एक बार उस नाई ने स्त्री सहित माघ महीने में प्रयागजी में निरंतर ॥ ६ ॥

प्रत्यहं क्रियते स्नानं प्रातःकाले सदाशिवे! गोदानं च कृतं तेन वृषभं स्वर्णभूषितम् ॥ ७ ॥

भा० टी० – प्रतिदिन प्रात: काल स्नान किया । हे सदाशिवे! फिर गोदान किया और स्वर्ण से विभूषित किये बैल का दान किया ॥७ ॥

ततो वै मरणं तस्य नापितस्य सुरेश्वरि! निर्जले तस्य भो देवि चोपले पथि मध्यगे ॥ ८ ॥

भा० टी ० — हे सुरेश्वरि! पश्चात् उस नाई की मृत्यु मार्ग में कहीं निर्जल स्थान में एक पत्थर पर हो गयी ॥ ८ ॥

यमदूतैर्महादेवि नरके नाम कर्द्दमे ।

क्षिप्तो यमाज्ञया वर्षसहस्त्रं षष्टिसंमितम् ॥ ९ ॥

भा० टी० — हे महादेवि! तदनन्तर धर्मराज के दूतों ने यम की आज्ञा से साठ हजार वर्षों तक उसे नरक में रखा ॥ ९ ॥

नरकान्निर्गतो देवि व्याघ्रयोनिस्ततोऽभवत् ।

पुनर्महिषयोनिं च मानुषत्वं ततो गतः ॥ १० ॥

भा० टी० — हे देवि! नरक से निकल कर वह व्याघ्र की योनि में पश्चात् भैंसे की योनि फिर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ १० ॥

ऋक्षे पुनर्वसौ देवि तृतीयचरणे वरे! प्रातः स्नानफलं देवि नृपवंशसमुद्भवः ॥ ११ ॥

भा० टी० - हे देवि! पुनर्वसुनक्षत्रके तीसरे चरण में जन्म लेने वाला यह प्रातः काल स्नान के फल से राजकुल में उत्पन्न हुआ है ॥ ११ ॥

मध्यदेशे वरारोहे सरय्वा उत्तरे तटे ।

महाधनेन संयुक्तश्चौराणां कर्मकारकः ॥ १२ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! मध्यदेश में सरयू नदी के उत्तर तट पर वह धन - वैभव से युक्त है और चौरों का कर्म करने वाला है ॥ १२ ॥

पत्नी तस्य भवेद्वन्ध्या मृतवत्सा सुतायुता ।

कफरोगसमायुक्ता ज्वरेणैव प्रपीडिता ॥ १३ ॥

भा० टी० - उसकी स्त्री वंध्या है अथवा उसकी संतान नहीं जीती है, या कन्या ही जन्मती है, वह कफ रोग से युक्त है और ज्वर से पीड़ित है ॥ १३ ॥

पृष्ठ 119

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कर्मविपाकसंहिता १११

मित्रस्यैव वधः पूर्वं नापितेन यतः कृतः ।

तेन कर्मफलेनैव महारोगसमुद्भवः ॥ १४ ॥

भा० टी० – इसने जो पूर्वजन्म में ( नाई की योनि में ) मित्र का वध किया, उस कर्म -फल से यह महारोग से पीडित है ॥ १४ ॥

पुत्रोऽपि जायते देवि तस्य मृत्युर्भवेत् किल ।

शान्तिं तस्य प्रवक्ष्यामि शृणु देवि समासतः ॥ १५ ॥

भा० टी ० — हे देवि! पुत्र भी जन्मा था, किन्तु उसकी मृत्यु हो गई । अब उसकी शांति कहता हूँ हे देवि! संक्षेप से सुनो ॥ १५ ॥

गायत्रीमूलमन्त्रेण पञ्चलक्षजपो यदा ।

तदा पापं क्षयं याति पूर्वजन्मनि यत्कृतम् ॥ १६ ॥

भा० टी० – जब गायत्री मूल मंत्र से पांच लाख तक जप कराये जायें, तब पूर्वजन्मका पाप नष्ट हो जाता है ॥ १६ ॥

हरिवंशस्य श्रवणं चण्डीपाठं शिवार्चनम् ।

विधिवद्देवि कर्तव्यं पापं सर्वं विनश्यति ॥ १७ ॥

भा० टी० - हरिवंश को सुनें दुर्गापाठ करायें विधि से शिवजी का पूजन करायें, हे देवि! ऐसा करने से संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥

चतुरस्त्रे ततः कुण्डे होमं चैव तु कारयेत् ।

तिलधान्यादिभिर्देवि दशांशजपसंख्यया ॥ १८ ॥

भा० टी० - पश्चात् जपों की दशांश संख्या से चौकोर कुंड में तिलधान्य आदि से होम करें ॥ १८ ॥

वैश्यस्य प्रतिमां देवि कारयेद्वै सुवर्णतः ।

पञ्चविंशपलेनैव रचितां च प्रयत्नतः ॥ १ ९ ॥

भा० टी० — हे देवि! प्रयत्नपूर्वक पच्चीस पल की सुवर्ण की वैश्य की मूर्ति बनायें ॥ १ ९ ॥

ताम्रपात्रे शुभे स्थाप्य पूजयेत्प्रतिमां ततः ।

मन्त्रेणानेन भो देवि गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ २० ॥

भा० टी० – तदनन्तर उत्तम तांबे के पात्र में उस मूर्त्तिको स्थापित कर पश्चात् गंध, अक्षत आदि से इस मंत्र से पूजन करें ॥ २० ॥

पृष्ठ 120

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११२ कर्मविपाकसंहिता ॐ नमस्ते देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर! अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा मया पापं कृतं पुरा ॥ २१ ॥

भा० टी० – ॐ हे देवदेवेश! हे शंखचक्रगदाधर! अज्ञान से अथवा प्रमाद से मैनें पूर्वजन्ममें पाप किये ॥ २१ ॥

तत्सर्वं क्षम्यतां देव शरणागतवत्सल । ॐ चक्रधराय नमः ॐ गोविन्दाय नमः । ॐ दामोदराय नमः ॐ कृष्णाय नमः ।

ॐ हंसाय नमः ॐ परमहंसाय नमः ।

ॐ अच्युताय नमः ॐ हृषीकेशायनमः ॥

ॐ चक्रादिनामभिश्चैतैः सर्वदिक्षु प्रपूजयेत् ।

प्रतिमां पूजयित्वा तु तां विप्राय प्रदापयेत्॥ २२ ॥

भा० टी० — हे शरणागतवत्सल! उस संपूर्ण को क्षमा करो, मन्त्र-ॐ चक्रधराय नमः १, ॐ गोविंदाय २, ॐ दामोदराय नमः ३, ॐ कृष्णाय नमः ४, ॐ हंसाय नमः ५, ॐ परमहंसाय नमः ६, ॐ अच्युताय नमः ७, ॐ हृषीकेशाय नमः ८ – ऐसे इन चक्रधर के नामों से संपूर्ण दिशाओं मे पूजें । प्रतिमा का पूजन करके ब्राह्मण को दान दें ॥२२ ॥

ततो गां कृष्णवर्णां तु ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।

पञ्चसंख्यमितं देवि प्रदद्याद्वै कुटुम्बिने ॥ २३ ॥

भा० टी० - तदनन्तर कृष्ण वर्ण की पाँच गौओं का दान किसी कुटुंबी ब्राह्मण को दें ॥ २३ ॥

ब्राह्मणान्भोजयेद्देवि यथासंख्यान्वरानने! एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ॥ २४ ॥

भा० टी० — हे देवि! यथासंख्य, शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन करायें । हे वरारोहे! ऐसा करने से शीघ्र ही पुत्र होता है ॥ २४ ॥

वन्ध्यत्वं नाशयत्याशु सर्वरोगो विनश्यति । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पुनर्वसुनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

भा० टी० - शीघ्र ही वंध्यापन दूर होता है और संपूर्ण रोग नष्ट होते हैं ॥ इतिश्रीकर्मविपाक० पुनर्वसुनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥