कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 91–100
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 91–100
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कर्मविपाकसंहिता ८३ भा० टी० – घर के धन में से छठे हिस्से को पुण्य के कार्य में खर्च करें और गायत्री अथवा " त्र्यंबकं यजामहे० " इस मंत्र का जप करें ॥ १३ ॥
लक्षत्रयं जपं चैव दशवर्णाः प्रदापयेत् ।
हवनं विधिवत्कुर्यात् तर्पणं मार्जनं तथा ॥ १४ ॥
भा० टी ० — उपर्युक्त दोनों मंत्रों का तीन लाख तक जप करायें, दश प्रकार के वर्णों वाली गौओं का दान करायें, विधिपूर्वक हवन करायें तर्पण तथा मार्जन करायें ॥१४ ॥
सौवर्णस्य वरारोहे सूर्यं कुर्यात्प्रयत्नतः ।
पलपञ्चप्रमाणेन द्विगुणं चन्द्रमेव च॥ १५ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! पांच पल प्रमाण सोने का सूर्य बनायें, दश पल का चंद्रमा बनायें ॥ १५ ॥
रौप्यस्यैव प्रकुर्यात्तु यथाशास्त्रं प्रपूजयेत् ।
मन्त्रेणानेन भो देवि दद्याद्विप्राय तद्द्वयम्॥ १६ ॥
भा० टी० - हे देवि! रूपा का चंद्रमा बनाये पश्चात् शास्त्र के अनुसार इस मंत्र से पूजा कर उन दोनों मूर्तियों को ब्राह्मण को दान करें ॥ १६ ॥
मंत्रः ॥ ॐ ह्रीं मार्त्तण्डाय स्वाहा । सूर्यदेव महाभाग त्रैलोक्यतिमिरापह! मम पूर्वकृतं पापं क्षम्यतां परमेश्वर!॥ १७ ॥
मन्त्र “" ॐ ह्रीं मार्त्तण्डाय स्वाहा " हे सूर्य देव महाभाग! त्रिलोकी के अंधकार को दूर करने वाले हे परमेश्वर! तुम मेरे पूर्वजन्म के पाप को क्षमा करो ॥ १७ ॥
ॐ सोमाय स्वाहा । ॐ सौम्यरूप महाभाग मन्त्रराज द्विजोत्तम! पूर्वजन्मकृतं पापमोषधीश क्षमस्व मे ॥ १८ ॥
भा० टी० – ॐ “ सोमाय स्वाहा " हे सौम्यरूप महाभाग! हे मंत्रराज! हे द्विजोत्तम! हे औषधीश! पूर्वजन्म में किये हुए मेरे पाप को दूर करो ॥ १८ ॥
ततश्च ब्राह्मणान् पूज्य भोजयित्वा विसर्जयेत् ।
एवं कृते न संदेहो विद्वान् पुत्रोऽभिजायते ॥ १ ९ ॥
भा० टी० — फिर ब्राह्मणों का पूजन कर उन्हें भोजन कराकर विसर्जन करें देवें ऐसा करने से विद्वान् पुत्र उत्पन्न होता है, इसमें संदेह नहीं ॥ १ ९ ॥
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८४ कर्मविपाकसंहिता रोगः सर्वः क्षयं याति नात्र कार्या विचारणा ॥ २० ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे० मृगशिर० नक्षत्र० चतुर्थचरणप्राय० नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
भा० टी० - संपूर्ण रोग नष्ट होता है इसमें कुछ भी चिन्तनीय नहीं है ॥ २० ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्व० मृगशि० प्रायश्चित्तकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
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॥२४ ॥
रौद्र( आर्द्रा नक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि रौद्रनक्षत्रजं फलम् ।
येन कर्मविपाकेन मृत्युलोके च भुज्यते ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं- अब आर्द्रा नक्षत्र में जन्म लेने वाले के कर्म फल को कहता हूँ जिस कर्मविपाक को मृत्यु लोक में भोगा जाता है ॥ १ ॥
अवन्तीपुर्य्यां भो देवि रङ्गकारश्च तिष्ठति ।
वस्त्राणि रङ्गयन्नित्यं स्वधर्मं पालयेत्सदा ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! उज्जैन नगरी में एक वस्त्र रंगने वाला ( रंगकार ) रहता था वह सदा अपने धर्म का पालन करता हुआ अनेक प्रकार के वस्त्रों को रंगा करता था ॥ २ ॥
कुबेर इति तन्नाम लीलानाम्नी च तत्प्रिया ।
पतिव्रता च सा देवि रङ्गकारश्च तां त्यजन्॥ ३ ॥
भा० टी००.- उसका नाम कुबेर था, उसकी स्त्री का नाम लीला था । हे देवि! वह पतिव्रता थी, उस रंगकार ने अपनी स्त्री को त्याग दिया ॥ ३ ॥
ब्राह्मणीं रमते चैकां पापप्रीतिं समुद्वहन् ।
त्यक्त्वा पतिव्रतां भार्यां ब्राह्मणीं प्रीतितोऽभजत्॥ ४ ॥
भा० टी००.-एक ( अन्य) ब्राह्मणी से रमण करता हुआ वह पाप की प्रीति बढ़ाता हुआ अपनी पतिव्रता भार्या को त्याग कर ब्राह्मणी की प्रीति के वशीभूत हो गया ॥ ४ ॥
द्रव्यं च संचितं तेन रङ्गकारेण वै शिवे! भूमिमध्ये च तद्द्रव्यं कृतं तेन च सुन्दरि! ॥ ५ ॥
भा० टी ० - हे शिवे! उस रंगकार ने जो द्रव्य संचित किया हे सुंदरी! वह संपूर्ण उसने पृथ्वी में गाड़ दिया ॥ ५ ॥
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८६ कर्मविपाकसंहिता
किञ्चिद्दानं कृतं तेन गङ्गायमुनसंगमे ।
मरणं तस्य वै जातं सा च भार्या विवाहिता ॥ ६ ॥
भा० टी ० — उसने गंगा - यमुना नदी के संगम पर कुछ दान भी किया, फिर वह मर गया और उससे विवाही हुई, वह उसकी स्त्री भी मर गई ॥ ६ ॥
तत्पुरे च सती जाता लीलानाम पतिव्रता ।
सत्यलोकं गतः सोऽपि लक्षद्वयमितं प्रिये! ॥ ७ ॥
भा० टी० — वह लीला नाम वाली उसकी पतिव्रता स्त्री उसके ही पुर में सती हो गई जिससे उसने भी हे प्रिये! दो लाख वर्ष तक स्वर्ग लोक में वास किया ॥ ७ ॥
पुनः पुण्यक्षये जाते मनुष्योऽभूत्सदाशिवे! मध्यलोके च विख्यातो धनधान्यसमन्वितः ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे सदाशिवे! पश्चात् पुण्य क्षीण हो गया, तब वह मध्य लोक में धनधान्य से युक्त प्रसिद्ध मनुष्य के रूप में पैदा हुआ ॥ ८ ॥
पुत्राश्च बहवो जाताः कोपितेषु न जीवति ।
शरीरे च ज्वरोत्पत्तिः खञ्जत्वं चरणे तथा ॥ ९ ॥
भा० टी० – इसके बहुत से पुत्र हुए, परंतु उनमें कोई भी जीवित नहीं रहता है शरीर में ज्वर रहता है पैर से लंगड़ा है ॥ ९ ॥
ब्राह्मणीगमनं देवि पूर्वजन्मनि वै कृतम् ।
तेन पापेन भो देवि पुत्रस्तस्य न जीवति ॥ १० ॥
भा० टी० — हे देवि! उसने पूर्वजन्म में ब्राह्मणी के संग गमन किया था, उस पाप के कारण उसके पुत्र नहीं जीते हैं ॥ १० ॥
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि तां शृणुष्व वरानने! दशायुतं जपेद्देवि गायत्रीं वेदमातरम् ॥ ११ ॥
भा० टी० – हे वरानने! इसकी शांति को कहता हूँ उसको सुनो । हे देवि! वेदमाता गायत्री का एक लाख तक जप करायें ॥ ११ ॥
हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ।
षडंशं चैव दानं वै दद्याद्वेदविदे शिवे! ॥ १२ ॥
भा० टी० - तद्दशांशहवन और तिल का दशांशतर्पण तथा मार्जन कराये हे शिवे! वेद को जानने वाले ब्राह्मण के अर्थ घर के वित्त से छठे हिस्से को दान करें ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ८७
ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चाच्छर्करापायसेन च ।
गामेकां विधिवद्दद्याद्धेमवर्णां सुभूषिताम् ॥ १३ ॥
भा० टी० – तदनन्तर शर्करा और खीर से ब्राह्मणों को भोजन कराये, विधिपूर्वक सुवर्ण से एक गौ को विभूषिते करके उसे दान करें ॥ १३ ॥
एवं कृते न संदेहो बहुपुत्रश्च जायते ।
रोगस्यैव विमुक्तिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रौद्रनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से निश्चय ही पुत्र होता है, रोग से छूटजाये, इसमें कुछ चिन्तनीय नहीं है ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्व०रौद्रनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
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॥२५ ॥
रौद्र( आर्द्रा नक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
शृणु देवि वरारोहे नृणां वै पूर्वजन्मनि ।
यत्कृतेन महाघोरे नरके परिपच्यते ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! हे वरारोहे!! मनुष्यों के पूर्वजन्म के, जिस कर्म से उनके द्वारा महाघोर नरक में दुःख भोगा जाता है उनको सुनो ॥ १ ॥
अवन्त्यां पश्चिमे द्वारे वैश्यो वसति भाग्यवान् ।
धनधान्यसमायुक्तः स्वधर्मनिरतः सदा ॥ २ ॥
भा० टी० – उज्जैन नगरी में पश्चिम के दरवाजे की तरफ एक भाग्यवान् वैश्य रहता था, वह धनधान्य से युक्त और अपने धर्म में सदा तत्पर रहता था ॥ २ ॥
एवमर्द्ध वयो जातं दरिद्रत्वं ततोऽभवत् ।
व्ययार्थं वै ततो देवि विप्रस्वर्णं गृहीतवान् ॥ ३ ॥
भा० टी० - इस प्रकार जब उसकी आधी अवस्था बीत जाने पर तब वह दरिद्री हो गया, हे देवि! तब उसने व्यय के लिए ब्राह्मण के द्रव्य को ( उधार) लिया ॥३ ॥
पलविंशप्रमाणं तद्व्ययं जातं वरानने! ततो वैश्यस्य मृत्युर्वै भार्यया सहितस्य वै ॥ ४ ॥
भा० टी० — हे वरानने! ऐसे बीस पल प्रमाण जो सुवर्ण उसने लिया था, वह सब खर्च हो गया, फिर स्त्री सहित उस वैश्य की मृत्यु हो गई ॥४ ॥
स्वर्गं जातं ततो देवि नर्मदामरणादपि ।
षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गस्यैव फलं शुभम् ॥ ५ ॥
भा० टी० — हे देवि! पश्चात् नर्मदा नदी के किनारे मरने से स्वर्ग लोक प्राप्त हुआ, साठ हजार वर्षों तक उसने स्वर्ग लोक का सुंदर फल भोगा ॥५ ॥
भुक्तं बहुविधं देवि भार्यया सहितेन वै ।
ततः पुण्यक्षये जाते पुनर्मत् बभूव तु ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ८९ भा० टी० - हे देवि! पश्चात् स्त्री सहित उसने अनेक सुख भोगे, फिर पुण्य क्षण हो गये, तब ये दोनों मनुष्य हो गये ॥ ६ ॥
धनधान्यसमायुक्तौ पुत्रकन्याविवर्जितौ ।
रुग्णौ दुर्बलगात्रौ च पूर्वकर्मफलेन तु ॥ ७ ॥
भा० टी ० – वे दोनों धनधान्य से युक्त हैं पुत्र-कन्या से रहित हैं रोग वाले हैं, दुर्बल शरीर वाले हैं, यह सब पूर्व कर्म फल से हो रहा है ॥ ७ ॥
ऋणसम्बन्धतो देवि विप्रः पुत्रोऽभवत्तदा ।
ऋणं यावत्प्रमाणं वै गृहीतं पूर्वजन्मनि ॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवि! ऋण के संबंध से उस ब्राह्मण का पुत्र हो गया, जितने प्रमाण का द्रव्य उधार के रूप में पूर्वजन्म में ग्रहण किया था ॥ ८ ॥
तावन्मात्रं गृहित्वा तु ततो वै मरणं भवेत् ।
पुनः पुत्रो न तस्यैव विंशद्वर्षे गते सति ॥ ९ ॥
भा० टी० — उतने ही प्रमाण में द्रव्य को ग्रहण करके अर्थात् खर्च कर वह पुत्र मर जाता है फिर इसके पुत्र नहीं हुआ है, बीस वर्ष व्यतीत हो चुके हैं ॥ ९ ॥
तस्य दानं शृणुष्वादौ पूर्वपापक्षयो यतः ।
गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ १० ॥
भा० टी० - पहले उसके दान को सुनो, जिससे पूर्वजन्म का पाप नष्ट होगा, घर के वित्त के अष्टमांश द्रव्य को ब्राह्मण को समर्पण करें ॥ १० ॥
स्वर्णपञ्चपलेनैव पुष्यं च मकराकृतिम् ।
प्रदद्याद्वेदविदुषे पूर्वपापक्षयो भवेत्॥ ११ ॥
भा० टी० — पांच पल सुवर्ण का मकराकार पुष्य बनाकर उसको वेद को जानने वाले ब्राह्मण को दान कर दें, तब पूर्वजन्म का पाप नष्ट होता है ॥ ११ ॥
पुनः पुत्रः प्रसूयेत नात्र कार्या विचारणा ॥ १२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रौद्रनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्त- कथनं नामपञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
भा० टी० - फिर उसका पुत्र उत्पन्न होता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥१२ ॥
इति श्रीकर्मविपाक० रौद्रनक्षस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पंचविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
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॥२६ ॥
रौद्र( आर्द्रा नक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अवन्तीनगरी नाम्ना ततः क्रोशद्वयोपरि ।
अग्निकोणे महादेवि मङ्गलं नाम वै पुरम् ॥ १ ॥
भा ० टी० – शिवजी कहते हैं - हे देवि! उज्जैन नगरी से दो कोश की दूरी पर अग्नि कोण में मंगल नामक पुर है ॥ १ ॥
तस्मिन्ग्रामे वसत्येको ब्राह्मणो द्यूततत्परः ।
अन्ये तु बहवस्तत्र वसन्ति सुद्विजोत्तमाः ॥ २ ॥
भा० टी० – वहाँ उस ग्राम में जुए में तत्पर रहने वाला एक ब्राह्मण रहता था, अन्य तो वहाँ बहुत उत्तम ब्राह्मण रहते थे ॥ २ ॥
मद्यपानरतो नित्यं चौरविद्यासु तत्परः ।
परस्त्रीलम्पटो देवि वेश्यायां निरतः सदा ॥ ३ ॥
भा० टी० - वह ब्राह्मण मद्यपान और प्रतिदिन चोरी की विद्या में तत्पर था, हे देवि! पर स्त्री केप्रति लंपट और वेश्यागामी था ॥ ३ ॥
प्रत्यहं स च भोदेवि द्विजरूपो नराधमः ।
चौरत्वाद्द्द्रव्यमुत्पाद्य नैव दानं समाचरेत्॥ ४ ॥
भा० टी० - हे देवि! ब्राह्मण के रूप को धारण करने वाला वह अधम नर प्रतिदिन चोरी से धन को इकठ्ठा कर, दान नहीं करता था ॥४ ॥
एवं बहुदिने याते तस्य मृत्युर्बभूव ह ।
नरके पातयामास यमदूतो यमाज्ञया ॥ ५ ॥
भा० टी० - ऐसे बहुत से दिन बीत जाने पर उसकी मृत्यु हो गई, धर्मराज का दूत यम की आज्ञा से उसे नरक में पटक गया ॥ ५ ॥
सप्ततिर्वै सहस्राणि रौरवे परिपच्यते ।
महाकष्टं लभेद्देवि कृमिसूचीमुखादिभिः ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ९१ भा० टी० - उसने सत्तर हजार वर्षे तक रौरव नामक नरक में दुःख भोगा, सुई सरीखे कृमियों से उसे महाकष्ट प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
पुनः कर्मवशाद्देवि नरकान्निर्गतो यदा ।
बिडालकाकयोनिञ्च तदा प्राप्तो द्वयं हि च ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! फिर कर्म- वश जब वह नरक से निकला तब बिलाव और काग इन दोनों योनियों को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
योनिद्वयफलं भुक्तं मानुषत्वं ततोलभेत् ।
मध्यदेशे वरारोहे ततः पीडा महत्यपि ॥ ८ ॥
भा० टी० – इन दानों योनियों के फल को भोग कर पश्चात् मध्य देश में मनुष्य
योनि को प्राप्त हुआ है । हे वरारोहे! वहाँ भी उसे बहुत -सी पीड़ा है ॥ ८ ॥
वंशछेदो भवेद्देवि पूर्वकर्मविपाकतः ।
तस्योपरि विशालाक्षि शान्तिं शृणु वरानने! ॥९ ॥
भा० टी० - हे देवि! हे वरानने! पूर्व कर्मविपाक से उनका वंश नष्ट हो गया, अब उसकी शांति को सुनो ॥ ९ ॥
गायत्रीजातवेदाभ्यां त्र्यम्बकेण यथाविधि ।
जपं वै कारयामास हवनं तर्पणं तथा ॥ १० ॥
भा० टी० – ' गायत्री, ' ' जातवेदसे ० ' ' त्र्यम्बकं यजा० '– इन मंत्रों से यथार्थ विधि पूर्वक जप, हवन और तर्पण करायें ॥ १० ॥
लक्षत्रयं जपेद्देवि पूर्वपापविशुद्धये ।
ततो वै पूजयेद्देवि तुलसीं शुद्धरूपिणीम्॥ ११ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्व पाप की शुद्धि के लिए तीन लाख जप करायें, हे देवि! तदनन्तर शुद्ध रूप वाली तुलसी की पूजा करें ॥ ११ ॥
पूजयेद्विविधैश्चान्नैर्धूपनैवेद्यदीपकैः ।
भूमिदानं ततो देवि यथाशक्ति प्रदापयेत् ॥ १२ ॥
भा० टी ० – अनेक प्रकार के अन्न, धूप, दीप, नैवेद्य- इन सबसे पूजन करें, हे देवि! पश्चात् शक्ति के अनुसार भूमि का दान करें ॥ १२ ॥
एवं कृते महादेवि सर्वरोगक्षयो भवेत् ।
पुत्रश्च जायते देवि वन्ध्यात्वं च प्रणश्यति ॥ १३ ॥
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९२ कर्मविपाकसंहिता इतिश्रीकर्मविपाक० रौद्र ( आर्द्रा) नक्षत्रतृतीयचरण प्रायाश्चित्तकथनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
भा० टी० — हे महादेवि! ऐसा करने से संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं, हे देवि! पुत्र उत्पन्न होता है और वंध्यापन रोग दूर होता है ॥ १३ ॥
इति श्रीकर्मविपाक० भाषाटी० षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥