कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 11–20

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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कर्मविपाकसंहिता ३ कुंभों का दान करें, प्रजापति की प्रसन्नता के लिए सोलह ब्राह्मणों को भोजन करायें, भोजन के पश्चात् आचार्य की प्रार्थना करें-हे ब्राह्मण! तुम महाभाग वाले हो, हे पृथ्वी के देव! हे ब्राह्मणों में उत्तम! मेरे शुभ -अशुभ पूर्व कर्मों को यथार्थ रूप से देख कर ॥ ७ ॥

कथं मे कथयस्वाशु कृपां कृत्वा ममोपरि ।

एवं तु ब्राह्मणाचार्य्यं नमस्कृत्य प्रसादयेत् ॥ ८ ॥

भा० टी ० – मेरे ऊपर कृपा करके शीघ्र कहो कि, मेरे पूर्व कर्म कैसे हैं? इस प्रकार ब्राह्मण आचार्य को प्रणाम करके प्रसन्न करें ॥ ८ ॥

दश पञ्च तथा विप्रानुपवेश्य प्रयत्नतः ।

तेषामनुज्ञया सर्वं प्रायश्चित्तमुपक्रमेत् ॥ ९ ॥

भा० टी० - मनोयोग से दश तथा पाँच ब्राह्मणों को बैठा कर उनकी आज्ञा लेकरके प्रायश्चित्त करें ॥ ९ ॥

वस्त्रालङ्करणैराचार्य्यं पूजयित्वा प्रजापतिस्वरूपं गुरुं प्रार्थयेत्— प्रजापते महाबाहो वेदवेदाङ्गपारग!॥ पुत्रकामसमृद्ध्यर्थं पूजां गृह्णीष्व ते नमः ॥ १० ॥

भा० टी००. - वस्त्र - आभूषणों को धारण करके आचार्य का पूजन करें, प्रजापति-रूप गुरु की प्रार्थना करें । हे प्रजा के पति! हे महाभुजा वाले!! हे वेदवेदांग को जानने वाले!!! पुत्र की कामना सिद्ध होने के लिये मेरे द्वारा किये गये पूजन को अंगीकार करो, आपको मेरा प्रणाम है ॥ १० ॥

विष्णो त्वं पुण्डरीकाक्ष भुवनानां च पालकः ।

लक्ष्म्या सह हृषीकेश पूजां गृह्णीष्व ते नमः ॥ ११ ॥

भा० टी ० — हे विष्णो! हे पुंडरीकाक्ष!! तुम भुवनों के पालन करने वाले हो । हे हृषीकेश! लक्ष्मी के साथ ( आकर ) मेरी पूजा को ग्रहण करो, आपको मेरा प्रणाम है ॥११ ॥

रुद्र त्वं दैन्यनाशाय सदा भस्माङ्गधारक ।

नागहारोपवीती च पूजां गृह्णीष्व ते नमः ॥ १२ ॥

भा० टी० - हे रुद्र! आप दीनता को दूर करने के लिए सदा भस्म को अंगों में धारण करते हैं, नाग के हाररूप यज्ञोपवीत को धारण करते हो, मेरी पूजा को ग्रहण करो, आपको मेरा प्रणाम है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 12

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४ कर्मविपाकसंहिता

स्वर्गे सुराश्च गन्धर्वाः पाताले पन्नगादयः ।

मृत्युलोके मनुष्याश्च सर्वे ध्यायन्ति भास्करम् ॥ १३ ॥

भा० टी० - स्वर्ग में देवता और गंधर्व, पाताल में नागादि और मृत्युलोक में मनुष्य- ये सब सूर्य का ध्यान करते हैं ॥ १३ ॥

महायज्ञादिकं चैव अग्निहोत्रादि कर्म च ।

तीर्थस्नानं तथा ध्यानं वर्तते भास्करोदयात् ॥ १४ ॥

भा० टी ० – महायज्ञ आदि कर्म, अग्निहोत्र आदि कर्म, तीर्थ का स्नान और देवता आदि का ध्यान —ये सब सूर्य के उदय होने से प्रवृत्त होते हैं ॥ १४ ॥

ब्रह्मा विष्णुः शिवः शक्तिर्देवदेवो मुनीश्वराः ।

ध्यायन्ति भास्करं देवं साक्षीभूतं जगत्त्रये ॥ १५ ॥

भा० टी० – उत्तम, मध्यम, अधम- तीन प्रकार के जगत् के साक्षीरूप सूर्य का ब्रह्मा, विष्णु, शिव, देवी, देवताओं के देव इंद्र, मुनियों में उत्तम मुनि- ये सब ध्यान करते हैं ॥ १५ ॥

त्वं ब्रह्मा त्वं च वै विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं प्रजापतिः ।

त्वमग्निस्त्वं वषट्कारस्त्वामाहुः सर्वसाक्षिणम् ॥ १६ ॥

भा० टी० — तुम ब्रह्मा -रूप हो, तुम ही विष्णु हो, तुम शिव हो, तुम प्रजापति हो, तुम ही अग्नि हो, तुम वषट्कार हो, तुमको ही संपूर्ण का साक्षी कहते हैं ॥ १६ ॥

योगिनां प्रथमो ध्येयो यतीनां ब्रह्मचारिणाम् ।

आधिव्याध्योश्च कर्त्ता त्वं सर्वपापक्षयं कुरु ॥ १७ ॥

भा० टी० - योगी, यती, ब्रह्मचारी- ये आपका ध्यान करते हैं और आधि ( मन की पीड़ा) - व्याधि को तुम ही करने वाले हो, मेरे सब पाप दूर करो ॥ १७ ॥

दीनानां कृपणानां च सर्वेषां व्याधिनाशनम् ।

एवं च भास्करं ध्यात्वा नमस्कृत्य प्रसादयेत्॥ १८ ॥

भा० टी० - हे सूर्य! आप दीन और कृपण- सब की व्याधि का नाश करने वाले हो, ऐसे सूर्य का ध्यान कर, प्रणाम करके सूर्य को प्रसन्न करें ॥ १८ ॥

अथ पृच्छकनियमः

पापी चैव दुराचारी परनिन्दापरो जनः ।

ब्रह्महा महारी च सुरापी गुरुतल्पगः ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 13

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कर्मविपाकसंहिता भा० टी० – अब पूछने वाले के नियम कहते हैं - पापी और निंदित आचरण करने वाला और पराई निंदा करने वाला, ब्रह्महत्यारा, सुवर्ण को चुराने वाला, सुरा पीने वाला, गुरुओं की स्त्रियों से संभोग करने वाला ॥ १ ९ ॥

स्त्रीहन्ता बालघाती च अगम्यागमनं तथा ।

एवमादिकपापानि मया वै पूर्वजन्मनि ॥ २० ॥

भा० टी० - स्त्री की हत्या, बालक की हत्या, अगम्य स्त्री से गमन करना— ऐसे अनेक पाप मैंने पूर्व जन्म में किये हैं ॥ २० ॥

कृतानि विविधान्येव सर्वाणि मार्टुमर्हसि ।

शरणं तव संप्राप्तस्त्वं मामुद्धर्त्तुमर्हसि ॥ २१ ॥

भा० टी० — अनेक प्रकार के जो पाप मैंने किये हैं, उन सब को आप दूर करो, मैं आपकी शरण में हूँ, आप मेरा उद्धार करो ॥ २१ ॥

ममोपरि कृपां कृत्वा कर्म मे कथय प्रभो! लग्नं तात्कालिकं कृत्वा जन्मपत्रं निरीक्ष्य च ॥ २२ ॥

भा० टी० - हे प्रभो! मेरे ऊपर कृपा करके, तात्कालिक लग्न करके जन्म पत्र को देख कर मेरे कर्मों को कहो ॥ २२ ॥

लग्नं ग्रहविचारेण ज्ञातव्यं कर्म मामकम् ।

ग्रहलग्नविचारेण जानन्ति कर्म पण्डिताः ॥ २३ ॥

भा० टी० -लग्न और ग्रह का विचार करके मेरा कर्म देखने योग्य है, क्योंकि ग्रह लग्न के विचार से पंडित कर्म को जानते ही हैं ॥ २३ ॥

सूत उवाच ॥

कैलासशिखरे रम्ये सुखासीनं महेश्वरम् ।

प्रणम्य पार्वती भक्त्या पप्रच्छ च सदाशिवम् ॥ २४ ॥

भा० टी० - सूतजी कहते हैं - कैलास के सुंदर शिखर में सुखासन में बैठे हुए शिवजी को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके पार्वती ने सदाकल्याणरूप शिव से यह पूछा ॥ २४ ॥

पार्वत्युवाच ॥ देव देव जगन्नाथ भक्तानुग्रहकारक! लोकोपकारकं प्रश्नं वद मे परमेश्वर! ॥ २५ ॥

भा० टी० – पार्वतीजी ने पूछा— हे देव! हे देव! हे जगत् के नाथ!! हे भक्तों पर कृपा करने वाले, लोक का उपकार करने वाले मेरे प्रश्न का उत्तर दो ॥ २५ ॥

पृष्ठ 14

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६ कर्मविपाकसंहिता

कलौ च मानवास्तुच्छाः पापमोहसमन्विताः ।

महामोहग्रहग्रस्ताः पुत्रकन्याविवर्जिताः ॥ २६ ॥

भा० टी० – कलियुग के मनुष्य तुच्छ हैं, पाप और मोह से युक्त हैं, महारोग आदि ग्रहों से ग्रसे हुये हैं और पुत्र व कन्या से वर्जित हैं ॥ २६ ॥

कुत्सिता रूपविभ्रष्टा मृतवत्सा नपुंसकाः ।

नारीणां पुरुषाणां च पूर्वकर्म च यत्प्रभो ॥ २७ ॥

भा० टी० - अधम, बिगड़े हुए रूप वाले नष्ट संतान वाले नपुंसक हैं, हे प्रभो! ऐसे स्त्री- पुरुषों के जो कर्म हैं ॥ २७ ॥

तत्सर्वं वद मे स्वामिन् सर्वज्ञोऽसि मतो मम ।

तच्च श्रुत्वा वचो देव्याः प्रीतिमान् स महेश्वरः ॥ २८ ॥

भा ० टी० — हे स्वामिन्! उन सम्पूर्ण कर्मों को मेरे आगे कहो, आप तो सर्वज्ञ हो यह मेरा मत है । पार्वती के वचन सुन कर शिवजी प्रसन्न हुए ॥ २८ ॥

प्रहस्य जगतामीशो वल्लभां प्रीतिसंयुताम् ।

उवाच प्रश्नं तद्गूढं त्रैलोक्ये चापि दुर्लभम्॥ २ ९ ॥

भा० टी० – जगत् के स्वामी शिवजी ने हँस कर प्रसन्न हुई पार्वती को तीनों लोकों में दुर्लभ उस प्रश्न के गुप्त उत्तर को कहा ॥ २ ९ ॥ शिव उवाच ॥

शृणु त्वं गिरिजे देव नृणां कर्म विशेषतः ।

कथयामि न संदेहो यत्ते मनसि वर्त्तते ॥ ३० ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं- हे पार्वती देवि! मनुष्यों के कर्म विशेष करके तुम सुनो, जो तुम्हारे मन में है उसका संपूर्ण उत्तर देता हूँ, इसमें संदेह मत करना ॥ २० ॥

मर्त्याः सर्वे जगज्जाताः कर्म कुर्वन्ति सर्वदा ।

स्वकर्माणि ततो देवि भुज्यन्ते देवमानुषैः ॥ ३१ ॥

भा० टी० — हे देवि! जगत् में उत्पन्न हुए सब जन सदा कर्म करते रहते हैं । फिर देवताओं और मनुष्यों द्वारा अपने कर्म भोगे जाते हैं अर्थात् सब अपने ही कर्मों को भोगते हैं ॥ ३१ ॥

मानवैस्तु विशेषेण सुखदुःखादिकं च यत् ।

कर्मत्रयं च सर्वेषां तन्मध्ये संचितं च यत्॥ ३२ ॥

पृष्ठ 15

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कर्मविपाकसंहिता ७

भा० टी० - सबके तीन प्रकार के कर्म हैं- प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण ।

उनमें से जो संचित कर्म है ॥ ३२ ॥

वक्तव्यं नात्र संदेहो यत्कृत्वा फलमाप्नुयात् ।

प्रारब्धं विस्तरं कर्म वर्त्तमानं च दृश्यते ॥ ३३ ॥

भा० टी० - वह मेरे द्वारा कहने योग्य है, इसमें संदेह नहीं है । क्योंकि जिसको करके जातक फल को प्राप्त होता है । प्रारब्ध कर्म विस्तार वाला है और वर्तमान में वह फल के रूप में दीखता ही है ॥ ३३ ॥

अश्विन्यादिकनक्षत्रे सर्वेषां जन्म जायते ।

तदादिपादभेदेन ज्ञातव्यं च शुभाशुभम्॥ ३४ ॥

भा० टी० – अश्विनी आदि नक्षत्रों में सभी जातकों का जन्म होता है । उनके प्रथम, द्वितीय आदि चरणों के भेद से शुभ-अशुभ फल जानने चाहिए ॥ ३४ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकभाषाटीकायां पूजनविधिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

पृष्ठ 16

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॥२ ॥

अश्विनीनक्षत्रफलम्

अश्विन्याः प्रथमे पादे यदा जन्म प्रजायते ।

तदा ब्राह्मणवर्णोऽयं मध्यदेशसमुद्भवः ॥ १ ॥

भा० टी० - यदि अश्विनी के प्रथम चरण में जन्म हो तो यह मानें कि यह पूर्वजन्म में मध्यप्रदेश में ब्राह्मण के घर जन्मा था ॥१ ॥

द्वितीयचरणे देवपुरा क्षत्री न चान्यथा ।

अयोध्यापुरतः पूर्वं पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ २ ॥

भा० टी ० — हे देवि! दूसरे चरण में जन्म हो तो वह पहले जन्म में क्षत्रिय वर्ण था, इस में सन्देह नहीं है और अयोध्यापुरी से पूर्व में बसने वाला पुत्रकन्या से वर्जित था अर्थात् कोई संतान नहीं थी ॥ २ ॥

तृतीयचरणे देवि वैश्यवर्णसमुद्भवः ।

रोगी कुत्सितवर्णोऽयं मृतवत्सो नपुंसकः ॥ ३ ॥

भा० टी० - हे देवि! तीसरे चरण में हो तो वैश्य वर्ण में उत्पत्ति जानें, यह रोगी और बुरे वर्णवाला तथा नपुंसक है, इसके संतान नहीं जीती है ॥ ३ ॥

चतुर्थचरणे देवि यदा भवति मानवः ।

तदा शूद्रं विजानीयाद्रोगवान् मृतवत्सकः ॥ ४ ॥

श्यामलः पुष्टदेहश्च कुष्ठरोगेण पीडितः ।

इतिश्रीअश्विनीनक्षत्रस्य सामान्यफलम्॥

भा० टी० - हे देवि! जो मनुष्य चौथे चरण में उत्पन्न हुआ हो तो उसे शूद्र जानें रोगी तथा इसकी संतान मरती है ॥ ४ ॥ श्याम वर्ण पुष्ट शरीर वाला है और कुष्ठ रोग से

पीड़ित है ॥ इति श्री अश्विनीनक्षत्रस्य सामान्यफलम्॥

पृष्ठ 17

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कर्मविपाकसंहिता शिव उवाच ।

अथ कर्म प्रवक्ष्यामि यत्कृतं ब्राह्मणादिभिः ।

एको ब्राह्मणवेदज्ञो गुणरूपसमन्वितः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिव जी कहते हैं- अब मैं जो ब्राह्मण आदि वर्णों ने किया है उस कर्म को कहता हूँ- वेद को जानने वाला गुण और रूप मे युक्त एक ब्राह्मण था ॥ १ ॥

तस्य पत्नी विशालाक्षी पुंश्चली क्षत्रवंशजा ।

तस्यां पुत्रो भवेद्देवि नाम्ना नरहरिस्तदा ॥ २ ॥

भा० टी० - उसकी स्त्री विशालाक्षी जारिणी और क्षत्रिय वंश में उत्पन्न थी । हे देवि! उसका नरहरि नामक पुत्र हुआ ॥ २ ॥

ब्रह्मकर्मपरिभ्रष्टो व्याधिभिः पीडितस्सदा ।

तस्य मित्रं द्विजोऽप्येको धनपुत्रैश्च संयुतः ॥ ३ ॥

भा० टी० – वह ब्राह्मण के कर्म से भ्रष्ट हुआ, व्याधियों से सदा पीड़ित हुआ उसका एक मित्र ब्राह्मण धन और पुत्रों से युक्त था ॥३ ॥

नामतो लग्नशर्मेति निकटे तस्य चागतः ।

आदरं बहुधा कृत्वा स्वर्णं दृष्ट्वा प्रहर्षितः ॥ ४ ॥

भा० टी० - लग्नशर्मा नाम वाला वह ब्राह्मण उसके समीप आया, तब बहुत आदर किया और सुवर्ण को देख कर प्रसन्न हुआ ॥ ४ ॥

स्वर्णलोभेन तं विप्रं हतवान् पुत्रसंयुतम् ।

स्वर्णं सर्वं हृतं देवि व्ययं कृत्वा दिने दिने ॥ ५ ॥

भा० टी ० - फिर सोने के लोभ से पुत्र समेत उह ब्राह्मण को मार दिया, हे देवि! चुराया हुआ सोना भी दिन प्रति दिन खर्च कर दिया ॥ ५ ॥

षडंशैर्गुप्तदानं च गङ्गायमुनसंगमे ।

चकार तद्धनैर्भक्त्या विष्णुप्रीतिकरं तदा ॥ ६ ॥

भा० टी० – और गंगा - यमुना के संगम में उसने मोह से छठे हिस्से के धन का गुप्तदान भी विष्णु की प्रीति के लिए भक्ति पूर्वक किया ॥ ६ ॥

एवं बहुगते काले पत्नी तस्य मृता पुरा ।

पश्चात्सोपि ग्रहग्रस्तो मृत्युं प्राप्तोऽतिदुर्जनः ॥ ७ ॥

भा० टी० – ऐसे ही बहुत सा काल बीत जाने पर उसकी स्त्री मर गई, फिर वह दुर्जन भी ग्रह - पीडा से ग्रस्त हो कर मर गया ॥ ७ ॥

पृष्ठ 18

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१० कर्मविपाकसंहिता

निक्षिप्तो नरके घोरे यमदूतैर्यमाज्ञया ।

युगसप्ततिपर्यन्तं भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ८ ॥

भा० टी- तब धर्मराज की आज्ञा से यम--दूतों ने उसे नरक में पटक दिया ।

सत्तर हजार युगों तक नरक की पीड़ा को भोग कर ॥ ८ ॥

नरकान्निःसृतो देवि शृगालो गहने वने ।

तत्स्थो निजफलं भुक्त्वा कृमियोनावभूत्पुनः ॥ ९ ॥

भा० टी ० – नरक से निकल कर हे देवि! गह्वर वन में गीदड़ हुआ, जहाँ अपने कर्म को भोग कर फिर कृमि योनि को प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥

पुनर्मानुषयोनिः स तूर्णं च प्रथिते कुले ।

मध्यदेशे शुभे ग्रामे मृतवत्सो ह्यपुत्रकः ॥ १० ॥

भा० टी० - फिर वह शीघ्र ही विख्यात कुल में मध्य देश में सुंदर ग्राम में उत्पन्न हुआ है, मृतवत्स है, इसकी संतान नहीं जीती है ॥ १० ॥

रुग्णो बहुधनाढ्यश्च गौडो मांसप्रियः सदा ।

तस्य भार्या महालुब्धा पुरा लोकमती च या ॥ ११ ॥

भा० टी – रोगी, बहुत धनाढ्य गौड जाति सदा मांस में प्रीति रखने वाला है, जिसकी स्त्री महालोभिनी है जो कि पहले लोकमती नाम वाली थी ॥ ११ ॥

पुनर्विवाहिता देवि पूर्वजन्मप्रसंगतः ।

मासि पुष्पं भवेत्तस्याः संतानं नैव वा भवेत्॥ १२ ॥

भा० टी० — हे देवि! पूर्व जन्म के प्रसंग से फिर उसी से उसका विवाह हो गया जिसके हर महीने रजोदर्शन होता है और संतान नहीं होती है ॥ १२ ॥

सज्वरा दीर्घनेत्रा सा कुक्षिरोगेण पीडिता ।

इति श्रुत्वा वचस्तस्य महादेवप्रिया शिवा ॥ १३ ॥

भा० टी ० – ज्वर वाली, दीर्घ नेत्रों वाली, कुक्षि के रोग से पीड़ित है । ऐसे इस वचन को सुन कर महादेव की प्रिया ॥ १३ ॥

प्रणम्य पार्वती देवी शङ्करं परमेश्वरम् ।

उवाच वचनं देवं चराचरगुरुं परम्॥ १४ ॥

भा० टी० - पार्वती देवी उन परमेश्वर शंकर को प्रणाम करके चराचर के परम गुरुदेव से वचन बोली ॥ १४ ॥

पृष्ठ 19

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कर्मविपाकसंहिता ११

प्राणिनां केवलं कर्म्म तव मायाविचेष्टितम् ।

शुभमेवाऽशुभं चैव कथं जानामि पूर्वजम् ॥ १५ ॥

भा ० टी ० – प्राणियों के कर्म केवल तुम्हारी माया के विचेष्टित हैं इसलिए पहले होने वाले शुभ- अशुभ कर्मों को कैसे जानूँ ॥ १५ ॥

तत्सर्वं कृपया देव वद मे परमेश्वर । ईश्वर उवाच ।

त्रिविधं प्राणिनां कर्म नृणां चैव स्वभावजम् ।

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्॥ १६ ॥

भा० टी० — हे देव! हे परमेश्वर!! कृपा करके मेरे आगे संपूर्ण बताओ || शिव जी कहते हैं - प्राणियों के स्वभाव से उत्पन्न हुए तीन प्रकार के कर्म हैं-जैसे ही मनुष्यों कि कर्म हैं— शुभ, अशुभ, मध्यम और तीन प्रकार के कर्मों के फल हैं ॥ १६ ॥

अनिष्टं नागलोके च नरके विविधे तथा ।

इष्टं स्वर्गे फलं देवि मिश्रं मर्त्ये प्रजायते ॥ १७ ॥

भा० टी० – जहाँ अशुभ कर्म पाताल लोक में और अनेक प्रकार के नरकों में भोगा जाता है, वही शुभ कर्म स्वर्ग में भोगा जाता है और हे देवि! मध्यम कर्म मनुष्य-लोक में जन्म ले कर भागा जाता है ॥ १७ ॥

रोगतश्चेष्टया देवि ज्ञेयं सर्वं शुभाशुभम् ।

राजयोगी भवेद्यस्तु ब्रह्महा पूर्वजन्मनि ॥१८ ॥

भा० टी० — हे देवि! रोगों से चेष्टा पूर्वक संपूर्ण शुभ- अशुभ जानना चाहिये, जो राज- रोगी हो, वह पूर्व जन्म में ब्राह्मण को मारने वाला था ॥ १८ ॥

पुत्रकन्याविहीनो यो गोत्रहा गुरुहा भवेत् ।

पाण्डुरोगी नरो यस्तु देवपूजनवर्जितः ॥ १ ९ ॥

भा० टी० – जो पुत्रकन्या से विहीन हो अर्थात् जिसकी पुत्र या कन्या नहीं हों तो वह पहले जन्म में अपने गोत्री या गुरु को मारने वाला था, जो पांडुरोग वाला मुनष्य हो, वह किसी भी देवता का पूजन नहीं करता था ॥ १ ९ ॥

कन्यापत्यं भवेद्यस्य वेदनिन्दा कृता तदा ।

कन्याघाती पक्षिघाती तस्य भार्या न जीवति ॥ २० ॥

भा० टी० — जिसकी लड़कियाँ ही उत्पन्न होती हों, उसने पूर्व जन्म में वेद की निंदा की है । कन्या, पक्षी, इनको मारने वाले की स्त्री नहीं जीती है ॥२० ॥

पृष्ठ 20

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१२ कर्मविपाकसंहिता

भ्रातृहा यः पुरा देवि स ज्वरेण प्रपीडितः ।

घण्टावादित्रहारी च कररोगी नरो भवेत् ॥ २१ ॥

भा० टी० — हे देवि! जो पूर्वजन्म में भाई को मारता है, वह ज्वर से पीड़ित होता है, घंटा, बाजा- इनको हरने वाले के हाथ में रोग होता है ॥ २१ ॥

भगिनीनाशनं देवि कृतं यैः पूर्वजन्मनि ।

तेन पापेन भो देवि ते ज्वरेण प्रपीडिताः ॥ २२ ॥

भा० टी ० — हे देवि! जिन्होंने पूर्व जन्म में अपनी बहिन का वध किया है, उस पाप के कारण वे ज्वर से पीड़ित होते हैं ॥ २२ ॥

मित्रद्रोही बालघाती पशुघाती तथैव च ।

तत्फलेन महादेवि मृतवत्सश्च रोगवान्॥ २३ ॥

भा० टी० - हे देवि! मित्रद्रोही, बालघाती, पशुघाती -जन इस पाप से ' मृतवत्स ' अर्थात् संतान मरने वाला और रोगी होता है ॥ २३ ॥

कायाघाती गर्भपाती धनपुस्तकहारकः ।

जन्मान्धो जायते देवि नात्र कार्या विचारणा ॥ २४ ॥

भा० टी० - शरीर का नाश करने वाला, गर्भ गिराने वाला, धन-पुस्तकों को चोरने वाला जन जन्म से अंधा होता है, इसमें कुछ चिन्तनीय नहीं है ॥ २४ ॥

वस्त्रहा भूमिहारी च परनिन्दापरस्तथा ।

तेन पापेन भो देवि दरिद्रो जायते नरः ॥ २५ ॥

भा० टी ० — हे देवि! वस्त्र और भूमि को हरने वाला पराई निंदा करने वाला जन उस पाप से दरिद्र होता है ॥ २५ ॥

गोत्रदारापहारी च दीर्घरोगी भवेन्नरः ।

महिषीपुत्रघाती च कम्परोगी प्रजायते ॥ २६ ॥

भा० टी० - अपने गोत्र की स्त्री को हरने वाला दीर्घ रोगी कुष्ठ आदि रोग वाला होता है, भैंसी के बछड़े काटड़े को मारने वाला कंप रोगी होता है ॥ २६ ॥

निर्बीजं वृषभं यो वै प्रकरोति नराधमः ।

षण्ढस्संजायते देवि मूत्रकृच्छ्री भवेत्ततः ॥ २७ ॥

भा० टी० - जो पापी मनुष्य बैल को वधिया करता है, हे देवि! वह नपुंसक होता है । फिर मूत्रकृच्छ्र रोग वाला होता है ॥ २७ ॥