कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 21–30
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 21–30
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कर्मविपाकसंहिता १३
मातृहा पितृहा देवि महाकुष्ठी नरो भवेत् ।
अगम्यागमनं यस्तु वीरयोषागमं तथा ॥ २८ ॥
भा० टी० — हे देवि! माता- पिता को मारने वाला जन महाकुष्ठी होता है, अगम्या स्त्री से तथा शूर- वीर की स्त्री से गमन करने वाला ॥२८ ॥
करोति योऽधमस्तस्य शरीरं ज्वरपीडितम् ।
गोवधी जायते देवि श्वेतकुष्ठी नरस्सदा ॥ २९ ॥
भा० टी० - अधम नर का शरीर ज्वर से पीड़ित होता है । हे देवि! गौ का वध करने वाला जन सदा श्वेतकुष्ठी होता है ॥ २ ९ ॥
कन्यकागमनं यस्तु करोति हठतः पुरा ।
तेन पापेन भो देवि रोगवान्धनवर्जितः ॥ ३० ॥
भा० टी ० - जो पूर्वजन्म में हठ से कन्या के संग गमन करता है अर्थात् बलात्कार करता है । हे देवि! वह उस पाप से रोगवान् और निर्धनकंगाल होता है ॥ ३० ॥
पुष्पगन्धापहारी च मुखे तस्य विगन्धता ।
घृतहारी भवेत्कुष्ठी तस्माद्भ्रष्टः कृमिर्भवेत्॥ ३१ ॥
भा० टी० – पुष्पों की सुगंधि को हरने वाले के मुख में दुर्गंधी होती है, घृत को
हरने वाला कुष्ठी होता है । फिर उस योनि से छूट कर कृमि होता है ॥ ३१ ॥
वृक्षगन्धापहारी च काकः संजायते नरः ।
वापीकूपापहारी च दद्रुरोगी भवेन्नरः ॥ ३२ ॥
भा० टी ० – वृक्ष के गंध को हरने वाला मुनष्य काग ( कौआ ) होता है, बावड़ी कुआँ को नष्ट करने वाला दगुरोगी होता है ॥ ३२ ॥
देवयात्रापहारी च कण्ठरोगी भवेन्नरः ।
सारङ्गगीतघाती च वने दावाग्निदाहकः ॥ ३३ ॥
भा० टी० — देव- यात्रा को भंग करने वाले जन के कंठ में रोग होता है । मयूर आदि पक्षियों के कूजने को बंद करने वाला तथा वन में दावानल लगाने वाला ॥३३ ॥
अक्षिरोगी नासिकायां व्रणी कृमिसमाकुलः ।
तैलहारी भवेत्तैली गुडहारी ज्वरी सदा ॥ ३४ ॥
भा० टी० – वह आँख के रोग वाला होता है, नासिका में व्रण और कृमि गिर जाते हैं, तेल को हरने वाला तेली होता है, गुड को हरने वाला ज्वर से पीड़ित होता है ॥३४ ॥
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१४ कर्मविपाकसंहिता
स्वर्णरौप्यापहारी च नरो भवति पुत्रहा ।
दासदासीहरो यस्तु नरो भवति कर्णरुक् ॥ ३५ ॥
भा० टी० – सोना-चांदी को हरने वाला मनुष्य अपने पुत्र का नाश करने वाला होता है । दास - दासी को मारने वाला मनुष्य कान के रोग वाला होता है ॥ ३५ ॥
लोहमौल्यापहारी च पाण्डुरोगी भवेन्नरः ।
दधिदुग्धहरो यस्तु कुक्षिरोगी भवेन्नरः ॥ ३६ ॥
भा० टी० - लोह के मोल को नहीं देने वाला पांडु रोगी होता है, दधि-दुग्ध को हरने वाला कुक्षि रोगी होता है ॥ ३६ ॥
मार्गग्राही वस्त्रहारी बाहुरोगी प्रजायते ।
मयूरकुक्कुटानां च कच्छपानां च बाधकः ॥ ३७ ॥
भा० टी० – मार्ग को रोकने वाले और वस्त्रों को हारने वाले की भुजाओं में रोग होता है, मोर, मुर्गे, कछुओं को पीड़ा करने वाला पुरुष ॥ ३७ ॥
वातरोगी च खञ्जश्च जन्म जन्म नपुंसकः ।
मद्यपी मांसभोगी च मत्स्यभोजी तथैव च ॥ ३८ ॥
भा० टी० — वात- रोग वाला लंगड़ा और जन्म-जन्म में नपुंसक होता है । मदिरा पीने वाला, मांस खाने वाला मच्छी भक्षण करने वाला ॥ ३८ ॥
तेन पापप्रभावेण चर्मकारो हि जायते ।
अन्ना जलहा चैव दन्तरोगी भवेन्नरः ॥ ३ ९ ॥
भा० टी० - उस पाप के प्रभाव के कारण वह चमार होता है, अन्न को हरने वाला, जल को हरने वाले के दांतों में रोग होता है ॥ ३ ९ ॥
ब्राह्मणस्य गृहं यस्तु धनधान्यसमन्वितम् ।
हरणं तस्य वै कुर्यान्मृगीरोगी भवेन्नरः ॥ ४० ॥
भा० टी ० – जो ब्राह्मण के धन और अन्न से युक्त घर पर अधिकार कर ले वह मृगी रोग वाला होता है ॥ ४० ॥
एवं बहुविध रोगो नराणां चैव जायते ।
पूर्वकर्मफलं चैव भुज्यते खलु मानवैः ॥ ४१ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२ ॥
भा० टी० - ऐसे बहुत प्रकार के रोग मनुष्यों को होते हैं इसलिए निश्चय मनुष्यों द्वारा अपना ही पूर्व कर्म भोगा जाता है ॥ ४१ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
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॥३ ॥
प्रायश्चित्तकथनम् ॥ ईश्वर उवाच ॥
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यत्प्रश्नं भुवि जायते ।
प्रायश्चित्तं नराणां च मेषराशिक्रमादनु ॥ १ ॥
भा० टी० - शिव जी कहते हैं - हे देवि! सुनों, जो प्रश्न पृथ्वी तल में उठता है, उसके समाधान में मैं मेष राशि के क्रम से मनुष्यों के प्रायश्चित्त को कहता हूँ॥ १ ॥
ब्राह्मणं स्वर्णलोभेन हत्वा चैव सपुत्रकम् ।
स्वर्णम्भुक्तं सदारेण तत्पापात् पुत्रवर्जितः ॥ २ ॥
भा० टी ० – पुत्र सहित ब्राह्मण को सुवर्ण के लोभ से मार कर जिसका सुवर्ण स्त्री - सहित उसने भोगा है, उसी पाप से उसके पुत्र नहीं है ॥ २ ॥
प्रायश्चित्तं जपं देवि गायत्री त्र्यम्बकं ततः ।
पञ्चलक्षप्रमाणेन ततः पापात् प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
भा० टी० — हे देवि! प्रायश्चित्त करते हुए ' गायत्री ' तथा ' त्र्यंबकं यजामहे ' मंत्र का पांच लाख जप करके तब वह उस पाप से छूटता है ॥ ३ ॥
ब्राह्मणस्य सपुत्रस्य प्रतिमां कारयेद्बुधः ।
स्वर्णं दशपलस्यैव तां संपूज्य प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
भा० टी० - ( पूर्व जन्म में मारे गये ) पुत्र सहित ब्राह्मण की मूर्त्ति ( दशपल ) चालीस तोले सुवर्ण की बनवा कर विधि-विधान पूर्वक उसकी पूजा करें ॥ ४ ॥
कुण्डं कृत्वा ततो देवि चतुरस्त्रं प्रसन्नधीः ।
प्रतिमां पूजयेच्चैव मन्त्रेणानेन भोः प्रिये ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! इसके अनंतर चौकोर कुंड बना कर प्रसन्नचित्त हो कर इस मंत्र से प्रतिमा का पूजन करें ॥ ५ ॥
ॐ नमो गणाधिपतये गन्धदपुष्पादिबलिं समर्पयामि नमः । ॐ इन्द्राय नमः । ॐ अग्नये नमः । ॐ यमाय नमः ।
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१६ कर्मविपाकसंहिता ॐ निरृतये नमः । ॐ वरुणाय नमः । ॐ कुबेराय नमः । ॐ कालाय नमः । ॐ शिवाय नमः । ॐ ब्रह्मणे नमः । ॐ अनन्ताय नमः । ॐ गरुडवाहनाय नमः । ॐ विष्णवे नमः ।
ॐ जयाय नमः । ॐ विजयाय नमः । ॐ पुण्यशीलाय नमः ।
ॐ सुशीलाय नमः ॥
भा० टी० –ॐ नमो गण० ॥ पुष्पबलि को समर्पण करता हूँ ॥ ॐ इन्द्राय नमः, ॐ अग्नये नमः, ॐ यमाय नमः, ॐ निर्ऋतये नमः, ॐ वरुणाय नमः, ॐ कुबेराय ॐ कालाय नमः ॐ शिवाय नमः, ॐ ब्रह्मणे नमः, ॐ अनंताय नमः, ॐ गरुडवाहनाय नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ जयाय नमः, ॐ विजयाय नमः, ॐ पुण्यशीलाय नमः ॐ सुशीलाय नमः - इन मंत्रों से पूजा करें ॥
ॐ सर्वे देवास्तथा दैत्या ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
मत्पापं यत्पुरा जातं तत्सर्वं क्षम्यतां सदा ॥ ६ ॥
भा० टी० - संपूर्ण देवता और दैत्य, ब्रह्मा, विष्णु, शिव– ये सब पूर्वजन्म में किये हुए मेरे पापों को सदा क्षमा करें ॥ ६ ॥
इमां पूजां गृहाणैवं मम पुत्रं प्रयच्छतु ।
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा यत्कृतं पूर्वजन्मनि ॥ ७ ॥
भा० टी ० - हे देव! मेरे द्वारा की जा रही इस पूजा को ग्रहण करो, मुझको पुत्र दो, अज्ञान से अथवा प्रमाद से मैंने जो पूर्वजन्म में ( पाप ) किया है ॥७ ॥
तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रयच्छ शरणं मम ।
ततो नवग्रहाः सर्वे दिक्पालाश्चाप्युपग्रहाः ॥ ८ ॥
भा० टी० — उस संपूर्ण ( पाप) को क्षमा करो । हे देव! मुझको अपनी शरण दो, इसके अनंतर नवग्रह, दिक्पाल - उपग्रह, इनका पूजन करें ॥ ८ ॥
सर्वे ममापराधां वै क्षम्यतां पूर्वजन्मनः ।
एवं सर्वं यथान्यायं पूजां कृत्वा विचारतः ॥ ९ ॥
भा० टी० –'कहें कि ' मेरे पूर्वजन्म के संपूर्ण अपराध आपके द्वारा क्षम्य हैं इस प्रकार यथार्थ विधि - पूर्वक संपूर्ण पूजा करके अनुष्ठान करें ॥ ९ ॥
ततो होमं प्रकुर्वीत तिलधान्यादितन्दुलैः ।
दशांशं होमयेद्देवि तर्पणं मार्जनं तथा ॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! फिर तिल, जौ, चावल, इन सबको एकत्रित कर दशांश का होम करें और दशांश तर्पण तथा मार्जन करें ॥ १० ॥
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कर्मविपाकसंहिता १७
गोदानं च ततः कुर्यात् दशवर्णं विशेषतः ।
वृषमेकं प्रदातव्यं स्वर्णशृङ्गं सहाम्बरम् ॥ ११ ॥
भा० टी० - फिर किसी योग्य पात्र को दश प्रकार के रंगों वाली गायों का दान करें, सुवर्ण के सींग और वस्त्रों से युक्त कर एक बैल का भी दान करें ॥ ११ ॥
ततो वै ब्राह्मणान्देवि भोजयेद्विधिपूर्वकम् ।
भोजनान्ते ततो दानं सुवर्णं दक्षिणां ततः ॥ १२ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसके अनंतर विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन करवा कर भोजन के अंत में उनको श्रद्धापूर्वक सुवर्ण का दान और दक्षिणा दें ॥ १२ ॥
प्रतिमालंकृता देवि वाचकाय प्रदापयेत् ।
एवं कृते महादेवि वंशो भवति नान्यथा ॥ १३ ॥
भा० टी ० — हे देवि! अलंकृत की हुई प्रतिमा को ' वाचक यदि ' ( संपूर्ण विधि बताने वाले और उपदेश करने वाले ब्राह्मण ) को दिया जाये तो हे महादेवि! ऐसे करने से अवश्य वंश चलता है, इस में संदेह नहीं ॥ १३ ॥
एकादशीव्रतं चैव सप्तमीं रविसंयुताम् ।
यावत्स्वमरणं देवि कुर्यात्सत्ययुतो नरः ॥ १४ ॥
भा० टी० – वह मनुष्य मरणपर्यंत एकादशी का व्रत तथा रविवार को पड़ने
वाली सप्तमी का व्रत करे । जीवन में सदा सत्य वचन बोलने का नियम रखें ॥ १४ ॥
पूर्वपापविशुद्धिस्स्यात् व्याधिरेवं विनश्यति ।
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां प्रायश्चित्तकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
भा० टी०o - तब पूर्वजन्म के पाप की शुद्धि होगी और समस्त व्याधियों का नाश होता है, इसमें संदेह नहीं है । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायांप्रायश्चित्तकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः
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118 11 अश्विनीनक्षत्रद्वितीयचरणविचारणम् ॥ शिव उवाच ॥ अथ द्वितीये वक्ष्यामि प्रायश्चित्तं तथाम्बिके! अश्विन्यां जायते देवि पूर्वकर्म विपाकतः ॥ १ ॥
भा० टी० -शिव जी कहते हैं - हे अंबिके! अब अश्विनी नक्षत्र के दूसरे चरण के प्रायश्चित्त को कहता हूँ । यह पूर्वकर्म के विपाक से अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाला नर ॥ १ ॥
अयोध्यापुरतो देवि पूर्वे क्रोशचतुष्टये ।
सरय्वा निकटे चैव वर्णसंकरक्षत्रियः ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! अयोध्या पुरी से पूर्व दिशा में चार कोश पर सरयू नदी के निकट वर्ण संकर क्षत्रिय रहा था ॥ २ ॥
नामतो श्वेतवर्मेति पुत्रदारसमन्वितः ।
एकदा मातुलो देवि पुत्रेण सह संयुतः ॥ ३ ॥
भा० टी०--श्वेतवर्मा नाम वाला वह स्त्री- पुत्र से संयुक्त था । हे देवि! एक समय उसका मामा अपने पुत्र सहित उसके घर आया ॥ ३ ॥
आगतो निकटे देवि स्वर्णकोटिसमन्वितः ।
आदरं बहुधा कृत्वा गृहे वासं ददौ च सः ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे देवि! करोड़ो रुपये का सुवर्ण- द्रव्य ले कर उसके समीप आया, तब उसने उसका बहुत आदर करके, अपने घर में उसे वास दिया ॥ ४ ॥
तस्य पत्नी गुणवती रूपयौवनसंयुता ।
मासमेकं तदा देवि प्रत्यहं भगिनीगृहे ॥ ५ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री भी गुणवती नाम वाली रूप -यौवन से भरपूर थी । हे देवि! तब उसके मामा ने एक महीने तक दिन प्रति दिन अपनी बहन के घर 114 11
भुज्यतेसह पुत्रेण चामिषं विविधं तथा ।
मासान्ते चावधीद्रात्रौ मातुलं सहपुत्रकम्॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १९ भा० टी० – पुत्र सहित अनेक प्रकार के मांसों का भक्षण किया और बाद में एक महीने के बाद पुत्र सहित मामा को उसने रात्रि के समय मार दिया ॥ ६ ॥
भूमिमध्ये व ताभ्यां यत्नतः स्थापितं तदा ।
स्वर्णकोटिं प्रजग्राह पापात्मा गुरुघातकः ॥ ७ ॥
भा० टी० — फिर उन दोनों पति- पत्नी ने वे शव यत्न से पृथ्वी में गाड़ दिये और ( अपने से बड़े सम्बन्धी ) गुरु को मारने वाले उस पापी ने सुवर्ण कोटि द्रव्य को ग्रहण किया ॥ ७ ॥
पल्या सह ततो द्रव्यव्ययं कुर्वन् दिने दिने ।
एवं बहुतिथे काले क्षत्री कालवशोऽभवत् ॥ ८ ॥
भा० टी० - फिर अपनी स्त्री-सहित दिन प्रतिदिन द्रव्य को खर्चता हुआ वह क्षत्रिय बहुत - सा समय व्यतीत होने पर बाद में मृत्यु को प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥
पश्चान्मृता ततः पत्नी निर्जले गहने वने ।
कर्दमे नरके घोरे यमदूतैर्यमाज्ञया ॥ ९ ॥
भा० टी० - फिर उसके अनन्तर वह उसकी स्त्री भी निर्जल गह्वर वन में मर गयी, तब यम के दूतों ने यम की आज्ञा से घोर कर्दम नरक में ॥९ ॥
निक्षिप्य महतीं पीडां तयोर्दत्त्वा ततः प्रिये! युगमेकं वरारोहे भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ १० ॥
भा० टी००.- पटक कर उन दोनों को बहुत- सी पीड़ाएँ दी । हे प्रिये! हे वरारोहे!! एक युग तक नरक की पीड़ा को भोग कर ॥ १० ॥
नरकान्निःसृतो देवि गर्दभत्वमजायत ।
पुनः सरटयोनिं तु भुक्त्वा मर्त्यस्ततोऽभवत् ॥ ११ ॥
भा० टी० – नरक से निकल कर हे देवि! फिर गर्धे की योनि को प्राप्त हुए फिर छिपकली की योनि को भोग कर अब मनुष्य हुए हैं ॥ ११ ॥
हतोऽनेन पुरा देवि मातुलः पुत्रसंयुतः ।
तत्पापफलतो देवि वंशच्छेदश्च जायते ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे देवि! पहले इसने पुत्र सहित मामा को मारा था, जिस पाप के फल के कारण इसका वंश नष्ट होता है ॥ १२ ॥
रोगयुक्ता भवद्देवि पत्नी वै पूर्वजन्मनि ।
ततो विवाहिता जाता पुनर्वै पूर्वकर्मतः ॥ १३ ॥
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२० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म में इसकी यह स्त्री रोगिणी हो होती गयी, फिर भी अब पूर्वकर्म के प्रभाव से उसी के साथ इसका विवाह हुआ है ॥ १३ ॥
कासश्वाससमायुक्तो विषमज्वरपीडितः ।
प्रायश्चित्तं ततस्तस्य प्रवक्ष्यामि दयानिधे ॥ १४ ॥
भा० टी ० – खांसी, श्वास करके समायुक्त और विषमज्वर से पीड़ित है, हे दयानिधे! जिसका प्रायश्चित्त अब मैं कहता हूँ ॥ १४ ॥
प्रत्यहं ब्राह्मणे दानं भक्तिपूर्वं वरानने! दश धेनुं प्रयत्नेन हरिवंशश्रुतिं तथा ॥ १५ ॥
भा० टी० – हे वरानने! दिन प्रतिदिन यत्न करके हरिवंश को सुनने और दश गौओं को भक्ति- पूर्वक ब्राह्मण को दान करे ॥ १५ ॥
सुवर्णप्रतिमां कृत्वा पलं पञ्चदशस्य च ।
वर्तुलाकारकुण्डे वै होमं कृत्वा प्रसन्नधीः ॥ १६ ॥
भा० टी० - १५ पल अर्थात् ६० तोले की सुवर्ण की प्रतिमा बनवा कर गोलकुंड में प्रसन्न चित्त से पुरुष होम करें ॥ १६ ॥
गायत्रीलक्षजाप्यं च कारयेत्तु प्रयत्नतः ।
दशांशहोमः कर्तव्यो विप्राणां भोजनं ततः ॥ १७ ॥
भा० टी०-० - प्रयत्न करके गायत्री का एक लाख जप करवायें और उसका दशांश होम करवाये बाद में ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥ १७ ॥
शय्यादानं विशेषेण प्रतिमां पूजयेत्ततः । भा० टी० - तदनन्तर इसी क्रम में विशेष करके शय्या का दान करे और प्रतिमा का पूजन करें || अथ प्रतिमापूजनम् । षोडशाङ्गुलिका वेदी मृत्तिकासप्तसंयुता ।
चतुरस्त्रा विचित्रा च गन्धपुष्पसमन्विता ।
तत्रैव प्रतिमां कृत्वा स्थापितां पूजयेत्ततः ॥ १८ ॥
भा० टी० – ( प्रतिमा - पूजन की विधि) सोलह आंगुल की वेदी बनवायें और सात मृत्तिकाओं से युक्त हो चौकोर और विभिन्न गंध पुष्प से युक्त वेदी हो वहीं ही प्रतिमा को स्थापित करके प्रतिमा- पूजन करें ॥ १८ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २१ ॐ चक्रधराय नमः । ॐ गदाधराय नमः । ॐ शार्ङ्गिणे नमः । ॐ गरुडाय नमः । ॐ विष्णवे नमः । ॐ शिवाय नमः ।
ॐ ब्रह्मणे नमः । ॐ प्रजापतये नमः ॐ सर्वेश्वराय नमः ।
ॐ लक्ष्म्यै नमः ॥
भा० टी ० – ॐ चक्रधराय नमः १, ॐ गदाधराय नमः २, ॐ शर्ङ्गिणे नमः ३, ॐ गरुडाय नमः ४, ॐ विष्णवे नमः ५, ॐ शिवाय नमः ६, ॐ ब्रह्मणे नमः ७, ॐ प्रजापतये नमः ८, ॐ सर्वेश्वराय नमः ९ ॐ लक्ष्म्यै नमः । १० ॐ देवदेव महादेव शङ्खचक्रगदाधर! मम पूर्वं कृतं पापं हर त्वं धरणीधर! ॥ १ ९ ॥ भा० टी० - ॐ हे देवों के देव महादेव! हे शंखचक्रगदाधर!! हे धरणीधर!!! तुम मेरे पूर्वजन्म-कृत पापों को हरो ॥ १ ९ ॥
एवं पूजां समाप्यैव प्रतिमां तां च दापयेत् ।
आचार्याय तदा देवि सुवर्णं दक्षिणां ततः ॥ २० ॥
भा० टी० - इस प्रकार पूजा को समाप्त कर बाद में उस प्रतिमा को आचार्य
ब्राह्मण को दान दें । देवि! तदनन्तर सुवर्ण की दक्षिणा दें ॥ २० ॥
ततः प्रदक्षिणां कृत्वा ब्राह्मणे व्यासरूपिणे ।
माघे मासि प्रयागे तु स्नानं पत्नीसमन्वितः ॥ २१ ॥
भा० टी० – फिर वेद व्यास रूपी उस ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करें और अपनी स्त्री से युक्त हो कर माघ के महीने में प्रयाग जी में स्नान करें ॥ २१ ॥
एवं कृते न संदेहो वंशो भवति नान्यथा ।
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं वन्ध्यात्वं च विनश्यति ॥ २२ ॥
भा० टी० - ऐसा करने से वंश अर्थात् संतान होती है, इसमें संदेह नहीं है और मृतवत्सा, अर्थात् जिस स्त्री की संतान नहीं जीती हो या वन्ध्या हो उस को भी पुत्र का सुख मिलता है ॥ २२ ॥
रोगी च मुच्यते रोगात् कन्यका नैव जायते । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे द्वितीयचरणविचारणं नाम चतुर्थोऽध्ऽध्यायः ॥ ४ ॥
भा० टी० - यदि रोगी हो तो रोग से छूट जाये और कन्या उत्पन्न न हो ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां द्वितीयचरणविचारणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
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॥५ ॥
अश्विनीनक्षत्र तृतीयचरणविचारणम् ॥ ईश्वर उवाच ॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि नक्षत्रतुरगास्य तु ।
तृतीयस्य ततो देव प्रायश्चित्तमतः शृणु ॥ १ ॥
भा० टी० - शिव जी कहते हैं - हे देवि! अब अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण के
प्रायश्चित्त को कहता हूँ । सुनो ॥ १ ॥
अयोध्यापुरतो देवि दक्षिणे पूर्वदिग्गते ।
नारायणपुरे रम्ये राजपुत्रोऽभवत्तदा ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! अयोध्या पुरी से पूर्व दिशा की ओर दक्षिण में अर्थात् अग्निकोण में, रमणीक नारायणपुर में एक राजपुत्र हुआ ॥ २ ॥
स्वकर्मनिरतो दान्तः प्रजापोषणतत्परः ।
नामतश्चोलसिंहेति तस्य पत्नी प्रभावती ॥ ३ ॥
भा० टी० - अपने कर्म में रत, प्रजा का पालन करने में तत्पर वह चोल सिंह नाम वाला था, उसकी स्त्री प्रभावती थी ॥ ३ ॥
तस्य मित्रं द्विजोऽप्येकः स्वकर्मपरिवर्जितः ।
एकदा मृगयां यातो राजपुत्रः सब्राह्मणः ॥ ४ ॥
भा० टी०o.- उसका मित्र एक ब्राह्मण अपने कर्म से भ्रष्ट था, एक समय वे दोनों राजा और ब्राह्मण शिकार खेलनं गये ॥ ४ ॥
मृगं हत्वा वारारोहे जग्मतुर्गहने वने ।
मांसस्य देवि भागार्थं कलहो हि महानभूत्॥५ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! वहाँ मृग को मार कर गह्वर वन में जाते हुए हे देवि! वहाँ मृग मांस के विभाग करने में इनका महान् कलह हुआ ॥ ५ ॥
ततः स ब्राह्मणो दुष्टः क्रोधेनैवापि च द्विषन् ।
मरणं तस्य भो देवि बभूव गहने वने ॥ ६ ॥