कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 121–130
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 121–130
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॥३१ ॥
पुनर्वसुनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ अवन्त्याः पश्चिमे देवि क्रोशमात्रोपरि प्रिये! कैवर्त्तको वसत्येको नन्दने च पुरे शुभे ॥ १ ॥
भा० टी० - हे देवि! अवन्ती नगरी से पश्चिम की तरफ एक कोश पर, नंदन नामक पुर में एक धीवर रहता था ॥ १ ॥
मनोहर इति ख्यातो धनाढ्यो जायते महान् ।
मत्ता तस्याऽभवत्पत्नी पतिशुश्रूषणे रता ॥ २ ॥
भा० टी० - वह मनोहर नाम से विख्यात धनाढ्य था, मत्ता नामक उसकी स्त्री पति की सेवा करती थी ॥ २ ॥
मत्स्यमांसस्य भो देवि विक्रयं चाकरोत् खलु ।
संचितं बहुरत्नं च न दानं बहुधाकरोत्॥ ३ ॥
भा० टी० - हे देवि! वह सदा मत्स्य के मांस का भक्षण करता था, उसने बहुत - सा धन संचित किया, परंतु कभी दान नहीं किया ॥ ३ ॥
एकदा चन्द्रग्रहणे शतस्वर्णयुतं वृषम् ।
अदाद्विप्राय विदुषे भार्यया सह भक्तितः ॥ ४ ॥
भा० टी००.- एक समय चंद्रमा के ग्रहण के समय उसने सौ मोहरों से युक्त एक बैल को विद्वान् ब्राह्मण को स्त्री सहित जा कर भक्ति पूर्वक दान दिया ॥४ ॥
ततो मृत्युवशं यातो भार्या तस्य मृता पुरा ।
यमदूतैर्महाघोरैर्नरके पातितं पुरा ॥ ५ ॥
भा० टी० - पश्चात् मृत्यु के वशीभूत हो गया और उसकी स्त्री पहले ही मर गई थी, उसे फिर धर्मराज के दूतों ने महाघोर नरक में पटक दिया॥ ५ ॥
यमाज्ञया महादेवि षष्टिवर्षसहस्रकम् ।
नरकान्निःसृतो देवि शृगालो गहने वने ॥ ६ ॥
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११४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे महादेवि! वह साठ हजार वर्षों तक नरक में रहा, फिर नरक से निकल कर वह गह्वर वन में गीदड़ हुआ ॥ ६ ॥
पुनः काको वरारोहे ततो भवति मानुषः ।
गुणज्ञो देवताभक्तो वेश्यासु रततत्परः ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! पश्चचात् कौआ हुआ, पीछे मनुष्य हुआ, वह गुणज्ञ है और देवता का भक्त है, परंतु वेश्यागामी है ॥ ७ ॥
रागी सूक्ष्मतनुर्वक्ता ज्ञानवान् सुतवर्जितः ।
तस्य भार्या भवेत्स्थूला कुरूपा कर्कशा तथा ॥ ८ ॥
भा० टी० - वह प्रीति करने वाला, सूक्ष्म शरीर वाला, वक्ता तथा ज्ञानवान् है, पुत्र, रहित है, उसकी भार्या स्थूल शरीर वाली है, कुरूपा और कर्कशा है ॥ ८ ॥
पूर्वजन्मप्रसङ्गाच्च मत्स्यमांसोपभोगिनी ।
मासि पुष्पं भवेद्देवि गर्भस्य पतनं तथा ॥ ९ ॥
भा० टी० - पूर्वजन्म के प्रसंग से वह मत्स्य- मांस को खाने वाली है, प्रति महीने वह रजस्वला होती है, परंतु गर्भपात होता है ॥ ९ ॥
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने! यत्कृतेन वरारोहे शीघ्रं पुत्रमवाप्नुयात् ॥ १० ॥
भा० टी० – अब इसकी शांति को कहता हूँ हे देवि! हे सुशोभने! इसको करने से शीघ्र ही पुत्र उत्पन्न होता है ॥ १० ॥
हरिवंशस्य श्रवणं त्रिवारं च विधानतः ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण पञ्चलक्षजपं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी० - विधिपूर्वक तीन वार हरिवंश पुराण को सुनें, गायत्री मूल मंत्र के पांच लाख तक जप करायें ॥ ११ ॥
दशांश हवनं देवि दशांशं चैव तर्पणम् ।
मार्जनञ्च विशेषेण दशांशं चैव कारयेत्॥ १२ ॥
भा० टी० - हे देवि! विशेष रूप से दशांश होम करायें दशांश तर्पण तथा तद्दशांश से मार्जन करायें ॥ १२ ॥
ततो गां कपिलां दद्याद्दशवर्णां ततः प्रिये! सूर्यस्य प्रतिमां देवि स्वर्णैर्दशपणैस्तथा ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ११५ भा० टी० – पश्चात् कपिला गौ का दान करें और दश वर्ण वाली गौ का दान करें दश तोले प्रमाण सुवर्ण की सूर्य की मूर्ति बनवायें ॥ १३ ॥
भूषितां विविधैर्वस्त्रैः स्वर्णरौप्यविभूषणैः ।
पूजयित्वा विधानेन मन्त्रेणानेन पार्वति! ॥ १४ ॥
भा० टी० — पश्चात् अनेक वस्त्रों से विभूषित कर सोना-चांदी के आभूषणों से युक्त कर हे पार्वति! विधान पूर्वक इस मंत्र से पूजन कर ॥ १४ ॥
ॐ त्वं ज्योतिः सर्वलोकानां पूज्यस्त्वं सर्वदेहिनाम्।
पूर्वजन्मकृतं पापं हर मे तिमिरापह!॥ १५ ॥
भा० टी० - ॐ तुम संपूर्ण लोकों की ज्योति हो, संपूर्ण देहधारियों के पूज्य हो, हे तिमिर- नाशक! मेरे पूर्वजन्म - कृत पापों को हरो ॥ १५ ॥
ॐ श्रीसूर्याय नमः ॐ सवित्रे नमः ॐ साक्षिणे नमः । ॐ त्रिगुणात्मने नमः ॐ द्वादशात्मने नमः ॐ केयूरधारिणे नमः । ॐ तीक्ष्णांशुधारिणे नमः ॐ कलाकाष्ठादिरूपिणे नमः । ॐ विष्णवे नमः ॐ ब्रह्मणे नमः ॐ रुद्राय नमः । ॐ मार्तण्डाय नमः ।
ॐ मन्त्रैर्द्वादशभिर्देवि पूजयेत्प्रतिमां ततः ।
धूपदीपादिभिश्चैव ताम्बूलैश्च विधानतः ॥ १६ ॥
भा० टी० — ॐ श्रीसूर्याय नमः १, ॐ सवित्रे नमः २, ॐ साक्षिणे नमः ३, ॐ त्रिगुणात्मने नमः ४, ॐ द्वादशात्मने नमः ५, ॐ केयूरधारिणे नमः ६, ॐ तीक्ष्णांशुधारिणे नमः ७, ॐ कलाकाष्ठादिरूपिणे नमः ८, ॐ विष्णवे नमः ९, ॐ ब्रह्मणे नमः १०, ॐ रुद्राय नमः ११, ॐ मार्तंडाय नमः १२, हे देवि! इन बारह मंत्रों से धूप, दीप आदि से तथा पान समर्पण करके विधि पूर्वक पूजन करें ॥ १६ ॥
पूजितां प्रतिमां दद्याद्ब्राह्मणाय वराय च ।
दासीदासं धनं धान्यं ब्राह्मणाय प्रदापयेत्॥ १७ ॥
भा० टी० - पूजा की हुई मूर्ति को उत्तम ब्राह्मण को दान दें । दास, दासी, धन, धान्य — ये भी सब वस्तु ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १७ ॥
अश्वदानं रथं वस्त्रं पात्राणि विविधानि च ।
शय्यादिकं वरारोहे वित्तशाठ्यं न कारयेत् ॥ १८ ॥
भा० टी ० – अश्व, रथ अनेक प्रकार के वस्त्र- इन सब का भी दान करें । हे वरारोहे! वित्तशाठ्य अर्थात् कृपणता नहीं करें ॥ १८ ॥
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११६ कर्मविपाकसंहिता
एवं कृते न संदेहश्चिरंजीविसुतं लभेत् ।
पूर्वजन्मकृतं पापं क्षयं याति न चान्यथा ॥ १ ९ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से निश्चय ही चिरंजीवी पुत्र की प्राप्ति होती है और पूर्वजन्म में किया हुआ पाप भी नष्ट होता है ॥ १ ९ ॥
सप्तम्यां रवियुक्तायां व्रतं कुर्यात्सुरेश्वरि! ।
पापं व्याधिः क्षयं याति ज्वरः क्वापि न जायते ॥ २० ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पुनर्वसुनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
भा ० टी ० — हे सुरेश्वरि! रविवार- सप्तमी का व्रत करें । हे सुरेश्वरि! ऐसा करने से संपूर्ण पाप और व्याधि नष्ट होते हैं और ज्वर कहीं भी नहीं रहता है ॥ २० ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां० पुनर्वसु० नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
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॥३२ ॥
पुष्यनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पापेन जायते व्याधिः पापेनैवाऽसुतो भवेत् ।
पापेन जायते मूर्खः पापेनैव दरिद्रता ॥ १ ॥
भा० टी० – शिवजी कहते हैं - पाप से व्याधि होती है और पाप से ही पुत्र नहीं होते, पाप से मूर्ख होता है, पाप से ही दरिद्री होता है ॥ १ ॥
पूर्वजन्मकृतं यत्तु पापं वा पुण्यमेव वा ।
इह जन्मनि भो देवि भुज्यते सर्वदेहिभिः ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म में किया हुआ पुण्य अथवा पाप इस जन्म में संपूर्ण देहधारियों द्वारा भोगा जाता है ॥ २ ॥
पुण्येन जायते विद्या पुण्येन जायते सुतः ।
पुण्येन सुन्दरी नारी पुण्येन लभते श्रियम्॥ ३ ॥
भा० टी० - पुण्य से विद्या प्राप्त होती है, पुण्य से पुत्र उत्पन्न होता है, पुण्य से सुंदरी नारी और पुण्य से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ॥३ ॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि पुष्यनक्षत्रजं फलम् ।
तत्सर्वं शृणु मे देवि यत्कृतं पूर्वजन्मनि ॥ ४ ॥
भा० टी०o. - अब पुष्प नक्षत्र में जन्म लेने वाले के फल को कहता हूँ हे देवि! उसके पूर्वजन्म में किये हुए कर्मों को सुनों ॥ ४ ॥
मध्यदेशे वरारोहे धनाढ्यो बल्लवोऽवसत् ।
इंसकेतुरिति ख्यातो भार्या तस्य तु केकयी ॥ ५ ॥
भा० टी० – हे वरारोहे! मध्यदेश में एक धनाढ्य ( गोपजाति) अहीर रहता था, उसका नाम हंसकेतु और उसकी स्त्री का नाम केकयी था ॥५ ॥
बहवो वृषभास्तस्य महिष्यो गास्तथा प्रिये! ।
धर्मकर्मरतश्शूद्रो विक्रयेद्गोवृषादिकम् ॥ ६ ॥
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११८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे प्रिये! उसके पास बहुत से बैल, भैंस, गौ, थीं । वह शूद्र धर्म-कर्म में रत था और गाय - बैलों को बेचता था ॥६ ॥
घृततक्रस्य भो देवि विक्रयं कुरुते सदा ।
एको वैश्यो धनाढ्यो वै तस्य मित्रं तदाभवत्॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! वह घृत तथा तक्र को बेचता था, तब उसकी मित्रता एक धनाढ्य वैश्य से हो गयी ॥ ७ ॥
महाप्रीतिस्तयोर्जाता वहुवर्षप्रमाणतः ।
एकदा तु निशायां वै शूद्रेण वणिकः प्रिये! ॥ ८ ॥
भा० टी० - तदनन्तर बहुत वर्षों तक उन दोनों के मध्य अत्यंत प्रीति रही । हे प्रिये! एक समय उस शूद्र के द्वारा उस वैश्य की ॥८ ॥
शुभरत्नादिलाभाय कटारेण तदा हतः ।
द्रव्यं सर्वं गृहीतं तु भूमिमध्ये तथा धृतम्॥ ९ ॥
भा० टी० – सुंदर रत्न आदि के लालच में कटारी से हत्या कर दी फिर उसका संपूर्ण धन ले कर भूमि में गाढ़ दिया ॥ ९ ॥
तन्मध्ये तु षडंशस्य व्ययं कुर्याद्दिने दिने ।
बहुवर्षगते काले शूद्रो मृत्युवशोऽभवत् ॥ १० ॥
भा० टी० - फिर उसमें से छठे हिस्से धन को प्रतिदिन के व्यय में खर्चता रहा बहुत से वर्ष बीत जाने पर तब उस शूद्र की भी मृत्यु गयी ॥ १० ॥
पातयामास घोरे तु यमदूतो यमाज्ञया ।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ११ ॥
ततो जातो महादेवि राक्षसो गहने वने ।
पुनः शृगालयोनिं च मानुषत्वं भवेत्पुनः ॥ १२ ॥
भा० टी० - यम की आज्ञा से यम के दूतों उस को घोर नरक में पटक दिया फिर साठ हजार वर्षों तक नरक की पीड़ा को भोग कर वह गह्वर वन में राक्षस हुआ, पश्चात् गीदड़ की योनि में पैदा हुआ, फिर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥ १२ ॥
धनधान्यसमायुक्तो भार्या जाता तु या पुरा ।
वन्ध्यारोगसमायुक्ता कन्यका चैव जायते ॥ १३ ॥
भा० टी० - वह धनधान्य से युक्त है, पूर्वजन्म में जो उसकी स्त्री थी, वह बंध्यारोग से युक्त'है अथवा उसकी कन्या ही जन्मती है ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ११ ९
तस्य रोगो भवेत्पश्चाद्विविधश्च वयोन्तरे ।
पूर्वजन्मनि भो देवि मित्रं च निहतं यतः ॥ १४ ॥
भा० टी० – तत्पश्चात् अवस्थांतर में पूर्वजन्म में मित्र को मारने के कारण अनेक
प्रकार के रोग हो गये हैं । हे देवि! इसने ॥ १४ ॥
तत्पापेन च भो देवि पुत्रो नैवोपजायते ।
बहुपुत्रप्रघाती च कम्परोगी प्रजायते ॥ १५ ॥
भा० टी० - हे देवि! उस पाप से उसको पुत्र प्राप्त नहीं होता है, बहुत पुत्रों को मारने ( उसके पत्नी के गर्भपात होते हैं ) वाला उसे कंपवात रोग है ॥ १५ ॥
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने! षडंशं वै ततो दानं विदुषे ब्राह्मणाय च ॥ १६ ॥
भा० टी० — हे देवि! हे सुशोभने! उसकी शांति को कहता हूँ, सुनो विद्वान् ब्राह्मण को छठे हिस्से धन का दान दें ॥ १६ ॥
गां तथा महिषीं दद्याद्विधिवद्भोजयेद्विजान् ।
गायत्रीजातवेदाभ्यां द्विलक्षं च जपं ततः ॥ १७ ॥
भा० टी० – गौ तथा महिषी का दान करें, विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन करायें, गायत्री जातवेदसे सुन०– इन मंत्रों से दो लाख तक जप करायें ॥ १७ ॥
कुण्डे कोणत्रये चैव होमं वै कारयेत्ततः ।
जपस्यैव दशांशेन हवनादिकमाचरेत् ॥ १८ ॥
भा० टी० - त्रिकोण कुंड में होम करायें, जप की दशांश संख्या से हवन आदि कर्म का आचरण करें ॥ १८ ॥
ततो वै प्रतिमां कुर्याद्वैश्यस्यैव विधानतः ।
द्वादशेन पलेनैव सुवर्णस्य विशेषतः ॥ १ ९ ॥
भा० टी० — तत्पश्चात् विधिपूर्वक बारह पल प्रमाण की सुवर्ण की वैश्यमूर्ति बनवायें ॥ १ ९ ॥
पूजयेत्पूर्वजैर्मन्त्रैस्ततो विप्राय दापयेत् ।
एवं कृते न संदेहो पुत्रो भवति नान्यथा ॥ २० ॥
भा० टी० — पूर्वोक्त मंत्रों से प्रतिमा का पूजन कर पश्चात् ब्राह्मण को दानकर दें । ऐसा करने से पुत्र होता है, इसमें संदेह नहीं है ॥२० ॥
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१२० कर्मविपाकसंहिता सर्वरोगः क्षयं याति नात्र कार्या विचारणा ॥ २१ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पुष्यनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामद्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
भा० टी० - संपूर्ण रोग नष्ट होता है, इसमें कुछ भी सन्देहास्पद नहीं है ॥ २१ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्व० पुष्यनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
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॥३३ ॥
पुष्यनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि शृणु देवि विशेषतः ।
आदौ पापफलं देवि भुज्यते देवमानुषैः ॥ १ ॥
भा ० टी० – शिवजी कहते हैं - हे देवि! अब जो कहता हूँ सब विशेष करके सुनो । पहले पाप का फल संपूर्ण देव, मनुष्य आदि के द्वारा भोगा जाता है ॥ १ ॥
पश्चात्पुण्यफलं देवि परलोके इहापि वा ।
एकः शिल्पकरो देवि वसते हस्तिनापुरे ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! पश्चात् पुण्य का फल इस लोक में तथा परलोक में भोगा जाता है । हे देवि! हस्तिनापुर में एक शिल्पकार ( कारीगर) रहता था ॥ २ ॥
हेमदास इति ख्यातो भार्याद्वयसमन्वितः ।
प्रत्यहं शिल्पकार्यं च करोति व्ययकारणात्॥ ३ ॥
भा० टी० - हेमदास नामक वह शिल्पकार दो स्त्रियों से युक्त था । अपने खर्च चलाने के लिए प्रतिदिन कारीगरी का काम किया करता था ॥ ३ ॥
काशीतः पश्चिमे देवि स्वकर्मनिरतः सदा ।
अश्वत्थानां च वृक्षाणां छेदनानि चकार सः ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे देवि! वह सदा अपने कर्म में तत्पर रह कर काशीजी से पश्चिम की तरफ पीपल वृक्षों को छेदन करता था ॥ ४ ॥
एवं बहुगते काले शिल्पकारो मृतः प्रिये! ।
नरके तस्य पतनं षष्टिवर्षसहस्रकम्॥ ५ ॥
भा० टी० — हे प्रिये! ऐसे बहुत-सा समय बीतने पर तब वह शिल्पकार मर गया । वह साठ हजार वर्षों तक नरक में पड़ा रहा ॥५ ॥
पत्न्या सह वरारोहे यातो योनिं बिडालकाम् ।
बिडालयोनिं वै भुक्त्वा सरटस्तु ततोऽभवत्॥ ६ ॥
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१२२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे वरारोहे! वह तदनन्तर स्त्री सहित बिलाव की योनि को प्राप्त हुआ । बिलाव की योनि को भोग कर छिपकली बन गया ॥ ६ ॥
पुनः स्यान्मानुषो देवि मध्यदेशे सुपूजितः ।
पूर्वजन्मनि वृक्षाणां छेदनं प्रत्यहं कृतम्॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! पश्चात् मध्य देश में सम्माननीय मनुष्य की योनि में पैदा हुआ है, पूर्वजन्म में वह प्रतिदिन वृक्षों को काटता था, ७ ॥
तेन पापेन भो देवि पुत्रो नैव प्रजायते ।
कन्यकाश्चैव संजाताः स्त्रिया रोगः सुदारुणः ॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवि! उस पाप के कारण उसके पुत्र नहीं होता है । कन्या जन्मती है और स्त्री को दारुण रोग हो रहा है ॥ ८ ॥
शरीरे महती पीडा रात्रौ निद्रा न लभ्यते ।
कन्यकायाश्च वैधव्यं वृक्षच्छेदनतः प्रिये! ॥ ९ ॥
भा० टी० - उसके शरीर में बहुत -सी पीड़ा होती है । रात्रि में निद्रा भी नहीं आती है । हे प्रिये! वृक्षों के छेदन करने से उसकी कन्या विधवा हो गई है ॥ ९ ॥
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि ततः पापनिवर्त्तनम्।
चतुर्थांशं तु वै दानं ब्राह्मणाय प्रदापयेत्॥ १० ॥
भा० टी० – अब इसकी शांति को कहता हूँजिससे पाप-निवृत्त होगा । घर के वित्त का चतुर्थांश को ब्राह्मण को दान दान कर दें ॥ १० ॥
दशायुतं जपं कुर्यात् गायत्रीमूलमन्त्रतः ।
पलपञ्चसुवर्णस्य वृक्षं वै कारयेत्ततः ॥ ११ ॥
भा० टी ० – गायत्री मूल मंत्र से एक लाख तक जप करायें और पांच पल सुवर्ण का वृक्ष बनवायें ॥ ११ ॥
पूजयित्वा यथान्यायं वृक्षं विप्राय दापयेत् ।
पञ्चधेनुं तथा दद्याद् वृषं चाभरणान्वितम् ॥ १२ ॥
भा० टी ० — यथार्थ - विधि से पूजित उस वृक्ष को दान कर दें पांच गौ और आभूषित किये हुए एक बैल का दान करें ॥ १२ ॥
कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।
गङ्गामध्ये च दातव्यं ततः पापक्षयो भवेत्॥ १३ ॥