कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 131–140
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 131–140
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कर्मविपाकसंहिता १२३ भा० टी० - कूष्माण्ड और नारियल को पाँच रत्न से भर कर गंगाजी के मध्य में दान करें तब पाप नष्ट होता है ॥ १३ ॥
सर्वव्याधिः क्षयं याति कन्यका च सुखान्विता ।
पुत्रश्चैव प्रजायेत नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पुष्यनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
भा० टी० — संपूर्ण व्याधि दूर होती है और कन्या सुख से युक्त होती है पुत्र उत्पन्न होता है इसमें कुछ भी सन्देहास्पद नहीं है ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पुष्यनक्षत्रस्य द्वितीयचरणेप्रायश्चित्तकथनं नामत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
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॥३४ ॥
पुष्यनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
मध्यदेशे वरारोहे लोहकारश्च तस्थिवान् ।
गौरेका लोहकारेण बाल्यतः पालिता शिवे! ॥ १ ॥
भा० टी ० — शिवजी कहते हैं - हे वरारोहे! अर्थात् ( हे उत्तम जंघों वाली ), शिवे! मध्य देश में एक लोहकार ( लुहार) रहता था, उसने बचपन से ही एक गौ पाली थी ॥ १ ॥
एकस्मिन्दिवसे देवि पङ्के मग्ना च गौर्वरा ।
तच्छ्रुत्वा लोहकारस्तु न गतस्तत्र वै शिवे!॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! एक दिन वह गौ कीचड़ में धँस गयी, तब सुन कर भी वह लोहकार उसे लाने नहीं गया ॥ २ ॥
मृता रात्रौ तदा देवि पङ्के वैतरणी च सा ।
बहुघस्स्रात्ततो देवि मरणं तस्य वै गृहे ॥ ३ ॥
भा० टी० — हे देवि! तब वह गौ उस कीचड़ में रात्रि के समय मर गई । हे देवि! तत्पश्चात् बहुत दिन बीत जाने पर घर में ही उस लोहार की भी मृत्यु हो गयी ॥ ३ ॥
तस्य पत्नी सती जाता सत्यलोकं गतौ च तौ ।
दशलक्षमितं वर्षं सत्यलोके च तस्थिवान्॥ ४ ॥
भा० टी० - तब उसकी स्त्री सती हो गयी, जिससे दोनों को सत्यलोक प्राप्त हुआ । दश लाख वर्षों तक स्वर्ग लोक में रहे ॥ ४ ॥
पुनः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोके तदाभवत् ।
मानुषः शुभजन्मा च धनधान्यसमन्वितः ॥ ५ ॥
भा० टी० — फिर पुण्य क्षीण होने पर तब मृत्यु लोक में मनुष्य योनि में उनका जन्म हुआ वह उत्तम कुल वाला तथा धनधान्य ' युक्त है ॥ ५ ॥
पत्या सह वरारोहे ब्राह्मणानां च सेवकः ।
पूर्वजन्मनि देवेशि पङ्के मग्ना च यत्र गौः ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १२५ भा ० टी० — हे वरारोहे! स्त्री सहित वह ब्राह्मणों का सेवक है । हे देवि! पूर्वजन्म में जब कीचड़ में गौ धँस गई थी ॥६ ॥
न गतस्तत्र भो देवि तस्मात्पुत्रो न जायते ।
कन्या जाता पुरा देवि तस्या मृत्युश्च जायते ॥ ७ ॥
भा० टी ० — तब वह वहाँ नहीं गया था, हे देवि! इसलिये उसका पुत्र नहीं होता है और पहले उनकी कन्या जन्मी थी उसकी भी मृत्यु हो गई है ॥ ७ ॥
तदर्थं वाटिकां कूपं पथि मध्ये च कारयेत् ।
कुर्याच्चैव तुलादानं पात्राणि विविधानि च ॥८ ॥
भा ० टी० — उस पाप की शांति के लिए मार्ग में बावड़ी अथवा कूआँ बनवायें तुलादान करें, अनेक प्रकार के पात्रों का दान करें ॥ ८ ॥
गोयुग्मं घृतकुम्भं च ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।
गायत्रीमन्त्रजाप्यं च लक्षमेकं तु कारयेत् ॥ ९ ॥
भा० टी० – गोयुग्म ( गौकाजोड़ा ), घृतकलश – इनका दान ब्राह्मण को दें और एक लाख गायत्री का जप करायें ॥ ९ ॥
होमं कुर्यात्ततो देवि तिलधान्यादितण्डुलैः ।
ब्राह्मणान्भोजयेद्देवि शतसंख्यान्वरानने! ॥ १० ॥
भा० टी० — हे देवि! तत्पश्चात् तिल, जौ, चावलों से होम करें । हे वरानने! पश्चात् सौ ब्राह्मणों को भोजन करायें ॥ १० ॥
एवं कृत्वा वरारोहे पुत्रो भवति नान्यथा ।
वन्ध्यात्वं नाशमायाति व्याधिनाशो भवेद्ध्रुवम्॥ ११ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहर० संवादे पुष्यनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामचतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से पुत्र होता है, इसमें अन्यथा नहीं । वंध्यापन रोग दूर होती है और निश्चय ही व्याधि का नाश होता है ॥ ११ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पुष्यनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
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॥ ३५ ॥
पुष्यनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यानगराद्देवि पूर्वे क्रोशचतुर्द्दशे ।
तत्राप्येको ऽवसच्छाककारो वैडुम्बराभिधः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! अयोध्यानगर से पूर्वदिशा में चौदह कोश एक वैडुंबर नामक शाकाकार रहता था ॥ १ ॥
चिन्ता तस्याऽभवत्पत्नी पतिसेवापरायणा ।
शाककारो महासाधुर्विष्णुभक्तिरतः सदा ॥ २ ॥
भा० टी० - और चिंता नामक उसकी स्त्री पति की सेवा में तत्पर थी, ऐसा शाककार महा साधु संपूर्ण समय में विष्णु की भक्ति में रत रहता था ॥ २ ॥
गुरुसेवारतो नित्यं प्रत्यहं शाकविक्रयी ।
एका मार्जारिका श्वेता पालिता तेन वै हता ॥३ ॥
भा० टी० - और गुरु- सेवा में नित्य रत प्रतिदिन शाकको बेचने का कार्य करता था उसने एक पाली हुई सफेद बिल्ली मार दी ॥ ३ ॥
प्राप्तौ वै तमसातीरे तीर्थे मृत्युर्मम प्रिये! विष्णुभक्तिरतो यस्मात्तीर्थे मृत्युफलादपि ॥ ४ ॥
भा० टी ० — हे प्रिये! नित्य विष्णु की भक्ति करने से तमसा नामक नदी के तट पर मेरे तीर्थ में उसकी मृत्यु हुई ॥ ४ ॥
न गतो यमलोकं तु भुक्त्वा स्वर्गं तु चाऽभवत् ।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि पुनः पुण्यक्षयो यदा ॥ ५ ॥
भा० टी० - तब वह यम- लोक में भी नहीं गया । साठ हजार वर्षों तक स्वर्गवास होने पर पुण्य नष्ट होने के कारण ॥ ५ ॥
तदा वृषभयोनिश्च मर्त्यलोकेऽभवत्पुनः ।
मानुषत्वं ततो यातो धनधान्यसमन्वितः ॥६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १२७ भा० टी ० — तब वह मृत्यु लोक में बैल की योनि को प्राप्त हुआ फिर धनधान्य से युक्त मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ ६ ॥
सुन्दरो विष्णुभक्तित्वात्पुत्रेण रहितः शिवे! गर्भाणां पतनं यातं यतो मार्जारिका हता ॥ ७ ॥
भा० टी००. - वह शाककार विष्णुभक्त होने के कारण पुत्र - रहित हुआ और
उसकी स्त्री के कई गर्भ नष्ट हो गये । क्योंकि बिल्ली की हत्या की थी ॥ ७ ॥
सगर्भा च तदा देवि ततो गर्भो विनश्यति ।
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गिरिजे वरे! ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे पार्वति! वह बिल्ली सगर्भा थी, इस कारण से उसके गर्भ नष्ट होते गये और हे वरारोहे! गिरिजे! उसकी शांति को मैं तुम्हारे समक्ष कहता हूँ ॥८ ॥
गृहवित्तार्द्धभागं वै ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।
तदा पापं क्षयं याति नात्र कार्य्या विचारणा ॥ ९ ॥
भा० टी० – अपने घर में जितना द्रव्य है, उसका आठवाँ भाग ब्राह्मण को दान कर दें तब वह पाप दूर होता है इसमें कुछ भी सन्देहास्पद नहीं है॥९॥
शिवार्चनं कारयित्वा रौप्यमार्जारिकां तथा ।
पलानां सप्तकैः कुर्यात् सगर्भां विमलां शुभाम् ॥ १० ॥
भा० टी० - शिवजी का पूजन करके १०० पल प्रमाण वाली चांदी से, गर्भ युक्त बहुत सुंदर एक बिल्ली बनवायें ॥ १० ॥
पूजयित्वा ततो देवि ततो दद्याद्विजात्मने ।
लक्षं जाप्यं ततो देवि त्र्यम्बकेण विशेषतः ॥ ११ ॥
भा० टी० — हे देवि! पूजन करके ब्राह्मण को दान दें फिर त्र्यंबक मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ ११ ॥
ततो भवति वै शुद्धः पूर्वपापान्न संशयः ।
पुत्रो भवति वै देवि रोगाणां संक्षयस्तथा ॥ १२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीशिवसंवादे पुष्यनक्षत्रस्य चतुर्थचरण- प्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
भा० टी० - तब संपूर्ण पाप से शुद्धि होती है । इसमें संशय नहीं है । ऐसा करने से हे देवि! पुत्र की प्राप्ति और रोगों का क्षय होता है ॥ १२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीशिवसंवादे पुष्यनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तक० नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
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॥३६ ॥
लेषानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने!।
जातस्य सर्पनक्षत्रे प्रथमे चरणे शुभे! ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! हे शोभने! अब आलेषानक्षत्र के पहले चरण में जन्म लेने वालों के कर्मफल को कहता हूँ, वह सुनो ॥ १ ॥
पुरी काशी समाख्याता त्रैलोक्ये देवि पूजिता ।
तस्यास्तु पश्चिमे भागे क्रोशपञ्चदशे मिते ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! त्रिलोक में पूजित काशी नामक प्रसिद्ध नगरी है उसके पश्चिम भाग में १५ कोश के परिमाण से ॥ २ ॥
माण्डव्यस्य पुरे शुभ्रे वसन्ति बहवो जनाः ।
तन्मध्ये शुद्र एको हि प्राकरोल्लवणं सदा ॥ ३ ॥
भा० टी० – मांडव्य नामक पुर है, जिसमें बहुत से लोग वास करते हैं और उन्हीं में एक शूद्र लवणकार भीर रहता था ॥ ३ ॥
डिण्डिभेति समाख्यातो गौरी तस्य वरानना ।
बह्वर्थं सञ्चितं तेन न दानमकरोत् क्वचित् ॥४ ॥
भा० टी० - वह डिंडिभ नाम से विख्यात था और उसकी स्त्री का नाम गौरी था उन्होंने बहुत सा धन इकठ्ठा किया तथा दान नहीं किया ॥४ ॥
एकदा दैवयोगेन ब्राह्मणानां निमन्त्रणम् ।
भोजनं प्रददौ कृत्वा दक्षिणां वै समर्पयेत्॥ ५ ॥
भा० टी० - एक समय दैव योग से ब्राह्मणों को निमंत्रण देकर भोजन करवा कर उन्होंने दक्षिणा दी ॥ ५ ॥
गामेकां कपिलां दत्त्वा भूषितां स्वपुरोधसे ।
ब्राह्मणोऽकथयत् कश्चित् शूद्रं प्रति तदा प्रिये!॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १२९ भा० टी० - हे प्रिये! एक कपिला गौ को आभूषण युक्त कर अपने पुरोहित को दिया तब उस शूद्र से एक ब्राह्मण ने कहा ॥ ६ ॥
अहं ग्रामस्य वै पूज्यो मदीया गौः कथं प्रभो! पुरोहिताय दत्तासि प्राणं ते च ददाम्यहम् ॥ ७ ॥
भा० टी० – कि, मैं ग्राम का पूज्य हूँ मेरी गौ पुरोहित कों क्यों दी,! मैं तुझे अपने प्राण दे दूँगा ( आत्माहत्या कर दूँगी ) ॥ ७ ॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य सोऽवदद्ब्राह्मणं प्रति ।
क्रोधेन महता देवि ब्राह्मणाय तदाधमः ॥ ८ ॥
भा० टी० – फिर वह शूद्र ब्राह्मण के वचन को सुन कर बड़े क्रोध से युक्त हुआ, उसने ब्राह्मण को कहा ॥ ८ ॥
तदा क्रोधेन महता स शूद्रोऽताडयद्विजम् ।
मरणं तस्य वै जातं तद्धस्ताद्वै वरानने! ॥ ९ ॥
भा० टी० -– और बड़े क्रोध से उस शूद्र ने उस ब्राह्मण को पीटा, तब हे वरानने! उसके हाथ से उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी ॥ ९ ॥
ततो बहुतिथे काले सस्त्रीकः प्रमृतः खलः ।
पातनं तस्य वै जातं कर्म्मपाके तदा खलु ॥ १० ॥
भा० टी० — फिर कर्मों के पूरे होने पर बहुत-सा काल हो गया, तब स्त्री सहित पाप- युक्त उस शूद्र की भी मृत्यु हुई ॥ १० ॥
निक्षिप्य यमदूतेन तत्रैव च यमाज्ञया ।
पञ्चलक्षं ततो वर्षं कष्टं दत्तं मुहुर्मुहुः ॥ ११ ॥
भा० टी० - उस शूद्र को यमराज की आज्ञा से दूतों ने उसे नरक में डाला जहाँ पाँच लाख वर्षों तक बार -बार कष्टों को भोगता रहा ॥ ११ ॥
तत्र जाता महापीडा नरकान्निसृतस्ततः ।
सर्पयोनिं स वै यातो गृध्रयोनिस्ततोऽभवत् ॥ १२ ॥
भा० टी० - और वहाँ बहुत पीडा को भोग कर नरक से निकल कर सर्प की योनि को प्राप्त हुआ, फिर गीध की योनि को प्राप्त हुआ ॥ १२ ॥
मानुषत्वं ततो लब्धं मध्यदेशे वरानने! पूर्वपापाच्च भो देवि पुत्रो नैव प्रजायते ॥ १३ ॥
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१३० कर्मविपाकसंहिता भा० टी ० – फिर हे वरानने! वह मध्य देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है जहाँ हे देवि! पहले के पाप से उसको पुत्र प्राप्त नहीं हुआ ॥ १३ ॥
शरीरे रोग उत्पन्नो विग्रहस्तु वरानने! प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि पूर्वकिल्विषशान्तये ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे वरानने! उसके शरीर में रोग उत्पन्न हो कर कष्ट को प्राप्त हो रहा है । अब मैं उसके पूर्वजन्म के पापों के प्रायश्चित को कहता हूँ ॥ १४ ॥
गायत्रीसूर्यमन्त्राभ्यां पञ्चलक्षजपं शिवे! करोतु विधिवद्भक्त्या तदा वै वरवर्णिनि! ॥ १५ ॥
भा० टी० - हे शिवे! हे वरवर्णिनि! गायत्री और सूर्य के मंत्रों का पाँच लाख तक विधि और भक्ति पूर्वक जप करवायें ॥ १५ ॥
होमं कारयितुं प्राज्यं कुण्डे चाष्टदले तथा ।
दशांशतर्पणं तस्य मार्जनं तद्दशांशतः ॥ १६ ॥
भा० टी० – अष्टदल वाला कुंड बनवा कर घृत की आहुति दें और उसका दशांश तर्पण तथा दशांश मार्जन करवायें ॥ १६ ॥
प्रतिमां रुचिरां कृत्वा सुवर्णस्य महेश्वरि! पलषष्ठ्याः प्रयत्नेन पूजयित्वा यथाविधि ॥ १७ ॥
भा० टी० — और हे महेश्वरि! साठ पल सुवर्ण की मूर्ति बनवायें यथाविधि 'पूजन करावायें ॥ १७ ॥
मन्त्रेणानेन विधिना गन्धधूपादिभिस्तथा ।
दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदेश्वरि! ॥ १८ ॥
भा० टी० — हे दुर्गे! हे देवि! हे सर्वसिद्धि प्रदेश्वरि!! तुम्हें नमस्कार है, इस विधि से इस मंत्र से गंधधूपादि प्रदान करें ॥ १८ ॥
इमां पूजां गृहीत्वा तु मम कार्यं प्रसाधय । ॐ ह्रीम् महेश्वर्यै नमः ॐ दुर्गायै नमः । ॐ सर्वकामप्रदे तुभ्यं नमः ॐ ईश्वय्यै नमः । ॐ त्र्यम्बकाय नमः ॐ ब्रह्मणे नमः ।
ॐ विष्णवे नमः ॐ सर्वेश्वराय नमः ।
ॐ भैरवाय नमः ॐ मार्त्तण्डाय नम ॥
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कर्मविपाकसंहिता १३१ एतैश्च दशभिर्मन्त्रैः प्रतिमां पूजयेत्प्रिये! ब्राह्मणाय ततो दद्याद्भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ १ ९ ॥ भा० टी० – और यह कहें कि-इस मेरी पूजा को ग्रहण करके मेरे कार्य को सिद्ध करो ॐ मंत्र-ॐ ह्रीम् महेश्वर्यै नमः १, ॐ दुर्गायै नमः २, ॐ सर्वकामप्रदे तुभ्यं नमः ३, ॐ ईश्वय्यै नमः ४, ॐ त्र्यम्बकाय नमः ५, ॐ ब्रह्मणे नमः ६, ॐ विष्णवे नमः ७, ॐ सर्वेश्वराय नमः ८, ॐ भैरवाय नमः ९, ॐ मार्तण्डाय नमः१०– ऐसे हे प्रिये! इन १० मंत्रों से प्रतिमा का पूजन करें, फिर भक्ति- युक्त चित्त वाला हो कर संकल्प लेकर ब्राह्मण को दें ॥ १ ९ ॥ पञ्चपात्रं ततो दद्यात्तदुद्देशेन पार्वति! तिलदानं ततो दद्याद्वस्त्रदानं यथाविधि ॥ २० ॥
भा० टी० - फिर उसी का उद्देश्य लेकर पाँच पात्रों का और तिल का तथा वस्त्रों का यथाविधि दान दे दें ॥ २० ॥
कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं पूर्वपापप्रणाशनम्॥ २१ ॥
भा० टी० – तदनन्तर एक पेठा तथा नारियल को पंचरत्न से युक्त कर पूर्व जन्म के पाप को दूर करने के लिए गंगाजी के मध्य में दान अर्थात् विसर्जित करें ॥ २१ ॥
रोगात्प्रमुच्यते देवि वन्ध्यापि पुत्रमाप्नुयात् । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्लेषानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
भा० टी ० — इसप्रकार हे देवि! साधक रोगों से दूर होता है । वंध्या भी पुत्र प्राप्त करती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां श्लेषानक्षत्रस्य प्रथमचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
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॥३७ ॥
सर्प( शेष )नक्षत्रद्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अलर्कस्य पुरे देवि शूद्र एकोऽवसत्पुरा ।
शूद्राचाररतो नित्यं विक्रयं कुरुते सदा ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! अलर्का नाम वाली पुरी में पहले एक शूद्र रहा करता था और वह शूद्र- कर्म में नित्य रत रहता था और विक्रय का व्यवहार करता था ॥ १ ॥
गोमहिष्यादिव्यापारैर्व्ययं कुर्य्याद्दिने दिने ।
गोधनानि बहून्येव तेषां रक्षा न जायते ॥ २ ॥
भा० टी० -और प्रतिदिन गौ, महिषी आदि के बेचने का व्यवहार करता था और उसके पास गौ, महिषी आदि बहुत संख्या में थीं जिन की रक्षा वह नहीं कर सका ॥ २ ॥
दुर्लभ इति विख्यातो तत्राऽज्ञानी सदावसत् ।
एकदा तस्य गोवृन्दे वने तिष्ठति भोऽनघे! ॥ ३ ॥
भा० टी० — वह दुर्लभ नाम से विख्यात अज्ञानी सदा वहीं रहा करता था, एक समय हे अनघे! वन में गौओं का समूह पास चर रहा था ॥ ३ ॥
वृष्टिस्तत्र महाजाता गावश्च पीडिता भृशम् ।
तासांमध्ये भूरि गावो वर्षणेन मृताः पुरा ॥ ४ ॥
भा० टी० - जहाँ वन में महावर्षा होने के कारण गौओं को बड़ी पीड़ा हुई और उनमें से - बहुत सी गाएँ वर्षा से मर गयीं ॥ ४ ॥
रक्षां शूद्रो नाऽकरोत्स तृणैराछादनादिभिः ।
एवं बहुगते काले शूद्रः पापी मृतो यदा ॥ ५ ॥
भा० टी० - वह शूद्र तृण से तथा छाया से गौओं की रक्षा नहीं कर सका, इसप्रकार बहुत काल व्यतीत होने पर वह पापी शूद्र मर गया ॥ ५ ॥