कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 141–150
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 141–150
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कर्मविपाकसंहिता १३३
नरके पातयामास यमदूतो यमाज्ञया ।
बहुवर्षसहस्राणि भुक्त्वा नरकजं फलम्॥ ६ ॥
भा० टी० - यमराज के दूत यम की आज्ञा से उसे नरक में ले गये, वहाँ अनेक हजारों वर्षों तक नरक के फल को भोग कर ॥ ६ ॥
नरकान्निर्गतो देवि गजयोनिमवाप्तवान् ।
गजयोनिं ततो भुक्त्वा मानुषत्वं ततोऽगमत् ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! नरक से निकल कर हाथी की योनि को प्राप्त हुआ, हाथी की योनि को भोग कर फिर मनुष्य के शरीर को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
स्वकर्मणा परित्यागं यतोऽकार्षीद्गवां पुरा ।
ततः कर्मफलाद्देवि नैव पुत्रः प्रजायते ॥ ८ ॥
भा० टी० – पहले जहाँ अपने कर्मों को त्याग कर उसने गौओं की रक्षा नहीं की थी, उस कर्म के फल के कारण ही उसे पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई है ॥ ८ ॥
कृतं दानं पुरा देवि सर्वपर्वणि चाञ्जसा ।
तेन पुण्येन भो देवि धनधान्यगजादिकम् ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! पहले इसने तिथि- पर्व पर विधि से दान किया था, जिस पुण्य के प्रभाव से यह धन - धान्य, हस्ती आदि से युक्त हुआ है ॥ ९ ॥
गोसंग्रहः कृतः पूर्वं मृतो तृणकणं विना ।
तेन पापेन भो देवि महाव्याधिः प्रजायते ॥ १० ॥
भा० टी० — हे देवि! पहले जिसके कारण गौओं का समूह तृण खाये बिना मृत्यु को प्राप्त हुआ, इस पाप से उसके शरीर में महाव्याधि होती है ॥ १० ॥
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने! ब्राह्मणाय दशांशं च दानं दद्यात्सुरप्रिये! ॥ ११ ॥
भा० टी ० — अब हे देवि! हे सुशोभने! उस पाप की शांति के उपाय को कहता हूँ! हे सुरप्रिये! ब्राह्मण को घर के धन में से दशांश का दान दें ॥ ११ ॥
गायत्रीलक्षजाप्येन जपं कुर्यात्प्रसन्नधीः ।
दशांश हवनं देवि मार्जनं तर्पणं तथा ॥ १२ ॥
भा० टी० - वह प्रसन्न मन वाला होके एक लाख तक गायत्री का जप करवाये और हे देवि! दशांश हवन तथा मार्जन तर्पणादि करवाये ॥ १२ ॥
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१३४ कर्मविपाकसंहिता दशवर्णास्ततो दद्याद्ब्राह्मणाय वरानने! एवं कृते न संदेहो वरः पुत्रः प्रजायते ॥ १३ ॥
भा० टी०o - हे वरानने! ब्राह्मण को दश वर्ण वाली गौओं का दान दो, ऐसा करने से श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है ॥ १३ ॥
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा । इतिकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे सर्पनक्षत्रद्वितीयचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
भा० टी ० – और संपूर्ण रोग नाश को प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां सर्पनक्षत्रस्य द्वितीयचरणे प्रायश्चित्तकथनंनाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
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॥ ३८ ॥
लेषानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
गङ्गाया उत्तरे कूले मालाकारोऽवसत्पुरा ।
डेलचन्द्रेति विख्यातो महाज्ञानी गुणाकरः ॥१ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे प्रिये! गंगाजी के उत्तर किनारे पर डेलचंद्र नामक महाज्ञानी, गुणों से युक्त अपने कर्म में नित्य रत ब्राह्मणों की सेवा में तत्पर मालाकार रहता था ॥ १ ॥
स्वकर्मनिरतो नित्यं द्विजसेवासु तत्परः ।
तस्य पत्नी विशालाक्षि नाम्ना चन्द्रावती शुभा ॥ २ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! उसकी पत्नी अर्थात् स्त्री चंद्रावती नाम से ख्यात और शुभ लक्षणों से युक्त थी ॥२ ॥
गुरुदास इति ख्यातो वैश्यवर्णेषु पूजितः ।
आसीत्तस्मै तदा तेन स्वर्णं दत्तं प्रियाय वै ॥ ३ ॥
भा० टी० – वहीं! गुरुदास नाम के विख्यात सब वैश्यों में पूजित एक वैश्य रहता था, उस वैश्य ने अपने प्रिय उस मालाकार को बहुत-सा सुवर्ण दिया ॥३ ॥
लक्षत्रयं स्थितं स्वर्णं तस्य वैश्यपतेः प्रिये! मालाकारेण तत्सर्वं भूमौ स्थाप्य तदा प्रिये! ॥४ ॥
भा० टी० - हे प्रिये! तीन लाख रुपयों का स्वर्ण उस वैश्य का हुआ तो वह स्वर्ण उस मालाकार ने भूमि के अन्दर स्थापित किया ॥४ ॥
स्वयं गतः स वैश्येन सार्द्धं वेण्यां तदा प्रिये! माघे नियमतः स्नानं कृते ताभ्यां यथाविधि ॥५ ॥
भा० टी ० — वह मालाकार माघ के महीने में उस वैश्य के साथ त्रिवेणी अर्थात् प्रयाग में यथाविधि स्नान करने को गया फिर उन दोनों ने नियम से स्नान किया ॥ ५ ॥
शूद्रस्तु स्वगृहं प्राप्तः वैश्यः काश्यां समागतः ।
तत्र काश्यां विशालाक्षि मरणं तस्य चाभवत् ॥ ६ ॥
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१३६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे विशालाक्षि! फिर स्नान के अनंतर शूद्र मालाकार तो अपने घर आया और वह वैश्य काशी को गया जहाँ काशी में उस वैश्य की मृत्यु हो गयी ॥ ६ ॥
अविमुक्ते महातीर्थे देवदानवपूजिते ।
मम पार्श्वे समायातो धर्मक्षेत्रप्रभावतः ॥ ७ ॥
भा० टी ० – मुक्ति को देने वाला यह महातीर्थ देवता और दानवों से पूजित है, ऐसे धर्मक्षेत्र के प्रभाव से वह वैश्य मेरे समीप आया ॥ ७ ॥
मालाकारस्तु तत्स्वर्णं भुक्त्वा पुत्रस्त्रिया युतः ।
बहुवर्षगते काले मरणं तस्य चाऽभवत् ॥ ८ ॥
भा० टी० -मालाकार ने पुत्र - स्त्री से युक्त हो कर उस वैश्य के स्वर्ण को भोगते हुए बहुत से वर्षों को व्यतीत किया, उस शूद्र की बाद में मृत्यु हुई ॥ ८ ॥
तदा गन्धर्वनगरे बहुवर्षसहस्रकम् ।
पल्या सह वरारोहे भुक्तं वै स्वर्गजं फलम्॥ ९ ॥
भा० टी० — तब उसे बहुत वर्षों तक गन्धर्व लोक की प्राप्ति हुई, वहाँ पत्नी सहित गंधर्वलोक में उसने स्वर्ग के फल को भोगा ॥ ९ ॥
ततो बहुगते काले मानुषत्वमवाप्तवान् ।
धनाढ्यो गुणवान् भोक्ता देवब्राह्मणतत्परः ॥ १० ॥
भा० टी० - फिर बहुत से समय के पश्चात् वह मनुष्य शरीर को प्राप्त हो कर धन से युक्त गुणवान्, भोग से' युक्त, देव ब्राह्मण के पूजन में तत्पर रहता है ॥ १० ॥
तस्य पत्नी विशालाक्षि पूर्वजन्मप्रसङ्गतः ।
पुनर्विवाहिता देवि पतिसेवासु तत्परा ॥ ११ ॥
भा० टी० - और हे विशालाक्षि! उसकी स्त्री पहले जन्म के प्रसंग से उसके साथ विवाहित हुई और पति की सेवा में तत्पर है ॥ ११ ॥
पुष्पं च जायते देवि मासि मासि निरन्तरम् ।
पुत्रो न जायते देवि कन्यका खलु जायते ।
यतो वैश्यस्य वै स्वर्णं न दत्तं पूर्वजन्मनि ॥ १२ ॥
भा० टी० – उसकी पत्नी को माहवारी तो प्रत्येक महीने में निरंतर होती है, किन्तु हे देवि! पुत्र नहीं होता है और उसके कन्या होती है, क्योंकि उसने पूर्व जन्म में वैश्य का स्वर्ण वापस नहीं दिया था ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १३७
तत्कर्मणः फलाद्देवि पुत्रो नैव प्रजायते ।
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि यथार्थतः ॥ १३ ॥
भा० टी० — हे देवि! उस कर्म के फल से उसका पुत्र नहीं हुआ, अब हे देवि! उस कर्म की शांति को यथावत् कहता हूँ, सुनो ॥ १३ ॥
गृहद्रव्यषडंशेन पुण्यं कार्यं च कारयेत् ।
हेम्नो दशपलस्यापि वैश्यं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ १४ ॥
भा० टी० - अपने घर में जितना द्रव्य हो, उसका छठा भाग पुण्य कार्य में दान करें और दशपल सुवर्ण प्रयत्नपूर्वक मूर्ति बनवायें ॥ १४ ॥
पूजयित्वा विधानेन ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।
षडङ्गजातवेदानां जपं वै कारयेत्ततः ॥ १५ ॥
भा० टी० - विधि - विधान से पूजा करके ब्राह्मण को संकल्प कर के दें और वेद के षडंग के मन्त्रों का जप करवायें ॥ १५ ॥
जीर्णोद्धारं ततो देवि वापिकां कूपमेव च ।
एवं कृते न संदेहः पुत्रो भवति नान्यथा ॥ १६ ॥
भा० टी० - हे देवि! पुराने फूटे - टूटे कूप, बावड़ी तथा बगीचा आदि का जीर्णोद्धार करें ऐसा करने से पुत्र की प्राप्ति निश्चय होती है, यह मेरा वचन अन्यथा नहीं है ॥१६ ॥
रोगस्तस्य निवर्तेत धनं च बहु जायते ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्लेषानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
भा० टी०-० - इसप्रकार करने वाले उस जन का रोग निवृत्त होता है और बहुत सा धन उसे प्राप्त होता है ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकभाषाटीकायां० नामाष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
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॥३ ९ ॥ शेषानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्या नगरी श्रेष्ठा सर्वदेवसुपूजिता ।
यस्याः प्रवेशमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१ ॥
भा० टी०– शिवजी कहते हैं - अयोध्या नगरी श्रेष्ठ है, सब देवतों द्वारा पूजी जाती है जिसमें वास करने मात्र से ही सब पापों से मनुष्य छूट जाता है ॥ १ ॥
तस्यास्तु पश्चिमं देवि योजनानां दशोपरि ।
लक्ष्मणाख्यं पुरं यत्र वसन्ति बहवो जनाः ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसके पश्चिम भाग में दश योजन दूर लक्ष्मण नामक पुर है, वहाँ बहुत से जन रहा करते हैं ॥ २ ॥
तन्मध्ये शूद्र एको हि कैवर्तो धनधान्यवान् ।
डालेतिनामविख्यातस्तस्य पत्नी च केशवी ॥ ३ ॥
भा० टी० - उनके मध्य में धनधान्य से युक्त एक शूद्र जाति का झीमर डाल नामक विख्यात व्यक्ति रहता था और उसकी स्त्री का नाम केशवी था ॥ ३ ॥
तेन व्यापारतो देवि धनं च बहु संस्थितम् ।
मांसं प्रभुज्यते नित्यं मांसं हि बहुधा प्रियम्॥ ४ ॥
भ० टी ० — उसने व्यापार से बहुत धन इकट्ठा किया, वह नित्य मांस का भक्षण करता था, मांस खाना उसे बड़ा प्रिय था ॥ ४ ॥
निर्दयः सर्वजन्तूनां कच्छपानां विशेषतः ।
एवं बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत् किल ॥ ५ ॥
भा० टी० –- वह निर्दयी सभी प्राणियों विशेषकर कछुओं का मांस खाता था, ऐसे बहुत - सा काल व्यतीत होने पर उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥
यमदूतैर्महाघोरे निक्षिप्तश्च यमाज्ञया ।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १३ ९ भा० टी० — फिर यमराज की आज्ञा पा कर दूतों ने उसे नरक में डाला, वह हजार वर्षों तक नरक के दुःखों को भोगता रहा ॥ ६ ॥
नरकान्निःसृतो देवि दर्दुरत्वं तथा गतः ।
ऋक्षत्वं च ततो देवि मानुषत्वं ततोऽलभत् ॥ ७ ॥
भा० टी० — फिर हे देवि! नरक से निकल कर मेंढक की योनि को प्राप्त हुआ, फिर रीछ की योनि को भोग कर मनुष्य शरीर को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
पाण्डुरोगेण संयुक्तो वंशो नैव तु जीवति ।
कन्याश्च बहवो जाता विधवा व्यभिचारिणी ॥ ८ ॥
भा० टी० - वह पाण्डुरोग से युक्त हुआ, उसके पुत्र जीवित नहीं रहते और उसकी बहुत- सी कन्याएँ उसके हुईं, वे सभी पाप के प्रभाव से विधवा और व्यभिचारिणी हुईं ॥ ८ ॥
अपत्यानां निरोधश्च युवत्वसमये सति ।
अस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि यथा पापात्प्रमुच्यते ॥ ९ ॥
भा० टी० – उसको युवावस्था में ही संतान का निरोध हो गया, अब उस पाप से मुक्त होने का पुण्यकर्म कहता हूँ ॥९ ॥
षडंशं ब्राह्मणे दानं श्रीविष्णोः पूजनं तथा ।
विष्णोरराटमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ॥ १० ॥
भा० टी००.- अब घर के द्रव्य में से छठे भाग का दान ब्राह्मण कर दें, विष्णु का पूजन करें, विष्णोरराट० इस मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ १० ॥
एवं कृते त संदेहो वंशो भवति नान्यथा ।
रोगाश्च विलयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्लेषानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ भा० टी० - ऐसे करने से निश्चय ही पुत्र होगा, अन्यथा नहीं होगा और रोग नष्ट हो जायेगा इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ११ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० लेषा० चतुर्थचरण० नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥
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॥ ४० ॥
अथ मघानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पुरा देवि शुभं ख्यातं पुरं मङ्गलनामकम् ।
तत्र वैश्यो वसत्येको धनधान्यसमन्वितः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! बहुत पहले एक मंगल नामक शुभनगर था, जिसमें एक वैश्य रहता था और धनधान्य से युक्त था ॥ १ ॥
तस्य नाम समाख्यातं मङ्गलं देवि वै शुभम् ।
तस्य पत्नी विशालाक्षी सुन्दरी सुखदायिनी ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! शुभ लक्षणों वाले उस वैश्य का नाम की उसकी स्त्री विशाल नेत्रों वाली तथा सुंदर रूप वाली तथा उसे सुख देने वाली थी ॥ २ ॥
विष्णुभक्तिरतो नित्यं गुरुब्राह्मणसेवकः ।
आचारे नियतश्चैव क्रयविक्रयतत्परः ॥ ३ ॥
भा० टी० - वह वैश्य नित्य विष्णुभक्ति में तत्पर, गुरु और ब्राह्मण की सेवा करने वाला आचार- नियम से युक्त और क्रय- विक्रय में तत्पर रहता था । ॥ ३ ॥
एकदा तु गृहे देवि मित्रं तस्य समागतम् ।
आदरं बहुधा कृत्वा भोजयामास शास्त्रतः ॥४ ॥
भा० टी० - हे देवि! एक समय उसके घर में उसका मित्र आ गया, तब उसने उसे अत्यन्त आदर दे कर उसे भोजन कराया ॥ ४ ॥
स्वर्णदानं ततो लक्षमुद्रादानं तु तत्प्रिये! दत्तं वैश्येन भो देवि ब्राह्मणाय स्वशान्तये ॥५ ॥
भा० टी० - फिर हे प्रिये! उसको सुवर्ण और एक लाख रुपयों का दान उस वैश्य ने ब्राह्मण को अपनी शांति के लिए दिया ॥ ५ ॥
ब्राह्मणेनापि तत्सर्वं स्थापितं तस्य वै गृहे ।
ततोऽगात्तीर्थयात्रार्थं वाराणस्यां वरानने ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १४१ भा० टी० - और उस ब्राह्मण ने भी सब धन उसके घर में ही रख कर फिर हे वरानने! वह ब्राह्मण तीर्थ -यात्रा के निमित्त काशी चला गया ॥ ६ ॥
तस्य मृत्युरभूद्देवि काश्यां चैव स्वकर्मतः ।
बहुकाले गते देवि वैश्यो दारिद्र्यपीडितः ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! अपने कर्मफल से वहाँ काशीपुरी में उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी तब बहुत काल पश्चात् हे देवि! वह वैश्य दारिद्र्य से पीड़ित हो गया ॥७ ॥
पुत्रदारैश्च संयुक्तः तस्य द्रव्यं तदा प्रिये! भुक्तं सर्वं तदा देवि स्वदत्तं चैव पुण्यदम् ॥ ८ ॥
भा० टी० – अपनी स्त्री- पुत्र से संयुक्त वह वैश्य उस ब्राह्मण के सब धन को भोगता गया जो उसने पुण्य के लिए ब्राह्मण को दिया था ॥ ८ ॥
वृद्धत्वे च पुनर्जाते तस्य मृत्युरभूत्किल ।
अयोध्यामरणात्तस्य स्वर्गवासस्ततोऽभवत्॥ ९ ॥
भा० टी० — फिर वृद्ध होने पर उसकी मृत्यु हुई और अयोध्याजी में मरण होने के कारण उसका स्वर्गवास हो गया ॥ ९ ॥
बहुवर्षसहस्राणि विष्णुलोके वरानने! भुक्त्वा बहुविधं भोगं ततः पुण्यक्षयेऽनघे! ॥ १० ॥
भा० टी० — हे वरानने! वहाँ स्वर्गवास करते हुए विष्णुलोक में बहुत हजार वर्षों तक उसने अनेक प्रकार के भोगों को भोगा, पुण्य क्षीण होने पर ॥ १० ॥
मृत्युलोके भवेज्जन्म धनधान्यसमन्वितः ।
विष्णुपूजारतो नित्यं ब्राह्मणे भक्तिरुत्तमा ॥ ११ ॥
भा० टी० — हे अनघे! मृत्युलोक में उसका जन्म हुआ । धनधान्य से युक्त वह विष्णुपूजा में नित्य रत रहता है और ब्राह्मणों में उत्तम भक्तियुक्त है ॥ ११ ॥
मित्रद्रव्यं स्वयं दत्तं भुक्तं तेन ततः प्रिये! पुत्रोत्पत्तिः प्रथमतस्तस्य वै मरणं भवेत्॥ १२ ॥
भा० टी० - मित्र को दान करके दिया हुआ द्रव्य अपने आप ही भोगने के कारण पहले पुत्र का जन्म होने पर उसकी मृत्यु हो गयी ॥ १२ ॥
पुनः पुत्रो न जायेत काकवन्ध्या ततः प्रिया ।
शरीरे कफवातादिरोगाश्च विविधास्तथा ॥ १३ ॥
भा० टी०-० - फिर पुत्र नहीं होने से उसकी स्त्री काकवन्ध्या है और उसका शरीर कफवातादि के द्वारा अनेक प्रकार से पीड़ित होता रहता है ॥ १३ ॥
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१४२ कर्मविपाकसंहिता
वृद्धत्वं च तथा तस्य जायते नात्र संशयः ।
तत्पापशमनार्थं च पुण्यं शृणु वरानने! ॥ १४ ॥
भा० टी ० — वही जल्दी ही बूढ़ा हो गया है इसमें संशय नहीं, इस पाप को दूर करने के लिए उपाय हेतु पुण्य कहता हूँ तुम सूनो ॥ १४ ॥
षडंशं च ततो दानं ब्राह्मणाय वरानने! गायत्रीमन्त्रजाप्यं च लक्षमेकं प्रयत्नतः ॥ १५ ॥
भा० टी० - हे वरानने! घर के वित्त में से छठाभाग दान करके ब्राह्मण को दें और यत्न से एक लाख तक गायत्री जप करवायें ॥ १५ ॥
हवनं विधिवत्कुर्यात् तर्पणं मार्जनं तथा ।
गामेकां कपिलां दद्यात्स्वर्णशृङ्गीं सहाम्बराम्॥ १६ ॥
भा० टी ० – विधिपूर्वक हवन, उसका दशांश तर्पण, उसका दशांश मार्जन और सुवर्ण के शृंग- वस्त्र से सहित एक कपिला गौ का दान करें ॥ १६ ॥
दद्यात्प्रयत्नतो देवि ब्राह्मणाय महात्मने! तिलधेनुं ततो दद्यात्पात्रं वस्त्रं तथा प्रिये! ॥ १७ ॥
भा० टी० — हे देवि! यत्न से महात्मा ब्राह्मण को दे कर तिल धेनु का दान भी वैसे ही वस्त्रादि युक्त करके दें ॥ १७ ॥
हरिवंशश्रुतिर्ब्रह्मदम्पत्योः पूजनं चरेत् ।
एवं कृते ततो देवि पुनः पुत्रः प्रजायते ॥ १८ ॥
भा० टी ० — हे देवि! ब्राह्मण-ब्राह्मणी का पूजन, हरिवंश पुराण का श्रवण करें, ऐसा करने से फिर पुत्र की प्राप्ति होगी ॥ १८ ॥
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे मघानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
भा० टी० - इसप्रकार सब रोग दूर होते हैं इसमें कुछ भी सन्देह करने योग्य नहीं है ॥ इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० मघानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥