कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 151–160
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 151–160
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॥४१ ॥
मघानक्षत्रद्वितीयचरण -प्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यानगराद्देवि योजनोपरि वल्लभे! ।
दक्षिणे नन्दिनिग्रामे वसन्ति बहवो जनाः ॥ १ ॥
भा० टी ० — शिवजी कहते हैं - दे देवि! अयोध्यापुरी से एक योजन दूर दक्षिण दिशा में नंदिनिग्राम में बहुत से जन निवास करते हैं ॥ १ ॥
द्विजस्तत्र वसत्येको मद्यवेश्यारतस्सदा ।
परस्त्रीलम्पटो नित्यं मद्यमांसरतस्तदा ॥ २ ॥
भा० टी० – वहाँ मदिरापान, वेश्या -संग, मांस आदि में प्रीति करने वाला एक ब्राह्मण रहा करता था ॥ २ ॥
नामतो मित्रशर्मेति तस्य पत्नी तु कर्कशा ।
प्रत्यहं द्यूतकरणे व्ययं कुर्याद्दिने दिने ॥ ३ ॥
भा० टी० — उसका नाम मित्रशर्मा था, कर्कशा नाम वाली उसकी स्त्री थी, वह प्रतिदिन जुए के व्यवहार में खर्चा करता था ॥ ३ ॥
एवं बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्पुरा ।
पश्चान्मृता तु तत्पत्नी कर्कशा दुःखदायिनी ॥ ४ ॥
भा० टी ० – इस प्रकार बहुत-सा काल बीत जाने पर पहले उसकी मृत्यु हुई और पश्चात् कर्कशा नाम वाली उसकी स्त्री भी मर गयी ॥ ४ ॥
यमस्य किंकरैरेव निक्षिप्तो नरकार्णवे ।
सप्ततिर्वै सहस्राणि वर्षाणि सुरवल्लभे! ॥ ५ ॥
भा० टी०o. - यम की आज्ञा से दूतों ने नरक रूपी समुद्र में उसे गिरा दिया, जहाँ हे सुरवल्लभे! सत्तर हजार वर्षों नरक में वास करते हुए ॥५ ॥
भुक्तं दुःखं नरकजं दम्पतिभ्यां तदा शिवे! ततः पापक्षये देवि शुनो योनिरभूत् पुरा ॥ ६ ॥
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१४४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे शिवे! दोनों स्त्री - पुरुष नरक का दुःख भोग कर पाप क्षय होने पर श्वान अर्थात् कुत्ते की योनि को प्राप्त हुए ॥ ६ ॥
योनिं ततो भुक्त्वा शूकरो निर्जने वने ।
मानुषस्य पुनर्योनिं मध्यदेशे ततोऽलभत् ॥ ७ ॥
भा० टी० – फिर श्वानयोनि को भोग कर मनुष्य-रहित वन में शूकर की योनि को प्राप्त हुए और फिर मध्य देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुए ॥ ७ ॥
नन्दिग्रामफलाद्देवि धनधान्यसमन्वितः ।
परस्त्रीलम्पटाद्देवि पादपीडा प्रजायते ॥ ८ ॥
भा० टी० – नंदिग्राम में मृत्यु के कारण वह, धनधान्य से युक्त है— पर स्त्री-गमन करने से उसके पैरों में पीड़ा होती है ॥८ ॥
मद्यपानफलाद्देवि गर्भपातः पुनः पुनः ।
बह्वयः कन्याः प्रजाताश्च बहुस्त्रीगमनात्प्रिये!॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! मद्य पीने के के कारण से बार- बार गर्भ नष्ट हुए और बहुत - सी स्त्रियों से गमन करने के कारण बहुत - सी कन्या हुई॥९॥
पुत्रस्य मरणं देवि जातं वेश्याऽतिसंगमात् ।
पूर्वजन्मकृतं पापं पुण्यं च गिरिजे वरे!॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! अत्यधिक वेश्या- संग करने से उसके पुत्र का मरण हुआ हे गिरिजे! हे वरे! पूर्वजन्म में किया हुए पाप और पुण्य ॥ १० ॥
मानुषैर्भुज्यते सर्वं मृत्युलोके सुरेश्वरि! अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि यथार्थं शृणु भामिनि ॥ ११ ॥
भा० टी० - मनुष्यों द्वारा मृत्युलोक में भोगे जाते हैं हे सुरेश्वरि! इस पाप की
शांति के लिए यथार्थ उपाय कहता हूँ । हे भामिनी! तुम सुनो ॥ ११ ॥
गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय समर्पयेत्॥ १२ ॥
भा० टी० - अपने घर के धन में से आठवें भाग का दान किसी ब्राह्मण को दें ॥१२ ॥
वापीकूपतडागेषु जीर्णोद्धारः प्रयत्नतः ।
माघकार्तिकवैशाखे श्रावणे च विशेषतः ॥ १३ ॥
भा० टी० - बावड़ी - कूप तथा तलाब इनका प्रयत्नपूर्वक जीर्णोद्धार करें माघ, कार्तिक, वैशाख, श्रावण, इन महीनों में ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १४५
प्रत्यब्दं भोजयेद्विप्रान् श्रोत्रियान्वेदपारगान् ।
गायत्रीजातवेदाभ्यां द्विलक्षं जपमाचरेत् ॥ १४ ॥
भा० टी० - प्रतिवर्ष वेदों में पारंगत पवित्र ब्राह्मणों को भोजन करवायें और गायत्री तथा जातवेदसे० इन मंत्रों का जप दो लाख की संख्या में करवायें ॥ १४ ॥
जपतो हवनं तद्वत्तर्पणं मार्जनं तथा ।
महाभारतमाख्यानं श्रुत्वा पापं व्यपोहति ॥ १५ ॥
भा० टी० - दशांश हवन तथा दशांश तर्पण तथा दशांश मार्जन करायें और महाभारत का श्रवण करने से सब पाप दूर हो जाते हैं ॥ १५ ॥
दशवर्णाः प्रदातव्याः पूर्वपापविशुद्धये ।
एवंकृते वरारोहे सर्वरोगः प्रणश्यति ॥ १६ ॥
भा० टी० – फिर पहले दश वर्णों वाली गौओं का दान पूर्व पाप की शुद्धि के लिये देना चाहिए और हे वरारोहे! ऐसा करने से सब रोग दूर होते हैं ॥ १६ ॥
पुत्रो भवति भो देवि वन्ध्यात्वं च प्रणश्यति ।
काकवन्ध्या च या नारी पुनः पुत्रमवाप्नुयात्॥ १७ ॥
भा० टी० – इसप्रकार पुत्र की उत्पत्ति होती है और वन्ध्यापन दूर होता है, ऐसी काकवन्ध्या नारी फिर पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १७ ॥
कन्यका नैव जायन्ते धनवृद्धिर्भवेत्किल ।
पूर्वजन्मकृतं पापं क्षयं याति न चान्यथा ॥ १८ ॥
भा० टी ० – उसकी कन्या नहीं होती है, धन की वृद्धि निश्चय हो जाती है और पूर्वजन्म- कृत पाप नष्ट होते हैं इसमें अन्यथा नहीं है ॥ १८ ॥
इह जन्मनि शं भुङ्क्ते पुनः पापं न बाधते । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे मघानक्षत्रद्वितीयचरण- प्रायश्चित्तकथनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
भा० टी० — इस जन्म में वह सुख भोगता है, फिर उसको पाप बाधा नहीं देते हैं ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पार्वतीहर० मघानक्षत्रस्य द्वितीचरण- प्रायश्चित्तकथनं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
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॥ ४२ ॥
मघानक्षत्रस्य तृतीचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यायां विशालाक्षि कुलालो वसति प्रिये! ।
मथुराग्राममध्ये वै स्वकर्मनिरतः सदा ॥१ ॥
भा० टी० – महादेवजी कहते हैं - हे विशालाक्षि! अयोध्यापुरी में मथुरा नाम के मध्य एक ग्राम में कुलाल अर्थात् कुम्हार जाति का एक व्यक्ति अपने में कर्म में सदा रत रहता था ॥ १ ॥
पात्रं वै मृन्मयं देवि प्रकरोति तदा प्रिये! ।
तस्य मित्रं समायातो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥२ ॥
भा० टी० - हे प्रिये! वह मृत्तिका के पात्र बनाया करता था, उसका मित्र एक वेद पाठ करने वाला ब्राह्मण उसके पास आया ॥ २ ॥
तस्य स्त्री च महादुष्टा ब्राह्मणी व्यभिचारिणी ।
कुलालेनाभवत्प्रीतिर्मैथुनं प्रकरोति सा ॥ ३ ॥
भा० टी० – वहाँ उस ब्राह्मण की स्त्री महादुष्टा और व्यभिचारिणी थी, वह कुलाल के साथ प्रीति और मैथुन करती थी ॥ ३ ॥
ब्राह्मण्यां गमनं नित्यं बहुवर्षे निरन्तरम् ।
एवं बहुगते काले समतीते सुरेश्वरि! ॥४ ॥
भा० टी ० - हे सुरेश्वरि! ब्राह्मणी से गमन करते हुए बहुत से वर्ष उस कुलाल के व्यतीत होते गये ॥ ४ ॥
कुलालस्य ततो मृत्युर्वृद्धे जाते सुरेश्वरि! पश्चात्तस्य मृता पत्नी या पुरा व्यभिचारिणी ॥५ ॥
भा० टी० - फिर हे सुरेश्वरि! बुढापा होने के कारण उस कुलाल की मृत्यु हुई, पश्चात् वह व्यभिचारिणी ब्राह्मणी स्त्री भी मर गयी ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १४७
यमदूतैर्महाघोरैः कर्दमे नरके प्रिये! ।
यमाज्ञया च निक्षिप्तो वर्षं लक्षत्रयं शुभे! ॥ ६ ॥
भा० टी० - फिर हे प्रिये! हे शुभे! यमराज के दूतों ने यम की आज्ञा से उस कुलाल को महाघोर कर्दम नरक में डाल दिया । वहाँ उसके तीन लाख वर्ष व्यतीत हुए ॥ ६ ॥
पतिव्रता समायाता लक्षत्रयगते सति ।
नरकाब्धेः समुद्धृत्य स्वपतिं च ततः प्रिये! ॥ ७ ॥
सत्यलोके समायाता स्वपत्या सह भामिनी ।
भुक्त्वा लक्षत्रयं देवि भोगांश्च विविधानपि ॥८ ॥
भा० टी० - फिर तीन लाख वर्ष व्यतीत होने पर उसकी वह पतिव्रता स्त्री भी वहाँ नरक में आ गयी फिर हे प्रिये! हे भामिनि! नरकाब्धि से दोनों का उद्धार हो कर सत्यलोक को प्राप्त हुए जहाँ तीन लाख वर्षों तक वे भोगों को अनेक प्रकार से भोगते गये ॥ ७॥ ८ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते धवेन सह शोभने ।
मर्त्यलोके ततो जातो धनधान्ययुतो तदा ॥ ९ ॥
भा० टी० – फिर पुण्यक्षय होने पर हे सुशोभने! मर्त्यलोक में दोनों का जन्म हुआ और वे धनधान्य से युक्त होते गये ॥ ९ ॥
पुत्रकन्याविहीनश्च मृतवत्सत्वमाप्तवान्।
ब्राह्मण्यां गमनाद्देवि बहुरोगश्च जायते ॥ १० ॥
भा० टी० — मृत्युलोक में पुत्र और कन्या से रहित मृत हैं, उसके बच्चे जीते नहीं हैं और ब्राह्मणी के संग गमन करने के कारण उसके शरीर में बहुत रोग हो गये हैं ॥१० ॥
अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गिरिजे शुभे! सर्वस्वदानं कर्तव्यं रुद्रमन्त्रजपं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी० --अब हे गिरिजे! हे शुभे! मैं शांति को कहता हूँ तुम श्रवण करो । घर के संपूर्ण धन का दान, तथा रुद्र- मंत्र का जप करें ॥ ११ ॥
पूजा कार्या पार्थिवानां वाटिकारोपणं तथा ।
हरिवंशश्रुतिः कार्या भूमिदानं तथैव च ॥ १२ ॥
भा० टी० — पार्थिवपूजन, धर्मशाला आदि की स्थापना, हरिवंश पुराण का श्रवण, भूमिदान करें ॥ १२ ॥
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१४८ कर्मविपाकसंहिता गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षं जाप्यं तथा प्रिये! होमं च कारयेद्देवि तिलधान्यादितण्डुलैः ॥ १३ ॥
भा० टी० – गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें और हे देवि! तिल, जौ, चावल, घृत- इन्हें इकट्ठा कर कुण्ड में हवन करायें ॥ १३ ॥
कुण्डे कुर्याद्विजद्वारा चतुष्कोणे सुरेश्वरि! ।
दशांशं हवनं देवि विधिवत्पापशुद्धये ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे सुरेश्वरि! चौकोर कुंड में दशांश हवन, दशांश तर्पण, दशांश मार्जन विधिवत् करायें ॥ १४ ॥
दशवर्णास्ततो दद्यात् स्वर्णनिष्कचतुष्टयम् ।
ब्राह्मणान्भोजयेत् शुद्धान् षष्टिः पायसलड्डुकैः ॥ १५ ॥
भा० टी० - दश वर्ण वाली गौओं का दान स्वर्ण की चार मोहरों का दान दें ब्राह्मणों को खीर और लड्डुओं का भोज दें ॥ १५ ॥
भूमिदानं ततः कुर्यात्तिलं दद्यात्प्रयत्नतः ।
एवं कृते न संदेहो वंशो भवति नान्यथा ॥ १६ ॥
भा० टी० - तथा यत्न से भूमि और तिल का दान दें, इसप्रकार वंश - वृद्धि अर्थात् पुत्र- प्राप्ति होती है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १६ ॥
सर्वे रोगाः क्षयं यान्ति न च कन्यां प्रसूयते ।
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं मृतवत्सा च पुत्रिणी ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे मघानक्षत्रस्य तृतीचरणेप्रायश्चित्तकथनं नामद्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
भा० टी० - और सब रोग दूर होते हैं, कन्या संतान नहीं होती है, काकवंध्या स्त्री पुत्र को प्राप्त करती है और मृतवत्सा स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १७ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां मघा० नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
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॥४३ ॥
मघानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
काञ्चीपुर्यां महादेवि वैश्य एकोऽवसत्पुरा ।
मेदसिन्द इति ख्यातस्तस्य स्त्री पालिका शुभा ॥ १ ॥
भा० टी ० — शिवजी कहते हैं - हे देवि! पहले कांचीपुर नामक नगर में मेदसिंद नामक एक वैश्य और पालिका नाम वाली उसकी स्त्री रहती थी ॥१ ॥
अश्वादिविक्रयं देवि छागपक्ष्यादिकं तथा ।
प्रत्यहं क्रियते देवि बहुद्रव्यस्य संचयम् ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! वह घोड़ा, बकरी, पक्षी आदि को बेचने से द्रव्य - संग्रह करता था ॥ २ ॥
न देवान् मन्यते देवि पितॄन्नैव च मन्यते ।
बहुष्वहस्सु गच्छत्सु प्रमृतौ पितरौ ततः ॥ ३ ॥
भा० टी० — हे देवि! वह देवताओं को तथा पितरों को नहीं मानते थे और बहुत से दिन व्यतीत होते गये तब उसके माता -पिता मर गये ॥ ३ ॥
स तयोर्नाकरोच्छ्राद्धं यत्कर्तव्यं सुतैः प्रिये! ततो बहुदिने याते वृद्धे सति वरानने! ॥ ४ ॥
भा० टी ० — हे प्रिये! जो पुत्रों द्वारा पिता का श्राद्धकर्तव्य है, वह भी उसने नहीं किया । इसप्रकार हे वरानने! बहुत से दिन व्यतीत होने पर वृद्धत्व को प्राप्त हो गया ॥ ४ ॥
मरणं तस्य वै जातं वैश्यस्य कृपणस्यच ।
यमाज्ञयातु दूतेन कुम्भीपाके सुदारुणे ॥ ५ ॥
भा० टी० – फिर उस कृपण वैश्य की मृत्यु हुई और यमराज के दूतों ने आज्ञा पाकर उसे दारुण अर्थात् कठोर नरक में गिरा दिया ॥ ५ ॥
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१५० कर्मविपाकसंहिता
निक्षिप्तं शृङ्खलैर्बध्वा युगपञ्चदशं समाः ।
भुक्त्वा नरकजं दुःखं महाकृमिसमाकुलम्॥ ६ ॥
भा० टी० – श्रृंखला अर्थात् शांकलों से बाँधकर उसे बड़े कृमियों से युक्त नरक में उसे डाला, जहाँ उसने पन्द्रह युगों तक दुःखों को भोगा ॥ ६ ॥
नरकान्निःसृतो देवि महिषत्वं ततोऽलभत् ।
पुनर्वै व्याघ्रयोनिश्च मूषयोनिस्ततोऽभवत्॥ ७ ॥
भा० टी० – हे देवि! नरक से निकलकर महिषी अर्थात् भैंसे की योनि को प्राप्त हुआ, फिर बाघ की तथा बाद में चूहे की योनिको प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
काकयोनिं ततो भुक्त्वा गजयोनिस्ततोऽभवत् ।
शुभे देशे विशालाक्षि धनधान्यसमन्वितः ॥ ८ ॥
भा० टी० — फिर काक योनि को भोग कर हाथी की योनि को प्राप्त हुआ । फिर हे देवि! शुभ देश में धनधान्य से युक्त हो कर मनुष्य की योनि में पैदा हुआ ॥ ८ ॥
व्याधिग्रस्तोऽभवद्देवि पुत्रकन्याविवर्जितः ।
काकवन्ध्या भवेन्नारी मृतवत्सा ह्यपुत्रिणी॥९ ॥
भा० टी ० — और हे देवि! व्याधि से पीड़ित पुत्र और कन्या से ही रहित है, इसकी स्त्री काकवन्ध्या अथवा मरने वाले पुत्रों की उत्पत्ति करने वाली पुत्रहीन है ॥९ ॥
पूर्वजन्मकृतं पापं यतः शान्तिमवाप्नुयात् ।
तत्सर्वं शृणु मे देवि विस्तरेण समन्वितम् ॥ १० ॥
भा० टी० — हे देवि पूर्वजन्म के पाप से कैसे शांति को प्राप्ति हो, इसको विस्तार से युक्त कहता हूँ तू श्रवण कर ॥ १० ॥
प्रयागे नियतः स्नायी प्रतिमाघं भवेद्यदा ।
गायत्रीजातवेदाभ्यां दशायुतजपं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी० - नियम से प्रयाग में स्नान तथा माघ में प्रयाग-स्नान, गायत्री - मंत्र तथा जातवेदसे० इस मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ ११ ॥
भूमिदानं च वै कृत्वा ततः पुत्रः प्रजायते ।
वन्ध्यत्वं शमनं याति काकवन्ध्यात्वमप्यथ ॥ १२ ॥
भा० टी० - और भूमि का दान कराने से पुत्र की प्राप्ति होती है तथा वंध्यापन, काक- वन्ध्यापन – ये भी दूर होते हैं ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १५१
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरंजीविनमुत्तमम् ।
सर्वे रोगाः क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे मघानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामत्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
भा० टी० - और मृतवत्सा चिरकाल तक जीने वाले उत्तम पुत्र को प्राप्त करती है और सब रोग नष्ट होते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्व० मघा० चतुर्थ० नामत्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
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11 88 11 पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
सौराष्ट्रविषये देवि शोभनं नामवै पुरम् ।
तत्र क्षत्री वसत्येको धनधान्यसमन्वितः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! सौराष्ट्र देश में शोभन नाम वाला पुर होता था, वहाँ एक क्षत्रिय धनधान्य से युक्त होकर निवास करता था ॥ १ ॥
मोहनेति च विख्यातस्तस्य पत्नी सती शुभा ।
वैश्यवृत्तिरतो नित्यं व्यापारं कुरुते सदा ॥ २ ॥
भा० टी० - वह मोहन नाम से विख्यात और शुभ लक्षणों वाली सती उसकी पत्नी ऐसे वह क्षत्रिय वैश्यवृत्ति में रत होकर व्यापार करता था ॥ २ ॥
व्यापारार्थं ततो देवि वृषभा बहुपालिताः ।
द्वौ वृष योजितौ देव कूपे वै पतितौ प्रिये! ॥ ३ ॥
भा० टी० — हे देवि! व्यापार के लिए उसने दो बैल पाले । हे प्रिये! वे बैल उसने कूपके जल निकालने के लिए युक्त किये वे बैल कुएँ में पड़ गये ॥ ३ ॥
मृतौ तौ रात्रिकालेपि जगाम स तदा नच ।
पापं च स न जानाति गर्वद्वारा वरानने ॥ ४ ॥
भा० टी० — फिर हे देवि! कुएँ में पड़ कर रात्रि में उन बैलों की मृत्यु हो गयी तब वहाँ वह गया भी नहीं और वह गर्व में प्राप्त होकर उनके मरने के पाप को नहीं मानता था ॥ ४ ॥
यत्किंचित्क्रियते कर्म शुभं तु कलुषं बहु ।
गुणाः स्वल्पा बह्वगुणा मोहनं नाम क्षत्रिणः ॥ ५ ॥
भा० टी० — वह मोहन नामक क्षत्रिय जिसने शुभ कर्म तो थोड़े और पाप बहुत ।
गुण थोड़े, अगुण बहुत किये ॥ ५ ॥