कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 161–170
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 161–170
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कर्मविपाकसंहिता १५३
ततो बहुगते काले मरणं तस्य चाऽभवत् ।
पश्चान्मृता तस्य पत्नी महालुब्धा वरानने! ॥ ६ ॥
भा० टी० – ऐसे बहुत काल बीतने पर उसकी मृत्यु हुई हे वरानने! पीछे महालोभ से युक्त उसकी स्त्री की भी मृत्यु हो गई ॥ ६ ॥
निक्षिप्तो नरके घोरे यमदूतैर्यमाज्ञया ।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ७ ॥
भा० टी ० — फिर वह क्षत्रिय यम के दूतों द्वारा यम की आज्ञा से साठ हजार वर्षों तक घोर नरक में डाला गया ॥ ७ ॥
पुनः सरटयोनिश्च वृषयोनिस्ततोभवत् ।
मानुषत्वं ततो देवि मध्यदेशे वरानने ॥ ८ ॥
भा० टी० — वह वहाँ से निकल सरट अर्थात् छिपकली की योनि को प्राप्त हुआ फिर बैल की योनि को प्राप्त होकर हे देवि हे! वरानने! मध्यदेश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥
वृषयोश्च पुरा मृत्युर्न कृतं पापमोचनम् ।
तस्माद्व्याधिः समुत्पन्नः पूर्वकर्मप्रयत्नतः ॥ ९ ॥
भा० टी० – ऐसे पहले कर्म के प्रसंग से बैलों की मृत्यु होने पर भी पाप-मोचन नहीं किया, जिससे शरीर में व्याधि हुई ॥ ९ ॥
मुखरायाऽभवत्पत्नी पुरा च प्रबला प्रिये! ।
पुनर्विवाहिता देवि तद्रूपा मुखरा तथा ॥ १० ॥
भा० टी० - और हे देवि! उसकी पत्नी मुखरा अर्थात् वाचाल और प्रबला थी, सो अब उससे पुनर्विवाहिता हो कर वैसी ही हो गयी है ॥ १० ॥
तत्पापशमनार्थाय षडंशं दानमाचरेत् ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण पञ्चलक्षजपं यदा ॥ ११ ॥
भा० टी० – उस पाप की शांति के लिए अपने घर के द्रव्य का छठा भाग दान करें और ५ लाख गायत्री के मूल मंत्र का जप करवायें ॥ ११ ॥
ततः पापं क्षयं याति शीघ्रं पुत्रो भवेत् प्रिये! अपुत्रा मृतवत्सा च काकवन्ध्या च या शिवे! ॥ १२ ॥
भा० टी० - तब हे प्रिये! पाप दूर होकर पुत्र की प्राप्ति शीघ्र होती है और हे शिवे! बिना पुत्र वाली, मरने वाले पुत्रों वाली, काकवन्ध्या ॥ १२ ॥
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१५४ कर्मविपाकसंहिता
पुत्रियश्चैव ताः सर्वा नात्र कार्या विचारणा ।
रोगाः सर्वे विनश्यन्ति शीघ्रमेव न संशयः ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
भा० टी० - उपर्युक्त ये सब पुत्रों वाली होती हैं इसमें कुछ विचार नहीं करना और सब रोग शीघ्र नाश को प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वान० प्रथम० नामचतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
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॥ ४५ ॥
पूर्वानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
कर्णाटविषये देवि काष्ठकारोवसत्पुरा ।
छिनत्ति सर्वकाष्ठानि व्ययं कृत्वा दिने दिने ॥ १ ॥
भा० टी० -शिवजी कहते हैं - हे देवि! कर्णाटदेश में पहले एक लकड़हारा रहता था, वह लकड़ी काटकर प्रतिदिन बेचा करता था ॥१ ॥
एका वै गोत्रजा कन्या तस्यां च मैथुनं कृतम् ।
ततो बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्पुरा ॥ २ ॥
भा० टी० - उसने अपने गोत्र की कन्या से मैथुन किया, तब बहुत समय बीतने पर उसकी मृत्यु हो गयी ॥२ ॥
पश्चात्तस्य मृता नारी कुलटा व्यभिचारिणी ।
यमदूतैर्महाघोरैर्निक्षिप्तो नरकार्णवे ॥ ३ ॥
भा० टी००.- पश्चात् व्यभिचारिणी कुलटा उसकी स्त्री की भी मृत्यु हो गयी फिर यमराज के दूतों ने आज्ञा पाकर उन्हें घोर नरक रूपी समुद्र में डाला ॥३ ॥
यमाज्ञया महादेवि भुक्त्वा नरकयातनाम्।
षष्टिवर्षसहस्राणि नरके पच्यते च सः ॥ ४ ॥
भा० टी ० — हे देवि! यम की आज्ञा से नरक के दुःखों को भोग कर साठ हजार वर्षों तक वह नरक में कर्मफल भोगता रहा ॥४ ॥
कुक्कुटत्वं ततो जातं चक्रवाकस्तततोऽभवत् ।
मानुषत्वं ततो जातं देशे पूज्यतमे तथा ॥ ५ ॥
भा० टी० – कुक्कुट अर्थात् मुरगा की योनि को प्राप्त हुआ फिर चक्रवाक अर्थात् चकुवा की योनि को प्राप्त हुआ फिर पुण्य युक्त देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥५ ॥
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१५६ कर्मविपाकसंहिता
शूद्रसेवारतो नित्यं शूद्रस्नेहेन यन्त्रितः ।
पितुर्मातुर्भवेद्वैरं महिष्याः क्रयविक्रये ॥६ ॥
भा० टी० - शूद्र - सेवा में रत और शूद्र -स्नेह में सदा प्रीति युक्त होकर माता-पिता से वैर और महिष्यादि के क्रयविक्रय अर्थात् बेचने का व्यवहार करता है ॥ ६ ॥
पूर्वजन्मनि भो देवि कृतं वृक्षस्य च्छेदनम् ।
तस्माद्रोगः समुत्पन्नः कटिशूलं निरन्तरम्॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म में उसने वृक्ष का छेदन किया उस पाप से रोग युक्त शरीर पैदा हुआ और निरंतर कटि में शूल रोग रहता ॥ ७ ॥
गोत्रकन्याभिगमनं यत्कृतं पूर्वजन्मनि ।
तेन पापेन भो देवि पुत्रस्य मरणं भवेत्॥ ८ ॥
भा० टी० - और हे देवि! पहले जन्म में अपने गोत्र की कन्या से गमन करने से उसका पुत्र होकर मर गया ॥ ८ ॥
गर्भस्त्रावी ततो भार्या काकवन्ध्यात्वमाप्नुयात् ।
बह्वयः कन्यास्ततो जाताः कष्टं प्राप्नोत्यहर्निशम्॥ ९ ॥
भा० टी० – फिर उसकी भार्या का गर्भ खंडित होकर वह काकवन्ध्यापन को प्राप्त हुई फिर बहुत सी कन्याएँ हुईं ऐसे रात दिन कष्ट को प्राप्त हुए॥९॥
अतः शान्तिं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापविशुद्धये ।
गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ १० ॥
भा० टी० — अब उस पाप की शुद्धि करने के लिए शांति को कहता हूँ, घर के द्रव्य का आठवाँ भाग ब्राह्मण को दान करें ॥ १० ॥
गायत्रीलक्षजाप्येन गोदानेन विशेषतः ।
वाटिकारोपणेनापि गृहदानेन वै शिवे! ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे शिवे! गायत्री के लक्ष जप से तथा विशेष करके गोदान और धर्मशाला तथा घर का दान करने से ॥ ११ ॥
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ।
पूर्वजन्मकृतं पापं क्षयं याति न संशयः ॥ १२ ॥
भा० टी० – सब रोग नाश को प्राप्त होते हैं, इसमें कुछ विचार नहीं करना, ऐसे पिछले जन्म के पाप नष्ट होते हैं, इसमें संशय नहीं ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १५७
जायन्ते बहवः पुत्राः शूराः कीर्तिविवर्द्धनाः ।
कन्यका नैव जायन्ते काकवन्ध्या तु शाम्यति ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वानक्षत्रस्यद्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
भा ० टी० - और बड़े शूर- वीर कीर्ति के बढ़ाने वाले पुत्रों का जन्म होते है तथा कन्या का जन्म होता ही नहीं, काकवन्ध्यापन की शांति होती है ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पूर्वा० नामप्रायश्चित्तकथनंनाम पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
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॥४६ ॥
पूर्वानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ सिंहले वै महाद्वीपे तत्र सिंहपुरं शिवे! कायस्थो वैष्णवोऽप्येकष्टीकारामेति नामतः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे शिवे! सिंहलद्वीप के मध्य सिंह नाम से विख्यात एक पुर है, जिसमें एक कायस्थ विष्णुभक्त टीकाराम नाम वाला व्यक्ति रहता था ॥१ ॥
तस्य भार्या विशालाक्षी सूर्यानाम्नी शुभा सती ।
आतिथ्यकरणे शक्ता देवतात्यन्तपूजिका ॥ २ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री सुंदर नेत्रों वाली शुभलक्षणा बड़ी श्रेष्ठ सूर्य्या नाम से विख्यात थी और अभ्यागत के पूजन करने में प्रवृत्त देवताओं का अति पूजन करने वाली हुई ॥ २ ॥
कार्तिके माघवैशाखे दीपदानं करोति सा ।
कदाचिद्दैवयोगेन तीर्थयात्रार्थमागता ॥ ३ ॥
भा० टी००.- वह कार्तिक, माघ, वैशाख – इन महीनों में दीपदान किया करती थी, कभी देव योग से वह तीर्थ यात्रा के लिए तीर्थ को गई ॥ ३ ॥
स्वर्णकारो महादेवि बहुस्वर्णेन संयुतः ।
आगतः सिंहनगरे तत्र वासमकारयत् ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे देवि! एक स्वर्णकार बहुत से स्वर्ण से युक्त होकर सिंहल नामक उस पुर में आकर रहने लगा ॥ ४ ॥
प्रीतिः परस्परं चैव कायस्थस्वर्णकारयोः ।
स्वर्णकारस्य कन्यैका सुन्दरी कमलानना ॥ ५ ॥
भा० टी० - वहाँ स्वर्णकार और कायस्थ की आपस में महा प्रीति हो गयी और स्वर्णकार की एक सुंदरी कमल के समान नेत्रों वाली पुत्री थी ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १५ ९ कायस्थस्याभवद्भार्या दैवयोगात्तदा शिवे! स्वर्णकारस्य यत्सर्वं स्थितं तेन हृतं धनम् ॥ ६ ॥
भा० टी० - हे शिवे! वह दैवयोग से कायस्थ की भार्या हो गयी, और स्वर्णकार के घर में जितना द्रव्य था वह सब कायस्थ के ही घर को चला आया ॥६ ॥
द्रव्यक्षयमथो ज्ञात्वा स्वर्णकारो मृतः पुरा ।
पुत्रदारादिकं त्यक्त्वा कायस्थश्च तदा शिवे! ॥ ७ ॥
भा० टी० - वह स्वर्णकार द्रव्य के नाश को जान कर दुःखी हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गया, तब वह कायस्थ पुत्र और स्त्री इत्यादि को त्याग कर ॥ ७ ॥
तया सार्द्धं रमत्येको पापात्मा कमलानने! एवं बहुगते काले कायस्थोऽपि मृतः प्रिये! ॥ ८ ॥
भा० टी० - उस स्वर्णकार की कन्या से ही रमण करता रहा ऐसे बहुत से दिन व्यतीत होने पर हे कमलानने! कायस्थ भी मृत्यु को प्राप्त हो गया ॥ ८ ॥
कुम्भीपाकेऽभवद्वासो वर्षलक्षत्रयं तथा ।
पुनः कर्मवशाद्देवि मृगयोनिस्ततोऽभवत्॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! उसका कुंभीपाक नामक नरक में वास हो गया और तीन लाख वर्ष पर्यंत नरक को भोग कर फिर मृग की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥
मानुषत्वं वरारोहे पुनः प्राप्तो महीतले ।
धनधान्यसमायुक्तो वंशो नैव प्रजायते ॥ १० ॥
भा० टी ० — फिर हे वरारोहे! भूमि पर मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर धनधान्य से युक्त किन्तु वंश से हीन हो गया ॥ १० ॥
बहुरोगसमायुक्तो ज्वरोऽतीव मृतेः समः ।
पुत्राणां मरणं देवि शीतलाद्यैरुपद्रवैः ॥ ११ ॥
भा० टी० – वह बहुत रोगों से युक्त, मृत्यु के तुल्य ज्वर से पीड़ित है और उसके पुत्रों का मरण शीतला आदि महामारियों से हो गया है ॥ ११ ॥
पूर्वजन्मनि भो देवि परस्त्रीगमनं कृतम् ।
त्यक्ता विवाहिता नारी पुत्रकन्यासमन्विता ॥ १२ ॥
भा० टी० — हे देवि! पिछले जन्म में परस्त्री -गमन करने से और पुत्र-कन्या-समेत अपनी स्त्री का त्याग करने से ॥ १२ ॥
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१६० कर्मविपाकसंहिता
तत्पापेनैव भो देवि पुत्रादीनां विनाशनम् ।
गर्भनाशो भवेद्देवि वन्ध्यात्वं जायते शिवे! ॥ १३ ॥
भा० टी० - हे देवि! उस पाप के प्रभाव से पुत्रादिकों का मरण हुआ और हे देवि! गर्भ नष्ट होते हैं अथ्सवा हे शिवे! वन्ध्यापन को उसकी स्त्री प्राप्त होती है ॥ १३ ॥
काकवन्ध्या भवेन्नारी सुखं नैव प्रजायते ।
स्वल्पयोनिकृशाङ्गश्च कथाश्रवणतत्परः ॥ १४ ॥
भा० टी० — काकवन्ध्यापन को प्राप्त होती है उसको सुख नहीं होता है, फिर कृशांग और सूक्ष्म भोग वाला, कथाश्रवण करने में तत्पर ऐसा होता है ॥ १४ ॥
विद्यादानविहीनश्च स्वकुले बहुनिष्ठरः ।
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि कृतं यत्पूर्वजन्मनि ॥ १५ ॥
भा ० टी० — वह विद्या के दान से रहित अपने कुल में कष्ट देने वाला है । अब पूर्वजन्म में जो कुछ बुरा कर्म किया है, उस की शांति को कहता हूँ ॥ १५ ॥
तत्सर्वं शृणु मे देवि यतः शुद्धिमवाप्नुयात् ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं वरानने!॥ १६ ॥
भा० टी० — हे देवि! उस सबका तुम श्रवण करो जिस संसार के जन सिद्धि को प्राप्त हों, हे वरानने! गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ १६ ॥
हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ।
हरिवंशश्रुतिं कुर्य्यात् त्रिवारावृत्तिसंख्यया ॥ १७ ॥
भा० टी० - उसके दशांश हवन, दशांश तर्पण, दशांश मार्जन करायें और तीन आवृत्ति से युक्त हरिवंश का श्रवण करें ॥ १७ ॥
दशवर्णां ततो दद्यात्स्वर्णदानं विशेषतः ।
निष्कत्रयं प्रदद्याच्च ततः पापक्षयो भवेत्॥ १८ ॥
भा० टी० - और दशवर्ण वाली गौओं का दान तथा विशेषकर स्वर्ण का दान और सुवर्ण के तीन मोहरों का दान करने से पापों का नाश होता है ॥ १८ ॥
भोजयेद्ब्राह्मणान्षष्टिं तथा दद्याच्च दक्षिणाम् ।
एवं कृते विधाने च पुत्रो भवति नान्यथा ॥ १ ९ ॥
भा० टी० - और साठ ब्राह्मणों को भोजन करायें और उन्हीं को दक्षिणा दें ऐसे विधानपूर्वक करने से निश्चय ही पुत्र की उत्पत्ति होती है यह अन्यथा नहीं है ॥ १ ९ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १६१
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ।
एवं यदा न कुर्यात्तु तदा रोगाः पुनः पुनः ॥ २० ॥
भा० टी० – और सब रोग नाश को प्राप्त होते हैं इसमें कुछ भी विचार नहीं करना है और जो ऐसा नहीं करें तो बार - बार शरीर में रोग पैदा होते हैं ॥ २० ॥
जायन्ते नात्र संदेहः पूर्वजन्मफलात्किल । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
भा० टी० - इसमें संशय नहीं यह निश्चय ही पूर्वजन्म का फल है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे तृतीयचरणेप्रायश्चित्तकथनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
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1180 11 पूर्वानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ नर्मदादक्षिणे कूले ब्राह्मणो वसति प्रिये! ब्रह्मकर्मकरो नित्यं सदा वेदपरायणः ॥ १ ॥
भा० टी० - हे प्रिये! नर्मदा के दक्षिण तीर पर एक ब्राह्मण वास कहता था, वह ब्रह्म कर्म में नित्य रत रहता था, सर्वदा वेद में परायण रहता था ॥ १ ॥
शंकरस्य पुरे देवि प्रत्यहं वेदपाठनम् ।
अर्भकान्ब्रह्मजातीयान्पाठयामास वै तदा ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! महादेव की पुरी में नित्य प्रति वेद पढ़ाया करता था और ब्रह्म जातीय बालकों को पढ़ाया करता था ॥२ ॥
तस्य भार्याद्वयं चासीदेका प्रीतिमती सदा ।
विरोधिनी ततो ह्येका ज्येष्ठा भार्या तु तां त्यजेत्॥ ३ ॥
भा० टी० – उनकी दो भार्याएँ थीं, जिन में से प्रीतियुक्त एक थी और दूसरी विरोध से युक्त थी, वह बड़ी थी उसने उसका त्याग कर दिया ॥ ३ ॥
एवं बहुगते काले ब्राह्मणस्य तदा शिवे! ।
ततो मृत्युवशं यातस्तस्य भार्या गरीयसी ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे शिवे! ऐसे बहुत काल व्यतीत होने पर उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी, जो उसकी श्रेष्ठ भार्य्या थी ॥ ४ ॥
चितां कृत्वा प्रयत्नेन भर्तुः खलु वराननेऽ! ।
सहच भो देवि सती जाता महामतिः ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! हे वरानने! यत्न से चिता बनाकर वह पति के साथ सती हो गयी ॥ ५ ॥
सत्यलोकस्त्वभूत्तस्य जायया सहितस्य वै ।
बहुवर्षसहस्राणि सत्यलोकेऽवसत्तदा ॥ ६ ॥