कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 171–180
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 171–180
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कर्मविपाकसंहिता १६३ भा० टी० — तब स्त्री के सहित उसको सत्य लोक की प्राप्ति हुई और अनेक हजारों वर्षों तक वह सत्यलोक में वास करता रहा ॥ ६ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोकेऽभवत्पुनः ।
मानुषत्वं शुभे जन्म कुले महति पूजिते ॥ ७ ॥
भा० टी० - फिर वहाँ पुण्यक्षीण होने पर मनुष्य-लोक में उसका जन्म हुआ, सब जनों से पूजित, शुभ लक्षणों से युक्त उसका उत्तम कुल में जन्म हुआ ॥ ७ ॥
धनधान्यसमायुक्तो वंशहीनो विचक्षणः ।
पूर्वजन्मनि भो देवि भार्य्यात्यागः कृतस्तथा ॥ ८ ॥
भा० टी ० — और हे देवि! धनधान्य से युक्त, बुद्धिमान् वह वंश से रहित होता गया है, क्योंकि उसने पिछले जन्म में भार्य्या का त्याग किया था ॥ ८ ॥
तेन दोषेण भो देवि ततः पुत्रो न जीवति ।
दिने दिने कुक्षिपीडा तस्य चाऽभिनवा भवेत् ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! उस दोष से पुत्र न उसका हुआ और प्रतिदिन उसकी कोख में नवीन पीड़ा होती रहती है ॥ ९ ॥
पुण्यं शृणु महादेवि यतः शान्तिर्भविष्यति ।
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! अब मैं उसकी शांति के प्रायश्चित को कहता हूँ तुम श्रवण करो घर के द्रव्य में से छठा भाग पुण्य हेतु दान करें ॥ १० ॥
वापीकूपतडागांश्च पथि मध्ये च कारयेत् ।
गायत्रीजातवेदाभ्यां जपं कुर्याद्विचक्षणः ॥ ११ ॥
भा० टी ० – बावड़ी, कूप, तलाब को मार्ग के मध्य में बनायें तथा गायत्री और जातवेद० इन मंत्रों का जप बुद्धिमान् जन करायें ॥ ११ ॥
होमं च तद्दशांशेन तिलतण्डुलपायसैः ।
दशवर्णाः प्रदातव्या विप्राणां भोजनं शतम्॥ १२ ॥
भा० टी० - और दशांश हवन तिल, चावल, घृत तथा खीर इन से करायें और दशवर्ण वाली गौओं का दान करें और सौ ब्राह्मणों को भोजन करायें ॥ १२ ॥
एवं कृते न संदेहो वंशलाभो भवेदनु ।
व्याधेश्चैव प्रमुच्येत सत्यं सत्यं वरानने! ॥ १३ ॥
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१६४ कर्मविपाकसंहिता इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वानक्षत्रस्य चतुर्थचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
भा० टी० - ऐसा कराने से निश्चय ही वंश का लाभ होता है और हे वरानने!
व्याधि से भी छूट जाता है । यह सत्य है और सत्य ही है ॥ १३ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० पूर्वा० चतुर्थ० नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
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11 82 11 उत्तराफाल्गुनीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यानगरे देवि वैश्योऽवात्सीत्सुरेश्वरि! ।
स्वकर्मनिरतो दक्षो विष्णुभक्तिपरायणः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे सुरेश्वरि! हे देवि! अयोध्यानगरी में एक वैश्य रहता था, वह अपने कर्म में रत बड़ा चतुर और विष्णु भक्ति में परायण था ॥ १ ॥
धनधान्यसमायुक्तो विप्रसेवासु तत्परः ।
पत्नी तस्य वरारोहे सुन्दरी च पतिव्रता ॥ २ ॥
भा० टी ० — हे वरारोहे! धनधान्य से युक्त ब्राह्मणों की सेवा में रत उसकी स्त्री अतिसुंदर पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली थी ॥२ ॥
कश्चिन्मित्रं प्रियस्तस्य ब्राह्मणो वेदपारगः ।
प्रत्यहं निकटे तस्य बहु स्वर्णमुपार्जयेत् ।
ब्राह्मणोऽप्यात्मनः स्वर्णं ददौ वैश्याय वै शिवे! ॥ ३ ॥
भा० टी० - और कोई वेद का पाठ करने वाला ब्राह्मण उस वैश्य के समीप नित्य प्रति स्वर्ण को इकट्ठा किया करता था । हे शिवे! वह ब्राह्मण अपने स्वर्ण को उस वैश्य को ही देता था ॥ ३ ॥
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन वाराणस्यां गतस्स वै ।
गत्वा काश्यां वरारोहे शरीरं ब्राह्मणोऽत्यजत् ॥४ ॥
भा० टी० - और तीर्थ- यात्रा के प्रसंग से वह काशीजी में गया, वहीं काशीजी में उसने अपने शरीर को त्याग दिया ॥ ४ ॥
सर्वं वैश्येन तद्द्रव्यं भुक्तं बहुदिनोपरि ।
शरीरत्याजनाद्देवि पुण्यतीर्थे स्त्रिया सह ॥ ५ ॥
भा० टी० — हे देवि! उस वैश्य ने वह सब द्रव्य बहुत काल तक भोगा । और पवित्र तीर्थ पर शरीर त्यागने से वह वैश्य स्त्री सहित ॥ ५ ॥
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१६६ कर्मविपाकसंहिता
अयोध्यायां विशालाक्षि स्वर्गवासं तथाऽक्षयम् ।
दशपञ्चयुगं भुक्त्वा फलं चैव मनोहरम् ॥ ६ ॥
भा० टी ० — हे विशालाक्षि! अयोध्यापुरी में मरने से उसे अक्षय स्वर्गवास प्राप्त हुआ १५ युग वर्षों तक मनोहर उसके फल को भोगता रहा ॥ ६ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते मृत्युलोके सुरेश्वरि! कुले महति वै पूज्ये नरजन्म ततोऽभवत् ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे सुरेश्वरि! वहाँ पुण्य क्षीण होने पर वहाँ मृत्यु लोक में बड़ों से पूजित उत्तम कुल में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
धनधान्यसमायुक्तो विष्णुपूजासु तत्परः ।
ब्राह्मणस्यैव स्वर्णं हि न दत्तं वै गृहीतवान् ॥ ८ ॥
भा० टी० — वह धनधान्य से युक्त, विष्णुपूजा में रत है और ब्राह्मण का द्रव्य नहीं देने से तथा अपने आप ही भोगने से इस पाप के प्रभाव से ॥ ८ ॥
तस्मात्खलु वरारोहे पुत्रस्तस्य न जायते ।
शरीरे च महाकष्टं मध्ये मध्ये प्रजायते ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! उसके पुत्र नहीं हुआ और शरीर में महाकष्ट उसे मध्य-मध्य में होता है ॥ ९ ॥
तस्य चोत्तरफाल्गुन्याः प्रथमे चरणे शुभे ।
जन्म वै चाप्यऽभूद्देवि पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! उसका उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के पहले चरण में जन्म हुआ इससे पुत्र और कन्या से रहित हुआ ॥ १० ॥
अस्य पापस्य वै शान्तिं पुण्यं शृणु वरानने! हरिवंशश्रुतिं कुर्याद्वारमेकं च तत्परः ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे वरानने! इस पाप की पवित्र शांति का तुम श्रवण करो । एकबार सावधान होकर हरिवंश का श्रवण करें ॥ ११ ॥
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण दशायुतजपं तथा ॥ १२ ॥
भा० टी० – घर के द्रव्य में से छठे भाग को दान कर दें और गायत्री के मूल मंत्र का १०००० जप करायें ॥१२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १६७
होमं च तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ।
दशवर्णाः प्रदातव्याः स्वर्णयुक्ताश्च साम्बराः ॥ १३ ॥
भा० टी० - और उसके दशांश से हवन तथा दशांश से तर्पण तथा दशांश मार्जन करायें और दश वर्ण वाली गौओं का दान सुवर्ण और वस्त्रों से युक्त करके करें ॥ १३ ॥
भूमिदानं ततो देवि विप्राय विदुषे प्रिये! व्रतं सूर्यस्य वै कुर्य्यात्पल्या सह वरानने! ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे देवि! पृथिवी ( भूमि) का दान वेद ज्ञाता ब्राह्मण को करें और हे वरानने! स्त्री सहित आदित्य का व्रत करें ॥ १४ ॥
कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं सुवर्णं दक्षिणां ततः ॥ १५ ॥
भा ० टी ० – और पेठा तथा नारियल को पंचरत्न से युक्त कर सुवर्ण की दक्षिणा सहित गंगाजी के मध्य में दान कर दें ॥ १५ ॥
शय्यादानं प्रयत्नेन प्रकुर्यान्नियतेन्द्रियः ।
एवं कृते न संदेहः सर्वरोगो विनश्यति ॥ १६ ॥
भा० टी० - शुद्ध मन से जितेन्द्रिय होकर यतन से शय्या का दान करें ऐसा करने से सब रोग नष्ट होते हैं, इसमें संदेह नहीं ॥ १६ ॥
अपुत्रो लभते पुत्रं काकवन्ध्या सुतं लभेत् ।
मृतवत्सा सुतं सूते चिरंजीविनमुत्तमम् ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तरानक्षत्रस्य प्रथमचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
भा० टी० - इसप्रकार बिना पुत्र वाले पुत्र को प्राप्त करते हैं और काकवन्ध्या स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है मरने वाले पुत्रों वाली स्त्री भी बहुत काल तक जीवत रहने वाले पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० नामाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
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॥४ ९ ॥ उत्तराफाल्गुनीनक्षत्र द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पुरुषोत्तमपुरे रम्ये स्वर्णकारोऽवसत्पुरा ।
स्वकर्मनिरतो नित्यं हेमकृत्ये विचक्षणः ॥ १ ॥
भा० टी० – पुरुषोत्तमपुर नामक नगर में पहले एक स्वर्णकार वास करता था ।
अपने कर्म में रत सुवर्ण के काम में चतुर था ॥ १ ॥
ब्राह्मणस्तस्य वै मित्रं धनाढ्यो वेदवर्जितः ।
तेन विप्रेण भो देवि स्वर्णं दत्तं शतं पलम् ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! उस स्वर्णकार का एक ब्राह्मण मित्र था, वह धन से युक्त था और वेद से रहित था, उस विप्रने सौ पल मात्रावाला सुवर्ण उस स्वर्णकार ( सुनार ) को दिया ॥ २ ॥
स्वर्णकाराय मित्राय माल्यार्थं च विचक्षणः ।
ब्राह्मणाय न दत्तं हि माल्यं दिव्यं वरेऽनघे ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे अनघे! उस स्वर्णकार मित्र को माला बनाने के लिए दिया था, फिर उस स्वर्णकार ने माला नहीं दी ॥ ३ ॥
ब्राह्मणस्याभवन्मृत्युः किंचित्काले गते सति ।
स्वर्णं तत्स्वेच्छया भुक्तं पुत्रदारयुतेन च ॥ ४ ॥
भा० टी ० — तब कुछ काल व्यतीत होने पर उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी, तब वह द्रव्य स्वर्णकार ने पुत्रदारा सहित स्वयं भोगा ॥ ४ ॥
ततो बहुतेकाले स्वर्णकारस्य वै शिवे! ।
मरणं वै तदा जातं पुत्रदारयुतस्य च ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे शिवे! फिर बहुत सा समय बीत जाने पर उस स्वर्णकार की पुत्रदारा सहित मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥
महाकटाहनरके दूतैः क्षिप्तो यमाज्ञया ।
युगमेकं वरारोहे भुक्तं नरकजं फलम्॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता १६ ९ भा० टी० — हे वरारोहे! उस स्वर्णकार को यमराज की आज्ञा पा कर दूतों ने महाकटाह नाम वाले नरक में प्राप्त किया तहां एक युग संख्या वाले वर्षों तक नरक के फल को भोगता भया ॥६ ॥
नरकान्निर्गतो देवि व्याघ्रयोनिस्ततोऽभवत् ।
व्याघ्रयोनिं ततो भुक्त्वा शृगालत्वं ततोऽभवत्॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! नरक से निकलकर बाघ की योनि को प्राप्त हुआ, फिर बाघ की योनि को भोगकर गीदड़ की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
ततः काकस्य वै योनिं भुक्त्वा नरकमाप्नुयात् ।
देशे पुण्यतरे देवि मानुषत्वं सुरेश्वरि!॥ ८ ॥
भा० टी ० — हे देवि! वहाँ से भी निकलकर काक पक्षी की योनि को प्राप्त हुआ, फिर वहाँ के दुःखों को भोगकर हे सुरेश्वरि! अति पवित्र देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥
पूर्वजन्मनि यत्स्वर्णं ब्राह्मणस्य ऋतं प्रिये! तेन पापेन भो देवि पुत्रो नैव प्रजायते ॥ ९ ॥
भा० टी० — हे प्रिये! पिछले जन्म में उसने ब्राह्मण के सुवर्ण को भोगा था उस पाप से उसका पुत्र नहीं हुआ॥९॥
गर्भस्त्रावो भवेन्नार्य्याः काकवन्ध्या च जायते ।
अस्य पापस्य वै शान्तिं शृणु देवि सुशोभने! ॥ १० ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री के गर्भस्राव होता है जिसके कारण उसकी स्त्री काकवन्ध्यापन को प्राप्त होती गई, हे सुशोभने! हे देवि! इस पाप की शांति को मैं कहता हूँ, तुम सुनो ॥ १० ॥
षडंशं च ततो देवि ब्राह्मणाय समर्पयेत् ।
दशायुतजपं कुर्याद्गायत्र्या नियमेन च ॥ ११ ॥
भा० टी० - घर के द्रव्य में से छठे भाग को ब्राह्मण को दान करें दश हजार गायत्री का नियम से जप करायें ॥ ११ ॥
हरिवंशश्रुतिं देवि संकल्प्य श्रद्धया युतः ।
होमं वै कारयेद्देवि स्वर्णदानं शतं पलम्॥ १२ ॥
भा० टी० — हे देवि! हरिवंश का श्रवण करें और श्रद्धायुक्त होकर हरिवंश का संकल्प करें होमादि करायें सौ पल मात्रा वाले सुवर्ण का दान करें ॥ १२ ॥
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१७० कर्मविपाकसंहिता
गोदानं विधिवत्कुर्य्याच्छिवपूजनमेव च ।
एवं कृते न संदेहः शीघ्रं पुत्रमवाप्स्यते ॥ १३ ॥
भा० टी ० — विधिपूर्वक गौ का दान करें, शिवजी का पूजन करें, ऐसा करने से घ्र ही पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम् ।
काकवन्ध्या प्रसूयेत सत्यमेव न संशयः ॥ १४ ॥
भा० टी० – मरने वाले पुत्रों की माता बहुत काल तक जीने वाले पुत्रों को प्राप्त करती है और काकवन्ध्या भी पुत्र को जन्म देती है, यह सत्य है, इसमें संशय नहीं है ॥१४ ॥
रोगात्प्रमुच्यते शीघ्रं ज्वरं सर्वं क्षयं व्रजेत् ॥ इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तरानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
भा० टी० – सब रोगों से शीघ्र ही छुटकारा मिलता है और सब प्रकार के ज्वर नाश को प्राप्त होते हैं । इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० उत्तरा० द्वितीयचरण० नामैकोनपंचाशत्तमोध्यायः ॥ ४१ ॥
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॥५० ॥
अथोत्तरानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पुरे वै गहने देवि तैलकारोऽवसत्पुरा ।
महाधनाढ्यो वै देवि कोटिद्रव्येण संयुतः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! पहले एक गहन नामक पुर एक तैलकार ( तेली ) रहता था, वह महाधन से युक्त और करोड़ों द्रव्य से युक्त था ॥ १ ॥
तस्य च स्त्रीद्वयं चासीज्ज्येष्ठायां वै विषं ददौ ।
कनिष्ठा च गृहे तस्य गृहिणी धर्मचारिणी ॥ २ ॥
भा० टी० - उसकी दो स्त्रियाँ थीं उसने बड़ी स्त्री को जहर दिया, छोटी स्त्री गृहस्थ धर्म में रत रहकर उसके घर में वास करती रही ॥ २ ॥
एवं बहुगते काले तैलकारस्य वै शिवे! मरणं तस्य जातं यमदूतैर्यमाज्ञया ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे शिवे! इस प्रकार तैलकार ने बहुत से दिन व्यतीत किये, फिर उस तैलकार की मृत्यु हुई तब उसे यमराज के दूतों नें यम की आज्ञा पाकर ॥ ३ ॥
महाकटाहे नरके निक्षिप्तश्च सुदारुणे ।
तत्र च बहुधा पीडा नानानरकयातना ॥ ४ ॥
भा० टी०-० - महाकटाह नाम वाले घोर नरक में उसे डाला, वहाँ नाना प्रकार के नरकों की पीड़ाओं को उसने भोगा ॥४ ॥
त्रिंशत् सहस्त्रं वै वर्षं तीव्रं दुःखं च जायते ।
भुक्तं नरकजं दुःखं योनिं सर्पस्य वै शिवे! ॥ ५ ॥
भा० टी० – उसने तीन हजार वर्षों तक बड़े दुःखों को भोगा फिर हे शिवे! नरकों के दुःखों को भोगकर वह सर्प योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥
गृध्रत्वं कुक्कुटत्वं वै द्वे योनी च तदा गतः ।
मानुषस्य च वै योन्यां जातः खलु वरानने! ॥ ६ ॥
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१७२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे वरानने! गृध्र पक्षी की योनि को प्राप्त होकर फिर मुरगे की योनि को प्राप्त हुआ, फिर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
धनधान्यसमायुक्तो गुणज्ञो ज्ञानवानपि ।
ततो वै तस्य मरणं गङ्गायां देव्यभूत्पुरा ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! धनधान्य से युक्त, गुणी, ज्ञानवान्, -ऐसा वह गंगाजी मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
तत्पुण्येन महादेवि मानुषो धनवानभूत् ।
तैलकारो यतः पूर्वं ज्येष्ठायै च विषं ददौ ॥ ८ ॥
भा० टी ० — हे देवि! उस पुण्य के प्रताप से वह धनी होता गया पहले तैलकार होकर उसने अपनी बड़ी स्त्री को जहर दिया था ॥ ८ ॥
तत्पापेनैव भो देवि पुत्रो नैव प्रजायते ।
बहुरोगेण संयुक्तो भार्या कष्टयुता सदा ॥ ९ ॥
भा० टी० — हे देवि! उस पाप के प्रभाव से उसका पुत्र नहीं हुआ और बहुत से रोग से युक्त होता गया और उसकी भर्य्या कष्ट से युक्त रहती है॥९॥
अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सविस्तरम् ।
गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं करोतु सः ॥ १० ॥
भा० टी ० — हे देवि! अब उसकी शांति को कहता हूँ तुम श्रवण करो अपनें घर के द्रव्य का आठवें भाग का दान करें ॥ १० ॥
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ।
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी० – गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें और उसके दशांश हवन, दशांश मार्जन, दशांश तर्पण करायें ॥ ११ ॥
त्र्यम्बकेति च मन्त्रेण दशायुतजपं पुनः ।
दशवर्णां ततो दद्यात् कूष्माण्डं रत्नसंयुतम् ॥ १२ ॥
भा० टी० - त्र्यंबक मंत्र के दश हजार जप करवायें दशवर्ण वाली गौओं का दान करें, रत्नों से संयुक्त किये पेठे का दान करें ॥ १२ ॥
काश्यां वै ग्रहणे दद्यात्पत्न्या सार्द्धं महद्धनम् ।
कार्तिके माघवैशाखे प्रातः स्नानं समाचरेत्॥ १३ ॥