कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 181–190

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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कर्मविपाकसंहिता १७३ भा ० टी० - काशीजी में ग्रहण के समय स्त्री सहित बहुत-सा द्रव्य दान करें तथा कार्तिक, माघ, वैशाख-इन मासों में प्रातः काल स्नान करें ॥ १३ ॥

तिलधेनुं ततो दत्वा सद्यः पापात्प्रमुच्यते ।

एवं कृते न संदेहो वंशलाभो भवेद्ध्रुवम् ॥ १४ ॥

भा० टी० — तिल धेनु को दान देने से तत्काल पाप से छूट जाते हैं ऐसा करने से वंश का लाभ होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥

कन्यका जननी यापि सापि पुत्रवती भवेत् ।

मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरञ्जीविनमुत्तमम्॥ १५ ॥

भा० टी०– यदि कन्या को भी जन्म देती हो तो भी पुत्र वाली हो और मरने वाले पुत्रों की भी माता बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १५ ॥

रोगात्प्रमुच्यते शीघ्रं ज्वरो नैव प्रजायते । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तरानक्षत्रस्य तृतीयचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

भा० टी० - रोग से शीघ्र छूट जाता है, ज्वर की पीड़ा उसको नहीं होती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्व० उत्तरानक्षत्रस्य तृतीयचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

पृष्ठ 182

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॥५१ ॥

उत्तरानक्षत्रस्य चतुर्थचरणे प्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ यापुर्यां पुरा देवि ब्राह्मणोऽध्यवसत्प्रिये! वेदकर्मपरिभ्रष्टो मद्यपानरतः सदा ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे प्रिये! गया नामक पुरी में एक ब्राह्मण वास करता था वह वेद कर्म से भ्रष्ट मदिरा पान में रत रहता था ॥ १ ॥

स्तेयवेश्यासु संसर्गी सप्रतिग्रहवानपि ।

वयः सर्वं गतं चेत्थं वृद्धे जाते मृतः स वै ॥ २ ॥

भा० टी० — चोरी करने में प्रवृत्त, वेश्या- संग, प्रतिग्रह के लेने वाला था, इस प्रकार सब आयु व्यतीत कर बुढ़ापे को प्राप्त होकर मर गया ॥ २ ॥

यमदूतो महाघोरे कटाहनरकेऽक्षिपत् ।

लक्षत्रयमितं देवि भुक्तं नरकजं फलम् ॥ ३ ॥

भा० टी ० — हे देवि! यमराज के दूतों ने आज्ञा पाकर महाघोर नरक में डाला, तीन लाख वर्षों तक नरक के दुःखों को भोगता रहा ॥ ३ ॥

चाणूरस्य कुले जन्म ततः प्रेतोऽगमत्पुरा ।

बिडालत्वं ततो यातः फल्गुतीर्थे मृतः स वै ॥ ४ ॥

भा० टी० - फिर चाणूर नामक कुल में जन्म लेकर वहाँ से फिर प्रेत गति को प्राप्त हुआ, फिर बिलाव की योनि को प्राप्त होकर फल्गु नाम वाले तीर्थ पर मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥

पुनर्मानुषयोनित्वं मध्यदेशे सुरेश्वरि! कन्यकाजननीभार्याशरीरे सततं ज्वरः ॥ ५ ॥

भा० टी० - फिर हे सुरेश्वरि! मध्य देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नी कन्या पैदा करने वाली हुई और उसके शरीर में निरंतर ज्वर की पीड़ा रहती है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 183

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कर्मविपाकसंहिता १७५

चिन्तोद्विग्नः सदा देवि बहुदुःखेन पीडितः ।

अस्य शान्तिं शृणुष्वादौ यतः पापक्षयो भवेत्॥ ६ ॥

भा० टी० - हे देवि! चित्त में उद्वेग, बहुत से दुःख से पीड़ित हुआ, अब इस पाप की शांति को कहता हूँ, जिससे पापक्षय हो, तुम सुनो ॥ ६ ॥

केशवस्याऽर्चनं चादौ साधूनां सेवनं सदा ।

ब्राह्मणे दृढभक्तिश्च दाने वै भोजने तथा ॥ ७ ॥

भा० टी० – केशवभगवान् का पूजन, सदा श्रेष्ठ पुरुषों का सेवन, ब्राह्मणों में दृढभक्ति, ब्राह्मणों को दान तथा भोजन कराना ॥ ७ ॥

गां सवत्सां ततो दद्याद्विप्राय प्रतिवत्सरम् ।

श्रवणं विष्णुशास्त्रस्य हरिवंशश्रुतिं तथा ॥ ८ ॥

भा० टी ० – और बछड़े से युक्त गौ का दान को ब्राह्मण प्रत्येक दिन दें विष्णुपुराण का श्रवण करना तथा हरिवंश का श्रवण करना चाहिए ॥ ८ ॥

एवं कृते न संदेहो बहुपुत्रः प्रजायते ।

रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति काकवन्ध्या च पुत्रिणी ॥ ९ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उतरानक्षत्रस्य चतुर्थचरणे प्रायश्चित्तकथनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

भा० टी० – ऐसा करने से बहुत से पुत्रों को प्राप्त करता है इसमें संशय नहीं और सारे रोग नाश को प्राप्त होते हैं, काकवन्ध्या स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ ९ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वहर० नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 184

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॥५२ ॥

हस्तनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

स्वर्णकारोऽवसद्देवि पुरे भोजकटे तथा ।

स्त्री तस्यासीन्महादुष्टा परपुंसि रता सदा ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! एक स्वर्णकार भोजकट नामक पुर वास करता था और उसकी स्त्री महादुष्टा सदा पर- पुरुषों से गमन करने वाली थी ॥१ ॥

तद्गृहे वैश्य एकोऽपि ह्यागतो धनसंयुतः ।

तयोः प्रीतिरभूद्देवि स्वर्णकारकवैश्ययोः ॥ २ ॥

भा० टी० — हे देवि! उस स्वर्णकार के घर में एक वैश्य धन से युक्त हो आ तहां वास करता भया और जिन दोनों की परस्पर प्रीति होती भई ॥ २ ॥

व्यापारार्थं गृहीतं तु वैश्यस्वर्णं तदा प्रिये! पलं शतमितं देवि विक्रयं चाकरोत्किल ॥ ३ ॥

भा० टी० – तब हे प्रिये! जिस वैश्य का स्वर्ण सौ पल मात्रा में व्यापार के लिए स्वर्णकार ने लेकर विक्रय किया ॥ ३ ॥

स्वर्णकारस्य या पत्नी सुन्दरी कुलटा परा ।

प्रीत्या तदाऽभजत्पत्नी वैश्याय धनिकाय वै ॥ ४ ॥

भा० टी० – उस स्वर्णकार की पत्नी सुंदरी नाम वाली कुलटा और चतुरा थी वह प्रीति से उस धनयुक्त वैश्य को चाहती थी ॥ ४ ॥

एवं बहुगते काले वैश्यस्य मरणे सति ।

पश्चान्मृतस्तदा सोऽपि स्वर्णकारो वरानने! ॥ ५ ॥

भा० टी० - ऐसे बहुत -सा समय व्यतीत होने पर उस वैश्य की मृत्यु हुई फिर हे वरानने! पश्चात् उस स्वर्णकार की भी मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥

उभौ च नरके प्राप्तौ बहुकालं तु दोषतः ।

युगैकसंमितं देवि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ६ ॥

पृष्ठ 185

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कर्मविपाकसंहिता १७७ भा० टी० — तब वे वैश्य और स्वर्णकार दोनों नरक को प्राप्त हुए । हे देवि! पाप के प्रभाव से एक युग की अवधि पर्यंत नरक के दुःखों को भोगते रहे ॥ ६ ॥

नरकान्निःसृतौ तौ तु शुनो योनिं तदा गतौ ।

पुनर्वृषभयोनिं च नरयोनिस्ततोऽभवत् ॥ ७ ॥

भा० टी० - फिर नरक से निकलकर दोनों श्वान योनि को प्राप्त हुए, पुनः वहाँ बैल की योनि को प्राप्त होकर उनका मनुष्य की योनि में जन्म हुआ ॥ ७ ॥

महद्धनैः समायुक्तो देशे पुण्यतमे शुभे! पूर्वजन्मप्रसङ्गेन स वैश्यः पुत्रतां गतः ॥ ८ ॥

भा० टी० - पुण्य से युक्त देश में उसे बहुत धन प्राप्त करके सुख भोग रहा है पूर्वजन्म के प्रसंग से वह वैश्य पुत्रभाव को प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥

भार्या तस्य तु भो देवि या पुरा व्यभिचारिणी ।

पुत्रोत्पत्तिस्तदा तस्यां मरणं शीघ्रमाप्नुयात् ॥ ९ ॥

भा० टी० - हे देवि! उनकी भार्या जो पहले व्यभिचारिणी थी, वह वैश्य उसका पुत्र होकर शीघ्र ही मर गया ॥ ९ ॥

शरीरे महती पीडा सततं चिन्तया युतः ।

अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि यथोक्तं शृणु वल्लभे! । १० ॥

भा० टी० — हे वल्लभे! इसके शरीर में महापीड़ा है और निरंतर चिंता से युक्त है, अब यथोक्त उसकी शांति को कहता हूँ, तुम सुनो ॥ १० ॥

गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

जातवेदेति मन्त्रेण पञ्चायुतजपं तथा ॥ ११ ॥

भा० टी ० — अपने घर के द्रव्य में से आठवें भाग को पुण्य हेतु दान करें जातवेद मंत्र का आधे लाख तक जप करायें ॥ ११ ॥

दशांशं हवनं कुर्य्यात्तर्पणं मार्जनं तथा ।

पापशान्त्यै च भो देवि भोजयेत् ब्राह्मणान् शतम्॥ १२ ॥

भा० टी० - दशांश हवन, दशांश मार्जन, दशांश तर्पण और पाप की शांति के लिए १०० ब्राह्मणों को भोजन करायें ॥ १२ ॥

गौदानं च विशेषेण शय्यादानं तथा प्रिये! प्रतिमां कारयेद्देवि सुवर्णस्य तदा प्रिये! ॥ १३ ॥

भ० टी० - हे प्रिये! विशेषता से गौ का दान करें और हे प्रिये! सुवर्ण की प्रतिमा अर्थात् मूर्ति बनायें ॥ १३ ॥

पृष्ठ 186

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१७८ कर्मविपाकसंहिता

एकादशपलेनैव रचितां वस्त्रभूषिताम् ।

पूजयेद्विधिवद्देवि मन्त्रेणानेन वै शिवे!॥ १४ ॥

भा० टी० – एकादश पल प्रमाण की सुवर्ण की मूर्ति बनवाकर फिर वस्त्र से युक्त और आभूषण युक्त कर उस मूर्ति का विधिवत्पूजन करें, इन मंत्रों से- ॥ १४ ॥

श्रीविष्णो पुण्डरीकाक्ष भुवनानां च पालक! ।

चन्दनैः प्रतिमां दिव्यां पूजयामि गृहाण भोः ॥ १५ ॥

ॐ शङ्खाय नमः ॐ चक्राय नमः । ॐ गदायै नमः ॐ शार्ङ्गय नमः । ॐ गरुडाय नमः ॐ नन्दकाय नमः ।

ॐ सुनन्दाय नमः ॐ जयाय नमः ।

ॐ विजयाय नमः ॥

ॐ भो किरीटिन् महादेव शङ्खचक्रगदाधर! पापं मया कृतं पूर्वं तत्क्षमस्व दयानिधे! ॥ १६ ॥

भा० टी० -ॐ शंखाय नमः १, ॐ चक्राय नमः २, ॐ गदायै नमः ३, ॐ शार्ङ्गाय नमः ४, ॐ गरुडाय नमः ५, ॐ नन्दकाय नमः ६, ॐ सुनन्दाय नमः ७, ॐ जयाय नमः ८, ॐ विजयाय नमः ९, ॐ किरीटिन्! हे महादेव! हे शङ्खचक्रगदाधर!॥ मैंने पूर्व में जो पाप किये हैं हे दयानिधे! उनको क्षमा करो ॥ १५ ॥ १६ ॥

ततः प्रदक्षिणां कुर्य्यात्पल्या सह वरानने! प्रतिमां पूजितां चैव ब्राह्मणाय समर्पयेत्॥ १७ ॥

भा० टी० =– फिर हे वरानने! परिक्रमा करें । प्रतिमा का पूजन करके संकल्प कर ब्राह्मण को दें ॥ १७ ॥

एवं कृते तदा देवि पुत्रो भवति नान्यथा ।

रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १८ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे हस्तनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामद्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

भा० टी० — हे देवि! ऐसा करने से पुत्र होता है, यह अन्यथा नही है और सब रोग दूर होते हैं इसमें सन्देह नहीं करना ॥ १८ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० हस्तनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्विपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 187

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॥५३ ॥

हस्तनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

वङ्गदेशे महादेवि केशवं नाम वै पुरम् ।

खड्गनामेति विख्यातो नापितो वसति प्रिये! ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! हे प्रिये! वङ्गदेश में केशव नामक पुर में एक नापित अर्थात् नाई खड्ग नामक वास करता था ॥ १ ॥

महाधनसमायुक्तो भाग्यवान्देवपूजकः ।

तस्य पत्नी विशालाक्षी लीलानाम्नीति विश्रुता ॥ २ ॥

भा० टी ० — वह महावैभव से युक्त, भाग्यवान्, देवता का पूजन करने वाला था और उसकी स्त्री विशाल नेत्रों वाली लीला नाम से विख्यात थी ॥ २ ॥

तस्यां पुत्रद्वयं जातं नापितस्य तदा प्रिये! एको द्यूतपरः पुत्रो द्वितीयश्चोरसंमतः ॥ ३ ॥

भा० टी० - हे प्रिये! उसके उस स्त्री से नापित के दो पुत्र हुए । एक पुत्र द्यूत अर्थात् जुए में तत्पर और दूसरा चौरी में तत्पर रहता था ॥३ ॥

परस्त्रीलम्पटो देवि नापितस्य च मृतः ।

ज्येष्ठपुत्रस्य या भार्या पुंश्चली चातिसुन्दरी ॥ ४ ॥

भा० टी० — और हे देवि! नापित का पुत्र पर स्त्री गमन में भी तत्पर होता भया और जेठे पुत्र की जो भार्या थी वह भी जार कर्म में अति चतुरता से युक्त थी ॥४ ॥

नापितं प्राऽभजत्सा तु श्वशुरं खड्गनामकम् ।

एवं बहुगते काले तस्य मृत्युरभूत्तदा ॥ ५ ॥

भा० टी०-० - वह भी खड्ग नाम से विख्यात उस अपने ससुर को चाहती थी, ऐसे बहुत- सा काल व्यतीत होने पर उस नाई की मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥

तदा पत्नी सती जाता नापितस्य चिताग्निना ।

सत्यलोकमभूद्देवि भार्य्यया सहितस्य वै ॥ ६ ॥

पृष्ठ 188

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१८० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे देवि! तब उसकी पत्नी नापित की चिता में सती हो गई उसके प्रभाव से दोनों को सत्य लोक प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

युगमेकायुतं देवि सत्यलोकेऽवसत्तदा ।

ततः पुण्यक्षये जाते पुनर्मानुषतां गतः ॥ ७ ॥

भा० टी ० — हे देवि! एक युग पर्यंत सत्यलोक में वास कर पुण्य क्षीण होने पर मनुष्यलोक में उसका जन्म हुआ ॥७ ॥

धनधान्यसमायुक्तो ह्यपुत्रश्च सुशोभने! पञ्च कन्याः प्रजायन्ते व्याधिस्तस्य प्रजायते ॥ ८ ॥

भा० टी० - हे सुशोभने! धनधान्य से युक्त, पुत्र से रहित, पाँच कन्याओं से युक्त और शरीर में व्याधि- इस प्रकार हो गया ॥ ८ ॥

अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापक्षयं यतः ।

गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय समर्पयेत्॥ ९ ॥

भा० टी० – अब उस पाप की शांति को कहता हूँ, जिससे पहले के पाप नष्ट हों, अपने घर के द्रव्य से अष्टमभाग ब्राह्मण को दान करके दें ॥ ९ ॥

गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ।

हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ॥ १० ॥

भा० टी० – गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप, दशांश हवन तथा दशांश तर्पण तथा दशांश मार्जन करायें ॥ १० ॥

वाटिकाकूपमार्गांश्च तडागं चैव कारयेत् ।

तुलसीसेवनं नित्यमेकादश्यां व्रतं ततः ॥ ११ ॥

भा० टी० – बगीचा, कुआँ, तलाब मार्गों के मध्य में बनाने से, नित्य तुलसीजी के सेवन से, एकादशी का व्रत करने से पाप दूर होते हैं ॥ ११ ॥

वृन्ताकं मूलिकां चैव न भोक्तव्यं कदाचन ।

दशवर्णां ततो दद्याद्धरिवंशश्रुतिं तथा ॥ १२ ॥

भा० टी० - वृत्ताक तथा मूली का भोजन नहीं करें और दशवर्णों वाली गायों का दान करें और हरिवंश का श्रवण करें ॥ १२ ॥

एवं कृते न संदेहः पुत्रो भवति तस्य वै ।

कन्यका नैव जायन्ते वन्ध्यात्वं च प्रशाम्यति ॥ १३ ॥

पृष्ठ 189

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कर्मविपाकसंहिता १८१ भा० टी० - ऐसा करने से उसके निश्चय ही पुत्र होता है कन्या की उत्पत्ति नहीं होती है और वन्ध्यापना दूर होता है ॥ १३ ॥

रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति काकवन्ध्या लभेत्सुतम् । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे हस्तनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामत्रयः पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

भा० टी० - सब रोग नाश को प्राप्त होते हैं तथा काकवंध्या स्त्री भी पुत्र को प्राप्त होती है ॥ इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां० हस्तनक्ष० द्वितीचरण० नाम त्रयः पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 190

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॥५४ ॥

हस्तनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ कौशिक्या दक्षिणे कूले कारुको न्यवसत्प्रिये! विष्णुभक्तिरतो नित्यं कृषिकर्मसु तत्परः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं -हे प्रिये! कौशिकी नदी के दाहिने किनारे पर कारुक अर्थात् चटाई बनाने वाला वास करता था, वह विष्णुभक्त और नित्य कृषि - कर्म में तत्पर रहता था ॥ १ ॥

धनं तु सञ्चितं देवि कार्पण्यात्पुण्यवर्जितम्।

एकस्मिन्समये रात्रौ क्षेत्रे व्याघ्रेण वै हतः ॥ २ ॥

भा० टी० — हे देवि! कृपणता से धन को संचित किया और पुण्य से रहित हुआ उसे एक समय रात्रि में खेत में व्याघ्र अर्थात् बाघ ने मार दिया ॥ २ ॥

यमदूतैर्महाघोरे रौरवे पातितस्तदा ।

षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ३ ॥

भा० टी ० - तब उसे यमराज के दूतों ने यम की आज्ञा पाकर रौरव नामक नरक में डाला वहाँ साठ हजार वर्षों तक नरकों में महादुःखों को भोगकर ॥ ३ ॥

ततः कर्मवशाद्देवि बिडालत्वं ततो गतः ।

पुनः कुक्कुटयोनिर्वै शृगालत्वं ततोऽभवत्॥ ४ ॥

भा० टी० - हे देवि! वहाँ से कर्मों के वश प्राप्त हो बिडाल अर्थात् बिलाव की योनि को प्राप्त हुआ, फिर कुक्कुट की योनि को प्राप्त होकर शृगाल अर्थात् गीदड़ की योनि को प्राप्त हुआ ॥४ ॥

पुनर्मानुषयोनिश्च मध्यदेशे वरानने! पुत्रकन्याविहीनश्च अर्शोरोगेण पीडितः ॥ ५ ॥