कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 31–40
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 31–40
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कर्मविपाकसंहिता २३ भा० टी ० - तब उस गह्वर वन में क्रोध से युक्त और द्वेष करते उस दुष्ट ब्राह्मण का मरण हो गया ॥६ ॥
ततश्चिन्तापरीतात्मा राजपुत्रो गृहं ययौ ।
गृहे च कारयामास तस्य कर्म यथाविधि ॥ ७ ॥
भा० टी० — उसके अनंतर चिंता से व्याकुल राजपुत्र अपने घर में गया और घर में ही उसने विधि पूर्वक से उसका कर्मकांड- संस्कार कराया ॥ ७ ॥
ततो बहुगते काले प्रयागे मकरे मुदा ।
शरीरं त्यक्तवान् देवि भार्यया सहितस्तदा ॥ ८ ॥
भा० टी० — फिर बहुत - सा काल व्यतीत होने के बाद तब यह स्त्री - सहित हुआ प्रयाग में मकरसंक्रांति के दिन आनंद से शरीर छोड़ा ॥ ८ ॥
स्वर्गं भुक्त्वा युगान् सप्त ततः पुण्यक्षये सति ।
मर्त्यलोकेऽभवज्जन्म धनधान्यसमन्वितः ॥९ ॥
भा० टी० - फिर सात युगों तक स्वर्ग भोग कर पुण्य क्षीण होने पर बाद में मृत्युलोक में जन्मा है और धन धान्य से युक्त है ॥ ९ ॥
भार्यया सहितो देवि मध्यदेशे वरानने पुत्रो न जायते देवि पूर्वकर्मविपाकतः ॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! हे वरानने!! भार्या सहित मध्य देश में जन्मा है । हे देवि! पूर्वकर्म के विपाक के कारण इसका पुत्र नहीं हुआ है ॥ १० ॥
ब्रह्महत्याफलेनैव मृतवत्सोऽपि वा भवेत् ।
तस्य शुद्धिं प्रवक्ष्यामि यतः पुत्रः प्रजायते ॥ ११ ॥
भा० टी० — ब्रह्महत्या के फल के कारण ही मनुष्य मृतवत्स अथवा इसके संतान नहीं जीती है निःसन्तान होता है अब उस पाप की शुद्धि को कहता हूँ, जिससे उसका पुत्र होगा ॥ ११ ॥
तदुद्देशेन कर्त्तव्यस्तडागो वापिका पथि ।
हरिवंशश्रवणं देवि विधिपूर्वमतः शिवे! ॥ १२ ॥
भा० टी ० — उस प्रायश्चित्त के उद्देश्य से मार्ग में कूआँ अथवा बावड़ी बनवायें ।
हे देवि! हरिवंशपुराण सुनें तब कल्याण होगा ॥ १२ ॥
दश वर्णाः प्रदातव्याः स्वर्णयुक्ताः सहाम्बराः ।
एवं कृते न संदेहो वंशस्तस्य प्रजायते ॥ १३ ॥
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२४ कर्मविपाकसंहिता भा ० टी० - और सुवर्ण तथा वस्त्रों से युक्त की हुई दश प्रकार की रंगों वाली गौओं का दान करें । ऐसा करने से वंश चलता है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १३ ॥
सा स्त्री स्यात्सुखिनी देवि सत्यमेव न संशयः ।
काकवन्ध्यात्वमुक्ता स्यात् मृतवत्सा सुखावहा ॥ १४ ॥
भा० टी ० — हे देवि! वह स्त्री सुखवती होती है, काकवंध्या की भी फिर संतान
होती है, मृत वत्सा को भी सुख होता है । इसमें संदेह नहीं ॥ १४ ॥
व्याधिनाशो भवेद्देवि नात्र कार्या विचारणा । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वती० अश्वि० तृतीयचरणविचारणं नाम पञ्चमोऽध्यायः 114 11 भा० टी ० — हे देवि! ऐसा करने से व्याधि का नाश होता है, इसमें कुछ विचार-णीय नहीं हैं ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसं० पार्वती अश्वि० तृतीयचरणविचारणंनाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
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॥६ ॥
अश्विनीनक्षत्रस्य चतुर्थचरणविचारणम् ॥ शिव उवाच ॥
शृणु देवि वरारोहे नृणां कर्मविपाकजम् ।
तदहं संप्रवक्ष्यामि यथाकर्मानुसारतः ॥ १ ॥
भा० टी० – शिव जी कहते हैं - हे देवि! हे वरारोहे!! मनुष्यों के कर्मों के
विपाक से उत्पन्न हुए फल को सुनो । मैं जिसको कर्मों के अनुसार कहूँगा ॥ १ ॥
पुत्रा बहुविधा देवि लौकिका वै विचक्षणाः ।
जायन्ते नात्र संदेहस्तत्सर्वं शृणु वल्लभे! ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! अनेक प्रकार के लौकिक विद्वान् पुत्र उत्पन्न होते हैं । इसमें संदेह नहीं है । हे वल्लभे! उनके विषय में सुनो ॥ २ ॥
प्रथमः पुण्यसंबन्धो मातृपितृप्रियः सदा ।
सुसेवानिरतो नित्यं पितृर्मातुश्च यत्नतः ॥ ३ ॥
भा० टी ० — प्रथम प्रकार का पुत्र पुण्य के संबंध वाला सदा माता- पिता को प्रिय होता है । नित्य प्रति प्रयत्नपूर्वक माता-पिता की सेवा करने में तत्पर रहता है ॥ ३ ॥
आजन्ममरणाद्देवि पितुराज्ञां करोति च ।
मरणे पितृमात्रोश्च श्राद्धं कुर्याद्दिने दिने ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे देवि! जन्म से ले कर मरण पर्यन्त माता -पिता की आज्ञा का पालन करता है । जब माता - पिता मर जाते हैं तो तब तिथि पर्व पर श्राद्ध करता है | ॥४ ॥
पितृश्राद्धं विना देवि भोजनं न करोतिहि ।
द्वितीयः शत्रुसंबंधी तस्य चेष्टां च मे शृणु ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! वह पुत्र पिता के श्राद्ध किये बिना भोजन भी नहीं करता है । दूसरे प्रकार का शत्रु संबंधी पुत्र होता है, जिसकी चेष्टा मुझसे सुनो ॥ ५ ॥
पूर्वजन्मप्रसङ्गेन शत्रुः पुत्रः प्रजायते ।
जन्मतः शत्रुरूपेण मातृपित्रोर्विरोधकृत् ॥ ६ ॥
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२६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० – पूर्वजन्म के प्रसंग से शत्रु पुत्र के रूप में पैदा होता है । इसलिए जन्म से ही शत्रु भाव करके माता- पिता से विरोध करता है ॥ ६ ॥
तत्कर्म कुरुते येन तयोः क्लेशोऽभिजायते ।
तृतीयो ऋणसंबन्धान्मत्तः शृणु वरानने ॥ ७ ॥
भा० टी०-० - वह ऐसा कर्म करता है, जिससे कि उनको क्लेश हो । हे वरानने! तीसरे प्रकार का पुत्र ऋण के संबंध से होता है, उसके विषय में मुझसे सुनो ॥७ ॥
ऋणं यस्य गृहीतं तु न दत्तं हठतः प्रिये! तदा पुत्रत्वमाप्नोति द्रव्यदाता न संशयः ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे प्रिये! पूर्व जन्म में जिससे ऋण ( कर्जा ) लिया हो, उसको हठ पूर्वक नहीं दिया हो तो वह द्रव्यदाता पुत्र के रूप में होता है, इसमें संदेह नहीं ॥ ८ ॥
पितृद्रव्यं प्रयत्नेन गृह्णाति हठतः प्रिये! द्यूतवेश्याप्रदानेन व्ययं कुर्याद्दिने दिने ॥ ९ ॥
भा० टी० - वह दिन प्रतिदिन हठ से पिता के धन को ग्रहण करता है, हे प्रिये! जुआ और वेश्या पर दिन प्रतिदिन खर्च करता है ॥ ९ ॥
यदा द्रव्यविहीनश्च पिता भवति वै प्रिये! तदा मृत्युमवाप्नोति युवरूपो न संशयः ॥ १० ॥
भा० टी० — हे प्रिये! जब उसका पिता द्रव्यहीन ( कंगाल ) हो जाता है, तब जवानीं में ही वह मर जाता है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १० ॥
चतुर्थी मित्ररूपेण पुत्रो जायेत पार्वति! स्थापितं द्रव्यमन्यस्य न दत्तं पूर्वजन्मनि ॥ ११ ॥
भा ० टी ० — हे पार्वति! चौथे प्रकार का पुत्र मित्र रूप में होता है, जिसको पूर्व-जन्म में अन्य किसी का द्रव्य स्थापित किया, फिर नहीं दिया ॥११ ॥
तत्संबन्धस्वरूपेण पुत्रो जातस्तदा शिवे! बहुप्रीतिं पितृभ्यां च पितृव्ये गोत्रजे तथा ॥ १२ ॥
भा० टी० – यदि उस संबंध से पुत्र होता है तो हे शिवे! तब वह माता- पिता, चाचा, गोत्र में होने वाले जनों से बहुत प्रीति रखता है ॥ १२ ॥
गुण भक्त पितुः शिक्षासु तत्परः ।
यत्करोति गृहे कर्म सुखदं जायते हि तत्॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २७ भा० टी० - वह बहुत उद्यमी, गुणी, भोक्ता, पिता की शिक्षा में तत्पर होता है, जो कुछ घर में करता है, वही सुखदायक होता है ॥ १३ ॥
पूर्वरूपो यदा देवि पत्नीपुत्रसमन्वितः ।
ततः शरीरं वै त्यक्त्वा धनं गृह्य ततः प्रिये! । १४ ॥
भा० टी० – ऐसा यह पूर्वमित्र रूपी पुत्र जब जवान होता है और स्त्री-पुत्र से युक्त होता है, तब हे प्रिये! पिता के सब धन को ग्रहण करके शरीर त्याग कर परलोक को प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥
अथ वक्ष्यामि ते देवि चतुर्थचरणं शिवे! नक्षत्रतुरगस्यैव प्राणिनां नियतं शृणु ॥ १५ ॥
भा ० टी० — हे देवि! हे शिवे!! अब अश्विनी नक्षत्र के चतुर्थ चरण को तुम्हारे आगे कहूँगा, इसमें जन्म लेने वाले प्राणियों के विषय में को सुनो ॥ १५ ॥
कोशला पुरतो देवि सरय्वा उत्तरे तटे ।
तत्र क्षत्री वसत्येको नगरे नन्दने तदा ॥ १६ ॥
भा० टी ० — हे देवि! अयोध्यापुरी से सरयू नदी के उत्तर किनारे पर नंदन नामक नगर में एक क्षत्रिय रहता था ॥ १६ ॥
स च धर्मविहीनस्तु लक्ष्मणेति च नामतः ।
तस्य भार्य्या विशालाक्षी कल्याणी नाम सा प्रिये! । १७ ॥
भा० टी०-०- वह धर्म से विहीन क्षत्रिय लक्ष्मण नाम से विख्यात था और हे प्रिये! जिसकी स्त्री सुंदर नेत्रों वाली कल्याणी नाम से विख्यात थी ॥ १७ ॥
कुलटा यौवनोन्मत्ता परपुंसि रता सदा ।
व्यापारं कारयामास वस्त्रहेमादिकस्य हि ॥ १८ ॥
भा० टी० — वह यौवन से मतवाली पर- पुरुष में प्रीति रखने वाली कुलटा सदा वस्त्र, सुवर्ण आदि का व्यापार करती थी ॥ १८ ॥
उद्यमं बहुधा कृत्वा द्विजैः सह वरानने! एवं बहुतिथे काले विप्रद्रव्यं तु चोरितम् ॥ १ ९ ॥ भा० टी० - बहुत उद्यम करके ब्राह्मण से व्यापार करते हुए इसप्रकार बहुत दिनों के पश्चात उसने ब्राह्मण के द्रव्य को चोर लिया ॥ १ ९ ॥
तेन शोकेन विप्रस्तु शीघ्रं पञ्चत्वमागतः ।
ततो बहुतिथे काले राजपुत्रस्य पञ्चता ॥ २० ॥
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२८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — जिसके शोक से ब्राह्मण शीघ्र ही मर गया और उसके बहुत दिनों बाद राजपुत्र क्षत्रिय की भी मृत्यु हो गई ॥ २० ॥
गतः स नरकं घोरं निरुश्वासं सुदारुणाम् ।
षष्टिवर्षसहस्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ २१ ॥
फिर वह बहुत बुरे संताप देने वाले दारुण नरक में पहुँचा साठ हजार वर्षों तक नरक की पीड़ा को भोग कर ॥ २१ ॥
नरकान्निःसृतो देवि वृषयोनिः पुराभवत् ।
ततो वै राजपुत्रस्तु मानुषत्वमुपागतः ॥ २२ ॥
भा० टी० - हे देवि! नरक से बाहर निकल कर पहले वह बैल की योनि को प्राप्त हुआ, फिर वह राजपुत्र अब इस मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ २२ ॥
पुरा तु यत्कृतं पापं तदिहैव प्रयुज्यते ।
मित्रस्य वञ्चनाद्देवि पुत्रस्यैव च पञ्चता ॥ २३ ॥
भा० टी० – पहले जो पाप किया था वही यहाँ भोगा जाता है । हे देवि! पहले जो मित्र ठगा था, जिससे इसके पुत्र की मृत्यु होती है ॥ २३ ॥
काकवन्ध्याऽभवत्पत्नी दुःखशोकसमन्विता ।
तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापस्य निग्रहम् ॥ २४ ॥
भा० टी० - इसकी स्त्री, काकवंध्या अर्थात् एक ही बार संतान पैदा करती है फिर कुछ नहीं पैदा करती है, इसलिए दुःख- शोक युक्त है, अब जिसके पूर्व पाप को दूर करने वाले पुण्य को कहूँगा ॥ २४ ॥
गायत्रीलक्षजाप्येन सर्वं पापं प्रणश्यति ।
कूष्माण्डं नारिकेलं वा स्वर्णयुक्तं सहाम्बरम् ॥ २५ ॥
भा० टी० – गायत्री का एक लाख जप कराने से संपूर्ण पाप नष्ट होता है और कूष्मांड ( पेठे ) को अथवा नारियल को सोने से भर कर वस्त्र से आच्छादित कर ॥२५ ॥
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं संतानार्थं वरानने! वर्तुलाकारकुण्डे च होमं यत्नेन कारयेत्॥ २६ ॥
भा० टी० - हे वरानने! संतान प्राप्ति के लिए गंगा जी के मध्य में उसका दान कर देना चाहिए और गोलकुंड बनाये, यत्न से उसमें होम करें ॥ २६ ॥
स्वर्णशृङ्गीं रौप्यखुरां पट्टवस्त्रसमन्विताम् ।
आचार्याय प्रदद्यात्तु सपात्रां विधिवत् प्रिये! ॥ २७ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २ ९ भा० टी० – सोने के सींग और रूपा के खुर बनवायें, पट्टवस्त्र से युक्त कर दोहनी आदि पात्र से युक्त करें, फिर विधिपूर्वक आचार्य ब्राह्मण को दान दें ॥ २७ ॥
एवं कृते न संदेहो वन्ध्यात्वं च प्रणश्यति ।
पुत्रपौत्राश्च वर्द्धन्ते न संदेहो वरानने!। २८ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे अश्विनीनक्षत्रस्य चतुर्थचरणविचारणं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
भा० टी० — हे वरानने! ऐसा करने से वन्ध्यापन दूर होता है और पुत्र - पौत्र बढ़ते हैं इसमें संदेह नहीं है ॥२८ ॥
इतिकर्मविपाकसं० भाषाटीकायां अश्विनी० चतुर्थचरण० नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
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11911 स्त्रीकर्मकथनम् ॥ पार्वत्युवाच ॥
देवदेव महादेव सृष्टिस्थितिलयात्मक ।
स्त्रीणां च कर्म संब्रूहि दयां कृत्वा ममोपरि ॥ १ ॥
भा० टी ० - पार्वती पूछती हैं- हे देवों के देव! महादेव!! सृष्टि, स्थिति, संहार करने वाले आप मुझ पर दया करके स्त्रियों के कर्मों को कहो ॥१ ॥
॥ ईश्वर उवाच ॥
नारीणां शृणु मे सर्वं यत्कृतं पूर्वजन्मनि ।
ततोऽहं संप्रवक्ष्यामि समासेन वरानने! ॥ २ ॥
भा० टी० -शिव जी कहते हैं - हे वरानने! स्त्रियों द्वारा जो कुछ पूर्वजन्म में
किया गया है, वह सब मुझसे सुनो । मैं संक्षेप में कहता हूँ ॥ २ ॥
पूर्वजन्मनि या नारी पतिनिन्दां चकार ह ।
तेन पापेन भो देवि न स्त्री पुष्पवती भवेत् ॥ ३ ॥
भा० टी० – जो स्त्री पूर्व-जन्म में पति की निंदा करती है, हे देवि! उस पाप से वह पुष्पवती, रजस्वला नहीं होती है ॥ ३ ॥
यदा रौप्यस्य वै वृक्षं स्वाङ्गुष्ठपरिमाणकम्।
पलपञ्चमिदं देवि दद्याद्वेदविदे प्रिये! । ४ ॥
भा० टी००. -जब वह अपने अंगुष्ठो के प्रमाण में चांदी का वृक्ष बीस तोले प्रमाण का बनाये, फिर वेद को जानने वाले ब्राह्मण को दान दें ॥ ४ ॥
तदा पुष्पं भवेद्देवि नान कार्या विचारणा ।
पतिं सुप्तं परित्यज्य परपुंसि रताभवत्॥ ५ ॥
भा० टी० — हे देवि! तब रजस्वला होती है, इसमें कुछ भी विचारणीय नहीं जो स्त्री सोते हुए अपने पति का त्याग कर पर- पुरुष के संग रमण करती है ॥ ५ ॥
तेन पापेन भो देवि वन्ध्या नारी प्रजायते ।
सुवर्णस्य कृतं वृक्षं फलपुष्पसमन्वितम्॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३१ भा० टी० - हे देवि! उस पाप से वह स्त्री वंध्या होती है, इसलिए फल, पुष्प आदि से युक्त सुवर्ण का वृक्ष बनवा कर ॥ ६ ॥
दद्याद्वेदविदे नारी पतिसेवासुतत्परा ।
ततः पुत्रं प्रसूयेत सुवर्णपलतो दश ॥ ७ ॥
भा० टी० - उसको और चालीस तोला सोने को वेद पाठी ब्राह्मण को दान दे और अपने पति की सेवा में तत्पर रहे, तब पुत्र उत्पन्न होता है ।॥ ७ ॥
परपुंसि रता नारी स्वपतिं मिष्टवादिनी ।
तेन पापेन भो देवि कन्यापत्यं च जायते ॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवि! जो स्त्री पर- पुरुष में रत रहे और अपने पति से मीठी-मीठी बातें बनाती रहे, उस पाप से उसकी कन्या ही होती है ॥ ८ ॥
रौप्यस्यैव कृतं लिङ्गं पलपञ्चदशेन तु ।
पूजयित्वा प्रयत्नेन दद्याद्विप्राय श्रोत्रिणे॥९ ॥
भा० टी० – पल अर्थात् ६० तोले चांदी का शिव लिंग बनवायें और उसका विधि पूर्वक पूजन करे और बाद में वेद पाठी ब्राह्मण को दान दें ॥ ९ ॥
तत: कन्या तु न भवेच्छुभं पुत्रं प्रसूयते ।
सततं वै यदा नारी कुलटा धर्मचारिणी ॥ १० ॥
तेन कर्मविपाकेन नारी गर्भं विनश्यति ।
ततः प्रपूजयेद्देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ११ ॥
भा० टी० - ऐसा करने से फिर कन्या संतान नहीं होती है और सुंदर पुत्र जन्म लेता है और जो सदा जार धर्म में प्रवर्त होने वाली स्त्री है उस स्त्री का उस जार कर्म के पाप के कारण गर्भ नष्ट होता है तो वह स्त्री शंख-चक्र - गदा को धारण करने वाले ( विष्णु ) देव का पूजन करे ॥ १० ॥ ११ ॥
प्रयागे मकरे स्नानं पतिना तु सहाचरेत् ।
स्वर्णशृङ्गं रौप्यखुरं मुक्तालाङ्गलग्रन्थितम् ॥ १२ ॥
दद्यात्सदक्षिणं देवि वृषभं विदुषे तथा ।
या पतिं दुर्बलं त्यक्त्वा परेण सह संगता ॥ १३ ॥
भा० टी० — और मकर के सूर्य में पति के सहित प्रयाग में स्नान करे और सुवर्ण के सींग चांदी के खुर, मोतियों से गूंथी हुई पूंछ बना कर ऐसी विधि से दक्षिणा के सहित वृषभ को हे देवि! विद्यावान् ब्राह्मण को दान दे, जो अपने दुर्बल पति को छोड़ कर जारपति के संग जाती है ॥ १२ ॥ १३ ॥
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३२ कर्मविपाकसंहिता
तेन पापेन भो देवि! दरिद्रा पुत्रवर्जिता ।
ततः कुमारीं संपूज्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान्॥ १४ ॥
भा० टी० — हे देवि! वह उस पाप के कारण दरिद्र और पुत्र से हीन होती है वह कुमारी कन्या को पूजे और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का पूजन करे ॥ १४ ॥
पूजयेदब्दमेकन्तु प्रत्यहं नियता प्रिये! वर्षे पूर्णे ततस्तस्यै वस्त्रं दत्त्वा विसर्जयेत् ॥ १५ ॥
भा० टी० — हे प्रिये! एक वर्ष तक प्रतिदिन नियम से पूजन करे, वर्ष पूर्ण होने पर तब उस कन्या को वस्त्र दे कर विसर्जित करे ॥ १५ ॥
व्रतं सूर्यस्य वै कुर्यात्प्रणम्य प्रतिवासरम् ।
तदा नारी पूर्वपापं दहत्येव न संशयः ॥ १६ ॥
भा० टी० - प्रत्येक रविवार को सूर्य- व्रत करे, प्रणाम करे, तब वह नारी निश्चय ही अपने पूर्व पाप को दग्ध कर देती है ॥ १६ ॥
मिष्टं भुङ्क्ते तु या नारी पत्युर्मिष्टं ददाति न ।
तेन पापेन सा नारी मुखे दौर्गन्ध्यधारिणी ॥ १७ ॥
भा० टी० - जो स्त्री मीठा भोजन करे, पति को मीठा नहीं देती हो, उस पाप से उसके मुख में दुर्गंध आ जाती है ॥ १७ ॥
गुडं वा मधु वा खण्डं विप्राय प्रयता सदा ।
प्रयच्छति यदा देवि मुखे शुद्धिश्च जायते ॥ १८ ॥
भा० टी० — गुड़ अथवा शहद या खांड को प्रयत्नपूर्वक सदा ब्राह्मण को दान देने पर हे देवि! तब उसके मुख में शुद्धि आती है ॥ १८ ॥
स्वपतिनी च या नारी रण्डा भवति नान्यथा ।
तया नित्यं प्रपूज्या च तुलसी भक्तिभावतः ॥ १ ९ ॥
भा० टी० - जो स्त्री पूर्वजन्म में अपने पति को मार देती है वह रंडा होती है, इसमें संदेह नहीं है । वह भक्ति -भाव से नित्य प्रति तुलसी का पूजन करे ॥ १ ९ ॥
ऊर्जे माघे च वैशाखे प्रातः स्नानं समाचरेत् ।
एकादशीव्रतं नित्यं द्वादशाक्षरविद्यया ॥ २० ॥