कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 291–300
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 291–300
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कर्मविपाकसंहिता २८३ भा० टी० - हे विशालाक्षि! घृत, तिल, पायस अर्थात् खीर-इनसे हवन करायें और दशवर्णवाली ( दश प्रकार के आभूषणों से सजायी हुई ) गाय का दान दें ॥ १२ ॥
भूमिदानं ततो दद्याच्छय्यादानं विशेषतः ।
भ्रातुश्चैवाकृतिं कृत्वा रौप्येणैव वरानने! ॥ १३ ॥
भा० टी० - भूमि का दान दें तथा शय्या का दान करें और चांदी की भाई की मूर्ति बनवायें ॥ १३ ॥
पलसप्तप्रमाणेन पूजां कृत्वा प्रसन्नधीः ।
देवदेव महादेव चर्मभस्मविभूषण! ॥ १४ ॥
भा० टी० – सात पल प्रमाण की मूर्ति बनाकर और प्रसन्न बुद्धि वाला होकर पूजन कर हाथ को जोड़कर ऐसा कहैं कि हे देवदेव! हे महादेव!! हे चर्मभस्म-विभूषण!!! ॥ १४ ॥
पूर्वजन्मनि देवेश भ्रातृनाशः कृतो मया ।
तत्पापं क्षम्यतां देव प्रपद्ये शरणं तव ॥ १५ ॥
भा० टी० - हे देवेश! पहले जन्म में मैनें अपने भाई का वध किया था, हे देव! उस पाप की शांति के लिए मैं तुम्हारी शरण को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १५ ॥
प्रतिमां पूजितां देवि! मन्त्रेणानेन वै शिवे! दद्याद्विप्राय विदुषे श्रोत्रियाय द्विजात्मने ॥ १६ ॥
भा० टी० — हे देवि! हे शिवे!! इस मंत्र से प्रतिमा का पूजन कर वेदपाठी विद्वान् ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १६ ॥
ततो वै भोजयेद्भक्त्या ब्राह्मणान्वेदपारगान् ।
एकाधिकशतं देवि पायसैर्मोदकेन च ॥ १७ ॥
भा० टी० - पूजन करने के बाद फिर भक्ति से युक्त होकर वेद का पाठ करने वाले एक सौ एक ब्राह्मणों को पायस, मोदक अर्थात् खीर, लड्डू आदि का भोजन करायें ॥ १७ ॥
एवं कृत्वा वरारोहे पूर्वपापस्य संक्षयः ।
वन्ध्यत्वं प्रशमं याति पुत्रः सत्यं प्रजायते ॥ १८ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से पूर्व जन्म में किये हुए पाप नष्ट होते हैं ।
वन्ध्यापन की शांति होती है और पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १८ ॥
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२८४ कर्मविपाकसंहिता
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं मृतवत्सा सुपुत्रिणी ।
व्याधयः संक्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १ ९ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराषाढानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
भा० टी ० - काकवंध्या और मृतवत्सा स्त्री भी उत्तम पुत्र को प्राप्त होती है सर्व व्याधि नष्ट होते हैं इसमें कुछ विचार नहीं करना ॥ १ ९ ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे उत्तरा० प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
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॥८५ ॥
उत्तराषाढानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
सकेश्वरपुरे देव्यवात्सीच्चैको द्विजो वरः ।
म्लेच्छवाणीं वदन्नित्यं म्लेच्छसेवारतः सदा ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! सकेश्वरपुर में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था, वह म्लेच्छवाणी सदा कहता था और म्लेच्छों की ही सेवा करता था ॥ १ ॥
अतिष्ठन् म्लेच्छनिकटे म्लेच्छविद्यासु पण्डितः ।
मत्स्यं मांसं च मद्यं च भोजनं चाकरोत्सदा ॥ २ ॥
भा० टी० - और म्लेच्छों के समीप रहने से म्लेच्छ विद्या ही में रत था, मत्स्य-मांस का भक्षण, मदिरा का पान अथवा भोजन किया करता था ॥२ ॥
एवं सर्वं वयो जातं धनं बहु सुसंचितम् ।
तद्धनं भूमिमध्ये हि स्थापितं तु गृहे शुभे ॥ ३ ॥
भा० टी० – इसी प्रकार हे शुभे! सब अवस्था व्यतीत होने पर उसके पास धन का संचय से युक्त था वह धन उसने भूमि के मध्य में अपने घर में स्थापित कर दिया ॥३ ॥
एकस्मिन्समये देवि भ्रातुः पुत्रः समागतः ।
रत्नव्यापारकरणे स दक्षश्चतुरस्तथा ॥ ४ ॥
भा० टी० — हे देवि! एक समय उसके भाई का पुत्र वहाँ आया और वह रत्नों का व्यापार करने में बहुत ही चतुर था ॥ ४ ॥
ततो गेहस्थितो नित्यं रत्नं बहुसुसंचितम् ।
रत्नलोभेन भो देवि रात्रौ क्षुरिकया तदा ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! उसके घर में रहते हुए उसने बहुत सा रत्न संचित किया, रत्नों के लोभ से उसने रात्रि में घुरी से ॥ ५ ॥
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२८६ कर्मविपाकसंहिता
कृत्वा शिरश्छेदनं च सुप्तं निशि ममार तम् ।
तत्सर्वं भूमिमध्ये तु स्थापितं रत्नसंचयम्॥ ६ ॥
भा० टी० – उसका शिरच्छेदन कर सोते हुए उसको मार दिया और जितना उसका धन था उसको भूमि के मध्य में गाड़ दिया ॥ ६ ॥
भ्रातृजस्य धनं गृह्य व्ययं कृत्वा दिने दिने ।
ततो बहुदिने याते द्विजः पूर्वं मृतः स च ॥ ७ ॥
भा० टी० - भतीजे के धन को ग्रहण कर वह प्रतिदिन खर्च करता था, फिर वह द्विज अपनी पत्नी से पहले मर गया ॥ ७ ॥
पश्चात्पत्नी मृता तस्य तौ गतौ नरकार्णवे ।
षष्टिवर्षसहस्राणि महाकष्टेन पीडितौ ॥ ८ ॥
भा० टी० — पश्चात् उसकी पत्नी भी मर गई । तब वे दोनों नरक रूपी ( अर्णव )
समुद्र में प्राप्त हुए । साठ हजार वर्षों तक उन्होंने महाकष्टों को भोगा ॥ ८ ॥
नरकान्निःसृतौ द्वौ तु गजयोनी बभूवतुः ।
पुनः कच्छपयोनिर्वै गोधायोनी बभूवतुः ॥ ९ ॥
भा० टी० - और नरक से निकलकर दोनों हाथी हुए की योनि को प्राप्त हुए फिर कछुआ की योनि को प्राप्त होकर गोधा की योनि को प्राप्त हुए॥९॥
एवं योनित्रयं भुक्त्वा सरय्वा उत्तरे तटे ।
मानुषत्वं ततो लेभे भाग्यवान् साधुसंज्ञितः ॥ १० ॥
भा० टी० — इस प्रकार तीन योनियों को भोगकर फिर शरयू के उत्तर किनारे पर मनुष्य योनि को प्राप्त होते हुए भाग्यवान् साधु सम्मति वाले बन गये ॥ १० ॥
सुशीलसुमतिर्दक्षः स्वल्पविद्यायुतो नरः ।
अपुत्रो रोगवान् देवि भूपतिर्नरपूजितः ॥ ११ ॥
भा० टी० – सुंदर, शील- स्वभाव, शुद्धमति, थोड़ी विद्या से युक्त, पुत्र से रहित भूपति अर्थात् राजा और नरों से पूजित इस प्रकार के हो गये ॥ ११ ॥
पूर्वजन्मनि देवेशि भ्रातृपुत्रवधः कृतः ।
निशायां च पुरा देवि तेन दोषेण नो सुतः ॥ १२ ॥
भा० टी० — हे देवेशि! हे प्रिये! पूर्वजन्म में उसने रात में भतीजे का वध किया उस दोष से इसका पुत्र नहीं हुआ ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २८७
म्लेच्छस्य सेवनाद्देवि म्लेच्छस्याऽशुचिभाषणात् ।
तेन पापेन भो देवि शरीरे रोगसंभवः ॥ १३ ॥
भा० टी० - हे देवि! म्लेछ का सेवन करने से तथा म्लेछों से संभाषण करने से उसके शरीर में रोगों की उत्पत्ति हुई ॥ १३ ॥
यत्तु दानं कृतं पूर्वं दत्ता शय्या सुरेश्वरि! तत्फलेन महादेवि धनाढ्यत्वमजायत ॥ १४ ॥
भा० टी० - और हे सुरेश्वरि! पूर्वजन्म में शय्या दान करने से वह धनाढ्य होता गया ॥ १४ ॥
अनाचारः कृतः पूर्वं पुत्रदारयुतेन च ।
तेन पापेन भो देवि नरः कन्याप्रजो भवेत्॥ १५ ॥
भा० टी० - और पुत्र- दारा- सहित अनाचार में रत रहने से उसकी कन्या की संतान हुई ॥ १५ ॥
अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने! गायत्रीमूलमन्त्रेण पञ्चलक्षं वरानने!॥ १६ ॥
भा० टी ० — अब हे देवि! हे वरानने!! हे सुशोभने!!! उसकी शांति को कहता हूँ, तुम सुनो । गायत्री के मूल मंत्र का पांच लाख जप करें ॥ १६ ॥
जपं च कारयेद्देवि षडंशं दानमाचरेत् ।
होमं च कारयेत्कान्ते कुण्डे चैव सुसंस्कृते ॥ १७ ॥
भा० टी० - हे देवि! जप करवायें अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग का दान करें और शुद्ध कुंड बनाकर हवन करवायें ॥ १७ ॥
दशांशं तर्पणं देवि मार्जनं तद्दशांशतः ।
भ्रातृपुत्रस्य प्रतिमां कारयेदद्रिनन्दिनि! ॥ १८ ॥
भा० टी० — और उसका दशांश तर्पण, उसका दशांश मार्जन, करायें हे अद्रिनंदिनि! हे पार्वति! एक भाई के पुत्र की मूर्ति बनवायें ॥ १८ ॥
पलं दश सुवर्णस्य विधिवत्पूजयेत्ततः ।
मन्त्रेणानेन देवेशि गन्धधूपादिभिस्तथा ॥ १ ९ ॥
भा० टी ० — हे देवेशि! दशपल सुवर्ण की ( प्रतिमा ) बनाकर विधिवत्पूजन करें गंध, धूपादि से इस मंत्र से उसका पूजन करें ॥ १ ९ ॥
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२८८ कर्मविपाकसंहिता गणाधिप सुराध्यक्ष सर्वसिद्धिप्रदायक! मम पूर्वकृतं पापं तत्क्षमस्व दयानिधे!॥ २० ॥
भा० टी० - हाथ जोड़कर इस प्रकार कहें कि, हे गणाधिप! हे सुराध्यक्ष! हे सर्वसिद्धि- प्रदायक! हे दयानिधे! मेरे द्वारा पूर्वजन्म में किये पापों को शांत करो ॥२० ॥
रौप्यपात्रे स्थितां तां तु प्रतिमां प्रार्थयेत्ततः ।
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा पाप मम पुरा कृतम्॥ २१ ॥
भा० टी० – और रूपे के पात्र में उस मूर्ति को स्थापित कर प्रार्थना करें, कहें अज्ञान से अथवा प्रमाद से मैंने जो पूर्वजन्म में पाप किया ॥ २१ ॥
तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रपद्ये शरणं तव । ॐ गणपतये नमः ॐ लक्ष्म्यै नमः ॐ सूर्याय नमः ॐ शिवाय नमः ॐ विश्वयोनये नमः ॐ गरुडाय नमः ॐ नन्दिकेश्वराय नमः ॥
भिर्मन्त्रैस्तु सर्वाणि वस्तूनि दापयेत्ततः ।
कलशं पूजयेद्देवि गणाधिपस्वरूपिणम्॥ २२ ॥
भा० टी० — हे देव! उसको तुम शांत करो तुम्हारी शरण को प्राप्त हुआ हूँ ॐ गणपतये नमः १, ॐ लक्ष्म्यै नमः २, ॐ सूर्याय नमः ३, ॐ शिवाय नमः ४, ॐ विश्वयोनये नमः ५, ॐ गरुडाय नमः ६, ॐ नन्दिकेश्वराय नमः ७-इन मंत्रों से सब वस्तुओं का निवेदन कर फिर गणाधिपरूपी कलशका पूजन करें ॥ २२ ॥
गन्धपुष्पैश्च ताम्बूलैर्वस्त्रैर्नानाविधैरपि ।
प्रतिमां पूजितां देवि ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ॥ २३ ॥
भा० टी० — गंध पुष्प, तांबूल तथा नाना प्रकार के वस्त्रादि से पूजित प्रतिमा को ब्राह्मण को दान कर दें ॥ २३ ॥
दशवर्णास्ततो दद्याद्वृषमेकं वरानने! पञ्चपात्रं ततो दद्याद्ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ॥ २४ ॥
भा० टी० - हे वरानने! दशवर्णों वाली गाय और एक बैल तथा पंच पात्र को ब्राह्मण को दान करें पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन करायें ॥ २४ ॥
रविवारेण संयुक्तसप्तम्यां विधिपूर्वकम् ।
उपोषणं नियमतः पल्या सह वरानने! ॥ २५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २८९ भा० टी० — हे वरानने! रविवार से युक्त सप्तमी के दिन विधिपूर्वक व्रत करें नियम से स्त्री सहित ॥ २५ ॥
सप्तवत्सरपर्यन्तं प्रकुर्य्याद्वै सुरेश्वरि! ततस्तूद्यापनं कुर्याद्यथाशक्ति सदाशिवे ॥ २६ ॥
भा० टी० - हे सुरेश्वरि! सात वर्ष पर्यंत व्रत करें । हे सदाशिवे! फिर उद्यापन करें शक्ति के अनुसार ( दक्षिणा दें ) ॥ २६ ॥
दद्याद्विप्राय विदुषे श्रोत्रियाय तपस्विने ।
कूष्माण्डं नारिकेलं च पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ २७ ॥
भा० टी० - वेद को पढ़ने वाले तपस्वी उत्तम ब्राह्मण को दान करें और पंचरत्नों से युक्त पेठे का दान करें ॥ २७ ॥
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं पूर्वपापविशुद्धये ।
एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ॥ २८ ॥
भा० टी० - पूर्वपाप की शुद्धि के लिये गंगाजी के मध्य में विसर्जित करें । इस प्रकार हे वरारोहे! शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥
सर्वे रोगाः क्षयं यान्ति नीहारा भास्कराद्यथा ॥ २ ९ ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराषाढानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चाऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
भा० टी० - इस प्रकार सब रोग नाश को प्राप्त होते हैं । सूर्य्य के तेज से जैसे नीहार अर्थात् ओस के कण अथवा बर्फ नष्ट होते हैं ॥ २ ९ ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां० उत्तराषाढा०द्वितीयचरण० प्रायश्चित्तकथनं नाम पंचाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
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॥८६ ॥
उत्तराषाढानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
मध्यदेशे महादेवि ब्राह्मणो वेदपारगः ।
जयदेवाभिधो विप्रो विख्यातश्चातिशीलवान् ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे महादेवि! मध्यदेश में जयदेव नामक विख्यात वेदों को जानने वाला अतिशील स्वभाव वाला ब्राह्मण रहता था ॥१ ॥
तस्य भार्या शीलवती सुशीला शीलरूपिणी ।
तस्याः पुत्रत्रयं जातं गुणज्ञं वेदपारगम्॥ २ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री शीलस्वभाव वाली सुशीला नामक साक्षात् शील रूपिणी थी उसके तीन पुत्र गुणी और वेदों को जानने वाले हुए ॥ २ ॥
पुत्राः सर्वे गुणज्ञाश्च वेदवेदाङ्गपारगाः ।
ज्येष्ठपुत्रस्य चोद्वाहे स्वसा तस्य समागता ॥ ३ ॥
भा० टी० - संपूर्ण पुत्र गुणज्ञ और वेद - वेदांगों के मर्मज्ञ थे, उनमें से ज्येष्ठपुत्र के विवाह में उस ब्राह्मण की भगिनी अर्थात् बहन आई थी ॥ ३ ॥
भगिन्याश्चादरं कृत्वा बहुमानेन पार्वति! विवाहे च समाप्ते तु ज्ञातयः स्वेषु वेश्मसु ॥ ४ ॥
भा ० टी ० — हे पार्वति! उस ब्राह्मण ने बहुत सम्मानपूर्वक बहन का आदर किया, फिर विवाह समाप्त होने पर उसके भाई -बांधव सब अपने -अपने घरों को गये ॥४ ॥
गताः सर्वे विशालाक्ष्ययाचयद्भगिनी च सा ।
ताटङ्कं स्वर्णरत्नाढ्यं भ्रातृपत्नीप्रकोपिता ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे विशाल नेत्रों वाली! तब उस ब्राह्मण की बहन ने अपने भाई से सुवर्ण रत्नों से जड़े हुए ताटंक नामक ( दंड ) आभूषण को माँगा, किन्तु उसकी स्त्री ने कहा कि नहीं देंगे । ऐसा कहते हुए भाई की स्त्री से प्रकुपित हुई ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २९१
श्रुत्या सवत्सा तु तदा याता स्ववेश्मनि ।
स्त्रीस्वभावाच्च देवेशि मृता सा भगिनी गृहे ॥ ६ ॥
भा० टी० - और ईर्ष्या युक्त का वचन को सुनकर वह अपने पुत्र सहित भी अपने घर को चली गयी और हे देवेशि! स्त्री - स्वभाव वश वह अपने घर में आकर मर गई ॥ ६ ॥
तदुद्देशेन देवेशि शरीरं निशि साऽत्यजत् ।
ततो बहुदिने याते तस्य मृत्युरभूत्तदा ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवेशि! उस क्रोध से अपने शरीर को उसने रात्रि में त्याग दिया ।
पश्चात् बहुत दिन व्यतीत होने पर उस ब्राह्मण की भी मृत्यु हो गई ॥ ७ ॥
पत्नी तस्य सती जाता सत्यलोकमभूत्तदा ।
वर्षं कोटित्रयं देवि सत्यलोकेऽवसत्पुनः ॥ ८ ॥
भा० टी० — तब उसकी स्त्री सती हो गई तो फिर उसे सत्यलोक की प्राप्ति हुई, हे देवि! वह फिर तीन कोटि वर्षों तक सत्यलोक में वास करती रही ॥ ८ ॥
मर्त्यलोके मनुष्यत्वं लब्धं पुण्यक्षये सति ।
धनधान्यसमायुक्तो विद्यावान् शास्त्रपारगः ॥ ९ ॥
भा० टी० - और पुण्य पूरे होने पर पश्चात् मृत्युलोक में मनुष्य शरीर को प्राप्त हुए वह धनधान्य से युक्त, विद्या से युक्त, शास्त्रों को जानने वाला अर्थात् पारंगत हुआ ॥९ ॥
कृतं तेन पुरा पापं भगिन्या दारकारणात् ।
पुत्रो न जायते देवि कन्योत्पन्ना विनश्यति ॥ १० ॥
भा० टी० - उसने अपनी स्त्री के वश होकर बहन मरण का पाप किया, हे देवि! इस कारण से उसका पुत्र नहीं जन्मता और कन्या जन्म होने के बाद नष्ट होती है ॥१० ॥
शरीरे सततं दुःखं मध्ये तस्य प्रजायते ।
काकवन्ध्या भवेद्भार्या मृतवत्सा सुदुःखिता ॥ ११ ॥
भा० टी० – उसके शरीर में सदा दुःख रहता है और उसकी स्त्री काकवन्ध्या अर्थात् एक ही संतान जन्मने वाली होती है अथवा संतान हो-होकर मरती है और दुःखी रहती है ॥ ११ ॥
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२९ २ कर्मविपाकसंहिता अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि तत्सर्वं शृणु पार्वति! गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे पार्वति! अब इसकी शांति को कहता हूँ तुम ध्यान से सुनो घर में जो धन हो, उसके छठे भाग का पुण्य हेतु दान करें ॥ १२ ॥
वापीकूपतडागानां जीर्णोद्धारं प्रयत्नतः ।
वाटिकां मार्गमध्ये तु सहितां शीतवारिणा ॥ १३ ॥
भा० टी० — बावड़ी, कुआँ, तालाब जीर्णोद्धार अर्थात् खंडित को सुधरवायें मार्ग में गमन करने वाले मनुष्यों का हित करने वाली शीतल जल से युक्त बगीची बनवायें ॥१३ ॥
गायत्रीजातवेदाभ्यां जपं वै कारयेत्ततः ।
लक्षद्वयं विशालाक्षि हवनं तद्दशांशतः ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! गायत्री और जातवेद० मंत्रों से दो लाख तक जप करायें पश्चात् उसके दशांश का हवन करायें ॥ १४ ॥
तर्पणं मार्जनं तद्वगोदानं विधिवत्ततः ।
एवं कृते वरारोहे तस्य पुत्रः प्रजायते ॥ १५ ॥
भा० टी० - तर्पण और मार्जन उसी प्रकार गोदान विधिपूर्वक करायें । हे वरारोहे! ऐसा करने से उसके पुत्र उत्पन्न होता है ॥ १५ ॥
गुणज्ञः सर्ववस्तूनां साधूनां संमतस्तथा ।
स्वर्णदानं विशालाक्षि पलपञ्चमितं तथा ॥ १६ ॥
भा० टी ० — उसका पुत्र संपूर्ण वस्तुओं के गुणों को जानने वाला और सज्जनों में सम्मानित होता है । हे विशालाक्षि! पांच पल सुवर्ण का दान करें ॥ १६ ॥
ब्राह्मणाय ततो दद्यात्पूजयेद्युवतिं ततः ।
वस्त्रालंकारसिन्दूरैर्गन्धाद्यैः सुमनोहरैः ॥ १७ ॥
भा० टी० – दान ब्राह्मण को दें और पश्चात् युवती स्त्री का पूजन करें वस्त्र, आभूषण, सिंदूर, गंध आदि मनोहर वस्तुओं से ॥ १७ ॥
ताटङ्कैर्मुद्रिकाभिश्च गन्धमाल्यैस्तथैव च ।
सर्वपापं क्षयं याति व्याधिनाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ १८ ॥
भा० टी० – ताटंक आभूषणों से, मुद्रिकाओं से, गंधमालाओं से पूजन करें तो संपूर्ण पापों का नाश होता है और व्याधि भी नष्ट होती है ॥ १८ ॥