कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 301–310
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 301–310
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कर्मविपाकसंहिता २९३
ब्राह्मणीं पार्वतीरूपां ब्राह्मणं शिवरूपिणम् ।
भोजयेद्विविधैश्चान्नैर्मोदकैः शतसंख्यकैः ॥ १ ९ ॥
भा० टी० - ब्राह्मणी को पार्वती के रूपवाली समझकर और ब्राह्मण को शिव रूप समझकर लड्डुओं से भोजन करायें अन्य और भी सेकड़ों विधि से पदार्थों से तृप्त करें ॥ १ ९ ॥
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं मृतवत्सा च पुत्रिणी ।
कन्यकाजननी या तु पुत्रवत्यपि जायते ॥ २० ॥
भा० टी० - ऐसा करने से काकवंध्या स्त्री के गर्भ से पुत्र जन्मता है, मृतवत्सा भी पुत्र वाली होती है और कन्या जन्मने वाली स्त्री भी पुत्र वाली होती है ॥ २० ॥
एवं न जायते चेत्तु सप्तजन्मस्वपुत्रकः ॥ २१ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराषाढानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
भा० टी० - ऐसा नहीं करने से सात जन्म तक भी वह अपुत्र रहता है ॥ २१ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराषाढानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
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1129 11 उत्तराषाढानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
गुर्जरे नगरे देवि न्यवसञ्ज्ञानवान् द्विजः ।
बलभद्रः समाख्यातो वेदानां पाठकः सुधीः ॥ १ ॥
भा० टी० – शिवजी कहते हैं -हे देवि! गुर्जर नामक नगर में एक ज्ञानवान् ब्राह्मण वास करता था, बलभद्र नाम से विख्यात वह वेदों का पाठ करने वाला सुंदर बुद्धि वाला था ॥१ ॥
ऋग्वेदं च यजुर्वेदं सामवेदमथर्वणम् ।
पठितं चैव कुरुते चतुर्वेदी द्विजोत्तमः ॥ २ ॥
भा० टी० – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद-इन सबका पाठ करता था, ऐसा वह चार वेद युक्त सभी ब्राह्मणों में उत्तम हुआ ॥ २ ॥
एकस्मिन् दिवसे देवि देशे कश्चिन्मृतः खलु ।
भोजनं तेन संस्कारं विना तत्र कृतं प्रिये! ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे देवि! एक दिन उस देश में कोई मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हुआ, वहां हे प्रिये! संस्कार किये विना उस ब्राह्मण ने भोजन कर लिया ॥ ३ ॥
म्लेच्छद्रव्यं गृहीतं च भुक्तं पुत्रयुतेन च ।
पल्या सह वरारोहे ततो वृद्धवयो गतः ॥ ४ ॥
भा० टी० –-म्लेच्छ के धन को दान में ले लिया और पुत्र सहित भोगता गया हे वरारोहे! पश्चात् वृद्ध अवस्था को प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
मरणं तस्य वै जातं शंकेश्वरपुरे यदा ।
यमाज्ञया तदा देवि यमदूतैरितस्ततः ॥ ५ ॥
नरके पातितं पश्चान्मर्त्यलोके ततोऽगमत्।
कुक्कुटत्वं विशालाक्षि काकं पारावतं ततः ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २९ ५ भा० टी ० — फिर शंकेश्वरपुर में वह मृत्यु को प्राप्त हुआ, हे देवि! तब धर्मराज की आज्ञा से धर्मराज के दूतों ने उसे भटकाते हुए नरकों में गिराया फिर मुर्गा, कौआ, कबूतर- इन शरीरों को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥ ६ ॥
मानुषत्वं पुनर्लेभे शुभे देवि कुले महत् ।
स पण्डितो महाविद्वान् ज्ञातिधर्मविचक्षणः ॥ ७ ॥
भा० टी ० — हे देवि! पश्चात् मनुष्य शरीर को प्राप्त हुआ, बड़े सुंदर कुल में जन्म लेकर महाविद्वान् पण्डित और ज्ञातिधर्म को जानने वाला है ॥७ ॥
पूर्वजन्मनि देवेशि म्लेच्छान्नभोजनं कृतम् ।
तेन पापेन भो देवि पुत्रः कन्या न जायते ॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवेशि! पूर्व जन्म में उसने म्लेच्छ के अन्न का भोजन किया, हे देवि! उस पाप से उसके पुत्र, कन्या का जन्म नहीं होता ॥ ८ ॥
प्रेतान्नभोजनं कृत्वा संस्कारो न कृतः पुरा ।
तेन पापेन भो देवि शरीरे रोगसंभवः ॥ ९ ॥
भा० टी० - और पूर्व जन्म में प्रेत के अन्न का भोजन करके संस्कार नहीं किया ।
हे देवि! उस पाप से उसके शरीर में रोग सदा रहता है ॥ ९ ॥
अस्य शान्तिं शृणुष्वादौ पूर्वपापप्रणाशिनीम् ।
गृहवित्ताष्टमं भागं ब्राह्मणाय प्रकल्पयेत्॥ १० ॥
भा० टी००.- अब पूर्वजन्म के पूर्वपाप को नाश करने वाली इसकी शांति को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो, घर में जो धन हो, उसके अष्टम भाग को ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक दान कर दें ॥ १० ॥
गायत्रीमूलमन्त्रेण दशायुतजपं ततः ।
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी ० – और गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें और उसके दशांश का हवन तथा तर्पण और मार्जन करायें ॥ ११ ॥
दशवर्णां ततो दद्याच्छय्यादानं विशेषतः ।
कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ॥ १२ ॥
भा० टी० - दशवर्ण की गायों का दान तथा विशेष करके शय्या का दान करें पेठा, नारियल इनमें पंचरत्न भरकर तैयार करें ॥ १२ ॥
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२९६ कर्मविपाकसंहिता
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं पूर्वपापप्रणाशनम्।
एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ॥ १३ ॥
भा० टी०--इनका गंगाजी के मध्य दान करने से पूर्वपापों का नाश होता है, हे वरारोहे! ऐसा करने से शीघ्र ही पुत्र जन्मता है ॥ १३ ॥
व्याधयः संक्षयं यान्ति काकवन्ध्या लभेत्सुतम्॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराषाढानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्ताऽशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
भा० टी० - और उसकी व्याधि नष्ट होती है, काकवंध्या स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १४ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराषाढानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
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112211 श्रवणनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पवनस्य महादेशे मारुते नगरे शुभे ।
गौतमो नाम विख्यातो ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं-- पवन के विशाल देश में मारुत नामक सुंदर नगर में गौतम नाम से विख्यात वेद को जानने वाला ब्राह्मण रहता था ॥ १ ॥
तस्य भार्या विशालाक्षि मालिनी मातृपालिनी ।
धनं च बहु संगृह्य म्लेच्छसेवारतो हि सः ॥ २ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! उसकी स्त्री मालिनी नाम वाली माता की सेवा करने वाली थी, वह ब्राह्मण बदले में धन लेकर म्लेच्छों की सेवा में रत रहता था ॥ २ ॥
तस्य मित्रो द्विजः कश्चित् तपस्वी सत्यवाक् शुचिः ।
आगतस्तस्य निकटे प्रेम्णा तत्र तपोऽकरोत् ॥ ३ ॥
भा० टी० - उसका मित्र कोई ब्राह्मण तपस्वी, सत्य बोलने वाला तथा पवित्र मन वाला था, वह उसके समीप आकर प्रेम से वहाँ तप करने लगा ॥३ ॥
अब्दे चैके ततो जाते पुनः काश्यां गतोऽपि सः ।
स्वर्णरत्नं महादेवि गौतमाय समर्पितम्॥ ४ ॥
भा० टी० - एक वर्ष पश्चात्, हे महादेवि! सुवर्ण रत्न गौतम को समर्पण करके वह काशी को गया ॥४ ॥
रक्षार्थं तेन द्रव्यं च गृहीतं गौतमेन च ।
वाराणस्यां ततो गत्वा तपस्वी प्राणमत्यजत् ॥ ५ ॥
भा० टी० - उसने कहा कि द्रव्य की रक्षा करना, तब गौतम ने रक्षा के निमित्त वह द्रव्य ग्रहण किया, फिर वह तपस्वी काशी में जाकर मर गया ॥ ५ ॥
गौतमेन तु स्वद्रव्यं स्थापितं भूमिमध्यके ।
तद्द्रव्यं ब्राह्मणस्यैव पुत्रदारयुतेन च ॥ ६ ॥
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२९ ८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - और गौतम ने अपना धन तो भूमि में गाड़ दिया, उस ब्राह्मण के धन को स्त्री-- पुत्र से युक्त होकर भोगता रहा ॥ ६ ॥
भक्षितं तेन विक्रीय बहुवर्षे गते शिवे! गौतमस्य ततो मृत्युर्वृद्धे जाते वरानने! ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे शिवे! उस स्वर्ण रत्न को बेचकर उसने बहुत वर्ष व्यतीत किये पश्चात् वृद्ध होने पर गौतम की मृत्यु हुई ॥ ७ ॥
गन्धर्वस्य ततो लोकं विंशतिर्वै सहस्रकम् ।
तेन भुक्तं विशालाक्षि गन्धर्वैः सह किन्नरैः ॥ ८ ॥
भा० टी० — फिर हे विशालाक्षि! बीस हजार वर्षों तक गंधर्व लोक को गंधर्व किन्नरों के साथ भोगता रहा ॥ ८ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते हंसयोनि ततोऽगमत् ।
मृगयोनिं ततो भुक्त्वा मानुषत्वं ततोऽगमत् ॥ ९ ॥
भा० टी० – पुण्य पुरा होने पर वह हंस योनि में जन्मा, पश्चात् मृगयोनि में जन्मा, वह उन योनियों को भोग कर मनुष्य शरीर में पैदा हुआ ॥ ९ ॥
स भाग्यवान् महाधीरः पुण्याचारे सदा मतिः ।
पूर्वजन्मनि देवेशि मित्रद्रव्यविनाशनम्॥ १० ॥
भा ० टी० - वह बड़े भाग्य वाला, महाधीर, पुण्य कर्म में सदा मति रखने वाला है । हे देवेशि! इसने पूर्वजन्म में मित्र के धन का नाश किया था ॥ १० ॥
अदत्तं यद्विशालाक्षि तेन पापेन तत्प्रिया ।
वन्ध्या भवति वै नारी काकवन्ध्या च जायते ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! जो इसने मित्र का धन उसको नहीं दिया था उस पाप से इसकी स्त्री काकवंध्या हुई ॥ ११ ॥
रोगयुक्तोऽभवद्देहो ज्वराश्च विविधास्तथा ।
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु देवि सुशोभने! ॥ १२ ॥
भा० टी ० — हे देवि! उसकी देह रोग से युक्त है । उसके शरीर में नाना प्रकार के ज्वर रहते हैं, अब इसकी शांति को कहता हूँ । सुनो ॥१२ ॥
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
वापीकूपतडागानि जीर्णोद्धारं च कारयेत् ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता २९९ भा० टी० - घर के षडांश धन को पुण्य हेतु दान करें बावड़ी, कूआँ, तालाबों का जीर्णोद्धार करें ॥ १३ ॥
गायत्रीमूलमन्त्रेण दशायुतजपं ततः ।
हवनं तद्दशांशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ १४ ॥
भा० टी० – गायत्री के मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें उसके दशांश का हवन करायें ऐसे पुण्यकर्म करायें ॥ १४ ॥
गामेकां तरुणीं शुभ्रां कांस्यदोहां सवत्सकाम् ।
सतीं सवस्त्रां विप्राय दद्याद्वेदविदे ततः ॥ १५ ॥
भा० टी० - एक युवा, सुंदर रूप वाली, सवत्सा कांस के दोहन पात्र युक्त सुंदर जरीवनी पीठ वस्त्र उठा कर वेद को जानने वाले ब्राह्मण को दान करें ॥ १५ ॥
ब्राह्मणान्भोजयेद्दत्वा यथा शक्त्या तु दक्षिणाम् ।
ज्ञातिभिः सह भुञ्जीत ततो नृत्यं तु कारयेत्॥ १६ ॥
भा० टी० - दान देकर ब्राह्मणों को भोजन करायें और अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा दें और अपने भाइयों के संग भोजन करें पश्चात् नृत्य करायें ॥ १६ ॥
पुराणश्रवणं देवि चण्डिकाचरणार्चनम् ।
अन्नदानं च भो देवि घृतदानं विशेषतः ॥ १७ ॥
भा० टी० — हे देवि! पुराणों का श्रवण करें और देवी के चरणों का पूजन करें हे देवि! अन्न का दान और घृत का दान विशेष करके करायें ॥ १७ ॥
एवं कृते न संदेहो वंशवृद्धिर्भविष्यति ।
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति सुखानि विविधानि च ॥ १८ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्रवणनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से वंश की वृद्धि होती है, इसमें संदेह नहीं करना । रोग सब नष्ट होते हैं अनेक प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं ॥ १८ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे श्रवणनक्षत्र० प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
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॥८ ९ ॥ श्रवणनक्षत्रस्य द्वितीचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
गान्धारदेशे वै शुभ्रे गान्धारस्य पुरे शुभे ।
वसन्ति तत्र बहवो जनाः पुण्योपजीविनः ॥ १ ॥
भा ० टी० – शिवजी कहते हैं - अत्यन्त गांधार देश में सुंदर गांधार नामक पुर है, वहाँ पुण्योपजीवी जन अर्थात् पुण्य से जीने वाले नागरिकजन निवास करते हैं ॥ १ ॥
तन्मध्ये ब्राह्मणोऽप्येको लक्ष्मीवान् गुणवर्जितः ।
यवनानां महन्मित्रं सार्द्धं म्लेच्छेन तिष्ठति ॥२ ॥
भा० टी० – उन के मध्य एक लक्ष्मी ( धन ) से युक्त गुणहीन ब्राह्मण म्लेच्छों के संग स्थित रहता था ॥ २ ॥
ऊर्णादिकं वरारोहे विक्रयं कुरुते सदा ।
म्लेच्छान्नं भुज्यते नित्यं म्लेच्छभार्याविहारकृत्॥ ३ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! वह ब्राह्मण ऊन का सदा विक्रय करता था और नित्य म्लेच्छों के अन्न का भोजन करता था और म्लेच्छों की स्त्रियों से प्रेमपूर्वक विहार करता था ॥ ३ ॥
एवं बहु वयो जातं ततो वै मरणं खलु ।
यमदूतैर्महाघोरैर्नरकेऽत्यन्तदारुणे ॥ ४ ॥
भा० टी० - ऐसा करते हुए बहुत अवस्था व्यतीत हो गई, वृद्ध होकर पश्चात् मृत्यु को प्राप्त हुआ, तब धर्मराज के महाघोर दूतों ने उसे दारुण नरक में डाल दिया ॥४ ॥
निक्षिप्तं तेन वै देवि षष्टिवर्षसहस्रकम् ।
भुक्तं सुदुःसहं कर्म विविधं नरके फलम्॥ ५ ॥
भा० टी० -तब वहाँ उसने साठ हजार वर्षों तक अपने दुःसहकर्म के कारण हे देवि! नाना प्रकार के नरकों के फल को भोगा ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३०१
नरकान्निःसृतो देवि वृकयोनिरभूत्पुरा ।
रासभस्य ततो योनिमृक्षत्वेऽभूत्पुनः प्रिये! ॥ ६ ॥
भा० टी० — हे देवि! नरक से निकल कर बाघ की योनि में जन्मा, पश्चात् गधे की योनि में जन्मा, फिर हे प्रिय! रीछ की योनि में जन्म लिया ॥६ ॥
मानुषत्वं पुनर्लेभे मध्यदेशे सुरेश्वरि! पूर्वजन्मनि म्लेच्छान्नं भुक्तं पुत्रेण वै शिवे! ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे सुरेश्वरि! फिर मध्य देश में मनुष्य शरीर को प्राप्त हुआ, हे शिवे! पूर्वजन्म में उसने अपने पुत्र व स्त्री सहित म्लेच्छों के अन्न का भोजन किया था ॥७ ॥
अतो वंशस्य विच्छेदो व्याधीनां चोद्भवस्तथा ।
अस्य दोषस्य वै शान्तिं शृणु मे परमेश्वरि! ॥८ ॥
भा० टी० - इस प्रकार पूर्वजन्म कर्मफल से उसके वंश का विच्छेदन और उसके शरीर में अनेक व्याधियों की उत्पत्ति होती है परमेश्वर! इस पूर्वजन्म के दोष की शांति को मुझसे सुनो ॥८ ॥
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं वरानने! हवनं तद्दशांशेन तर्पणं मार्जनं तथा ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे वरानने! गायत्री मंत्र का एक लाख तक जप करायें उसके दशांश हवन, तर्पण, मार्जन करायें ॥ ९ ॥
सवृषं पञ्चगोदानं वस्त्रदानं विशेषतः ।
सहस्रघटदानं च गोदानं च सुरेश्वरि! ॥ १० ॥
भा० टी० – हे सुरेश्वरि! वृषभ ( बैल) सहित पाँच गायों का दान करें तथा विशेष करके वस्त्रों का दान करें हजार घटों का दान और गोदान - ये सब श्रद्धा सहित कराये ॥ १० ॥
एवं कृते न संदेहो वंशवृद्धिर्भविष्यति ।
रोगा विनाशमायान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्रवणनक्षत्रस्य द्वितीचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से वंश की वृद्धि होती है इसमें संदेह नहीं है और सम्पूर्ण रोग नष्ट होते हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना ॥ ११ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे श्रवणनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८ ९ ॥
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॥९ ० ॥ श्रवणनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
काश्मीरनगरे देवि ब्राह्मणोऽध्यवसत्पुरा ।
खण्डशर्मेति विख्यातो गङ्गाख्या स्त्री तु कर्कशा ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! काश्मीर नगर में बहुत पहले एक ब्राह्मण वास करता था, वह खंडशर्मा नाम की विख्यात था और गंगा नाम की उसकी स्त्री बड़ी कर्कशा थी ॥ १ ॥
पतिवाक्यं न साकार्षीद्विक्रयं कुरुते सदा ।
घृततैलं च देवेशि दधि तक्रं पुनर्गुडम् ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवेशि! वह पति के वचन को सहन नहीं करती थी सदा घृत, तेल, दधि, तक्र तथा गुड को बेचाकरती थी ॥ २ ॥
अश्वं च वृषभं चैव चामरं धातुवस्तु च ।
प्रत्यहं विक्रयं कर्त्री व्ययकर्त्री दिने दिने ॥ ३ ॥
भा० टी० - घोड़ा, वृषभ, चमर, धातुमय वस्तु-इन सब को नित्य बेचती थी ॥ ३ ॥
एवं सर्वं वयो जातं वृद्धे सति वरानने! मरणं तस्य वै जातं ब्राह्मणस्य तदा शिवे! ॥४ ॥
भा० टी०० - इसप्रकार संपूर्ण अवस्था व्यतीत हो गई, तब उसके वृद्ध होने पर हे वरानने! उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी ॥ ४ ॥
धर्मराजाज्ञया दूतैर्नरके कर्द्दमे तथा ।
निक्षिप्तः षष्टिसाहस्त्रं भुक्त्वा वै यातना तथा ॥ ५ ॥
भा ० टी ० — धर्मराज की आज्ञा से दूतों ने कर्दम नामक नरक में साठ हजार वर्षों तक उसे पटका, वहाँ पीड़ा को भोग कर ॥ ५ ॥
नरकान्निःसृतो देवि वृकयोनिस्ततोऽभवत् ।
रासभस्य पुनर्योनिर्मेषयोनिस्ततोऽभवत्॥ ६ ॥