कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 311–320

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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कर्मविपाकसंहिता ३०३ भा० टी० - नरक से निकल कर वह भेड़ की योनि को प्राप्त हुआ, फिर गधे को योनि फिर मेंढा की योनि प्राप्त हुआ ६ ॥ मानुषत्वं पुनर्लेभे मध्यदेशे वरानने! धनधान्यसमायुक्तः पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ ७ ॥

भा० टी० - हे वरानने! पश्चात् वह मध्य देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ धनधान्य से युक्त और पुत्र - कन्या से हीन है ॥ ७ ॥

पुनर्विवाहिता सा तु पूर्वजन्मफलाच्छुभे! शरीरे सततं रोगा वायोः संजायते शिवे! ॥ ८ ॥

भा० टी० - हे शुभे! पूर्वजन्म के फल से वही स्त्री उससे विवाही गई और इसके शरीर में निरंतर वायु के रोग रहते हैं ॥ ८ ॥

ब्राह्मणस्य स्वयं धर्मं यतस्त्यक्तं पुरा शुभे! अतः पुत्रविहीनेयं मृतवत्सात्वमाप्नुयात्॥ ९ ॥

भा० टी० - हे शुभे! क्योंकि पूर्वजन्म में इसने ब्राह्मण के धर्म त्याग दिये थे, इसलिये यह पुत्र - हीन है तथा उसकी स्त्री मृतवत्सा है ॥९ ॥

अस्य शान्तिमहं वक्ष्ये शृणु देवि सुशोभने! गृहवित्तषडंशं च ब्राह्मणाय समर्पयेत् ॥ १० ॥

भा० टी ० – अब इसकी शांति कहता हूँ हे देवि! ध्यान से सुनो, घर के धन में से छठे द्रव्य भाग को ब्राह्मण को दान करें ॥ १० ॥

गायत्रीं चायुतं जप्त्वा मूलमन्त्रं शिवस्य तु ।

षडक्षरं सप्रणवं लक्षमेकं वरानने! ॥ ११ ॥

भा० टी० - और दश हजार गायत्री मंत्र का जप करवा कर हे वरानने! शिव के मूल मंत्र ( ॐ नमः शिवाय ) इस छह अक्षरों के मंत्र एक लाख जप करवायें ॥ ११ ॥

हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ।

ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या हविषा पायसेन च ॥ १२ ॥

भा० टी० - उसका दशांश हवन, तर्पण तथा मार्जन करायें, फिर भक्ति सहित घृत, खीर आदि के भोजन से ॥ १२ ॥

पञ्चाशत्संख्यया देवि यथाशक्त्या तु दक्षिणाम् ।

प्रयागे माघमासे तु स्नानं भार्यासमन्वितः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 312

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३०४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - पचास ब्राह्मणों को भोजन करायें, हे देवि! शक्ति के अनुसार दक्षिणा दें, माघ महीनें में स्त्री सहित होकर प्रयागजी में स्नान करें ॥ १३ ॥

कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।

गङ्गामध्ये प्रदातव्यं विधिपूर्वं वरानने!॥ १४ ॥

भा० टी० – हे वरानने पेठे और नारियल को पाँच रत्न से भरके विधिपूर्वक गंगाजी के मध्य में दान करें ॥ १४ ॥

एवं कृते न संदेहो वंशवृद्धिर्भवेदनु ।

रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति वन्ध्या भवति पुत्रिणी ॥ १५ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्रवणनक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ० ॥ भा० टी० - ऐसा करनें से वंश की वृद्धि होती है, इसमें संदेह नहीं है और संपूर्ण रोग नष्ट होते हैं और वंध्या स्त्री पुत्र वाली होती है ॥ १५ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां श्रवणन० तृतीयच० प्रायश्चित्तकथनं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥

पृष्ठ 313

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॥९ १ ॥ श्रवणनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

अट्टकस्य प्रतीच्यां तु यादवं नाम वै पुरम् ।

वसन्ति बहवो देवि जनाः कर्मविचक्षणाः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - अटक देश के पश्चिम की तरफ यादव नाम वाला पुर है, वहाँ बहुत से जन अपने - अपने कर्मों में निपुण होकर द्धह्ववास करते हैं ॥ १ ॥

तन्मध्ये ब्राह्मणोऽप्येकः सिद्धलाल इति श्रुतः ।

तस्य भार्या विशालाक्षि देवीनाम्नी सदाशिवे! ॥ २ ॥

भा० टी० - उनके मध्य में एक सिद्धलाल नाम वाला ब्राह्मण रहता था, हे विशालाक्षि! उसकी स्त्री का नाम देवी थी ॥ २ ॥

पतिव्रता गुणोपेता मिष्टवाक्यप्रवादिनी ।

सिद्धलालो महाचौरश्चौर्य्यवृत्तिरतः सदा ॥ ३ ॥

भा० टी० — वह पतिव्रता, गुणों से युक्त और मिष्ट वचन बोलने वाली थी और वह सद्धिलाल महाचोर था, सदा चोरी की वृत्ति किया करता था ॥३ ॥

दारपुत्रादिभृत्यानां चौर्येण पोषणं कृतम् ।

एवं सर्वं वयो जातं ततो मृत्युमुपागमत् ॥ ४ ॥

भा० टी० – स्त्री, पुत्र, भृत्य आदि का पोषण ( पालन ), चोरी वृत्ति से ही वह किया करता था, ऐसे उसकी संपूर्ण अवस्था व्यतीत हो चुकी, तब वह मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥४ ॥

तस्य भार्या सती जाता तत्प्रभावाद्वतो द्विजः ।

सत्यलोके वरारोहे सततं विविधं सुखम्॥ ५ ॥

भा० टी० - उसके मरने पर उसकी स्त्री सती हो गई । हे वरारोहे! उसके प्रभाव से वह ब्राह्मण सत्यलोक को प्राप्त हो गया और वहाँ वह अनेक प्रकार के सुखों को भोगता गया ॥ ५ ॥

पृष्ठ 314

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३०६ कर्मविपाकसंहिता

भुक्तं पुर्वकृतात्पुण्यात्ततः पुण्यक्षये सति ।

मानुषत्वे पुनर्जन्म दुर्लभं सर्वदेहिनाम् ॥ ६ ॥

भा० टी० - पूर्वपुण्य के प्रभाव से उसने सब फल भोगे, पश्चात् पुण्य क्षीण होने पर सब देहधारियों को जो दुर्लभ है, ऐसे मनुष्य शरीर को प्राप्त किया ॥ ६ ॥

धनधान्येन संयुक्तः कन्यापुत्रविवर्जितः ।

ब्राह्मण्यं च यतस्त्यक्त्वा शूद्रकर्म समाचरत्॥ ७ ॥

भा० टी० – वह धनधान्य से युक्त है और पुत्र- कन्या से रहित है । इसने पूर्वजन्म में ब्राह्मण के कर्म को त्यागकर शूद्र भाव को प्राप्त किया था ॥ ७ ॥

परद्रव्यं ऋतं देवि तस्माद्व्याधिरजायत ।

तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि यत्कृतं पूर्वजन्मनि ॥ ८ ॥

भा० टी० - और हे देवि! पराया द्रव्य हरा था, इसलिये इसके शरीर में रोग हैं ।

अब इसके पूर्वपापों की शांति कहता हूँ॥ ८ ॥

गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

दशवर्णाप्रदानं च पूर्वपापविशुद्धये ॥ ९ ॥

भा० टी० - घर के धन में से आठवें भाग को पुण्य-कार्य में खर्च करें और दश वर्ण वाली गायों का दान पूर्वपाप की शुद्धि के लिये करना चाहिए ॥ ९ ॥

शय्यादानं ततः कुर्यादेकादश्यां व्रतं शुभम् ।

गायत्रीमूलमन्त्रेण विष्णुमन्त्रेण सुन्दरि! ॥ १० ॥

भा० टी० - फिर शय्या का दान करें पश्चात् उत्तम एकादशी का व्रत करें । हे सुदंरि! गायत्री के मूल मंत्र से अथवा विष्णु के मंत्र से ॥१० ॥

लक्षजाप्यं प्रयत्नेनाऽश्वत्थबिल्वतलेऽबले! दशांशहवनं कुर्यात्तर्पणं मार्जनं तथा ॥ ११ ॥

भा० टी० – प्रयत्नपर्वक एक लाख तक जप करायें, हे अबले! पीपल अथवा बेल के वृक्ष के नीचे उसका दशांश हवन, उसका दशांश तर्पण और उतना ही मार्जन करायें ॥ ११ ॥

विप्राणां भोजनं देवि घटदानं विशेषतः ।

एवं कृते न संदेहो वंशो भवति नान्यथा ॥ १२ ॥

भा० टी० — हे देवि! ब्राह्मणों को भोजन कराकर, घट-दान करें । ऐसा करने से वंश बढ़ता है, इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं है ॥ १२ ॥

पृष्ठ 315

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कर्मविपाकसंहिता ३०७ व्याधयः संक्षयं यान्ति मम वाक्यं न चान्यथा ॥ १३ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे श्रवणनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥ भा० टी ० — संपूर्ण व्याधि नष्ट होती है, यह मेरा वचन अन्यथा नहीं है ॥ १३ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहर० श्रवणनक्षत्र० चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥

पृष्ठ 316

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॥९ २ ॥ धनिष्ठानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

देशे पञ्चनदे देवि गङ्गानाम्नी पुरी शुभा ।

वसन्ति सर्वे वै वर्णा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! पंचनद देश में गंगा नाम वाली पुरी थी उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि सब जन निवास करते थे ॥ १ ॥

स्वकर्मनिरताः सर्वे वर्णाचारसमाश्रिताः ।

तन्मध्ये ब्राह्मणोऽप्येकः कृषिकर्मरतः सदा ॥ २ ॥

भा० टी० - वर्ण और आचार युक्त वे सभी अपने- अपने कर्मों में युक्त थे, जिन में एक ब्राह्मण कृषि कर्म में रत रहता था ॥ २ ॥

एकस्मिन्समये तदीयभगिनीपुत्रो गृहे भिक्षुकः प्राप्तस्तस्य बुभुक्षितो निशि तदा यष्ट्याऽहनत्तं खलः । प्राप्तः कालकरालदन्तदलनं पुत्रः स्वसुस्तस्य तत्पापात्सत्वरमाजगाम मरणं दुष्टः स्वयं चान्धधीः ॥ ३ ॥

भा० टी०o. - एक समय उसकी बहन का पुत्र घर में भिक्षा लेने पहुँचा और वह भूख से पीड़ित था, तब रात्रि में उस कृषिकार ब्राह्मण ने अपना भानजा मार दिया और वह बहन का पुत्र कालकराल दंत दलन को प्राप्त हुआ, पश्चात् अंधबुद्धि वाला वह ब्राह्मण भी अपने आप ही काल को प्राप्त हुए ॥ ३ ॥

यमदूतैर्महादेवि निक्षिप्तो नरकार्णवे ।

अष्टाशीतिसहस्राणि वर्षाणि च तदा शिवे! ॥४ ॥

भा० टी० - हे शिवे! तब यमराज के दूतों ने यमराज की आज्ञा पाकर समुद्र रूपी नरक में डाला, वहाँ अट्ठासी हजार वर्षों तक वास किया ॥४ ॥

भुज्यते विविधं कष्टं नरकं चैव दारुणम् ।

नरकान्निःसृतो देवि मार्जारत्वे भवेत्किल ॥५ ॥

पृष्ठ 317

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कर्मविपाकसंहिता ३० ९ भा० टी० — हे शिवे! हे देवि! बहुत प्रकार के कष्टों को भोग कर नरक से निकल कर वह मार्जार की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥

व्याघ्रस्य च पुनर्योनिं कुक्कुटत्वं ततोऽभवत् ।

पुनर्मानुषयोनिं च धनधान्यसमन्वितम् ॥ ६ ॥

भा० टी० - फिर बाघ की योनि को प्राप्त होकर मुरगे की योनि को प्राप्त हुआ, फिर मनुष्य - योनि को प्राप्त होकर धनधान्य से युक्त हुआ ॥ ६ ॥

स प्रवीणो महावक्ता कुलाचाररतः सदा ।

पूर्वजन्मनि भो देवि भागिनेयस्य वै वधः ॥ ७ ॥

भा० टी० - हे देवि! बहुत चतुर था, अत्यन्त कथन करने वाला अपने कुल के आचार में रत रहता था और उसने पूर्वजन्म में भगिनी के पुत्र का वध किया था ॥७ ॥

कृतो वै मन्दमतिना तत्पापेनेह दुःखभुक् ।

पुत्रो न जायते देवि व्याधिश्चैव पुनः पुनः ॥ ८ ॥

भा० टी ० – इसप्रकार मंद बुद्धि वाला वह उस पाप से महाकष्ट को भोगता गया और उसके पुत्र की संतान नहीं हुई, बार- बार व्याधि से पीड़ित होता गया ॥ ८ ॥

अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु मत्तो वरानने! गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत्॥ ९ ॥

भा० टी ० – अब हे वरानने! उसकी शांति को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग का पुण्य कर दें ॥ ९ ॥

गायत्रीत्र्यम्बकाभ्यां च द्यौः शान्तीति मनुत्रयम् ।

लक्षत्रयं वरारोहे जपं वै कारयेत्सुधीः ॥ १० ॥

भा० टी० – गायत्री तथा त्र्यंबक मंत्र का जप, द्यौः शांतिः मनुत्रय का पाठ तथा तीन लाख तक जप करवायें ॥ १० ॥

दशांशहवनं देवि तर्पणं मार्जनं तथा ।

ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या पञ्चाशच्च वरानने! ॥ ११ ॥

भा० टी० – हे देवि! दशांश हवन उससे दशांश तर्पण उससे दशांश मार्जन करायें, हे वरानने! पचास ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥ ११ ॥

हविषा पायसेनापि खण्डेन मोदकेन वै ।

दशवर्णां ततो दानं तिलधेनुं प्रदापयेत् ॥ १२ ॥

पृष्ठ 318

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३१० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - साकल्य और क्षीर तथा खांड तथा मोदक से भोजन करायें और दशवर्ण वाली गायों का दान करें तिल धेनु का दान दें ॥ १२ ॥

पञ्चपात्रं च संदाय पिण्डदानं च कारयेत् ।

भागिनेयस्य वै मूर्तिः सुवर्णरजतान्विता ॥ १३ ॥

भा ० टी ० – पाँच पात्रों का दान, पिंड दान और भागिनेय की मूर्ति सुवर्ण तथा चांदी की बनवायें ॥ १३ ॥

दशपलसुवर्णेन सवत्सां पीठसंयुताम् ।

पूजयामास विधिवन्मन्त्रेणानेन वै शिवे! ॥ १४ ॥

भा० टी० - दशपल प्रमाण से युक्त सवत्सा ( बच्चे सहित ) सिंहासन से युक्त सोने की मूर्ति बनवायें, हे शिवे! इस मंत्र से विधिवत्पूजन करें ॥ १४ ॥

सुराराध्य जगत्स्वामिन् चराचरगुरो हरे! मम पूर्वं कृतं पापं तत्क्षमस्व दयानिधे! ॥ १५ ॥

भा ० टी ० – और हाथ जोड़ इसप्रकार कहें कि हे सुराराध्य! हे जगत् स्वामिन्! हे चराचरगुरो! हे हरे! हे दयानिधे! मेरे पहले किये हुए पापों को क्षमा करो ॥ १५ ॥

अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा भागिनेयवधः कृतः ।

तत् क्षमस्व दयापूर्ण त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक! ॥ १६ ॥

भा० टी० — हे दयापूर्ण! हे त्र्यंबक! हे त्रिपुरान्तक! अज्ञान से अथवा जानबूझकर से मैंने भागिनेय का वध किया था, इसलिए आप मुझे क्षमा करो ॥ १६ ॥

ततो वै पूजयामास लोकपालान् पृथक् पृथक् ।

पश्चान्माषबलिं दद्यात्प्रतिमां दापयेत्ततः ॥ १७ ॥

भा० टी ० — फिर लोक- पालों का पूजन कर, पृथक् - पृथक् पश्चात् माषबलि दें फिर मूर्ति का दान करें ॥ १७ ॥

ब्राह्मणाय तदा देवि पूर्वपापविशुद्धये ।

एवं कृते वरारोहे पुत्रः संजायते खलु ॥ १८ ॥

भा० टी० — हे देवि! हे वरारोहे! ब्राह्मण को दान करें, पूर्वपाप की शुद्धि के लिये ऐसा करने से पुत्र निश्चय ही होता है ॥ १८ ॥

व्याधयः संक्षयं यान्ति न कन्या जायते खलु ।

यदा न क्रियते देवि सप्तजन्मस्वपुत्रकः ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 319

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कर्मविपाकसंहिता ३११ इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामद्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ २ ॥ भा० टी० - और हे देवि! व्याधि नाश को प्राप्त होती है, कन्या की संतान नहीं होती है और जो ऐसा नहीं करें तो सात जन्म पर्यंत पुत्र की प्राप्ति नहीं होती है ॥ १ ९ ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठान० प्रथमच० प्रायश्चित्तकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥

पृष्ठ 320

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॥९ ३ ॥ धनिष्ठानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

पश्चिमायां महादेवि यवनस्य पुरं महत्।

महानन्द इति ख्यातः सर्वदेशे सुरेश्वरि! ॥ १ ॥

भा० टी० — शिवजी कहते हैं - हे देवि! हे सुरेश्वरि!! पश्चिम दिशा में यवन का पुर महानंद नाम से विख्यात था ॥ १ ॥

वसन्ति बहवो म्लेच्छाः स्वविद्यायां विचक्षणाः ।

ब्राह्मणास्तत्र वै देवि विद्यायां निपुणास्तथा ॥ २ ॥

भा० टी० — हे देवि! उसमें बहुत से म्लेच्छ तथा म्लेच्छ-विद्या में निपुणजन वास करते थे और वहाँ ब्राह्मण भी विद्या में निपुण हुए और बहुत से लोग वास करते थे ॥२ ॥

तिष्ठत्यशङ्कया नित्यं म्लेच्छान्नं भुज्यते सदा ।

स संध्यारहितो विप्रः पिशुनो दुर्मतिः शठः ॥३ ॥

भा० टी० - और वहाँ एक ब्राह्मण शंका से रहित नित्य म्लेच्छान्न का भोजन करने वाला, संध्या से रहित, चुगली करने वाला, दुर्मति तथा शठ स्वभाव का था ॥ ३ ॥

संचितं बहु साहस्त्रं स्वर्णरत्नगजादिकम् ।

ततो बहुदिने जाते तस्य मृत्युरभूत्पुरा ॥ ४ ॥

भा० टी० – सुवर्ण, रत्न, गज आदि उसने संचित किये । ऐसे बहुत सा समय व्यतीत होने पर उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ४ ॥

सर्पेण दष्टो देवेशि पञ्चके निर्जलेऽपि वा ।

यमदूतैर्महादेवि यमाज्ञां गृह्य वै द्विजम् ॥ ५ ॥

भा० टी ० — हे देवेशि! वह ब्राह्मण निर्जल देश में सर्प से दंशित हुआ, अर्थात् सर्प के डँसने से पंचकों में वह मृत्यु को प्राप्त हुआ और उसे यमराज के दूतों ने यमराज की आज्ञा पाकर नरक में डाला ॥ ५ ॥