कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 41–50
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 41–50
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कर्मविपाकसंहिता ३३ भा० टी० – कार्त्तिक, माघ, वैशाख के इन महीनों में प्रात: काल स्नान करना एकादशी व्रत करे नित्य प्रति द्वादशाक्षर मंत्र का जाप करे ॥ २० ॥
जपं कृत्वा प्रयत्नेन पतिरूपाय विष्णवे ।
समर्पणं ततः कुर्यात् शीघ्रं पापं प्रणश्यति ॥ २१ ॥
भा० टी० - प्रयत्नपूर्वक जपकर पश्चात पतिरूप विष्णु के निमित्त समर्पण करे, तब शीघ्र ही पाप नष्ट होता है ॥ २१ ॥
यदा पापयुता नारी गर्भपातं च कारयेत् ।
तेन दुश्चरितेनेह ज्वरकुक्षिप्रपीडनम् ॥ २२ ॥
भा० टी० - यदि कोई स्त्री पूर्वजन्म में गर्भपात कराती है तो उस दुष्टाचरण से इस जन्म में उसको ज्वर और कुक्षि में पीड़ा रहती है ॥ २२ ॥
योनिशूलं भवेद्देवि गुदरोगो भगन्दरः ।
तदा कुर्यात् प्रयत्नेन ब्राह्मणीं ब्राह्मणं तथा ॥ २३ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसको योनिशूल, गुद – रोग, भगंदर- ये रोग होते हैं, तब प्रयत्न से ब्राह्मण- ब्राह्मणी की मूर्ति बनाये ॥ २३ ॥
रौप्यस्य च महादेवि दशनिष्कस्य भक्तितः ।
प्रत्यहं पूजयेद्देवि पत्युराज्ञां समाचरेत्॥ २४ ॥
भा० टी० — हे महादेवि! भक्ति से चालीस मासे प्रमाण की चांदी की मूर्ति बनवाये, फिर प्रतिदिन उस मूर्ति का पूजन करे और अपने पति की सेवा में तत्पर रहे ॥२४ ॥
भोजयेद्विविधैश्चान्नैर्धृतखण्डसमन्वितैः ।
गोदानं च ततः कुर्यात् भक्त्या विद्योपजीविने ॥ २५ ॥
भा० टी० – अनेक प्रकार के घृत-खांड- युक्त अन्नों से ब्राह्मणों को भोजन करवायें और भक्ति- पूर्वक विद्याकी आजीविका करने वाले ब्राह्मण को गोदान दे ॥२५ ॥
यदा नारी च दुष्टात्मा स्वपतौ दुर्वचो वदेत् ।
तदा कण्ठे भवेद्रोगो नासिकायां च पीनसम्॥ २६ ॥
भा० टी० – जो दुष्ट नारी पूर्वजन्म में अपने पति को कड़वे ( अपशब्द युक्त ) वचन बोलती है तो उसके कंठ में रोग ( गलगण्ड ) और नासिका में पीनस ( खेहर का) रोग होता है ॥ २६ ॥
१. “ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " यह द्वादशाक्षर मंत्र है ।
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३४ कर्मविपाकसंहिता
वातगुल्मं वापि शिवे श्वेतपुष्पं प्रजायते ।
रौप्यपुष्पयुतं देवि सुवर्णेन समन्वितम् ॥ २७ ॥
भा० टी० - हे शिवे! उस स्त्री के वातगुल्म ( वादी का गोला) अथवा श्वतपुष्प, शरीर में सफेद धब्बे हो जाते हैं । हे देवि, इसके लिए वह चांदी के पुष्पों से युक्त सुवर्ण से बनाया हुआ ॥ २७ ॥
दद्याद्विप्राय विदुषे तदा सप्तपलं शुभे! कन्यकां कलहाद्दुष्टाहन्ति नारी यदा हठात्॥ २८ ॥
भा० टी० — सात पल अर्थात् ४० तोले प्रमाण के वृक्ष को विद्वान् ब्राह्मण को दान दें, और जो दुष्टा नारी हठ से कलह करके कन्या को मार देती है ॥ २८ ॥
तदा कुष्ठं भवेद्देवि जन्मजन्मदरिद्रता ।
सूर्यस्य पूजनं कान्ते सदा नारीव्रतं चरेत्॥ २ ९ ॥
भा० टी० – तो उसको कुष्ठ होता है और जन्म-जन्मान्तर में दरिद्रता होती है । हे कान्ते! वह सूर्य का पूजन करे और सदा स्त्री का व्रत - नियम धारण रखे ॥ २ ९ ॥ मासे मासे शनौ वारे वृक्षे विष्णुस्वरूपिणि! विधिवत्पूजनं कुर्यात् पूर्वपापं विशुध्यति ॥ ३० ॥
भा० टी ० – प्रत्येक महीने प्रति शनिवार को विष्णु रूपी पीपल वृक्ष का विधि-पूर्वक पूजन करे, ऐसा करने से पूर्वजन्म के पाप की शुद्धि होती है ॥ ३० ॥
श्वश्रूंच श्वशुरं चैव नित्यं क्रूरवचो वदेत् ।
तेन पापेन भो देवि! श्वेतपुष्पं तनौ भवेत्॥ ३१ ॥
भा० टी० - हे देवि! जो स्त्री नित्य प्रति अपने सास-श्वशुर को क्रूर वचन बोलती है, उस पाप से उसके शरीर में सफेद धब्बे होते हैं ॥ ३१ ॥
सूर्यस्य प्रतिमां देवि सुवर्णत्रिपलस्य च ।
दद्याद्वेदविदे देवि सूर्यस्यैव व्रतं चरेत्॥ ३२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्व० स्त्रीकर्मकथनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! इसके लिए वह बारह तोले सुवर्ण से सूर्य की मूर्ति बनवाये, वेदपाठी ब्राह्मण को दान दे और सूर्य का व्रत करती रहे, तब पाप नष्ट होता है श्वेत पुष्प, सफेद धब्बे दूर होते हैं ॥ ३२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्व० स्त्री कर्मकथनं नाम भाषाटीकायां सप्तमोऽध्यायः ॥७ ॥
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11211 अथ भरणीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
भरण्याः प्रथमे पादे नीलकण्ठो भवद्विजः ।
ब्रह्मकर्मपरिभ्रष्टः काकुत्स्थनगरे शुभे ॥ १ ॥
भा० टी० -शिव जी कहते हैं- भरणी के प्रथम चरण में जन्म लेने वाला यह मनुष्य पहले जन्म में नीलकंठ नाम वाला ब्राह्मण, ब्राह्मण के कर्म से भ्रष्ट काकुत्स्थ नामक सुंदर नगर में रहता था ॥ १ ॥
वैश्येन सह मित्रत्वं क्रयं कृत्वा दिने दिने ।
ब्राह्मणी तत्र वृद्धासीत्पतिपुत्रविवर्जिता ॥ २ ॥
भा० टी० - वह वैश्य से मित्रता करके दिन प्रतिदिन माल खरीदने का व्यवहार करता था, वहीं एक ब्राह्मणी पति और पुत्र से हीन थी ॥२ ॥
तस्या द्रव्यं गृहीतं च विक्रयार्थं द्विजेन तु ।
ततो बहुदिनं यातं तस्य द्रव्यं न दत्तवान्॥ ३ ॥
भा० टी० - जिसका धन विक्रय के लिए नीलकंठ ब्राह्मण ने उधार ले लिया तदनन्तर बहुत दिन व्यतीत हो गये, परंतु उसका धन दिया नहीं ॥ ३ ॥
एवं बहुतिथे काले तस्य मृत्युरजायत ।
ब्रह्मकर्मपरिभ्रंशान्नरके पतनं प्रिये! ॥ ४ ॥
भा० टी ० - इसी प्रकार बहुत समय के पश्चात् उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गई तो हे प्रिये! ब्रह्म - कर्म से भ्रष्ट होने के कारण नरक में पड़ा ॥४ ॥
नरकान्निःसृतो देवि सर्पयोनिरजायत ।
सर्पयोनिफलं भुक्त्वा गर्दभत्वमुपागतः ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! नरक से निकल कर वह सर्प योनि में जन्मा और सर्प के फल को भोग कर गर्दभ योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥
पुनः संप्राप्तवान्देवि मध्यदेशे च मानुषम् ।
धनधान्यसमायुक्तः पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ ६ ॥
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३६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे देवि! फिर वह मध्यदेश में मुनष्य के रूप में पैदा हुआ, धनधान्य से युक्त और पुत्र - कन्या से वर्जित हुआ ॥ ६ ॥
ततो बहुतिथे काले तदा कन्याभवत्प्रिये! स्वर्णं पूर्वं हृतं देवि स्वर्णसम्बन्धजा सुता ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे प्रिये! तब बहुत काल व्यतीत होने पर पूर्व में जिस स्त्री का सुवर्ण हरा था वह कन्या के रूप में सोने के संबंध से उसकी पुत्री बन कर पैदा हुई ॥७ ॥
ततः सा वर्द्धिता कन्या विवाहश्चाभवत् खलु ।
पितृमातृप्रिया नित्यं युवती तु यदाभवत्॥ ८ ॥
भा० टी०o - तदनन्तर वह कन्या बढ़ती गई और फिर उसका विवाह हुआ, तब वह युवती माता- पिता को प्रिय लगने लगी ॥ ८ ॥
तदा सा विधवा जाता मातापित्रोश्च दुःखदा ।
पुनः पुत्रविहीनत्वं प्रायश्चित्तमतः शृणु ॥ ९ ॥
भा० टी० – तभी वह विधवा हो गई, माता- पिता को दुःख देती रही । फिर वह पुत्रहीन रहा । अब इसके प्रायश्चित्त को सुनो ॥ ९ ॥
सूर्यमन्त्रस्य जाप्येन लक्षमेकं वरानने!।
पार्थिवस्यार्चनं सम्यक् त्र्यम्बकेति ततो जपेत्॥ १० ॥
भा० टी० - हे वरानने! सूर्य- मंत्र का जप एक लाख तक करें पार्थिव शिव बनवा कर उनका पूजन करायें फिर " त्र्यम्बकं यजामहे ० " इस मंत्र का जप करें ॥१० ॥
होमं च कारयेद्धीमान् शतब्राह्मणभोजनम् ।
पायसं शर्करायुक्तं कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ११ ॥
भा० टी० - बुद्धिमान् जन होम करें और खीर-खांड से विधि- पूर्वक सौ ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥ ११ ॥
ततः कूपतडागौ च वापिकां च महापथे ।
एवं कृते न संदेहो वंशलाभो वरानने! ॥ १२ ॥
भा० टी० — फिर लम्बे - बड़े मार्ग में कुआँ, बावड़ी, तालाब, बनवायें । हे वरानने! ऐसा करने से निश्चय ही वंश बढ़ता है ॥ १२ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३७ यदा न क्रियते देवि तदा वंशो न जायते । इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वती० संवादे भरणीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे देवि! जो ऐसा नहीं किया जाये तो वंश आगे नहीं चलता है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकभाषाटीकायां भरणी० प्रथमचर० नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
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॥९ ॥
भरणीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ ईश्वर उवाच ॥ अथ द्वितीये वक्ष्यामि भरण्याश्चरणे प्रिये! तस्य सर्वं प्रवक्ष्यामि यत्कृतं पूर्वजन्मनि ॥ १ ॥
भा० टी० - शिव जी कहते हैं - हे प्रिये! अब भरणी नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाले के पूर्वजन्म में किये गये कर्मफल को कहूँगा ॥ १ ॥
अयोध्यापुरतो देवि क्रोशमात्रे प्रदक्षिणे ।
जानकीनगरे रम्ये द्विजश्चासीत् स तस्करः ॥२ ॥
कोश पर जानकी भा० टी० – हे देवि! अयोध्यापुरी दक्षिण की तरफ एक नाम वाले सुंदरपुर में कोई ब्राह्मण रहता था और वह चोरी करता था ॥ २ ॥
ब्रह्मकर्मपरिभ्रष्टो मद्यपानरतः सदा ।
स वेश्यानिरतो नित्यं पत्नी तस्य पतिव्रता ॥ ३ ॥
भा० टी० - ब्रह्म कर्म से परिभ्रष्ट तथा मदिरा पीने में तत्पर वह प्रतिदिन वेश्या के संग में गमन करता था, किन्तु उसकी स्त्री पतिव्रता थी ॥३ ॥
पतिभक्तिरता नित्यं देवपूजासु तत्परा ।
एकदा ब्राह्मणोऽप्येकः क्षुधार्तो दुर्बलः प्रिये! ॥ ४ ॥
भा० टी० – वह उसकी पत्नी नित्य पति की भक्ति में रत और देवपूजन में तत्पर थी । हे प्रिये! एक समय एक दुर्बल ब्राह्मण ॥ ४ ॥
अन्नं च याचयामास लम्पटं प्रति वत्सले! दुर्वचश्चावदद्देवि भिक्षुकं प्रति दुर्बलम्॥ ५ ॥
भा० टी० — हे वत्सले! उस लंपट तस्कर ब्राह्मण से अन्न माँग रहा था, तब उस दुर्बलभिक्षुक को उस ब्राह्मण ने कटु वचन बोले ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३९
आत्मघातः कृतस्तेन दुर्बलब्राह्मणेन च ।
ततो बहुतिथे काले मरणं तस्य चाभवत्॥ ६ ॥
भा० टी० – फिर उस दुर्बल ब्राह्मण ने अपना अपघात कर दिया अर्थात् मर गया ( आत्महत्या कर दी), तत्पश्चात् बहुत-सा समय बीत गया, तब वह लंपट ब्राह्मण भी मर गया ॥६ ॥
पातिव्रत्येन तत्पत्न्याः सत्यलोकं जगाम सः ।
बहुवर्षसहस्राणि स्वर्गे वासोऽभवत्प्रिये!॥ ७ ॥
भा० टी० - तदनन्तर अपनी स्त्री के पतिव्रता धर्म के कारण वह सत्य- लोक में जाता है, हे प्रिये! वहाँ स्वर्ग लोक में बहुत हजार वर्षों तक वास करता है ॥ ७ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोके स मानुषः ।
पूर्वपापफलाद्देवि पुत्रकन्याविवर्जितः ॥ ८ ॥
भा० टी० - फिर पुण्य क्षीण होने पर वह मृत्यु लोक में मनुष्य के रूप में पैदा हुआ है । हे देवि! पूर्व पाप से पुत्र-कन्या से हीन है अर्थात् उसकी कोई सन्तान नहीं होती है ॥ ८ ॥
तदुद्देशेन मरणं ब्राह्मणस्याऽभवत् पुरा ।
मद्यपानं कृतं तेन ततः कुष्ठी प्रजायते ॥ ९ ॥
भा० टी० - क्योंकि उसके कारण ही पहले भिक्षुक ब्राह्मण ने आत्माहत्या की थी, और उसने मदिरा पान किया था जिससे उसको अब कुष्ठ है ॥ ९ ॥
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि यतः पापात्प्रमुच्यते ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षं जाप्यं प्रयत्नतः ॥ १० ॥
भा० टी ० – अब इसकी शांति को कहता हूँ कि, जिससे पाप से छूट जायेगा, यत्न से गायत्री का एक लाख तक जप करवाये ॥ १० ॥
दशांशहोमः कर्तव्यो विप्राणां भोजनं शतम् ।
विधिवत्पूजयेद्देवि कपिलां स्वर्णभूषिताम् ॥ ११ ॥
भा० टी० - दशांश होम करवाये, सौ ब्राह्मणों को भोजन करवाये, हे देवि! विधि पूर्वक कपिला गौ का दान करे और उसे सुवर्ण से विभूषित करे ॥ ११ ॥
दद्याद्विप्राय तां देवि विदुषे ज्ञानरूपिणे ।
अतः पुत्र प्रजायेत रोगनाशो भवेदनु ॥ १२ ॥
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४० कर्मविपाकसंहिता इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीशिवसंवादे भरणीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्वित्तकथनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! उस गाय को विद्वान् और ज्ञानरूपी ब्राह्मण को दान में दें तो फिर उसके घर पुत्र-जन्म और रोगों का नाश होगा ॥ १२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
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॥१० ॥
भरण्यास्तृतीयचरणप्रायश्वित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ एको वणिग्जनो देवि काकुत्स्थनगरे शुभे! अग्निकोणे शिवपुरो योजनार्द्धप्रमाणके ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं -हे देवि! एक वैश्यजन काशी से अग्निकोण में दो कोश के विस्तार में फैले हुए सुंदर काकुत्स्थ नामक नगर में ॥ १ ॥
धनाढ्यो ह्यवसद्देवि वैश्यवृत्तिरतस्सदा ।
विक्रयं कुरुते देवि गुडमन्नं रसादिकम्॥ २ ॥
भा० टी० - धन से पूर्ण हो कर वृत्ति में रत रहता हुआ सदा गुड, अन्न, रस आदि का विक्रय लेना करता हुआ रहता था ॥ २ ॥
एकस्मिन् समये देवि गुडमादाय चाध्वनि ।
वृषभं भारसंपन्नं करोति स वरानने! ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे वरानने देवि! एक समय में गुड ले कर मार्ग में गमन करते हुए वृषभ को वह भारबोझे से लाद रहा था ॥ ३ ॥
भारणे पीड़ितोऽनड्वान् स वै पथि गतः शिवे! न ज्ञातं तेन वै पापं वृषभार्तिसमुद्भवम्॥ ४ ॥
भा० टी० - हे शिवे! वह वृषभ मार्ग में भार से पीड़ित होता हुआ जा रहा था वृषभ की पीड़ा होने से उत्पन्न हुए पाप को उसने जाना नहीं ॥ ४ ॥
एवं बहुतिथे काले बिल्वमङ्गलके पुरे ।
वैश्यस्य मरणं जातं सरय्वां सह भार्यया ॥ ५ ॥
भा० टी० - ऐसे बहुत -सा काल व्यतीत होने के बाद बिल्वमंगल नामक पुर में सरयू नदी के किनारे स्त्री सहित उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ५ ॥
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४२ कर्मविपाकसंहिता
स्वर्गलोके गतौ द्वौ च तौ तु क्षेत्रप्रभावतः ।
षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गे भुक्तं शुभं फलम्॥ ६ ॥
भा० टी ० — फिर पवित्र क्षेत्र के प्रभाव से वे दोनों स्वर्ग लोक को प्राप्त होते हुए वहाँ स्वर्ग लोक में उन्होंने साठ हजार वर्षों तक उत्तम फल भोगे ॥ ६ ॥
ततः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोके वरानने! अवन्तीनगरे जातौ धनधान्यसमन्वितौ ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे वरानने! पश्चात् पुण्य क्षीण हो गये, तब ये दोनों उज्जैनपुरी में धनधान्य से युक्त होते हुए ॥ ७ ॥
मध्यदेशे विशालक्षि पूर्वकर्मफलेन हि ।
पुत्रो न जायते देवि गर्भपातस्तथा शिवे ॥ ८ ॥
भा० टी ० - हे देवि! हे विशालाक्षि!! पूर्व - कर्म के प्रभाव से मध्यदेश में उत्पन्न हुए हैं और इनको पुत्र प्राप्त नहीं होता है है शिवे! हे देवि!! अथवा गर्भपात होता है ॥८ ॥
कन्यका वै प्रजायेत वारंवारं वरानने! शरीरे च ज्वरोत्पत्तिर्मध्यमा च प्रजायते ॥ ९ ॥
भा० टी० - अथवा वारंवार कन्या का जन्म होता है । हे वरानने! उसके शरीर में मध्यम -सा ज्वर रहता है ॥ ९ ॥
प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापविशुद्धये ।
सुवर्णस्य वृषं शुभ्रं पलपञ्चमितं तथा ॥ १० ॥
भा० टी० - अब इसके पूर्व पाप की शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त को कहता हूँ कि बीस तोले सुवर्ण का सुंदर ( वृष ) बैल बनवायें ॥ १० ॥
प्रतिमां कारयेद्देवि वृषमेकं विभूषितम् ।
प्रपूज्य शिवमन्त्रेण वैदिकेन यथाविधि ॥ ११ ॥
भा० टी० – हे देवि! एक बैल की मूर्ति बना उसको विभूषित कर फिर वेद के शिव मंत्र द्वारा यथार्थ विधि से उसका पूजन करे ॥ ११ ॥
प्रदद्याद्विदुषे तस्मै ज्ञानिने शुद्धबुद्धये ।
नमः शिवाय मन्त्रेण लक्ष्यजाप्यं प्रयत्नतः ॥ १२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीशिवसंवादे भरण्यास्तृतीयचरणप्रायश्वित्तक० नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥