कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 321–330
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 321–330
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कर्मविपाकसंहिता ३१३
रौरवे क्षिप्तवाञ्च्छीघ्रं महाकष्टं प्रभुज्यते ।
षष्टिवर्षसहस्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ६ ॥
भा० टी० -रौरव नामक नरक में शीघ्र प्राप्त होकर महाकष्टों को भोगता गया और वहाँ साठ हजार वर्षों तक नरक के दुःखों को भोगता गया ॥६ ॥
नरकान्निःसृतो देवि ग्राहयोनिरभूत्पुरा ।
पुनः कच्छपयोनिश्च मानुषत्वं ततोऽभवत्॥ ७ ॥
भा० टी० - फिर हे देवि! नरक से निकल कर ग्राह की योनि को प्राप्त हुआ, फिर कछुए की योनि को प्राप्त होकर मनुष्य की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
पूर्वजन्मनि भो देवि ब्राह्मणत्वं यतोऽत्यजत् ।
अपुत्रत्वं ततो देवि कन्यका नैव जायते ॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवि! पूर्व जन्म में उसने ब्राह्मणवृत्ति को त्यागा । जिससे पुत्र रहित हुआ और उसकी कन्या भी नहीं हुई ॥ ८ ॥
म्लेच्छान्नं भुज्यते देवि संध्यां च तर्पणं विना ।
अतो व्याधियुतो नित्यं न सुखं लभते क्वचित्॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! उसने म्लेछ के अन्न भक्षण किया, संध्या, तर्पणादि से रहित रहा, इससे नित्य व्याधि युक्त हुआ तथा उसे सुख की किंचित् प्राप्ति भी नहीं हुई ॥ ९ ॥
शान्तिं शृणु वरारोहे पूर्वपापप्रणाशिनीम् ।
गृहं शुभ्रं वरारोहे धनधान्यसमन्वितम्॥ १० ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! पूर्व पाप का नाश करने वाली शांति को कहता हूँ । शुभ और शुभ घर को धनधान्य से युक्तकर ॥ १० ॥
संचितान्नं वरारोहे ब्राह्मणाय प्रदापयेत् ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! संचित किए हुए अन्न सहित घर को ब्राह्मण को दान करें गायत्री के मूल मन्त्र का एक लाख तक जप करवायें ॥ ११ ॥
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ।
त्रैमासिकव्रतं कुर्यात् व्रतं च रविसप्तमी ॥ १२ ॥
भा० टी० - और उसका दशांश हवनादि करायें तथा त्रैमासिक व्रत निरंतर तीन महिनों तक समाप्त होने वाला व्रत करें और रवि से युक्त सप्तमी का व्रत करें ॥ १२ ॥
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३१४ कर्मविपाकसंहिता
जातवेदेति मन्त्रेण लक्षजाप्यं तु कारयेत् ।
ततो गां कपिलां देवि स्वर्णवस्त्रविभूषिताम्॥ १३ ॥
भा० टी० - हे देवि! ' जातवेद '- मंत्र का एक लाख तक जप करवायें और कपिला गौ का दान विधिपूर्वक ब्राह्मण दें और स्वर्ण से भूषित वस्त्र युक्त कपिला गौ का दान करें ॥ १३ ॥
दद्यात्सवस्त्रां विधिवद्ब्राह्मणाय शिवात्मने ।
अश्वदानं च कर्तव्यं चामरं छत्रमेव च ॥ १४ ॥
भा० टी० - और शिव स्वरूपी ब्राह्मण को अश्व का दान दें और चमर तथा छत्र का दान दें ॥ १४ ॥
एवं कृते न संदेहो व्याधिनाशो भवेद्ध्रुवम् ।
पुत्रोऽपि जायते देवि वन्ध्यत्वं च प्रशाम्यति ॥ १५ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामत्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
भा० टी० — हे देवि! ऐसा करने से व्याधि का नाश होता है और पुत्र की प्राप्ति होती है तथा वंध्यापन नष्ट होता है ॥ १५ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामत्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥
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॥९ ४ ॥ धनिष्ठानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
यत्किञ्चित्क्रियते कर्म वैदिकं चाप्यलौकिकम् ।
तत्तत्कर्म फलं भोग्यमिह लोके परत्र च ॥१ ॥
भा० टी० – शिवजी कहते हैं -जो कुछ वैदिक अथवा लौकिक कर्म इस संसार में किये जाते हैं उन उन कर्मों का फल इस लोक तथा परलोक में भोगा जाता है ॥१ ॥
सौराष्ट्रनगरे देवि क्षत्रियो वसति प्रिये! क्षत्रधर्मरतो नित्यं मृगपक्षिप्रहारकः ॥ २ ॥
भा० टी० - हे देवि! हे प्रिये!! सौराष्ट्र नामक नगर में एक क्षत्रिय वास करता था, वह क्षत्र धर्म में नित्य रत रहता हुआ मृग तथा पक्षियों को मारता था ॥ २ ॥
एकस्मिन् समये काले वनं यातः सुदुर्मतिः ।
मृगीं सगर्भां हतवान् बालकद्वयसंयुताम्॥ ३ ॥
भा० टी० - ऐसा करते हुए एक समय उस दुर्मति ने वन में जाकर सगर्भा मृगी को मारा वह मृगी दो बालकों से युक्त थी ॥ ३ ॥
पुत्रेण भार्यया सार्द्धं भुक्तं तेन दुरात्मना ।
ततो वृद्धे तु संजाते तस्य मृत्युरभूत् किल ॥ ४ ॥
भा० टी० - और उस दुरात्मा ने पुत्र तथा भार्या से युक्त होकर मृगी का मांस भोगा, फिर वृद्ध होने पर उसकी मृत्यु हुई ॥ ४ ॥
यमदूतैर्महादेवि नरके क्षिप्त एव सः ।
षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ५ ॥
भा० टी० — हे देवि! तब उसे यमराज के दूतों ने यम की आज्ञा पाकर नरक में डाला, वहाँ साठ हजार वर्षों तक उसने नरक को भोगा ॥ ५ ॥
नरकान्निःसृतो देवि महिषो जायते खलु ।
वराहत्वं पुनर्जातं मानुषत्वं पुनर्भवेत् ॥ ६ ॥
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३१६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे देवि! नरक से निकलकर वह महिष योनि को प्राप्त हुआ, फिर वराह की योनि को प्राप्त होकर वहाँ से मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
देशे पुण्यतमे देवि धनधान्यसमन्वितः ।
विद्यावान् गुणवान् वक्ता राजसेवासु तत्परः ॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! वह पवित्र देश में जन्मा है । धनधान्य से युक्त, विद्यावान् गुणवान् बहुत अच्छा कथन करने वाला, राज सेवा में तत्पर रहने वाला व्यक्ति है ॥७ ॥
पूर्वजन्मनि देवेशि हत्वा मृगगणान्बहून् ।
प्रसवोन्मुखीं मृगीं हत्वा मृगवृन्दसमन्विताम्॥ ८ ॥
भा० टी० — हे देवेशि! पूर्वजन्म में उसने मृगों के समूह को मार कर सगर्भा मृगी को उसके बच्चों सहित मार दिया था ॥ ८ ॥
तत्पापेन महादेवि मृतवत्सत्वमाप्नुयात् ।
शरीरे बहवो रोगा ज्वराश्चातुर्थिकास्तथा ॥ ९ ॥
भा० टी० - उस पाप से हे महादेवि! इस जन्म में वह मृतवत्सता को प्राप्त हुआ । अर्थात् उसकी कोई संतान नहीं जीती है और उसके शरीर में बहुत से रोग हैं, चातुर्थिक नामक ज्वर से पीड़ित रहता है ॥ ९ ॥
शान्तिं शृणु वरारोहे मृतवत्सत्वशान्तये ।
गृहवित्तामष्टमं भागं पुण्यकार्ये च कारयेत्॥ १० ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! मृतवत्सत्व की शांति के लिये उसके प्रायश्चित को कहता हूँ— अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग का दान करें ॥ १० ॥
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं तु कारयेत् ।
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं ततः ॥ ११ ॥
भा० टी ० – गायत्री मूल के मंत्र का एक लाख तक जप करायें और उससे दशांश हवन और तर्पण तथा मार्जन करायें ॥ ११ ॥
पलपञ्चसुवर्णस्य मृगीं वत्ससमन्विताम् ।
कृत्वा समर्पयामास ब्राह्मणाय शिवात्मने ॥ १२ ॥
भा० टी ० — और पांच पल सुवर्ण की गर्भ से युक्त और बच्चे से युक्त मृगी की मूर्ति बनवायें और उसको संकल्प कर शिवस्वरूपी ब्राह्मण को दान करें ॥ १२ ॥
दशवर्णां ततो दद्याच्छय्यादानं विशेषतः ।
वाटिकारोपणं कुर्यात् पथि कूपं तथा शिवे! ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३१७ भा० टी० - हे शिवे! दश वर्ण वाली गायों का दान करें और विशेषता पूर्वक शय्या का दान करें मार्ग में धर्म-स्थान बनवायें तथा कूप का निर्माण करायें ॥ १३ ॥
ब्राह्माणन् भोजयामास शतसंख्यान्स मोदकैः ।
एवं कृते वरारोहे पुत्रः संजायते खलु ॥ १४ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! सौ ब्राह्मणों को मोदकों का भोजन करायें ऐसा करने निश्चय ही पुत्र की प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
व्याधयः संक्षयं यान्ति वन्ध्यात्वं च प्रशाम्यति ।
मृतवत्सा तु या नारी सुतं सानुग्रहं लभेत्॥ १५ ॥
भा० टी० - व्याधि नाश को प्राप्त होकर बाँझपन की शांति होती है और मृतवत्सा स्त्री भी उत्तम पुत्र को प्राप्त करती है ॥ १५ ॥
काकवन्ध्या पुनः पुत्रं लभते नात्र संशयः ॥ १६ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥१४ ॥
भा० टी० – और काकवंध्या स्त्री भी फिर पुत्र को प्राप्त करती है इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥ १६ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठान० तृतीचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
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॥९ ५ ॥ धनिष्ठानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
मथुरादक्षिणे भागे योजने वै त्रयोपरि ।
पुरं सिद्धमिति ख्यातं वसन्ति बहवो जनाः ॥ १ ॥
भा० टी० — शिवजी कहते हैं - मथुरा के दक्षिण भाग में तीन योजन पर सिद्धपुर नामक विख्यात नगर है वहाँ बहुत से जन वास करते थे ॥१ ॥
क्षिपकारो वसत्येको धनधान्यसमन्वितः ।
बलभद्र इति ख्यातो वैष्णवो ज्ञानवल्लभः ॥ २ ॥
भा० टी० - वहाँ एक क्षिपकार अर्थात् छिंपी वास करता था, वह धनधान्य से युक्त और बलभद्रनाम से प्रसिद्ध था, वह विष्णु भक्तज्ञान से प्रेम करने वाला था ॥२ ॥
तस्य पुत्रत्रयं जातं कनीयांस्तस्य चादरः ।
नादरो ज्येष्ठपुत्रस्य मध्यमस्य तथैव च ॥ ३ ॥
भा० टी०-० -इसप्रकार उसके तीन पुत्र हुए, जिन में कनिष्ठ का अर्थात् छोटे का आदर और ज्येष्ठ तथा मध्यम पुत्र का आदर नहीं करता था ॥ ३ ॥
धनं च संचितं तेन महाशूद्रेण चानघे! भ्रातॄणां विग्रहो जात विभागार्थं धनस्य तु ॥ ४ ॥
भा० टी ० — हे अनघे! उस महाशूद्र नें बहुत सा धन संचित किया और भाइयों का धन के विभाग के लिए विग्रह अर्थात् लड़ाई होने लगी ॥४ ॥
ब्राह्मणस्तस्य वै मित्रं विग्रहस्तेन वै श्रुतः ।
आगतस्तस्य निकटे क्षिपकारस्य वै शिवे! ॥५ ॥
भा० टी० - हे शिवे! उसका मित्र एक ब्राह्मण के युद्ध को सुनकर उस छींपी के समीप अर्थात् उसके घर आया ॥ ५ ॥
ब्राह्मणस्य वधो जातः शूद्राणां विग्रहे सति ।
सर्वं द्रव्यं कनिष्ठाय क्षीपकारो ददौ स्वयम्॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३१ ९ भा० टी० – उन शूद्रों के युद्ध में उस विप्र की मृत्यु हो गयी, सब द्रव्य उस शूद्र ने छोटे बेटे को दे दिया ॥ ६ ॥
एवं बहुगते काले शूद्रस्य मरणं भवेत् ।
रौरवं नरकं जातं क्षीपकाराय वै स्वयम्॥७ ॥
भा० टी० – इसप्रकार बहुत समय व्यतीत होने पर उस शूद्र की मृत्यु हुई, तब क्षिपकार को रौरव संज्ञक नरक की प्राप्ति हुई ॥ ७ ॥
लक्षवर्षं वरारोहे भुक्त्वा नरकयातनाम् ।
नरकान्निःसृतो देवि व्याघ्रयोनिस्ततोऽभवत्॥ ८ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! एक लाख वर्ष पर्यंत नरक के दुःखों को भोग कर फिर नरक से निकल कर बाघ की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ८ ॥
भुक्त्वा व्याघ्रस्य योनिं स काकयोनिस्ततोऽभवत् ।
मानुषत्वं पुनर्जातं मध्यदेशे सुरेश्वरि!॥ ९ ॥
भा० टी० — हे सुरेश्वरि! फिर वहाँ से गधे की योनि को प्राप्त होकर काकयोनि को प्राप्त हुआ, फिर मध्य देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ ॥ ९ ॥
धनधान्यसमायुक्तो रोगवान् पुत्रवर्जितः ।
अस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु मे परमेश्वरि! ॥ १० ॥
भा० टी० — हे परमेश्वरि! वह धनधान्य से युक्त है, किन्तु उसके शरीर में रोग हैं और पुत्र से रहित है । अब इसकी शांति को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो ॥ १० ॥
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
पूर्वपापविशुद्ध्यर्थं दशवर्णां ददेत्ततः ॥ ११ ॥
भा० टी० - अपनें घर के द्रव्य में से छठे भाग को पुण्य हेतु पूर्व पाप की शुद्धि के लिये दश वर्णों वाली गौओं का दान करें ॥ ११ ॥
गायत्रीसूर्यमन्त्रेण लक्षजाप्यं वरानने! दशांशहवनं देवि मार्जनं तर्पणं तथा ॥ १२ ॥
भा० टी० — हे वरानने! गायत्री तथा सूर्य के मंत्र का एक लाख जप करवायें और उससे दशांश हवन, तर्पण तथा मार्जन करवायें ॥ १२ ॥
दशांशं भोजयेद्विप्रान् ब्राह्मणान्वेदपारगान् ।
कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ १३ ॥
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३२० कर्मविपाकसंहिता भा० टी० – और उससे दशांश वेद का पारायण करने वाले ब्राह्मणों को भोजन करवायें और पंचरत्न से युक्त पेठे और नारियल का दान करें ॥ १३ ॥
गङ्गामध्ये प्रदातव्यं देवि सत्यव्रताय च ।
एवं कृते वरारोहे सर्वरोगक्षयो भवेत् ॥ १४ ॥
भा० टी० - सत्य बोलने वाले ब्राह्मण को गंगा के मध्य में दान करें ऐसा करने से सारे रोगों का क्षय होता है ॥ १४ ॥
वंशवृद्धिर्भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ १५ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे धनिष्ठानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
भा० टी० - उसके वंश की वृद्धि होती है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना ॥१५ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां धनिष्ठानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥
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॥९ ६ ॥ शतभिषानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
मथुरायां विशालाक्षि आभीरस्तत्र तिष्ठति ।
गोपालेति समाख्यातो सदा गोधनजीवितः ॥ १ ॥
भा ० टी० – शिवजी कहते हैं - मथुरा नगर में एक आभीर संज्ञक जाति वाला गोपाल नाम से विख्यात गोधन से जीविका करने वाला व्यक्ति वास करता था ॥ १ ॥
तस्य भार्या विशालाक्षी सती नामातिसुन्दरी ।
गोधनं बहुसाहस्त्रं गोपालस्य सुरेश्वरि! ॥ २ ॥
भा० टी ० — हे सुरेश्वरि! उसकी भार्य्या सुन्दर नेत्रों वाली सती नाम से विख्यात थी, हे सुरेश्वरि! उस गोपाल के पास बहुत हजार गायों का धन था ॥ २ ॥
वत्सानां वृषभानां च पालनं क्रियते सदा ।
शीतकाले महादेवि वृष्टिर्जाता वरानने! ॥ ३ ॥
भा० टी० - वह गौ- वत्सों का तथा वृषभों का पालन किया करता था, एक समय शीतकाल में महा वर्षा हो गयी ॥ ३ ॥
गौः सवत्सा महादेवि पीडिता भोजनं विना ।
गृहाऽभावे मृता बाह्ये वत्सेनैव च संयुता ॥ ४ ॥
भा० टी० — हे महादेवि! गौ और बछड़े भोजन के बिना पीड़ित होते हुए घर के बिना खुले आकाश के नीचे अपने बछड़ों सहित गाएँ मृत्यु को प्राप्त हुईं ॥४ ॥
ततो बहुगते काले गोपालस्य मृतिस्तदा ।
यमदूतैर्महाघोरे नरके नाम कर्द्दमे ॥ ५ ॥
भा० टी ० — फिर बहुत - सा काल व्यतीत होने पर उस गोपाल की मृत्यु हुई और उसे यमराज के दूतों ने कर्द्दम संज्ञक महाघोर नरक में डाला ॥ ५ ॥
क्षिप्तं यमाज्ञया देवि षष्टिवर्षसहस्रकम् ।
नरकान्निःसृतो देवि भेकयोनिस्ततोऽभवत् ॥ ६ ॥
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३२२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे देवि! साठ हजार वर्षों तक नरक में रहकर फिर नरक से निकल कर मेंढक की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
सरस्य ततो देवि मानुषत्वं ततोऽभवत् ।
धनधान्यसमायुक्तो व्याधिना पीडितः सदा ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! फिर छिपकली की योनि को प्राप्त होकर पश्चात् धनधान्य से युक्त मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ किन्तु सदा व्याधि से पीड़ित रहता है ॥ ७ ॥
अपुत्रत्वं ततो लेभे कन्यका जायते खलु ।
तस्य शान्तिमहं वक्ष्ये शृणु देवि सुशोभने! ॥ ८ ॥
भा० टी ० — हे देवि! हे सुशोभने! वह पुत्र से रहित है, उसे कन्या की प्राप्ति हुई, अब उसकी शांति कहता हूँ तुम ध्यान से सुने ॥ ८ ॥
निर्बीजं वृषभं तेन कृतं योगेन वै शिवे! तेन पापेन भो देवि गर्भपातः पुनः पुनः ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे शिवे! उसने पूर्वजन्म में वृषभ को निर्बीज किया था, अब ( बैलवधिया ) दैवयोग से उस पाप से उसकी पत्नी का बार- बार गर्भपात हुआ ॥ ९ ॥
वसन्ते मासि वै कुर्य्याद् घटदानं सहस्रशः ।
एकादशीव्रतं नित्यं वेण्याः स्नानं समाचरेत्॥ १० ॥
भा० टी० - वसंत के महीने में एक हजार घटों का दान करें, एकादशी का नित्य व्रत करें, त्रिवेणी में स्नान करें ॥ १० ॥
दशवर्णगवां दानं शय्यादानं तथैव च ।
आकृष्णेति जपं कुर्य्याल्लक्षसंख्यं वरानने! ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे वरानने! दश वर्णों वाली गायों का दान करें तथा शय्या - दान तथा आकृष्णे० इस मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ ११ ॥
दशांशं हवनं तद्वन्मार्जनं तर्पणं तथा ।
भोजयेद्विविधैश्चान्नैर्ब्राह्मणान् श्रोत्रियान् शतम्॥ १२ ॥
भा० टी० – तथा उससे दशांश हवन, तर्पण और मार्जन भी दशांश करायें तथा सौ ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के अन्नों से भोजन करायें ॥ १२ ॥
पायसान्नेन खण्डेन घृतेन दधिना तथा ।
एवं कृते न संदेहो ज्वरमोक्षः प्रजायते ॥ १३ ॥