कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 331–340
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 331–340
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कर्मविपाकसंहिता ३२३ भा० टी ० – खीर, खांड, दही, घृत– इनका भोजन करायें ऐसा करने से निश्चय ही ज्वर से छुटकारा मिलता है ॥ १३ ॥
वंशवृद्धिर्भवेत्तस्य मृतवत्सा च पुत्रिणी ।
काकवन्ध्या पुनः पुत्रं लभते नात्र संशयः ॥ १४ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामषण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
भा० टी ० — उसके वंश की वृद्धि होती है मृतवत्सा स्त्री भी पुत्र को प्राप्त करती है काकवंध्या पुनः पुत्र को प्राप्त करती है इसमें थोड़ा भी संदेह नहीं है ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
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॥९७ ॥
शतभिषानक्षत्रस्यद्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ मध्यदेशे महेशानि लुब्धको वसति प्रिये! मृगारिर्नाम विख्यातो मृगमांसेन जीवति ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे महेशानि! हे प्रिये!! मध्य देश में एक लुब्धक वास करता था वह मृगारि नाम से विख्यात था, मृगमांस से जीविका चलाता था ॥ १ ॥
प्रत्यहं मृगयां याति पक्षिणां मारणे रतः ।
मासक्रयं च कुरुते कलत्रं पोषयेत्सदा ॥ २ ॥
भा० टी० - प्रतिदिन जंगल में शिकार पर जाकर पक्षियों को मारने में रत रहता था और मांस को बेचकर स्त्री आदि कुटुंब का पोषण किया करता था ॥२ ॥
एवं वयो गतं सर्वं वृद्धे सति वरानने! मरणं तस्य वै जातं यमदूतैर्यमाज्ञया ॥ ३ ॥
भा० टी० — हे वरानने! इसप्रकार उसकी सारी अवस्था व्यतीत होने पर बुढ़ापे में उसका मरण हुआ, तब उसे यमराज के दूतों ने यम की आज्ञा पाकर ॥ ३ ॥
रौरवे नरके क्षिप्तं तत्र कष्टं मुहुर्मुहुः ।
सप्ततिर्वै सहस्राणि नरके परिपच्यते ॥ ४ ॥
भा० टी० - रौरव संज्ञक नरक में डाला, वहाँ बार - बार कष्टों को भोग कर सत्तर हजार वर्षों नरक में पकाया गया ॥ ४ ॥
नरकान्निःसृतो देवि श्येनयोनिं प्रजायते ।
उष्ट्रस्य च पुनर्योनिं शृगालत्वं ततः पुनः ॥ ५ ॥
भा० टी० - फिर हे देवि! नरक से निकलकर बाज पक्षी की योनि को प्राप्त हुआ, तत्पश्चात् उष्ट्र की योनि को प्राप्त होकर गीदड़ की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥
मानुषत्वं ततो जातं धनधान्येन संयुतः ।
पूर्वजन्मनि देवेशि पक्षिणो बहवो हताः ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३२५ भा० टी० - फिर वहाँ से मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ और धनधान्य से युक्त हुआ, पूर्वजन्म में उसने बहुत से पक्षी मारे थे ॥६ ॥
तेन पापेन भो देवि व्याधिना पीडितो हि सः ।
मृगं हत्वा वरारोहे हतं च मृगशावकम्॥ ७ ॥
भा० टी० - हे देवि! हे वरारोहे!! उस पाप के कारण यह व्याधि से पीड़ित हुआ, मृग तथा मृगों के बच्चों को मारने के कारण ॥ ७ ॥
एतद्दोषेण भो देव पुत्राणां मरणं खलु ।
काकवन्ध्या भवेन्नारी कन्यका जायते सदा ॥ ८ ॥
भा० टी ० — हे देवि! इस दोष से निश्चय ही उसके पुत्रों का मरण होता है और उसकी पत्नी काकवन्ध्या स्त्री अथवा सदा कन्या को जन्म देने वाली स्त्री होती गई ॥३८ ॥
वन्ध्या भवति वै नारी शान्तिं शृणु वरानने! गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे वरानने! उसकी नारी वंध्या होती गई, अब इसकी शांति को कहता हूँ, तुम ध्यान से सुनो अपने घर के द्रव्य से छठे भाग का दान करें ॥ ९ ॥
गायत्रीजातवेदाभ्यां लक्षजाप्यं वरानने! दशांशं हवनं तद्वत्तर्पणं मार्जनं तथा ॥ १० ॥
भा० टी० - हे वरानने! गायत्री तथा जातवेद० इन मंत्रों का एक लाख तक जप करायें और उसका दशांश हवन, तर्पण, मार्जन आदि करायें ॥ १० ॥
दश धेनुस्ततो दद्यात्स्वर्णदानं विशेषतः ।
हरिवंशश्रुतिं देवि व्रतं च हरिवासरम् ॥ ११ ॥
भा० टी ० — और हे देवि! दश गायों का तथा सुवर्ण का दान विशेषता पूर्वक करें हरिवंश का श्रवण करें और एकादशी का व्रत करें ॥ ११ ॥
ब्राह्मणान् भोजयामास यथाशक्ति तु दक्षिणा ।
एवं कृते वरारोहे वंशस्तस्य भविष्यति ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दें, ऐसा करने से वंश की वृद्धि होती है ॥ १२ ॥
वन्ध्यात्वं प्रशमं याति काकवन्ध्या पुनः सुतम् ।
मृतवत्सा सुतं लेभे चिरञ्जीविनमुत्तमम् ॥ १३ ॥
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३२६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी ० – बाँझपन की शांति होती है, काकवंध्या फिर पुत्र को प्राप्त करती है, मृतवत्सा स्त्री बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को जन्म देती है ॥ १३ ॥
व्याधयः संक्षयं यान्ति ज्ञानं च लभते क्वचित् ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
भा० टी ० - और सभी व्याधियाँ दूर होकर उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषान० द्वितीय- चरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
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॥९८ ॥
शतभिषानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
गोमतीनिकटे देवि पुरमस्ति धुरंधरम् ।
वसन्ति बहवो देवि जना धर्मविचक्षणाः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! गोमती के निकट धुरंधर नाम वाली पुरी है, वहाँ बहुत से जन धर्म में विचक्षण हो कर वास करते हैं ॥ १ ॥
तन्मध्ये ब्राह्मणोऽप्येको ब्रह्मकर्मविवर्जितः ।
द्यूतकर्मरतः सोऽपि वेश्यासुरततत्परः ॥ २ ॥
भा० टी० – उनके मध्य में एक ब्राह्मण ब्रह्म कर्म से रहित, द्यूतकर्म में रत और वेश्याओं के संग रमण करता रहता था ॥ २ ॥
मद्यपानरतो नित्यं वेदशास्त्रविनिन्दकः ।
ततो बहुदिने देवि तस्य मृत्युरभूत्पुरा ॥ ३ ॥
भा० टी० – नित्य मद्यपान करने वाला, वेदशास्त्र की निंदा करने वाला, इसप्रकार उसको बहुत दिन व्यतीत हुए तब उसकी मृत्यु हो गयी ॥३ ॥
यमदूतैर्महाघोरैर्नरके तु निपातितः ।
क्षिप्तस्सन्नरके घोरे लक्षवर्षं महेश्वरि! ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे महेश्वरि! उसे यमराज के दूतों ने घोर नरक में डाला, वहाँ एक लाख वर्ष पर्यंत उस घोर नरक में रहकर ॥ ४ ॥
नरकान्निःसृतो देवि वृकयोनिरभूत्पुरा ।
वराहस्य पुनर्योनिनिर्गर्दभत्वं ततोऽभवत् ॥ ५ ॥
भा० टी० - फिर हे देवि! नरक से निकलकर भेड़िये की योनि को प्राप्त हुआ, फिर शूकर की योनि को प्राप्त होकर बाद में गर्दभ की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥
मानुषत्वं ततो लेभे देशे पुण्यतमे शुभे ।
पूर्वजन्मनि देवेशि मद्यपानरतः सदा ॥ ६ ॥
भा० टी० - फिर हे शुभे! हे देवेशि!! पुण्यतम देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हो
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३२८ कर्मविपाकसंहिता गया है । दे देवेशि! यह पूर्वजन्म में मदिरापान करने में रत रहता था इसलिये रोग से युक्त उसका शरीर रहता है ॥ ६ ॥
तेन पापेन भो देवि शरीरे रोगसंभवः ।
द्यूतवेश्यारतो नित्यं यत्कृतं पूर्वजन्मनि ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे देवि! पूर्वजन्म में जो वह जुआ खेलने में और वैश्याओं के संग रमण करने में रत रहता था उस पाप से उसके शरीर में रोग हो गये हैं ॥ ७ ॥
तत्पापेन महादेवि वंशच्छेदश्च जायते ।
शान्तिं शृणु वरारोहे पूर्वपापप्रणाशिनीम्॥ ८ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! उस पाप उसका वंश नष्ट होता है । हे वरारोहे! उस पाप की शांति को कहता हूँ पूर्व पाप के नाश के लिये ॥ ८ ॥
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
विष्णोरराटमन्त्रेण लक्षजाप्यं वरानने! ॥ ९ ॥
भा० टी० — अपने घर के द्रव्य में से छठे भाग को पुण्य हेतु दें और विष्णोरराट० इस मंत्र का एक लाख जप करायें ॥ ९ ॥
दशांशं हवनं तद्वन्मार्जनं तर्पणं तथा ।
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पञ्चाशच्च वरानने! ॥ १० ॥
भा० टी० - और उससे दशांश का हवन, तर्पण और मार्जन करवायें पश्चात् पंचाशत् ( पचास ) ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥१० ॥
ततो गां कृष्णवर्णां च स्वर्णशृङ्गीं विभूषिताम् ।
युक्तां वस्त्रसवत्सां च दद्याद्विजवराय च ॥ ११ ॥
भा० टी० - फिर कृष्णा गौ को स्वर्ण श्रृंग युक्त तथा सवत्सा और वस्त्रादि से युक्त करके दान दें ॥ ११ ॥
प्रतिमां तु ततः कुर्यात् विष्णोः साम्बस्य वा शिवे! पलं दश सुवर्णस्य विष्णोर्मुक्ताविभूषिताम्॥ १२ ॥
भा० टी० - हे शिवे! तत्पश्चात् विष्णु भगवान् की मूर्ति और शिव की मूर्ति बनायें । विष्णु की मूर्ति को दश पल सुवर्ण की बनवा कर उसे मुक्ता आदि से विभूषित करें ॥ १२ ॥
तद्वदेव शिवस्यैव रजतस्य वरानने! नानावस्त्रैरलंकारैः पूजयित्वा यथाविधि ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३२ ९ भा० टी० — हे वरानने! इसीप्रकार चांदी की शिव की मूर्ति भी बनवायें और अनेक प्रकार के शिवजी को पहनाये जाने वाले अर्थात् बाघाम्बर भस्म सर्प आदि वस्त्र- अलंकारादि से युक्त कर यथाविधि पूजन करें ॥ १३ ॥
मन्त्रेणानेन देवेशि तद्वद्देवगणं नमेत् ।
गरुडध्वज देवेश भूतनाथ दयानिधे! ॥ १४ ॥
भा० टी०-० - इस मंत्र से गणों का पूजन करें, हाथ जोड़कर यह कहें कि, हे गरुडध्वज! हे देवेश! हे भूतनाथ! हे दयानिधे! इसप्रकार कहकर सब गणों का पूजन करें ॥ १४ ॥
मम पूर्वकृतं पापं तत्क्षमस्व दयानिधे! ॐ सुदर्शनाय नमः । ॐ त्रिशूलाय नमः । ॐ गरुडाय नमः । ॐ भैरवाय नमः । ॐ जयाय नमः । ॐ विजयाय नमः ।
ॐ बटुकाय नमः । ॐ कालभैरवाय नमः ।
गन्धधूपादिभिर्देवि पूजयित्वा पृथक् पृथक् ॥ १५
भा० टी ० — हे दयानिधे! पूर्व जन्म में किये हुए मेरे पापों को क्षमा करो । ॐ सुदर्शनाय नमः १, ॐ त्रिशूलाय नमः २, ॐ गरुडाय नमः ३, ॐ भैरवाय नमः ४, ॐ जयाय नमः ५, ॐ विजयाय नमः ६, ॐ बटुकाय नमः ७, ॐ कालभैरवाय नमः ८ ॥ हे देवि! ऐसे इनको पृथक् - पृथक् गंध, धूप, दीप - आदि समर्पित करें और उनकी यथाविधि पूजा करें ॥ १५ ॥
प्रतिमां पूजितां तां तु विप्राय प्रददौ स्वयम् ।
ततो विष्णुं नमस्कृत्य शिवं सर्वसुखप्रदम् ॥ १६ ॥
भा० टी० — तत्पश्चात् उस मूर्ति को ब्राह्मण को दान देकर फिर भक्तिपूर्वक विष्णु भगवान् को और सर्वसुख प्रदाता शिव को नमस्कार करें ॥ १६ ॥
एवं कृते न संदेहः सर्वपापक्षयो भवेत् ।
वंशवृद्धिर्भवेत्तस्य व्याधिनाशस्तथैव च ॥ १७ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाऽष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
भा० टी ० – ऐसा करने से निस्संदेह संपूर्ण पाप नष्ट होते हैं और सभी व्याधियाँ नष्ट होती हैं । आराधक के वंश की वृद्धि होती है ॥ १७ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषान० तृ० प्रायश्चित्तकथनं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
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॥९९ ॥
शतभिषानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
पञ्चक्रोशमिते देवि मथुरा उत्तरे तथा ।
हेमन्तपुरसद्ग्रामे वसन्ति बहवो जनाः ॥ १ ॥
भा ० टी ० – शिवजी कहते हैं - हे देवि! मथुरा से उत्तर दिशा में पाँच कोश पर हेमंत पुर नामक उत्तम ग्राम है, उसमें बहुत से जन निवास करते हैं ॥ १ ॥
तन्मध्ये वैश्य एको हि क्रयविक्रयतत्परः ।
स सुकर्मा इति ख्यातो धनं च बहुसंचितम् ॥ २ ॥
भा० टी० - उस नगर में खरीदने बेचने का व्यवहार करने वाला एक सुकर्मा नाम वाला वैश्य रहता था, उसने बहुत सा धन संचित किया ॥ २ ॥
तस्य स्त्री पार्वती नाम रूपयौवनसंयुता ।
वैश्यश्चैव महादेवि प्रौढिं यातः सुरेश्वरि! ॥ ३ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री पार्वती नाम वाली रूप और यौवन से सम्पन्न थी, हे देवि! जब वह वैश्य वृद्ध हो गया, तब ॥ ३ ॥
दरिद्रत्वं भवेद्देवि दरिद्रत्वात्सुपीडितः ।
शतं पञ्च ऋणं नीतं ब्राह्मणस्य सुरेश्वरि! ॥ ४ ॥
भा० टी ० — वह वैश्य दरिद्री हो गया । हे सुरेश्वरि! तब दरिद्रपन से पीड़ित होकर ब्राह्मण से पांच सौ रुपये ग्रहण किये ॥ ४ ॥
व्यापारार्थं विशालाक्षि न दत्तं ब्राह्मणाय वै ।
सर्वं भुक्तं महादेवि बहुकाले गते सति ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे देवि! व्यापार के लिये उसने वे रुपये लिए थे, किन्तु फिर ब्राह्मण को वापस नहीं दिये, ऐसा बहुत काल व्यतीत हो चुका ॥ ५ ॥
वैश्यस्यैव भवेन्मृत्युः सभार्यस्य वरानने! मथुरायां विशालाक्षि लब्धं स्वर्गं वरं शुभम् ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ३३१ भा० टी ० — तब वैश्य की मृत्यु हो गई । हे वरानने! मथुराजी में स्त्री - सहित वह वैश्य मरा, इसलिये उसको उत्तम स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥
दशलक्षमितं स्वर्गं फलं भुक्त्वा वरानने! ततः सह कलत्रेण पुनः पुण्यक्षये सति ॥ ७ ॥
भा० टी० - दश लाख वर्षों तक स्वर्गवास भोग कर फिर वहाँ से पुण्य क्षीण होने पर तब वह स्त्री सहित ॥ ७ ॥
मानुषत्वं पुनर्लेभे देशे शुभ्रे मनोहरे ।
धनधान्यसमायुक्तो जायते वै सुरेश्वरि! ॥ ८ ॥
भा० टी० – सुंदर मनोहर देश में मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है । हे सुरेश्वरि! वह धनधान्य से युक्त है ॥ ८ ॥
पूर्वजन्मनि देवेशि ब्राह्मणस्य धनं हृतम् ।
न दत्तं वै ततो देवि ततः पुत्रो न जायते ॥ ९ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसने पूर्वजन्म में ब्राह्मण का धन लिया था और बाद में वापस नहीं दिया इसलिये इसका पुत्र नहीं होता है ॥ ९ ॥
ततः शान्तिं प्रवक्ष्यामि यतः पापस्य संक्षयः ।
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ॥ १० ॥
भा० टी ० — अब इसकी वह शांति को कहता हूँकि जिससे पूर्व पाप नष्ट हों घर के द्रव्य में से छठे भाग को पुण्य के कार्य में खर्च करें ॥ १० ॥
आकृष्णेति ततो मन्त्रलक्षजाप्यं च कारयेत् ।
दशांशं हवनं कुर्याद्दशांशं तर्पणं तथा ॥ ११ ॥
भा० टी० – ' आकृष्णेनरज० ' -इस मंत्र का एक लाख जप करवायें दशांश हवन, दशांश तर्पण और मार्जन करायें ॥ ११ ॥
हरिवंशश्रुतिं देवि चण्डीपाठं शिवार्चनम् ।
विधिवत्कारयामास ब्राह्मणानां च भोजनम्॥ १२ ॥
भा० टी० - हरिवंश को सुनें, विधिपूर्वक दुर्गा का पाठ और शिव का पूजन करवाकर ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥ १२ ॥
दशवर्णा तु गौर्देया शय्यादानं विशेषतः ।
एवं कृते वरारोहे वंशो भवति नान्यथा ।
व्याधिनाशः समायाति मम वाक्यामृतं भवेत्॥ १३ ॥
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३३२ कर्मविपाकसंहिता इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
भा० टी० - दश प्रकार के वर्ण वाली गायों का दान और शय्या का दान करें, हे वरारोहे! ऐसा करने से वंश बढ़ता है, इसमें अन्यथा नहीं है और व्याधि नष्ट होती है, यह मेरा वचन सत्य है ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे शतभिषानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥