कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 341–350

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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॥१०० ॥

पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

मथुरापुरीमध्ये तु शूद्र एको हि तिष्ठति ।

शाकादीनां च सततं विक्रयं तु सदाऽकरोत्॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - मथुरापुरी में एक शूद्र रहता था, वह निरंतर सदा शाक आदि को बेचा करता था ॥ १ ॥

विष्णुभक्तिरतः शान्तः पुण्यात्मा साधुसंमतः ।

सेवादास इतिख्यातस्तस्य पत्नी तु राधिका ॥२ ॥

भा० टी० – वह विष्णु का भक्त, शांत और पुण्यात्मा, साधुजनों द्वारा मान्य सेवादास नाम वाला व्यक्ति था, उसकी स्त्री राधिका नाम वाली थी ॥ २ ॥

कुलाचारे रतः साधुर्द्विजसेवासु तत्परः ।

वाणिज्यं कुरुते साधुः पुरोहितधनेन च ॥ ३ ॥

भा० टी० - वह साधुजन अपने कुल के आचार में तथा साधुजनों की सेवा में तत्पर रहता था, वह पुरोहित के धन से वणिज कार्य किया करता था ॥ ३ ॥

बहुवर्षे गते देवि ब्राह्मणोऽपि तदागतः ।

आदरं बहुधा कृत्वा कलत्रेण तदा शिवे! ॥ ४ ॥

भा० टी० - बहुत से वर्ष व्यतीत हो चुके, तब वह ब्राह्मण उसके घर पर आया, तब बहुत-सा आदर करके उसकी स्त्री ने ॥४ ॥

विषं दत्तं चतुर्थेऽह्नि भोजनान्तर्विधानतः ।

न जानाति तदा साधुस्तद्वृत्तं ब्राह्मणस्य तु ॥५ ॥

भा० टी० - चौथे दिन भोजन के समय में उस ब्राह्मण को विष दे दिया, तब उस ब्राह्मण के वृत्तांत को वह साधु शूद्र तो नही जान पाया था ॥ ५ ॥

मरणं वै ततो जातं ब्राह्मणस्य सुरेश्वरि! ।

ब्राह्मणस्य वधे जाते हाहाकारो गृहे गृहे ॥ ६ ॥

पृष्ठ 342

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३३४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - हे सुरेश्वरि! जब ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी तो तब ब्रह्मवध होने से उस घर में हाहाकार हो गया ॥ ६ ॥

श्रुत्वा तच्च पुरीं त्यक्त्वा प्रयागे साधुरागतः ।

देहं त्यक्त्वा तदा साधुर्हठं कृत्वा वरानने! ॥७ ॥

भा० टी० – उस वार्ता को सुनकर वह साधु शूद्र अपनी पुरी को त्याग कर प्रयागजी में आकर हे वरानने! हठ पूर्वक अपनी देह का त्याग कर गया ॥ ७ ॥

पश्चात्तत्रैव सा गत्वा पत्नी प्राणांस्ततोऽत्यजत् ।

प्रयागे मथुरां त्यक्त्वा तदुद्देशेन शोभने! ॥ ८ ॥

भा० टी० — हे शोभने! पश्चात् वह उस साधु की स्त्री भी मथुरापुरी को त्याग कर प्रयागजी में अपने पति के पास प्राणों को त्याग कर मर गयी ॥ ८ ॥

बहुवर्षसहस्त्राणां स्वर्गवासस्ततोऽभवत् ।

ततः पुण्यक्षये जाते मानुषत्वं ततोऽभवत्॥ ९ ॥

भा० टी० - फिर उनको बहुत हजार वर्षों तक स्वर्ग का वास हुआ, तब पुण्य क्षीण होने पर उन्हें मनुष्य योनि प्राप्त हुई है ॥ ९ ॥

शूद्रयोनिं विशालाक्षि देहजस्य कुले तदा ।

पुनर्विवाहिता पत्नी पूर्वजन्मप्रपञ्चतः ॥ १० ॥

भा० टी० — हे विशालाक्षि! अपने पुत्र के ही कुल में शुद्र - योनि में जन्मा है और पूर्व जन्म के प्रसंग से वही स्त्री फिर विवाही गयी है ॥ १० ॥

धनधान्यसमायुक्तो विद्यावान् कुलपूजितः ।

गौराङ्गो नीचजातीनां मतज्ञो लब्धवान् स्वयम्॥ ११ ॥

भा० टी० — वह धनधान्य से युक्त है, विद्यावान् और कुल में पूजित है, गौरवर्ण वाला और नीच जातियों के मत को अपने आप ही जानता है ॥ ११ ॥

पूर्वजन्मनि भो देवि ब्राह्मणाय विषं ददौ ।

भार्या तस्य विशालाक्षि तत्पापेनैव पातकी ॥ १२ ॥

भा ० टी ० — हे देवि! पूर्वजन्म में उसकी स्त्री ने ब्राह्मण को विष दिया था, उस पाप से उसकी स्त्री पातक वाली ( पाप करने वाली ) है ॥ १२ ॥

मासि पुष्पं ततस्तस्याः संतानं नैव जायते ।

अस्य पापस्य वै शान्तिं शृणु देवि सुशोभने! ॥ १३ ॥

पृष्ठ 343

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कर्मविपाकसंहिता ३३५ भा० टी० - जिससे वह प्रत्येक महीने रजस्वला होती है, परंतु संतान नहीं ठहरती हे देवि! हे शोभने!! इसकी शांति को सुन ॥ १३ ॥

गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

गायत्रीजातवेदाभ्यां त्र्यम्बकेन वरानने! ॥ १४ ॥

भा० टी० - घर के धन में से आठवें भाग को पुण्यकार्य में खर्च करें । हे वरानने! गायत्री और जातवेदसे० तथा त्र्यंबकं यजामहे० - इन मंत्रों से ॥ १४ ॥

लक्षत्रयं जपं देवि कारयामास यत्नतः ।

हरिवंशश्रुतिं देवि भार्यया सहितस्तदा ॥ १५ ॥

भा० टी० – हे देवि! तीन लाख तक जप यत्न पूर्वक करायें और हे देवि! हरिवंश को अपनी स्त्री के संग बैठकर ध्यान पूर्वक सुनें ॥ १५ ॥

होमं वै कारयामास कुण्डे शुद्धे सुदारुणे ।

चतुष्कोणे विशालाक्षि योनिपल्लवशोभिते ॥ १६ ॥

भा० टी० - हे विशालाक्षि! योनिपल्लवों से शोभित करके चतुष्कोण युक्त सुंदर और पवित्र कुंड में हवन करायें ॥ १६ ॥

दशांशं विधिवद्देवि तर्पणं मार्जनं ततः ।

ब्राह्मणस्य ततो मूर्तिं दशपञ्चपलात्मिकाम्॥ १७ ॥

भा० टी० - हे देवि! विधि पूर्वक उसके दशांश का तर्पण और मार्जन करायें पश्चात् पंदरह पल सुवर्ण की ब्राह्मण की मूर्ति बनवायें ॥ १७ ॥

विधिवत्कारयेद्देवि पूजयेच्चैव बुद्धिमान् ।

वस्त्रालंकारशय्याभिर्भूषणैर्विविधैस्तथा ॥ १८ ॥

भा० टी० - शास्त्रोक्त विधि पूर्वक मूर्ति बनवायें और बुद्धिमान् पुरुष वस्त्र, अलंकार अर्थात् आभूषण, शय्या और नाना प्रकार के आभूषणों द्वारा उन मूर्तियों का पूजन करें ॥ १८ ॥

मन्त्रेणानेन देवेशि गन्धपुष्पैः पृथक् पृथक् ।

सर्वकारणकर्ता त्वं साक्षीभूतो जगत्त्रये ॥ १ ९ ॥

भा० टी ० — हे देवेशि! इस निम्नलिखित मंत्र से गंध, पुष्पों से अलग-अलग मूर्तियों का पृथक् - पृथक् पूजन करें ( कहें कि ) तुम सबके कारण के कर्त्ता हो, तुम त्रिलोकी के साक्षी हो ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 344

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३३६ कर्मविपाकसंहिता पापं ब्रह्मवधं घोरं हर मे भुवनाधिप! ।

ॐ चक्रधराय नमः । ॐ त्र्यम्बकाय नमः ।

ॐ शङ्खहस्ताय नमः । ॐ सनकसनत्कुमार- सनन्दनसनातनेभ्यो नमः ॥ २० ॥

भा० टी० - हे भुवनाधिप! ब्रह्म-वध के मेरे घोर पाप को हरो, ॐ चक्रधराय नमः १, ॐ त्र्यंबकाय नमः २, ॐ शङ्खहस्ताय नमः ३, ॐ सनकसनत्कुमारसनन्दनसना-तनेभ्यो नमः ॥ २० ॥

पूजयामास विविधैर्मोदकैश्च फलैरपि ।

प्रतिमां पूजितां तां तु सुविप्राय प्रदापयेत्॥ २१ ॥

भा० टी० — अनेक प्रकार के मोदक तथा फलों से पूजन करें, फिर पूजित की हुई उस प्रतिमा को उत्तम ब्राह्मण को दान करें ॥ २१ ॥

दशवर्णां सवृषभां पट्टवस्त्रविभूषिताम् ।

दद्याद्विप्राय विदुषे श्रोत्रियाय तपस्विने ॥ २२ ॥

भा० टी० - पट्ट वस्त्र से विभूषित की हुई तथा एक वृषभ से युक्त दश प्रकार के वर्णों वाली गायों को वेद पढे हुए विद्वान् तपस्वी ब्राह्मण को दान करें ॥ २२ ॥

सप्तम्यां रविवारे च व्रतं कुर्याद्विधानतः ।

एवं करोति देवेशि पुत्रयुग्मं प्रजायते ॥ २३ ॥

भा० टी० – रविवारीय सप्तमी को विधि विधानपूर्वक व्रत करें हे देवेशि! ऐसा करें तो दो पुत्र उत्पन्न होते हैं ॥ २३ ॥

कन्या नैव वरारोहे रोगं सर्वं विनश्यति ॥ २४ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥

भा० टी० — और कन्या उत्पन्न नहीं होती है, हे वरारोहे! ऐसा करने से संपूर्ण रोग नष्ट होते हैं ॥ २४ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्र० नक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥

पृष्ठ 345

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॥१०१ ॥

पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

धर्मेण जायते पुत्रो धर्मेण लभते श्रियम् ।

धर्मेण व्याधिनाशः स्यात्तस्माद्धर्मपरोऽभवत्॥१ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - धर्म से पुत्र उत्पन्न होता है, धर्म से लक्ष्मी प्राप्त होती है, धर्म से व्याधि नष्ट होती है, इसलिए धर्म पालन करने योग्य है ॥ १ ॥

कापिल्ये नगरे देवि बाह्मणस्तत्र तिष्ठति ।

स वेदपाठनिरतो धनाढ्यश्च बहूद्यमी ॥ २ ॥

भा० टी० - हे देवि! कपिलनगर में एक वेदपाठी ब्राह्मण रहता था, वह धनाढ्य और बहुत उद्यम करने वाला था ॥ २ ॥

तस्य पत्नी वरारोहे पतिसेवासु तत्परा ।

एकदा चागता कन्या ब्राह्मणस्य किलानघे!॥ ३ ॥

भा० टी० - हे वरारोहे! उसकी स्त्री पति की सेवा में तत्पर रहती थी, हे अनघे! एक समय उसके घर में उस ब्राह्मण की कन्या आयी ॥ ३ ॥

पुत्रेण सह देवेशि चादरस्तेन वै कृतः ।

ततो बहुदिने जाते तस्य स्वर्णं च चोरितम्॥ ४ ॥

भा० टी० - हे देवि! वह पुत्र सहित आयी, तब उसने उसका बहुत-सा आदर किया । बहुत से दिन व्यतीत हो चुके । तब उस ब्राह्मण का सुवर्ण ( धन ) चोरी हो गया ॥ ४ ॥

कन्यापुत्रेण स्वर्णं हि हृतं चेति तदा शिवे! वदन्ति बहवस्तत्र जनास्तु ब्राह्मणं प्रति ॥ ५ ॥

भा० टी ० — हे शिवे! तब बहुत से जन उस ब्राह्मण को ऐसा कहने लगे कि, इस कन्या के पुत्र ने यह धन चोरा है ॥ ५ ॥

ततो रोषपरीतात्मा पौत्रो भवति वै शिवे! विषं भुक्तं तदा तेन बहुरोषाकुलेन तु ॥ ६ ॥

पृष्ठ 346

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३३८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - तब हे शिवे! उस ब्राह्मण का पोता अत्यन्त क्रोधित हुआ और बहुत रोष ( क्रोध ) से आकुल होकर उस पौत्र ने विष भक्षण किया ॥ ६ ॥

मरणं तस्य वै जातं पौत्रस्यैव वरानने! ततो बहुदिने जाते ब्राह्मणस्य तदा मृतिः ॥ ७ ॥

भा० टी० - हे वरानने! तब उसके पौत्र की मृत्यु हो गयी, फिर बहुत दिन व्यतीत हुए पश्चात् उस ब्राह्मण की भी मृत्यु हो गई ॥ ७ ॥

तस्य पत्नी सती जाता सत्यलोकेऽवसत्तदा ।

ततः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोके सुरेश्वरि! ॥८ ॥

भा० टी० – तब उसकी स्त्री सती हो गयी, उसकाइसलिये सत्यलोक में वास हुआ, हे सुरेश्वरि! तब पुण्य क्षीण हो गया, तब मृत्युलोक में ॥ ८ ॥

मानुषत्वं ततो जातमयोध्यानगरे शिवे! धनधान्यसमायुक्तो राजमन्त्री विचक्षणः॥९ ॥

पौत्रस्तस्य मृतो देवि तदुद्देशेन भो शिवे! ॥ १० ॥

भा० टी० - वह मनुष्य योनि में उत्पन्न हुआ । हे शिवे! अयोध्या नगरी में उसने जन्म लिया है, धनधान्य से युक्त है, राजा का मंत्री और पंडित है । हे शिवे! उसके कारण उसके ( पौत्र ) पोते की मृत्यु हो गई थी ॥ ९ ॥१० ॥

अतः पुत्रो न जायेत कन्या चैव प्रजायते ।

शरीरे सततं चोग्रो ज्वरो जातः सुदारुणः ॥ ११ ॥

भा० टी ० — इसलिये इसके पुत्र नहीं जन्म होता है, केवल कन्या ही जन्मती है और इसके शरीर में निरंतर उग्र दारुण ज्वर रहता है ॥ ११ ॥

शत्रवो बहवः सन्ति न सौख्यं लभते क्वचित् ।

पुण्यं शृणु वरारोहे पूर्वपापस्य संक्षयः ॥ १२ ॥

भा० टी० – और बहुत से शत्रु हैं, कभी भी सुख नहीं मिलता है, हे वरारोहे! इसके प्रायश्चित के लिए पुण्य को सुनो, जिससे पूर्वपाप का क्षय होता है ॥ १२ ॥

गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।

गायत्रीत्र्यम्बकं चेति श्रीश्च ते इति ऋक्त्रयम् ॥ १३ ॥

भा० टी० - घर के वित्त में से छठे भाग को पुण्य के कार्य में खर्च करें हे देवि! गायत्री, त्र्यम्बकं यजामेंहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् श्रीश्चते लक्ष्मी० – इन तीन मंत्रों को ॥१३ ॥

पृष्ठ 347

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कर्मविपाकसंहिता ३३९

प्रतिमन्त्रं जपेल्लक्षं दशांशं हवनं ततः ।

दशांशतर्पणं देवि मार्जनं तद्दशांशतः ॥ १४ ॥

भा० टी० - फिर अलग-अलग एक-एक लाख तक जप करें, फिर दशांश हवन, दशांश तपर्ण तथा दशांश मार्जन करायें ॥ १४ ॥

गोदानं तद्दशांशं च तद्दशांशं च भोजयेत् ।

ब्राह्मणान् चैव देवेशि श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ॥ १५ ॥

भा० टी० - उसके दशांश का गोदान करें, उससे दशांश का ब्राह्मणों को भोजन करायें और श्रद्धाभक्ति से युक्त रहें ॥ १५ ॥

कूष्माण्डं नारिकेरं च पञ्चरत्नसमन्वितम् ।

गङ्गामध्ये प्रदातव्यं पूर्वपापविशुद्धये ॥ १६ ॥

भा० टी - और कोहले तथा नारियल को पंचरत्न से युक्त करके पूर्वजन्म में किये हुए पाप की शुद्धि के लिए गंगाजी के मध्य में दान करें ॥ १६ ॥

वृषभस्तरुणः शुभ्रो घण्टाचामरशोभितः ।

ब्राह्मणाय प्रदातव्यः शय्यादानं विशेषतः ॥ १७ ॥

भा० टी०o.- तत्पश्चात् घंटा और चामर से युक्त किये हुए श्वेतवर्ण वाले बैल का दान ब्राह्मण को दें विशेष करके शय्या का दान करें ॥ १७ ॥

एवं कृते वरारोहे शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ।

रोगस्यैव निवृत्तिः स्याज्ज्वरस्तस्य न जायते ॥ १८ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकाधिशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! ऐसा करने से शीघ्र ही पुत्र उत्पन्न होता है और सभी प्रकार के रोगों की निवृत्ति हो उसके शरीर में ज्वर कभी भी नहीं होता है ॥ १८ ॥

इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्र० नक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥

पृष्ठ 348

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॥१०२ ॥

पूर्वाभाद्रापदानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ गान्धारनगरे देवि ब्राह्मणो वसति प्रिये! दयाशर्म इति ख्यातो मद्यपानरतः सदा ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! गान्धार नगर में दया शर्मा नाम वाला एक ब्राह्मण रहता था, वह सदा मदिरापान करने में तत्पर रहता था ॥१ ॥

वेश्यासुरतसंतृप्तश्चौरकर्मरतः सदा ।

म्लेच्छाचाररतः सोऽपि म्लेच्छान्नं भुज्यते सदा ॥ २ ॥

भा० टी० - वेश्या के साथ संभोग में सदा तत्पर रहने वाला वह सर्वदा चौर कर्म में रत और म्लेच्छों के आचार को करता था तथा सदा म्लेच्छों के ही अन्न का भोजन किया करता था ॥ २ ॥

धनं तु संचितं तेन म्लेच्छभार्यासु तत्परः ।

श्राद्धकर्मविहीनश्च पितुर्मातुश्च निन्दकः ॥ ३ ॥

भा० टी ० — इसने बहुत - सा धन संचित किया और सदा म्लेच्छों की स्त्रियों से रमण किया, श्राद्ध के कर्म से हीन और माता-पिता की निंदा करने वाला था ॥ ३ ॥

एवं बहुगते काले मरणं तस्य जायते ।

महारौद्रं च नामानं नरकं नाम दारुणम्॥४ ॥

भा० टी० - ऐसे बहुत सी अवस्था बीत चुकी थी तब उसकी मृत्यु हुई तदनन्तर उसे महारौद्र नाम वाले दारुण घोर नरक में डाला गया ॥४ ॥

निक्षिप्तः शृङ्खलैर्बद्ध्वा यमदूतैर्यमाज्ञया ।

षष्टिवर्षसहस्त्राणि भुक्त्वा नरकयातनाम्॥ ५ ॥

भा० टी० — धर्मराज के दूतों ने यम की आज्ञा पाकर बेड़ियों से बांध कर ( वहाँ नरक में ) उसे पटका । साठ हजार वर्षों तक नरक की पीड़ा को भाग कर ॥ ५ ॥

नरकान्निःसृतो देवि गोधायोनिरभूत्पुरा ।

सरटस्य पुनर्योनिं चटकत्वं ततोऽभवत्॥ ६ ॥

पृष्ठ 349

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कर्मविपाकसंहिता ३४१ भा० टी० - फिर नरक से निकलकर वह गोह की योनि को प्राप्त हुआ, पश्चात् छिपकली की योनि, फिर चिड़की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

मानुषत्वं ततो लेभे मध्यदेशे वरानने! धनधान्यसमायुक्तो वंशहीनो महेश्वरि॥ ७ ॥

भा० टी० - पश्चात् उसे मनुष्य योनि प्राप्त हुई । हे वरानने! हे महेश्वरि!! यह मध्य देश में धनधान्य से युक्त है, किन्तु उसकी संतान नहीं है ॥७ ॥

पूर्वजन्मनि देवेशि ब्राह्मणत्वं यतोऽत्यजत् ।

तत्पापेनैव भो देवि पुत्रस्य मरणं मुहुः ॥ ८ ॥

भा० टी० - हे देवेशि! इसने पूर्वजन्म में ब्राह्मणत्व का त्याग किया था, उस पाप से इसके पुत्र बार - बार मरते हैं ॥ ८ ॥

अनेन पितरौ वृद्धौ त्यक्तौ दुर्मतिना यतः ।

अतः शरीरे वै रोगः काकवन्ध्या सहव्रणा ॥ ९ ॥

भा० टी० - क्योंकि इस दुष्ट बुद्धि वाले ने अपने वृद्ध माता-पिता का त्याग किया था, इसलिये इसके शरीर में रोग होता है और इसकी स्त्री काकवंध्या है और व्रणों वाली है॥९॥

शान्तिं शृणु वरारोहे यतः पुत्रो हि जायते ।

गृहवित्ताष्टमं भागं पुण्यकार्ये च कारयेत्॥ १० ॥

भा० टी० — हे वरारोहे! जिससे इसके पुत्र हों, उस शांति कर्म को सुनों, घर के वित्त के आठवें भाग धन को पुण्य कार्य में खर्च करें ॥ १० ॥

पलपञ्चसुवर्णस्य गणाध्यक्षस्य चाकृतिम्।

कृत्वा वै पूजयेद्देवि मन्त्रेणानेन सुव्रते! ॥ ११ ॥

भा० टी० — हे देवि! हे सुव्रते!! पंद्रह पल सुवर्ण की शिवजी की मूर्ति बनाकर इस मंत्र से उसका पूजन करें ॥ ११ ॥

गणाध्यक्ष सुरेशान सर्वोपद्रवनाशन! मम पूर्वकृतं पापं हर दुःखनिवारण! ॥ १२ ॥

भा० टी० - हे गणाध्यक्ष! सुरेश! सब उपद्रवों को नष्ट करने वाले हे दुःखनिवारण! पूर्वजन्म के मेरे पापों को हरो ॥ १२ ॥

एवं कृत्वा विधानं च ब्राह्मणाय समर्पयेत् ।

ततो भवति वंशश्च व्याधिनाशश्च जायते ॥ १३ ॥

पृष्ठ 350

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३४२ कर्मविपाकसंहिता इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्रापदानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥

भा० टी० – इसप्रकार संपूर्ण विधिविधान करके पश्चात् ( मूर्ति आदि को ) ब्राह्मण को दे दें तब वंश बढ़ता है और व्याधि नष्ट होती है ॥ १३ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वती० पूर्वाभाद्र० तृतीयच० प्रायश्चित्तकथनं नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥