श्रीगणेशाय नमः।
कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 351–360
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 351–360
पृष्ठ 351
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॥१०३ ॥
पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ वैदण्डे च पुरे देवि लुब्धको वसति प्रिये! सेमानाम्ना स विख्यातस्तस्य भार्यातिनिष्ठुरा ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे प्रिये! वैदंड नामक पुर एक लुब्धक ( व्याध ) वसता था, वह सेमा नाम से विख्यात था, उसकी स्त्री अत्यंत कठोर थी ॥ १ ॥
प्रत्यहं मृगमांसेन व्ययं कुर्य्याद्दिने दिने ।
एवं सर्वं वयो जातं लुब्धकस्य तदा प्रिये! ॥ २ ॥
भा० टी० – वह प्रतिदिन मृगमांस से अपने खर्च को चलाता था, इसप्रकार लुब्धक की जब संपूर्ण अवस्था बीत चुकी, तब ॥ २ ॥
मरणं तस्य वै जातं यमदूतैर्यमाज्ञया ।
निक्षिप्तो नरके घोरे षष्टिवर्षसहस्रकम्॥ ३ ॥
भा० टी ० – उसका मरण हो गया, उस समय धर्मराज के दूतों ने यम की आज्ञा पाकर उसे साठ हजार वर्षों तक घोर नरक में पटका ॥ ३ ॥
भुक्तं च विविधं दुःखं कृमिसूचिमुखैर्युतम् ।
मानुषत्वं ततो जातं धनधान्यसमन्वितम्॥ ४ ॥
भा० टी० — वहाँ अनेक प्रकार के दुःखों को सूचिमुख आदि कृमियों के द्वारा पीडित वह बाद में मनुष्य हुआ है, वह धनधान्य से युक्त है ॥४ ॥
पुत्राणां मरणं देवि जायते हि विपाकतः ।
पलपञ्चसुवर्णस्य माल्यं मेरुयुतं तु वै ॥ ५ ॥
भा० टी ० — हे देवि! पूर्वकर्मविपाक से इसके पुत्रों की मृत्यु होती है, पाँच पल सुवर्ण की माला बनवायें, उसके बीच में सुमेरु बनवायें ॥ ५ ॥
ब्राह्मणाय ततो दद्याच्छय्यादानं विशेषतः ।
एवं कृते वरारोहे पुत्रस्तस्य च जीवति ॥ ६ ॥
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३४४ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - पश्चात् उसको ब्राह्मण को दान करें, शय्यादान विशेष करके दें हे वरारोहे! ऐसा करने से पुत्र जीवित रहता है ॥ ६ ॥
व्याधयः संक्षयं यान्ति काकवन्ध्या लभेत्सुतम्॥ ७ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्रपदानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
भा० टी० – संपूर्ण व्याधि नष्ट होती है और काकवंध्या स्त्री पुत्र को प्राप्त करती है ॥७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे पूर्वाभाद्रापदानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
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॥१०४ ॥
उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
श्रीपुरे नगरे देवि द्विज एकोऽवसत्पुरा ।
एकदा तस्य वै गेहे गुरुपुत्रः समागतः ॥१ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! पहले श्रीपुर नगर में एक ब्राह्मण वसता था, एक समय उसके घर में उसके गुरु का पुत्र आया ॥ १ ॥
आदरं बहुधा कृत्वा मासमेकं तदा खलु ।
गुरुपुत्रस्य घातं हि कृत्वा द्रव्यस्य लोभतः ॥२ ॥
भा० टी०o - एक महीने तक वहाँ उसे बहुत आदर के साथ रखकर पश्चात् द्रव्य के लोभ से उसने गुरु के पुत्र का घात ( हत्या ) किया ॥ २ ॥
तेन पापेन भो देवि महापापयुतो नरः ।
पुत्रहीनश्च देवेशि जायते धनवर्जितः ॥ ३ ॥
भा० टी ० — हे देवि! उस पाप से वह मनुष्य महापापी है, इसलिये इसके पुत्र नहीं होता है और वह धनहीन है ॥ ३ ॥
वंशगोपालमन्त्रं वै गायत्रीमन्त्रमेव च ।
हरिवंशश्रवणं देवि कुर्याच्च विधिपूर्वकम् ॥ ४ ॥
भा० टी० — हे देवि! विधिपूर्वक संतानगोपाल का मंत्र, गायत्रीमंत्र का जप करवायें और हरिवंशपुराण को सुनें ॥ ४ ॥
तुलसीवाटिकां कृत्वा तन्मूले विष्णुपूजनम् ।
दशवर्णां ततो दद्यात्पूर्वपापप्रणाशिनीम्॥ ५ ॥
भा० टी० - तुलसी की वाटिका बनाकर उसके जड़ में विष्णु का पूजन करें और पूर्वजन्म के पाप को नष्ट करने वाली दश प्रकार के वर्णों वाली गायों का दान करें ॥ ५ ॥
स्वर्णनिष्कस्ततो दद्याद्दशगोदानमेव च ।
एवं कृते वरारोहे वंशो भवति नान्यथा ॥ ६ ॥
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३४६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — निष्क अर्थात् एक तोला प्रमाण सुवर्ण का दान और दश गायों का दान करें, हे वरारोहे! ऐसा करने से निश्चय ही वंश बढ़ता है ॥ ६ ॥
व्याधिनाशो भवेद्देवि सत्यं सत्यं न संशयः ॥ ७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नामचतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
भा० टी० - हे देवि! सभी व्याधियाँ नष्ट होती हैं, यह मेरा वचन सत्य है । इसमें संशय नहीं ॥ ७ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीह० उत्तरानक्ष० प्रथमच० प्रायश्चित्तकथनं नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
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॥ १०५ ॥
उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
मणिकाख्यपुरे रम्ये वसन्ति बहवो जनाः ।
लवणकारो वसत्येको नित्यं लवणविक्रयी ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! रमणीक मणिपुर में बहुत से जन वास करते थे, वहाँ एक लवणकार ( नमक बनाने वाला ) भी रहता था, वह नित्य लवण बेचा करता था ॥ १ ॥
ब्राह्मणीगमनं तेन कृतं शूद्रेण वै शिवे! तेन पापेन भो देवि वंशहीनश्च जायते ॥ २ ॥
भा० टी० - हे शिवे! उस शूद्र ने ब्राह्मणी के साथ संभोग किया था, हे देवि! उस पाप से वह वंशहीन है ॥ २ ॥
व्याधियुक्तो महेशानि पीडा चाङ्गेषु जायते ।
शान्तिं शृणु महेशानि येन पापनिवर्तनम्॥ ३ ॥
भा० टी ० — हे महेशानि! वर्तमान में वह बीमारी से युक्त है और उसके अंगों में बहुत - सी पीड़ा रहती है । हे महादेवि! जिससे उसके पूर्व पापों की निवृत्ति हो, उसके लिए शांतिविधान को सुनो ॥ ३ ॥
गृहवित्ताष्टमैर्भागैर्ब्राह्मणं तोषयेद्यदि ।
हरिवंशश्रवं देवि विधिवद्यदि पार्वति! ॥४ ॥
भा० टी० - घर के वित्त में से आठवें भाग को दान करके विद्वान् और वेदपाठी ब्राह्मण को प्रसन्न करें और हे पार्वति! हरिवंश पुराण को विधिविधानपूर्वक भक्तिभाव से सुनें ॥४ ॥
ब्राह्मणान्भोजयेद्देवि कूष्माण्डं चैव दापयेत् ।
एवं कृते वरारोहे पुत्रो भवति नान्यथा ॥५ ॥
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३४८ कर्मविपाकसंहिता इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
भा० टी० - हे देवि! ब्राह्मणों को भोजन करवायें और पेठे का दान करें । हे वरारोहे! इसप्रकार से शान्तिकर्म करने से पुत्र की उत्पत्ति होती है, इसमें अन्यथा कुछ भी नहीं है ॥ ५ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ ॥
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॥१०६ ॥
उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥ अलर्काख्यपुरे देवि क्षत्रियो वसति प्रिये! चन्द्रवर्मेति विख्यातो भार्या देवीतिसंज्ञिका ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं -हे प्रिये! अलर्का नामक नगर में एक क्षत्रिय रहता था, उसका नाम चन्द्रवर्मा था और उसकी स्त्री का नामदेवी था ॥ १ ॥
क्षत्रधर्मरतो नित्यं धनाढ्यः शूरसंमतः ।
कृष्णदास इति ख्यातो विप्रस्तस्य पुरोहितः ॥२ ॥
भा० टी० - वह नित्यप्रति क्षत्रिय के धर्म में तत्पर रहता था और शूरवीरों में मान्य था उसका नाम कृष्णदास था उसका एक पुरोहित ब्राह्मण था ॥ २ ॥
क्रोधतो क्षत्रियस्यापि बभूव मरणं यतः ।
पुरोहितस्य विप्रस्य सप्ताहाच्च सुतक्षयः ॥ ३ ॥
भा० टी० - उस क्षत्रिय के क्रोधित होने से उस कलह में उस पुरोहित ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी और सात दिनों के भीतर उस ब्राह्मण का पुत्र भी मर गया ॥ ३ ॥
व्याधिपीडागुल्मजालैः पीड्यते सततं हि सः ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण पञ्चलक्षजपं चरेत्॥ ४ ॥
भा० टी० – उस पाप से उत्पन्न हुई व्याधि, पीड़ा, गुल्मजालों से वह सदा पीड़ित रहता है इसकी शान्ति के लिए गायत्री के मूलमंत्र का पाँच लाख तक जप करायें ॥ ४ ॥
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्यं च कारयेत् ।
ब्राह्मणस्य ततो देवि प्रतिमां कारयेद्बुधः ॥ ५ ॥
भा० टी० - घर में स्थित वित्त में से छठे भाग को पुण्य कर्म में व्यय करायें । हे देवि! फिर वह बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मण की मूर्ति बनवाये ॥ ५ ॥
पूजयित्वा ब्राह्मणाय दत्त्वा पापनिवृत्तये ।
पलपञ्चसुवर्णस्य दद्याद्वै ब्राह्मणाय च ॥ ६ ॥
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३५० कर्मविपाकसंहिता भा० टी ० - और उस मूर्ति का पूजन करके पूर्व पाप दूर करने के लिए ब्राह्मण को देकर पाँच पल सुवर्ण भी ब्राह्मण को दान कर दें ॥ ६ ॥
काकवन्ध्या लभेत्पुत्रं मृतवत्सा सुपुत्रका ॥ ७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से काकवंध्या स्त्री का भी पुत्र जन्मता है, मृतवत्सा भी सुंदर पुत्र वाली होती है ॥७ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
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॥१०७ ॥
उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अयोध्यानिकटे देवि विप्र एकोऽवसत्पुरा ।
वैष्णवोक्तप्रकारेण दीक्षां प्राप्तो हि गर्वितः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! अयोध्यापुरी के समीप एक ब्राह्मण रहता था, वह वैष्णव मत के अनुसार दीक्षा को प्राप्त करके अत्यधिक अभिमान से युक्त था ॥ १ ॥
वेदनिन्दारतो साधुः श्राद्धादिविधिवर्जितः ।
शिवभक्तिरतानां च नाभिवादं समाचरेत् ॥ २ ॥
भा० टी० - वह ब्राह्मण वेद की निंदा करने वाला, श्राद्धादिकों की विधि विधान से रहित था और जो शिवजी की भक्ति में तत्पर रहने वालों को नमस्कार अथवा प्रणाम भी नहीं करता था ॥२ ॥
विप्रद्रोहरतश्चैव हरिमन्दिरशोभितः ।
एकदा तस्य गेहे तु चागतः पथिकः प्रिये! ॥ ३ ॥
भा० o - वह ब्राह्मणों से द्रोह करने वाला था, हरि मंदिर से सुशोभित था । हे प्रिये! एक समय उसके घर पर एक पथिक आ गया ॥३ ॥
रुद्राक्षालंकृतो दान्तस्तस्मै क्रूरमभाषत ।
विषमाहारपानादौ दत्तं तेन द्विजन्मने ॥ ४ ॥
भा० टी० - वह पथिक रुद्राक्ष की माला धारण किये हुए था तथा जितेंद्रिय था, उसको इस ब्राह्मण ने क्रूर वचन कहे और आहार पान आदि में उस ब्राह्मण ने पथिक को विष दे दिया ॥ ४ ॥
रात्रौ तद्द्रव्यलोभेन घटं कृत्वा त्वपाहरत् ।
कूपमध्ये तु तं विप्रं पायीयान् वैष्णवाधमः ॥ ५ ॥
भा० टी० - रात्रि समय में उसके द्रव्य के लोभ से उस ब्राह्मण पथिक को पापी अधम वैष्णव ने कूएँ में घट की तरह बनाकर डुबोता रहा, जिससे वह मर गया ॥५ ॥
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३५२ कर्मविपाकसंहिता
कालान्तरे मृतिर्जाता तस्य साधोर्दुरात्मनः ।
विष्णुनाम स्मरेन्नित्युं वैकुण्ठे वासमाप्तवान्॥ ६ ॥
भा० टी० — फिर कालांतर में उस दुरात्मा साधुनामक ब्राह्मण की भी मृत्यु हुई यह प्रतिदिन विष्णु भगवान् के नाम का स्मरण किया करता था इसलिये उसको वैकुंठ- वास हो गया ॥ ६ ॥
क्षीणे पुण्ये ततो देवि विट्भक्षो ग्रामसूकरः ।
ततो मनुष्ययोनिश्च दृश्यते पुत्रवर्जितः ॥ ७ ॥
भा० टी ० — हे देवि! पश्चात् पुण्य क्षीण होने के बाद पूर्वजन्म के कर्मफल से वह विष्ठा को भक्षण करने वाला ग्राम का सूकर हुआ तत्पश्चात् मुनष्य योनि को प्राप्त हुआ है और पुत्ररहित है ॥ ७ ॥
रोगवानल्पकीर्तिश्च स एव सुरसुन्दरि! अतः शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणुष्व हरवल्लभे! ॥ ८ ॥
भा० टी० – वह रोगवान् और अत्यधिक स्वल्प कीर्ति वाला है । हे हरवल्लभे! अब इसकी शांति को कहता हूँ, ध्यान से सुनो ॥ ८ ॥
लक्षमुद्रां ब्राह्मणाय दत्त्वा काश्यास्तु सेवनम् ।
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं ततो मुच्येत पातकात्॥ ९ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रापदानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
भा० टी ० – ब्राह्मण को एक लाख मुद्रा रुपयों का दान देकर काशजी का सेवन करें और ब्रह्मचर्य में रत रहें तब पूर्वजन्म के सारेपाप से छूट जाते हैं ॥ ९ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे उत्तराभाद्रपदानक्षत्रस्य चतुर्थचरण० प्रायश्चित्तकथनं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥