कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 51–60
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 51–60
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कर्मविपाकसंहिता ४३ भा० टी० - पश्चात् शुद्ध बुद्धि वाले ज्ञानी विद्वान् ब्राह्मण को उसका दान दे 44' नमः शिवाय ' ' और इस मंत्र का एक लाख तक प्रयत्नपूर्वक जप करवायें ॥१२ ॥
रोगतो मुच्यते देवि नात्र कार्या विचारणा ।
भा० टी० — हे देवि! रोग से वह छूट जाता है, इसमें कुछ विचारणीय नहीं है ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां भरण्यास्तृतीयचरणप्रायश्वित्त० नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
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॥११ ॥
अथ भरण्याश्वतुर्थचरणप्रायश्वित्तकथनम् ॥ ईश्वर उवाच ॥
शृणु देवि वरारोहे नृणां कर्मविपाकजम् ।
प्रवक्ष्यामि न संदेहो यदि ते श्रवणे मतिः ॥ १ ॥
उत्तरे चाप्ययोध्यायास्ततः क्रोशत्रयोपरि ।
तत्र तस्थौ च भो देवि लोकशर्मेति नामतः ॥ २ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! हे वरानने!! मैं मनुष्यों के कर्म विपाक को निसंदेह कहूंगा, यदि तुम्हारी बुद्धि सुनने में उत्सुक है तो ( सुनो ) अयोध्यापुरी से उत्तर दिशा में तीन कोश पर लोक शर्मा नामक ब्राह्मण रहता था ॥ १ ॥ २ ॥
तस्य पत्नी शुभाङ्गी वै लीलानाम्नीति विश्रुता ।
ब्राह्मणः कर्मविभ्रष्टो व्याधरूपो वरानने ॥ ३ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री सुंदर अंग वाली लीला नाम से प्रसिद्ध थी । हे वरानने! वह ब्राह्मण अपने कर्म से भ्रष्ट हो कर व्याध रूप हो गया ॥ ३ ॥
मृगान् सबालकान् हत्वा पक्षिणो विविधानपि ।
भुभुजे पत्नीयुक्तस्तु तुतोष बहुधा तदा ॥ ४ ॥
भा० टी० — शावकों सहित मृगों को मार कर तथा अनेक पक्षियों को मार कर अपनी स्त्री सहित उनका भक्षण करता हुआ बहुत प्रसन्न होता था ॥ ४ ॥
तस्य पत्नी महादुष्टा मुखरा चञ्चला तथा ।
परपुंसि रता नित्यं धर्मकर्मविवर्जिता ॥ ५ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री महादुष्टा क्रोधिनी और चंचल थी, नित्य प्रति पर- पुरुष मे रत रहा करती थी और नित्य नैमित्तिक किये जाने वाले अपने धर्म -कर्म से वर्जित थी ॥ ५ ॥
एवं सर्वं वयो जातं वृद्धे सति वरानने! मरणं तस्य वै देवि स्वपुरे सर्प्पतस्तथा ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ४५ भा० टी० - हे वरानने! इसप्रकार उसकी संपूर्ण अवस्था बीत गई, फिर वह वृद्ध हो गया । तब हे देवि! वह अपने ही पुर में कहीं गमन करता हुआ मर गया ॥ ६ ॥
पत्नी चैव तदा तस्य दुष्टा वै व्यभिचारिणी ।
उभौ च नरके यातौ स्वकर्मवशतः प्रिये! ॥ ७ ॥
भा० टी० - उसकी दुष्टा व्यभिचारिणी वह स्त्री भी मृत्यु को प्राप्त हो गई । हे प्रिये! फिर वे दोनों ही अपने कर्म-वश नरक को प्राप्त हो गये ॥ ७ ॥
कुम्भीपाके महाघोरे नानानरकयातनाम् ।
भुक्त्वा बहु सहस्राणि पुनर्यातश्च सूकरः ॥ ८ ॥
भा० टी० - कुम्भीपाक नामक महाघोर नरक में अनेक प्रकार की पीड़ाओं को कई हजार वर्षों तक भोग कर फिर वह सूकर हो गया ॥ ८ ॥
योनिं च शूकरीं भुक्त्वा बिडालत्वं पुनः प्रिये! ततो बिडालयोनिं च भुक्त्वा गृध्रस्ततोऽभवत्॥ ९ ॥
भा० टी० - हे प्रिये! शूकर की योनि को भोग कर बिलाव योनि को भोग कर फिर गीध हो गया ॥९ ॥
पुनः कर्मवशाद्देवि मानुषत्वं ततोऽभवत् ।
इह लोके वरारोहे पूर्वकर्मप्रभावतः ॥ १० ॥
भा० टी० — हे देवि! पश्चात् वह कर्म- वश मनुष्य योनि में इस मृत्यु लोक में उत्पन्न हुआ है ॥ १० ॥
मृतवत्सा भवेन्नारी पुत्रश्चैव न जीवति ।
बहुरोगो भवेद्देवि ज्वरेणैव प्रपीडितः ॥ ११ ॥
भा० टी० - उसकी स्त्री की संतान नहीं जीती है ( मृतवत्सा है ) । पुत्र नहीं जीता है । वह बहुत रोग और ज्वर से पीड़ित है ॥ ११ ॥
पूर्वजन्मकृतं पापमिहजन्मनि भुज्यते ।
इह लोके कृतं कर्म जन्मजन्मनि भुज्यते ॥ १२ ॥
भा० टी० - पूर्वजन्म में किया हुआ पाप इस जन्म में भोगा जाता है और इस जन्म में जो कर्म किया जाता है, वह अन्य जन्मों में भोगा जाता है ॥ १२ ॥
अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं गिरिजे मम ।
वंशगोपालमन्त्रेण लक्ष्यजाप्यं वरानने! ॥ १३ ॥
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४६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० — हे पार्वति! अब इसकी शांति कहूँगा सुनो, हे वरानने! संतान गोपाल- मंत्र का एक लाख जप करवायें ॥ १३ ॥
दशांशहोम: कर्तव्यो विप्राणां भोजनं शतम् ।
मन्त्रं च संप्रवक्ष्यामि येन पुत्रमवाप्स्यसि ॥ १४ ॥
भा० टी० - दशांश होम करवायें सौ ब्राह्मणों को भोजन करायें, अब मंत्र को कहूँगा जिससे पुत्र की प्राप्ति होगी ॥ १४ ॥
मन्त्रः- ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते! देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ १५ ॥
भा० टी० – मंत्र— ॐ हे देवकी- सुत! हे गोविंद! हे वासुदेव! हे जगत्पते! मुझको पुत्र दो । हे कृष्ण! मैं तुम्हारी शरण हूँ, यह मंत्र संतान गोपाल का है ॥ १५ ॥
ततो वै समृगान् कृत्वा मृगबालान् सपक्षिणः ।
स्वर्णपञ्चपलेनैव मृगान् कृत्वा सबालकान्॥ १६ ॥
भा० टी ० — इसके अनंतर वह बच्चों सहित मृगों की और पक्षियों की मूर्ति बनवाये बच्चों सहित मृग को पांच पल सुवर्ण का बनवायें ॥ १६ ॥
रौप्यस्यैव वरारोहे पक्षिणः पञ्च कारयेत् ।
पूजनं विधिवत् कृत्वा संप्रार्थ्य परमेश्वरम्॥ १७ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! पांच पक्षी चांदी के बनवायें, पश्चात् विधिपूर्वक पूजन कर परमेश्वर की प्रार्थना करें ॥ १७ ॥
स्रष्टा त्वं सर्वलोकानां सर्वकामप्रदः सताम् ।
देवदेव जगन्नाथ शरणागतवत्सल!॥ १८ ॥
भा० टी० — हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! शरणागतवत्सल! तुम सब लोकों को रचने वाले हो और श्रेष्ठ पुरुषों को सब मनोकामनाएँ देने वाले हो ॥ १८ ॥
त्राहि मां कृपया देव पूर्वकर्मविपाकतः ।
एवं संपूज्य देवेशं ततो विप्रं प्रपूजयेत् ॥ १ ९ ॥
भा० टी० — हे देव! कृपा करके पूर्व-कर्म के विपाक से मेरी रक्षा करो । ऐसे विष्णु भगवान् का पूजन कर पश्चात् ब्राह्मण की पूजा करे ॥ १ ९ ॥
सुवर्णेन वरारोहे अश्वादिवाहनेन वै ।
प्रतिमामयेद्देवि विप्राय ज्ञानरूपिणे ॥ २० ॥
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कर्मविपाकसंहिता ४७ भा० टी० - हे वरारोहे! सुवर्ण तथा अश्व आदि वाहन के साथ ब्राह्मण का पूजन करें फिर ज्ञानरूपी ब्राह्मण को उन मूर्त्तियों को भी दान दे ॥ २० ॥
वापिकां कूपखातं च पथि मध्ये वरानने!
प्रकरोति यदा देवि तदा पुत्रः प्रजायते ।
रोगात्प्रमुच्यते देवि जीवेत् पुत्रो न संशयः ॥ २१ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे भरण्याश्वतुर्थचरणप्रायश्वि० नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
भा० टी० — हे वरानने! यदि मार्ग में बावड़ी बनवाये अथवा कुआँ खुदवायें तब पुत्र उत्पन्न होता है । हे देवि! रोग से छुटकारा मिलता है और उसका पुत्र जीये इसमें संदेह नहीं ॥ २१ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे भरण्याश्वतुर्थचरण० नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
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॥१२ ॥
कृत्तिकाप्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ ईश्वर उवाच ॥
कृत्तिकायां वरारोहे प्रथमे चरणे तथा ।
यो जायेत नरो देवि तस्य वक्ष्ये शुभाशुभम्॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहतें हैं - हे देवि! कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम चरण में जो जन्म लेता है । हे वरारोहे! उस मनुष्य के शुभाशुभ योग को कहूँगा ॥ १ ॥
ईशानेऽपि महादेवि कोसलापुरतोऽनघे! राजपुत्रोवसत्कश्चिन्नगरे गूढसंज्ञके ॥ २ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! हे अनघे!! अयोध्यापुरी से ईशान की तरफ गूढ नाम वाले नगर में ॥ २ ॥
नामतो अहिशर्मेति तस्य पत्नी कला शुभा ।
धनधान्यसमायुक्तो रूपवान् मन्मथो यथा ॥ ३ ॥
भा० टी० – अहिशर्मा नाम वाला ब्राह्मण धन - धान्य से युक्त और कामदेव के समान रूप वाला था । उसकी स्त्री कला नाम वाली शुभ गुणों से युक्त थी ॥ ३ ॥
याति चाखेटकं नित्यं मृगीं हत्वा च गर्भिणीम् ।
प्रत्यहं मृगमांसेन पोषयेत्स्वतनुं तथा ॥ ४ ॥
भा० टी० - वह नित्य शिकार को जाता, तब गर्भिणी मृगी को मार कर और दिन- प्रतिदिन मृगों के मांस से अपने शरीर का पोषण करता ॥ ४ ॥
शरीरे वृद्धता जाता दया तस्य न चाभवत् ।
ततो वै मरणाद्देवि सती भार्य्या ततोऽभवत् ॥ ५ ॥
भा० टी० – फिर उसको वृद्ध अवस्था प्राप्त हुई और उसको दया तब भी नहीं आयी बाद में वह मृत्यु को प्राप्त हुआ । तब उसकी स्त्री उसके संग अग्नि में सती हो गई ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ४९
सत्यलोकं गतस्तेन भार्य्यायाः सुकृतेन तु ।
भुक्तं कल्पमितं पुण्यं सत्यलोके वरानने! ॥ ६ ॥
भा० टी० – वह स्त्री के सुकृत से सत्य ( पुण्य ) लोक को चला गया और हे वरानने! एक कल्प तक उसने सत्यलोक में पुण्य भोगा ॥ ६ ॥
पुनः पुण्यक्षये जाते मानुषत्वमुपागतः ।
पत्न्या सह ततो देवि कुले महति पूजिते ॥ ७ ॥
भा० टी० - फिर पुण्य पूरा हाने पर तब वह मनुष्य शरीर को प्राप्त हुआ ॥ हे देवि! उसकी स्त्री और उसने बड़े कुलों में जन्म लिया ॥ ७ ॥
पूर्वजन्मविपाकेन मृतवत्सत्वमाप्नुयात् ।
मृगीं सगर्भां हतवान् पूर्वजन्मनि सुव्रते! ॥ ८ ॥
भा० टी ० – पूर्व कर्मविपाक से ( मृतवत्सत्व ) जिसकी संतान नहीं जीती है क्योंकि हे सुव्रते! वह गर्भिणी मृगी को मारता था ॥ ८ ॥
तेन कर्मविपाकेन मर्त्यलोके ह्यपुत्रकः ।
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि यतः पुत्रः प्रजायते ॥ ९ ॥
भा० टी० -जिस कर्म -विपाक से वह मृत्यु लोक में पुत्र रहित हुआ है, अब उसकी शांति को कहूँगा जिससे उसकी संतान होगी ॥ ९ ॥
गायत्रीजातवेदाभ्यां लक्षमेकं जपं तथा ।
दशांशहोमः कर्त्तव्यो विप्राणां भोजनं ततः ॥ १० ॥
भा० टी० - गायत्री मंत्र और " जातवेदसे सुनवाम० " इस मंत्र से एक लाख जप करवाये पश्चात् दशांश होम करवायें फिर ब्राह्मण को भोजन करवायें ॥ १० ॥
सौवर्णेन मृगीं कृत्वा मृगबालं तथैव च ।
पूजयित्वा विधानेन कपिलां च ततः प्रिये! । ११ ॥
भा० टी० – सुवर्ण की मृगी और मृगी के बच्चे बना कर उनका विधिपूर्वक पूजन करें । हे प्रिये! पीछे कपिला गौ को ॥ ११ ॥
प्रदद्याद्वेदविदुषे ब्राह्मणाय सुतेजसे ।
हरिवंशस्य श्रवणं चण्डीपाठं शिवार्चनम् ॥ १२ ॥
भा० टी० – वेद को जानने वाले सुंदर तेज वाले विद्वान् ब्राह्मण को दान दें, हरिवंश को सुनें और दुर्गापाठ करें तथा शिव-पूजन करवायें ॥ १२ ॥
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५० कर्मविपाकसंहिता
एवं कृत्वा विधानेन शीघ्रं पुत्रः प्रजायते ।
कन्यका न भवेत्तस्य गर्भपातो न जायते ॥ १३ ॥
भा० टी० - यदि ऐसे विधान से करें तो शीघ्र ही पुत्र उत्पन्न होता है, कन्या उत्पन्न न हो और गर्भपात भी नहीं होता है ॥ १३ ॥
रोगत्प्रमुच्यते रोगी सर्वकामः प्रजायते । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे कृत्तिका० प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
भा० टी० – रोगी रोग से मुक्त हो जाता है, सब कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं ॥१४ ॥
इति कर्मविपाकस० पार्वतीहरसंवादे कृत्तिका-प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
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॥१३ ॥
कृत्तिकानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
नराणां पुण्यशीलानामिह जन्मसमुद्भवम् ।
सुखं वक्ष्याम्यहं देवि पूर्वकर्मफलं यतः ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! पुण्यात्मा मनुष्यों को इस जन्म में पूर्व-कर्म के प्रभाव से सुख की प्राप्ति होती है, उसको कहता हूँ ॥ १ ॥
येन दत्तं पुरादानं गोसुवर्णगजादिकम् ।
तत्फलेन महादेवि इह तस्मात् सुखं भवेत्॥ २ ॥
भा० टी० -जिसने पूर्व जन्म में गौ, सुवर्ण, हाथी आदि का दान किया हो, हे महादेवि! इस जन्म में उस दान से उसको सुख मिलता है ॥ २ ॥
शरीरे जन्मतः कान्तिर्लक्ष्मीवान् गुणवानपि ।
सौख्यं प्रभुज्यते नित्यं पुत्रतो धनतस्तथा ॥ ३ ॥
भा० टी००.-जन्म से ही शरीर में कांति रहती है, लक्ष्मीवान् और गुणवान् होता है ।
नित्य प्रति पुत्रों के और धन के सुख को भोगता है ॥ ३ ॥
न रोगो जायते देवि दुःखं नैव कदाचन ।
इह लोके सुखं भुक्त्वा कीर्त्तिमान् सुखमेधते ॥४ ॥
भा० टी ० — हे देवि! उसे रोग नहीं होता है और दुःख भी कभी नहीं होता है ।
इस जन्म में सुख भोग कर कीर्तिमान् हो कर सुख की वृद्धि को प्राप्त होता है ॥
अथ वक्ष्याम्यहं देवि नक्षत्रे कृत्तिकाह्वये ।
द्वितीयचरणे देवि पूर्वं यत् फलमुच्यते ॥ ५ ॥
भा० टी ० — हे देवि! अब कृत्तिका नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म लेने वाले के पूर्वजन्म के कर्मफलों को कहता हूँ ॥ ५ ॥
कान्यकुब्जो द्विजः कश्चिदिन्द्रशर्मेति नामतः ।
पत्नी रुद्रमती देवि कुशीला कलहप्रिया ॥ ६ ॥
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५२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० – कान्यकुब्ज वंश का कोई इन्द्रशर्मा नाम वाला ब्राह्मण था । हे देवि! उसकी स्त्री रुद्रमती दुष्ट स्वभाव की और कलह करने वाली थी ॥ ६ ॥
वेदपाठरतो नित्यं षडङ्गस्य च पाठकः ।
एकदा तत्र वै देशे कश्चित् क्षत्री नराधिपः ॥७ ॥
भा० टी० - वह ब्राह्मण वेद -पाठ और षडंग के पाठ करने में तत्पर रहता था ।
एक समय उस देश में कोई क्षत्रिय राजा आया ॥७ ॥
मरणे तस्य वै याते तद्विप्रस्य निमन्त्रणम् ।
भुक्तं तेन तदा देवि क्षत्रियस्य क्रियासु च ॥ ८ ॥
भा० टी० - उस राजा की मृत्यु हो गई । तब वहाँ उस ब्राह्मण का निमंत्रण हुआ हे देवि! वहाँ उस क्षत्रिय की क्रिया में उस ब्राह्मण ने भोजन किया ॥ ८ ॥
गृहीतं तस्य वै दानं शय्या चैव गजादिकम् ।
सर्वं गृह्य गृहं गत्वा भुक्तं बहुदिनं प्रिये! । ९ ॥
भा० टी० – उसने शय्या, हस्ती आदि दान ग्रहण किया है । प्रिये! संपूर्ण दान ग्रहण करके घर में जा कर उसने बहुत दिन तक भोगा ॥ ९ ॥
ततो बहुगते काले तस्य विप्रस्य पञ्चता ।
स यातो यमलोके वै नरके च सुदारुणे ॥ १० ॥
भा० टी० - फिर बहुत समय बीत जाने के बाद उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी तब वह धर्मराज के लोक में प्राप्त हो कर दारुण नरक में पड़ गया ॥ १० ॥
भुक्तं स्वकर्मजं दुःखं युगमेकं वरानने! गजव्याघ्रकृमेर्योनिं ततो भुङ्क्ते पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥
भा० टी ० — हे वरानने! एक युग तक अपने कर्मों का दुःख भोगता हुआ, हाथी, व्याघ्र, कृमि–इन योनियों को अलग अलग भोग कर ॥ ११ ॥
मनुष्यत्वं ततः प्राप्तः पूर्वकर्मविपाकतः ।
पुत्रो न जायते देवि कन्यका विविधास्तथा ॥ १२ ॥
भा० टी ० — फिर पूर्व कर्मों के प्रभाव से मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है । हे देवि! उसके पुत्र नहीं होता है और अनेक कन्याएँ ही जन्म लेती हैं ॥ १२ ॥
मृतवत्सा भवेन्नारी रोगाश्च विविधाः प्रिये! शान्तिं तस्य प्रवक्ष्यामि यतः पुत्रमवाप्स्यते ॥ १३ ॥