कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 61–70

कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 61–70

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कर्मविपाकसंहिता ५३ भा० टी० – अथवा उसकी स्त्री के संतान नहीं जीती है और उसे अनेक प्रकार के रोग रहते हैं । हे प्रिये! अब इसकी शांति को कहूँगा, जिससे पुत्र की प्राप्ति होगी ॥१३ ॥

गायत्रीलक्षजाप्येन त्र्यम्बकेण तथा प्रिये! होमं च कारयामास षडंशं दानमेव च ॥१४ ॥

भा० टी० - हे प्रिये! गायत्री मंत्र तथा " त्र्यंबकं यजामहे ० " इस मंत्र के एक लाख तक जप करायें, दशांश होम करायें, घर के द्रव्य में से षडंश ( छठे हिस्से ) धन का दान करें ॥ १४ ॥

दशवर्णाश्च गा दद्याद्विधिवद्ब्राह्मणाय वै ।

भोजयेच्छतसंख्यं च ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ १५ ॥

भा० टी० – और विधिपूर्वक दश प्रकार के रंगों वाली गौओं को ब्राह्मण को दान दें, वेदपाठी सौ( १०० ) ब्राह्मणों को भोजन करवायें ॥ १५ ॥

एवं कृतेन भी देवि पुत्रश्चैव प्रजायते ।

रोगाणां च निवृत्तिः स्यात् पूर्वपापक्षयो भवेत्॥ १६ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे कृत्तिकानक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

भा० टी० — हे देवि! ऐसा करने से पुत्र होता है, रोगों की निवृत्ति होती है और पूर्वजन्म के पाप नष्ट होतें हैं ॥ १६ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे कृत्तिकानक्षत्रस्य द्वितीयचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 62

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॥१४ ॥

कृत्तिकानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

तृतीयं तस्य वै देवि चरणं वदतः शृणु ।

कान्यकुब्जकुले कश्चिन्नगरे सूर्यसंज्ञके ॥ १ ॥

उद्योतशर्मा विख्यातस्तस्य स्त्री गिरिजाभवत् ।

वेदपाठरतो नित्यं दारिद्र्येणैव पीडितः ॥ २ ॥

भा० टी० -शिवजी कहते हैं - हे देवि! अब कृत्तिका नक्षत्र के तीसरे चरण के कमल को सुनो । सूर्यपुर में कान्यकुब्ज कुल में कोई उद्योतशर्मा नाम वाला ब्राह्मण हुआ, जिसकी गिरिजा नामक स्त्री हुई । वह ब्राह्मण नित्यप्रति वेदपाठ करने में रहता रत था और दारिद्र्य से पीड़ित था ॥ १॥२ ॥

कर्कशा भामिनी तस्य निष्ठुरं वदती स्मृता ।

एकदा सूर्यग्रहणे तैलकारस्तदागतः ॥ २ ॥

भा० टी० - उसकी स्त्री कर्कशा ( कठोर बोलने वाली ) थी, उसको क्रूर वचन बोलती थी । एक समय सूर्य ग्रहण में कोई तैलकार ( तेली ) वहाँ आया ॥ ३ ॥

गङ्गामध्ये ततो दानं तस्मै विप्राय वै शिवे! प्रददौ लक्षसंख्यां वै स्वर्णमुद्रां तु दक्षिणाम् ॥ ४ ॥

भा० टी० - हे शिवे! तदनन्तर उस तैलकार ने उस ब्राह्मण को गंगाजी के मध्य में लाख मोंहरों का दान दिया ॥ ४ ॥

प्रतिगृह्य ततो दानं गृहं गत्वा द्विजस्तदा ।

व्ययं करोति स्म तदा भार्यापुत्रेण चैव हि ॥ ५ ॥

भा० टी० – तब वह ब्राह्मण उस दान को ग्रहण कर अपने घर मे जाकर दिन प्रतिदिन स्त्री- पुत्र सहित व्यय करता गया ॥ ५ ॥

वेदपाठं ततस्त्यक्त्वा प्रत्यहं ससुखं प्रिये! मरणं वृद्धसमये गृहे शय्योपरि स्थिते ॥ ६ ॥

पृष्ठ 63

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कर्मविपाकसंहिता ५५ भा० टी० - हे शिवे! पश्चात् वह वेदपाठ को त्याग कर दिन प्रतिदिन सुख को भोगता हुआ फिर वृद्ध अवस्था में घर में खाट पर पड़े - पड़े उसकी मृत्यु हो गई ॥ ६ ॥

स्वर्णमध्ये च दानं वै न दत्तं गिरिनन्दिनि! स गतो नरके घोरे यमराजेन प्रेरितः ॥ ७ ॥

भा० टी० — हे गिरिजे! उसने सुवर्ण - मोह से कुछ भी दान नहीं किया था, इसलिये वह के द्वारा घोर नरक में डाला गया ॥ ७ ॥

भुङ्क्ते नरकजं दुःखं स्त्रीपुत्रेण च संयुतः ।

युगमेकं वरारोहे प्रेतत्वं काकतां गतः ॥८ ॥

भा० टी० - हे वरारोहे! स्त्री- पुत्र से संयुक्त वह वहाँ नरक के दुःखों को एक युग तक भोगता हुआ फिर काग ( कौआ) हुआ ॥ ८ ॥

ततः शृगालयोनिं च मानुषत्वं ततो गतः ।

पूर्वजन्मकृतं कर्म इह लोके प्रभुज्यते ॥ ९ ॥

भा० टी ० — पश्चात् गीदड़ की योनि को प्राप्त हो कर फिर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है क्योंकि, पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म इस लोक में भोगा जाता है ॥९ ॥

पाठयामास वै वेदान् ब्राह्मणेभ्यो वरानने! तत्संचितफलाद्देवि महदैश्वर्यमाप्नुयात्॥ १० ॥

भा० टी० - हे देवि! वह जो ब्राह्मणों को वेद पढ़ाता था, उस कर्म -फल से वह महान् ऐश्वर्यवान् हुआ है ॥ १० ॥

भार्या मृता ततः पुत्रो द्वितीया च विवाहिता ।

शरीरे बहवो रोगाः सुखं तस्य न जायते ॥ ११ ॥

भा० टी० - स्त्री मर गई, फिर पुत्र मर गया । पश्चात् उसने दूसरी स्त्री से विवाह किया है, इसके शरीर में बहुत से रोग हैं, उसे सुख नहीं मिलता है ॥ ११ ॥

वृद्धे सति वरारोहे पुत्रः शत्रुर्भवेदिति ।

मृतवत्सा भवेन्नारी पूर्वजन्मविपाकतः ॥ १२ ॥

भा० टी ० — हे वरारोहे! वृद्ध - अवस्था में उसका पुत्र ही अत्यंत शत्रु हो जाता है अथवा पूर्वजन्म के कर्म से उसकी स्त्री के संतान ही नहीं जीती ॥ १२ ॥

तस्य पुण्यमहं वक्ष्ये यतो रोगो निवर्तते ।

पुनः पुत्रो भवेद्देवि कन्यका नैव जायते ॥ १३ ॥

पृष्ठ 64

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५६ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० – उसके पुण्य को मैं कहूँगा, जिससे रोग- निवृत्त हो कर फिर पुत्र उत्पन्न हो, हे देवि! कन्या नहीं होंगी ॥ १३ ॥

जातवेदादिमन्त्रेण जपं वै कारयेद्बुधः ।

लक्षत्रयं प्रयत्नेन ततो होमं तिलादिभिः ॥ १४ ॥

भा० टी०– “ जातवेदसे सुनवाम० " इस मंत्र का बुद्धिमान् जन यत्न से तीन लाख तक जप करायें, पश्चात् तिल आदि से होम करवायें ॥ १४ ॥

चतुरस्त्रे शुभे कुण्डे हरिवंशश्रवणं ततः ।

भूदानं विधिवत्कुर्याच्छायां पात्राय दापयेत्॥ १५ ॥

भा० टी० - चौकोर शुभ कुंड में होम करायें, हरिवंशपुराण सुनें, पृथ्वी ( भूमि ) का दान करें, सत्पात्र ब्राह्मण को विधिपूर्वक शय्या का दान दें ॥ १५ ॥

एवं कृते न संदेहो रोगनाशो भविष्यति ।

पुत्रश्च जायते देवि नात्र कार्य्या विचारणा ॥ १६ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे कृत्तिकानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

भा० टी० - ऐसा करने से निश्चय ही रोग का नाश होगा, दे देवि! पुत्र भी उत्पन्न होगा । इसमें कुछ भी सन्देहस्पद नहीं है ॥ १६ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां कृत्तिका० तृतीयचर० नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४ ॥

पृष्ठ 65

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॥१५ ॥

कृत्तिकानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥

कान्यकुब्जो द्विजः कश्चिन्नर्मदादक्षिणे तटे ।

माहिष्मत्यां वसत्येको द्विजः परमवैष्णवः ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं— नर्मदा नदी के दक्षिण किनारे पर माहिष्मती नामक नगरी में परम वैष्णव कोई ब्राह्मण रहता था ॥ १ ॥

नामतो योधशर्मेति तस्य भार्या तु दानवी ।

प्रत्यहं वैश्यवृत्तिस्तु विक्रयं चाकरोत्सदा ॥ २ ॥

भा० टी० - योधशर्मा नाम वाले उस ब्राह्मण की स्त्री दानवी नाम वाली थी जो प्रतिदिन वैश्य - वृत्ति द्वारा सदा शरीर को बेचने का व्यवहार करती थी ॥ २ ॥

तत्र वैश्य उवासैको धनधान्यसमन्वितः ।

वैश्यतस्तेन विप्रेण स्वर्णं नीतमृणं बहु ॥ ३ ॥

भा० टी ० — वहाँ धनाढ्य एक वैश्य रहता था, उस वैश्य के पास से उस ब्राह्मण ने बहुत सा सुवर्ण उधार में लिया ॥ ३ ॥

ततो बहुतिथे काले स विप्रो मृत्युमागतः ।

ऋणं तस्मै न दत्तं वै वैश्याय तु स्वकर्मणे ॥ ४ ॥

भा० टी० - फिर बहुत - सा समय बीतने के बाद तब वह ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त हो गया और अपने काम आने वाले उस वैश्य को वह ऋण, दान नहीं दिया ॥ ४ ॥

मरणे सति विप्रस्तु रौरवं नरकं गतः ।

वैश्यकर्म कृतं तेन स्वकर्म परिमुच्यते ॥ ५ ॥

भा० टी००.- वह ब्राह्मण मर गया, तब रौरव नरक को प्राप्त हुआ, क्योंकि उसने वैश्य कर्म किया, अपने धर्म से भ्रष्ट रहा था ॥५ ॥

विंशद्वर्षसहस्राणि यमलोके वसत्यसौ ।

नरकान्निःसृतो देवि यातो वृषभशूकरौ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 66

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५८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - वह बीस हजार वर्षों तक धर्मराज के लोक में रहा था ।। हे देवि! नरक से निकल कर बैल और शूकर की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ६ ॥

योनिद्वयफलं भुक्त्वा मनुष्यत्वमवाप्नुयात् ।

धनधान्यसमायुक्तस्तत्पुण्यस्य प्रभावतः ॥ ७ ॥

भा ० टी० – इन दोनों योनियों के फल को भोग कर मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है, जिस पुण्य के प्रभाव से धनधान्य से संयुक्त है ॥७ ॥

ऋणसंबन्धतो देवि वैश्यः पुत्रत्वमागतः ।

प्रत्यहं तस्य वै द्रव्यं व्ययं कुर्याद्दिने दिने ॥८ ॥

भा० टी० — हे देवि! ऋण के संबंध से वह वैश्य उसके पुत्र के रूप में हुआ है और दिन प्रतिदिन जिस के द्रव्य को खर्च करता रहता है ॥ ८ ॥

मद्यवेश्याप्रदानेन धनं सर्वं व्ययं कृतम् ।

यदा पुत्रः समुत्पन्नो युवा तस्य भवेत्प्रिये ॥ ९ ॥

भा० टी० - मदिरापान के लिए और वैश्या को देने से संपूर्ण धन खर्च दिया । हे प्रिये! जब उसका यह पुत्र जवान हुआ ॥ ९ ॥

तदा मृत्युमवाप्नोति शोकं दत्त्वा तयोस्तदा ।

पुनः पुत्रो न जातो वै पूर्वजन्मविपाकतः ॥ १० ॥

भा० टी० – तब इन दोनों स्त्री- पुरुषों को शोक देकर मर गया है । पूर्वजन्म के कर्म विपाक से फिर इनको पुत्र प्राप्त नहीं हुआ है ॥ १० ॥

प्रायश्चित्तं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापविशुद्धये ।

गायत्री लक्षजाप्येन तदर्थं वाटिकां पथि ॥ ११ ॥

भा० टी० - पूर्व पाप की शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त कहूँगा गायत्री का एक लाख तक जप करायें, पाप की शुद्धि के लिए मार्ग में धर्मशाला बनवायें ॥ ११ ॥

कूपं प्रयत्नतः कुर्यात्तडागं विधिपूर्वकम् ।

होमं वै कारयेच्चैव विधिपूर्वं वरानने! ॥ १२ ॥

भा० टी० — यत्न से विधिपूर्वक कूआँ अथवा तालाब बनवायें । हे वरानने! विधिपूर्वक होम करवायें ॥ १२ ॥

पलपञ्चसुवर्णस्य दानं दद्याद्विशेषतः ।

दशवर्णाः प्रदातव्याः स्वर्णयुक्ताः सहाम्बराः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 67

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कर्मविपाकसंहिता ५ ९ भा० टी० - विशेष करके पाँच पल, बीस तोले सुवर्ण का दान करें दश प्रकार के वर्णों वाली सुवर्ण और वस्त्रों से युक्त गौओं का दान करें ॥ १३ ॥

भोजयेच्छतविप्रांस्तु यथाशक्ति सदक्षिणान् ।

एवं कृते न संदेहो रोगनाशो भवेदनु ॥ १४ ॥

भा० टी० – सौ ब्राह्मणों को भोजन करवायें, शक्ति के अनुसार दक्षिणा दें ऐसा करने से वात- रोग का नाश होगा, इसमें संदेह नहीं ॥ १४ ॥

पुत्रपौत्रा विवर्द्धन्ते मम वाक्यं न चाऽन्यथा ॥ १५ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे कृत्तिकानक्षत्रस्य चतुर्थचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

भा० टी० – उसके पुत्र - पौत्र बढेंगे, यह मेरा वाक्य अन्यथा नहीं है ॥ १५ ॥

इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां कृत्तिकानक्षत्रस्य चतुर्थचरणे प्रायश्चित्तकथनं नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 68

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॥१६ ॥

रोहिणीनक्षत्रस्य प्रथमचरणकथनम् ॥ महादेव उवाच ॥

अथातः संप्रवक्ष्यामि ब्रह्मनक्षत्रजं फलम् ।

रोहिण्याः प्रथमे पादे यस्य जन्म च जायते ॥ १ ॥

भा० टी० - शिवजी कहते हैं - अब रोहिणी नक्षत्र में जन्म लेने वाले के कर्म-फल को कहूँगा — रोहिणी के प्रथम चरण में जिसका जन्म हो ॥१ ॥

तस्य कर्म पुरा देवि संचितं संब्रवीम्यहम् ।

अन्तर्वेद्यां द्विजः कश्चिद्धोपनामावसत्प्रिये! ॥ २ ॥

भा० टी० - हे देवि! उसके पूर्व संचित कर्म को मैं कहता हूँ। हे प्रिये! गंगा-यमुना के मध्य देश में कोई भोप नाम वाला ब्राह्मण रहता था ॥२ ॥

ब्रह्मकर्मविहीनश्च चौरकर्मरतः सदा ।

सार्द्धं चौरेण भो देवि बहु द्रव्यमुपार्जितम् ॥ ३ ॥

भा० टी० - हे देवि! वह ब्राह्मण के कर्म से विहीन था और सदा चोरी के काम में तत्पर रहता था । हे देवि! उसने चोरों के संग मिल कर बहुत-सा द्रव्य इकट्ठा किया ॥३ ॥

परस्त्रीलम्पटो देवि स्वां भार्यां परिमुच्य च ।

एवं बहुगते काले कालवश्यस्ततोऽभवत् ॥ ४ ॥

भा० टी० - हे देवि! वह अपनी स्त्री को त्याग कर अन्य स्त्री में अभिलाषा रखता । ऐसे बहुता सा काल बीत चुका, तब वह काल के वश हो गया ॥ ४ ॥

यमः कर्मप्रभावेण नरके नाम कर्दमे ।

वासयामास भो देवि षष्टिवर्षसहस्रकम्॥ ५ ॥

भा० टी० - हे देवि! धर्मराज ने उसके कर्मों के प्रभाव से उसे कर्दम नामक नरक में साठ हजार वर्षों तक वास कराया ॥५ ॥

पृष्ठ 69

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कर्मविपाकसंहिता ६१

नरकान्निःसृतो देवि कुक्कुटत्वं प्रजायते ।

ततो यातो महादेवि नरयोनिं च दुर्लभाम्॥ ६ ॥

भा० टी० — हे देवि! नरक से निकल कर वह मुरगा हुआ । हे महादेवि! पीछे दुर्लभ इस मनुष्य योनि को प्राप्त हुआ है ॥ ६ ॥

पाण्डुरोगेण संयुक्तः पुत्रो नैव प्रजायते ।

वेश्याः कन्याः प्रजायन्ते पुत्रस्य मरणं भवेत् ॥ ७ ॥

भा० टी० – वह पांडुरोग ( पीलिया रोग) से युक्त है, इसके पुत्र नहीं होता है

और उसने जिन वेश्याओं के संग रमण किया था, वे वेश्याएँ इसकी पुत्रियाँ हो गयी हैं ।

पुत्र होके मर जाता है ॥ ७ ॥

तस्योपदानं वक्ष्यामि तत्सर्वं शृणु मे प्रिये! ॐ नमः शिवाय मन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत्॥ ८ ॥

भा० टी०10-. अब इसके उपाय को कहता हूँ- हे प्रिये! वह सब सुनो ‘ ॐ नमः शिवाय ' इस मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ ८ ॥

पार्थिवं तिलपिष्टेन गोमयेन तथा प्रिये! पूजयामास विधिवद्भक्तियुक्तेन चेतसा ॥ ९ ॥

भा० टी० - हे प्रिये! तिल की पीठी से अथवा गोबर से पार्थिव शिव बना कर पश्चात् विधिपूर्वक भक्ति युक्त चित्त से उसका पूजन करें । हे देवि! होम करायें । पश्चात् घर के द्रव्य का छठे हिस्से को दान करें ॥ ९ ॥

होमं वै कारयेद्देवि षडंशं दक्षिणां ततः ।

आचार्याय सुवर्णं च पूर्वपापविशुद्धये ॥ १० ॥

भा० टी० - हवन करने के बाद दक्षिणा देने के पश्चात् आचार्य को पूर्वपाप की शुद्धि के लिये सुवर्ण का दान करें ॥१० ॥

कूपं खातं ततो देवि वाटिकां चैव कारयेत् ।

एवं कृते न संदेहो रोगनाशो भवेदनु ॥ ११ ॥

भा० टी०– हे देवि! कुआँ खुदवायें, धर्मशाला बनवायें, ऐसा करने से निश्चय ही बाद में रोग का नाश होगा ॥ ११ ॥

कन्यका न भवेद्देवि पुत्रश्चैव प्रजायते ।

मृतवत्सा लभेत्पुत्रं चिरंजीविनमुत्तमम्॥ १२ ॥

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६२ कर्मविपाकसंहिता इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रोहिणीनक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

भा० टी० — हे देवि! उसकी कन्या न हो, पुत्र हो, जिस स्त्री के संतान नहीं जीती हो वह दीर्घ आयु वाले पुत्र को जन्म देती है ॥ १२ ॥

इतिकर्मविपाकसं० पार्वतीहरसंवादे रोहिणी० द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥