कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 71–80
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 71–80
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॥१७ ॥
रोहिणीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
द्वितीयचरणं देवि रोहिण्याः शृणु विस्तरम् ।
गङ्गाया उत्तरे कूले पुरं वैमानिकं शुभम्॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे देवि! रोहिणी के दूसरे चरण को विस्तार पूर्वक सुनो । गंगा के उत्तर किनारे पर सुंदर वैमानिक नामक नगर था ॥ १ ॥
वासुदेवश्च नाम्ना हि ब्राह्मणो वेदपारगः ।
लीलावती पवित्रा च तस्य पत्नी शुभा तथा ॥ २ ॥
भा० टी० - वहाँ वासुदेव नामक वेदपाठी ब्राह्मण रहता था, लीलावती नामक उसकी स्त्री पवित्र रहने वाली सुंदर महिला थी ॥ २ ॥
युवती रूपसंपन्ना स्वैरिणी च सदा प्रिये! बहु द्रव्यतया लब्धं परपुंसप्रसंगतः ॥ ३ ॥
भा० टी००.- वह जवान और रूप- यौवन से युक्त थी । सदा इच्छापूर्वक विचरती थी । हे प्रिये! उसने पर- पुरुष के संग से बहुत-सा द्रव्य संचित किया ॥ ३ ॥
पापादुपार्जितं द्रव्यं भुज्यते पतिना सह ।
गङ्गायां मरणं तस्य विप्रस्य भार्यया सह ॥ ४ ॥
भा० टी० - उसने पाप से संचित किया हुआ द्रव्य पति के संग भोगा । फिर स्त्री सहित उस ब्राह्मण की मृत्यु गंगा में हुई ॥४ ॥
स्वर्गवासो हि दम्पत्त्योः षष्टिवर्षसहस्रकम् ।
ततः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोके वरानने!॥ ५ ॥
भा० टी० – इसलिये साठ हजार वर्षों तक उन दोनों स्त्री- पुरुष का स्वर्ग में वास रहा । हे वरानने! पश्चात् पुण्य क्षीण होने पर वे मृत्यु लोक में आये ॥५ ॥
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६४ कर्मविपाकसंहिता
धनधान्यसमायुक्तो धर्मे मतिरथाधिका ।
पुत्राश्च बहवस्तेषां मरणं चैव जायते ॥ ६ ॥
भा० टी० – वह धनधान्य से समायुक्त, धर्म में अधिक बुद्धि रखने वाला हुआ ।
उसके बहुत से पुत्र हुए और उनका मरण हो गया ॥६ ॥
कन्यका विविधास्तासां मृत्युश्चैव प्रजायते ।
पुनश्च तस्य हानिश्च बहुरोगः प्रजायते ॥ ७ ॥
भा० टी० – उसकी अनेक कन्याएँ हुईं, उनकी भी मृत्यु हो गई, फिर इसकी हानि होती है और उसको अनेक रोग लग गये ॥ ७ ॥
तस्य शान्तिं प्रवक्ष्यामि यत्कृतं पूर्वजन्मनि ।
त्र्यम्बकेति च मन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत्॥ ८ ॥
भा० टी० - उसने जो पूर्वजन्म में कर्म किये हैं, उनकी शांति को कहता हूँ, ' त्र्यम्बकं... ' इस मन्त्र का एक लाख तक जप करायें ॥ ८ ॥
देवस्य प्रतिमां कृत्वा पूजयेच्चैव शास्त्रतः ।
सुवर्णस्य शिवं कुर्यात् पलपञ्चप्रमाणकम् ॥ ९ ॥
भा० टी० - महादेव की मूर्ति बनाकर शास्त्र के अनुसार पूजन करें और पांच पल प्रमाण सोने की शिव जी की मूर्ति बनवायें ॥ ९ ॥
धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैर्मन्त्रेणानेन पूजयेत् । ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः हराय नमः इति प्रतिमास्थापनम् । रौप्यपात्रे ॐ ह्रीं ह्रौं जूं सः महेश्वराय नमः । इतिधूपकरणानि संगृह्य स्थापयेत् । ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः पिनाकधृते नमः इति स्पृश्यावाहनं च ।
आवाहये महादेव देवदेव सनातन ।
इमां पूजां गृहाण त्वं मम पापं व्यपोहतु ॥
ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं सोहं शङ्करस्य सर्वेन्द्रिय- वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रघ्राणइहागत्यइहजीवस्थितिं सुखं चिरं तिष्ठन्तु । इति प्राणप्रतिष्ठां विधाय शिवं ध्यायन् पूजयेत् । ॐ ह्रौं ह्रीं जूंसः पशुपतये नमः इति पञ्चामृतेन स्नानम्। ॐ ह्रौं ह्रीं जूंसः शिवाय नमः इति चन्दनादिभिः पूजनम् । ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः महादेवाय नमः । इति विसर्जनम् ।
गोदानं च ततः कुर्यात्कृष्णां च कपिलां ततः ।
विप्रायः वेदविदुषे सुवर्णं दक्षिणां ततः ॥ १० ॥
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कर्मविपाकसंहिता ६५
प्रदक्षिणां ततः कुर्याद्विप्रस्येशानरूपिणः ।
शतसंख्यद्विजांश्चैव भोजयित्वा विसर्जयेत् ॥ ११ ॥
भा० टी० – धूप, दीप, नैवेद्य इत्यादि करके इस मंत्र से पूजें- ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः हर के लिए नमस्कार है । ऐसा कहकर रूपा के पात्र में मूर्ति को स्थापित करें ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः महेश्वर के लिए नमस्कार है ऐसा कहकर धूप पात्र को उठा कर स्थापित करें ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः पिनाकधारी को नमस्कार है ऐसा कहकर स्पर्श करके आवाहन करें । हे देवों के देव महादेव! सनातन तुम इस पूजा को ग्रहण करो मेरे पापों को दूर करो । तत्पश्चात् ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं सोहं शंकरस्य सर्वेन्द्रिय वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रघ्राण-इहागत्य - इह जीव स्थितिं सुखं चिरं तिष्ठन्तु ऐसा उच्चारण कर, प्राण-प्रतिष्ठा कर शिवजी का ध्यान करते हुए पूजन करें । ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः पशुपतये नमः ऐसा कहकर पंचामृत से स्नान करायें । ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः इस मंत्र से चंदनादि दे करके पूजा करें ॐ ह्रौं ह्रीं जूं सः महादेवाय नमः ऐसा कहकर विसर्जन करें, फिर गोदान करें । काली अथवा कपिला गौ को वेदपाठी ब्राह्मण को दें । सुवर्ण की दक्षिणा दें पश्चात् । शिव रूपी ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करें तब १०० ब्राह्मणों को भोजन करवाकर उनका विसर्जन करें ॥ १०॥ ११ ॥
प्रयागे मकरे माघे पत्न्या सह वरानने! स्नानं कुर्याच्च भो देवि व्रतमेकादशीं चरेत्॥ १२ ॥
भा० टी० - हे वरानने! मकर संक्रांति युक्त माघ महीने में प्रयागजी में स्नान करें । दे देवि! एकाददी का व्रत करें ॥ १२ ॥
एवं कृते न संदेहो रोगनाशश्च जायते ।
पुत्रं चापि लभेद्देवि चिरंजीविनमुत्तमम्॥ १३ ॥
भा० टी० – ऐसा करने से नि: संदेह रोग का नाश होता है । हे देवि! वह बहुत काल तक जीने वाले पुत्र को प्राप्त करता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १३ ॥
यद्येवं न प्रकुरुते सप्तजन्मस्वपुत्रकः । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे रोहिणीनक्षत्रस्य द्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामसप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
भा० टी० - यदि ऐसा नहीं करे तो सात जन्म तक पुत्र की प्राप्ति नहीं होती है ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिता० भाषाटीकायां पार्वतीह० रोहिणी० द्वितीयचरणप्राय० नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
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॥१८ ॥
रोहिणीतृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् शिव उवाच ॥
गोमत्या उत्तरे कूले क्रोशद्वयप्रमाणतः ।
विष्णुदासेति विख्यातो देवीपुत्रो वरानने ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं- हे वरानने! गोमती नदी के उत्तर तट से दो कोस पर विष्णु दास नाम का विख्यात देवीपुत्र संज्ञक मनुष्य रहता था ॥ १ ॥
शंकरे वै पुरे रम्ये तस्य भार्या च सुन्दरी ।
कर्कशा कुलटा सा वै पतिविद्वेषकारिणी ॥ २ ॥
भा० टी० — वह रमणीक शंकरपुर नामक नगर में रहता था और उसकी स्त्री सुंदरी नाम वाली कर्कशा और जारिणी थी, इसलिए वह पति से विद्वेष करती ॥ २ ॥
शुश्रूषां कुरुते नैव श्वश्रूणां च वरानने! स्वधर्मनिरतो नित्यं शिवभक्तिपरायणः ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे वरानने! वह अपने सास की सेवा नहीं करती थी और वह विष्णुदास नित्य अपने धर्म में तत्पर शिवजी की भक्ति में तल्लीन रहता था ॥ ३ ॥
कृषिं वै सोकरोच्चैव विप्राणां चैव सेवकः ।
पित्रोश्च परमो दासः सदा च प्रियभाषणः ॥ ४ ॥
भा० टी० — खेती करता हुआ ब्राह्मणों का सेवक वह माता- पिता का परम दास तथा प्रिय बोलने वाला था ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नगरे देवि व्रती कश्चित्समागतः ।
भिक्षार्थमागतो द्वारे तया भिक्षा ददे न च ॥५ ॥
भा० टी० — हे देवि! इस नगर में कोई ब्रह्मचारी भिक्षा के लिए उस विष्णुदास के द्वार पर आ गया, तब उसकी स्त्री ने उसे भिक्षा नहीं दी ॥५ ॥
अपभ्रंशमवोचत्सा भिक्षुकं प्रति सुन्दरी ।
विष्णुदासो गृहे नासीत्तद्दिने कुत्रचिद्गतः ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ६७ भा० टी० - वह सुन्दरी नामक स्त्री ने उस भिक्षुक को दुष्ट वचन बोले । उस दिन विष्णुदास घर पर नहीं था वहा कहीं गया था ॥६ ॥
एवं बहुगते काले तस्य मृत्युर्बभूव ह ।
भक्तत्वान् मम भो देवि यक्षलोके गतस्स वै ॥७ ॥
भा० टी० - ऐसे बहुत -सा समय बीत चुका, तब उस विष्णुदास की मृत्यु हो गई । हे देवि! वह मेरा भक्त था इस लिये यक्ष लोक को प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥
त्रिंशद्वर्षसहस्राणि यक्षेण यह भोगवान् ।
तस्य भार्या मृता क्रूरा श्वश्रूणां दुःखदायिनी ॥ ८ ॥
भा० टी० - वह तीस हजार वर्षों तक यक्ष अर्थात् कुबेर के लोक में भोग भोगता रहा जब सास- श्वशूर को दुःख देने वाली वह उसकी स्त्री भी मरती है ॥८ ॥
सागता नरके घोरे रौरवे नाम्नि भामिनि! भुक्त्वा नरकजं दुःखं पुनर्व्याघ्री बभूवह ॥ ९ ॥
भा० टी० — हे भामिनि! वह रौरव नामक नरक को प्राप्त होती हुई नरक के दुःखों को भोग कर बाद में व्याघ्री हो गयी ॥ ९ ॥
पुनः शृगाली वै जाता मानुषी च ततोऽभवत् ।
पुनर्विवाहिता सा वै मर्त्यलोके वरानने! ॥ १० ॥
भा० टी० – फिर शृगाली ' गीदड़ी ' हुई । पीछे अब स्त्री हुई है । हे वरानने! इस मृत्यु लोक में फिर वही उसके संग विवाही गई है ॥ १० ॥
वन्ध्या चैव विशालाक्षि पूर्वजन्मविपाकतः ।
रोगो बहुभवेद्देवि सुखं नैवोपजायते ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे विशालाक्षि! पूर्वजन्म के विपाक से वह वंध्या भी है । हे देवि! उसको बहुत सा रोग हैं उसे सुख नहीं मिलता है ॥ ११ ॥
तस्याः पुण्यं प्रवक्ष्यामि पूर्वपापप्रणाशनम् ।
स्वपतिं प्रत्यहं माघे स्नापयेदुष्णवारिणा ॥ १२ ॥
भा० टी००. - अब मैं उसके पूर्व पापों को नष्ट करने वाले उसके लिए पुण्य कर्मों को कहता हूँ प्रतिदिन माघ महीने में गरमजल से अपने पति को स्नान कराये ॥ १२ ॥
श्वश्रूचरणयोः प्रातर्नमस्कुर्यात् प्रयत्नतः ।
अलाबूं नैवखादेत्तु षोडशाब्दप्रमाणतः ॥ १३ ॥
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६८ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० – प्रतिदिन प्रातः काल सास के चरणों में यत्न पूर्वक प्रणाम करे और सोलह वर्षों तक तूंबी का भक्षण नहीं करे ॥ १३ ॥
माघे नियमतो देवि पतिना सह सुव्रते! स्नानं प्रतिदिनं कुर्याद्दीपं दद्याद्यथाविधि ॥ १४ ॥
भा० टी० – दे देवि! माघ के महीने में नियम से हमेशा पति के संग स्नान करे ।
हे सुव्रते! यथार्थविधि से दीपदान भी करे ॥ १४ ॥
ततः कृत्वा सुवर्णस्य वृक्षं वै द्विपलस्य च ।
रौप्यां दशपलां देवि वेदीं शुभ्रां च कारयेत्॥ १५ ॥
भा० टी० — फिर दो पल सुवर्ण अर्थात् आठ तोले सुवर्ण का वृक्ष बनाये और दश पल प्रमाण चांदी की वेदी बनाये ॥ १५ ॥
वृक्षं तस्यां च संस्थाप्य कल्पवृक्षस्वरूपिणम् ।
पूजयित्वा ततो देवं शङ्खचक्रगदाधरम्॥ १६ ॥
भा० टी० - उस वेदी पर कल्पवृक्षरूपी उस वृक्ष को स्थापित कर शंख- चक्र गदा- धारी विष्णुदेव की पूजा करे ॥ १६ ॥
सगणं देवदेवेशं वृषकेतुं वरप्रदम् ।
ततो वै पूजयेद्देवि विधिवच्चारुरूपिणम्॥ १७ ॥
भा० टी० — हे देवि! तदनन्तर विधिपूर्वक सुंदर रूप वाले वरदायक महादेव को ( सगण ) गणों सहित पूजे ॥ १७ ॥
वस्त्रकाञ्चनकेयूरैः कुण्डलाभ्यां विशेषतः ।
तद्वृक्षं वेदिकायुक्तं तस्मै विप्राय दापयेत् ॥ १८ ॥
भा० टी० – वस्त्र, सुवर्ण के आभूषण, कुंडल इन से युक्त किये हुए उस वृक्ष को वेदी समेत उस आचार्य ब्राह्मण को दान कर दें ॥ १८ ॥
अन्यान्विप्रान् वरारोहे भोजयेद्विविधै रसैः ।
पायसैर्मोदकैः शुभ्रैः षट्षष्टिप्रमितान्प्रिये! ॥ १ ९ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! हे प्रिये!! अन्य छियासठ ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के रसों से बनी हुई खीर, सुंदर लड्डू आदि का भोजन कराये ॥ १ ९ ॥
ततो गां कपिलां दद्यात्स्वर्णशृङ्गीं सनूपुराम् ।
सप्तम्यां रवियुक्तायां व्रतं कुर्यान्मम प्रिये! ॥ २० ॥
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कर्मविपाकसंहिता ६९ भा० टी० - फिर सुवर्ण की सींगड़ी और खुरों के आभूषणों से युक्त की हुई कपिला गौ का दान करे । हे प्रिये! रविवार सप्तमी के दिन मेरा व्रत करे ॥ २० ॥
गोपालस्य च मन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ।
हवनं तद्दशांशेन मार्जनं तर्पणं तथा ॥ २१ ॥
भा ० टी ० — गोपाल देव के मंत्र से एक लाख जप कराये तद्दशांश होम, तद्दशांश तर्पण और मार्जन कराये ॥ २१ ॥
एवं कृते न संदेहो शीघ्रं पुत्रमवाप्नुयात् ।
कन्यका नैव जायन्ते रोगश्चैव निवर्त्तते ॥ २२ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्व० रोहिणी० तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
भा० टी० - ऐसा करने से निस्संदेह पुत्र उत्पन्न होता है, कन्या नहीं जन्मती । रोग निवृत्त होते हैं ॥ २२ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे रोहि० तृतीय० नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
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॥१ ९ ॥ रोहिणीनक्षक्षचतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
रोहिण्याश्चरणं देवि चतुर्थं साम्प्रतं शृणु ।
यत्कृतं संचितं पूर्वमिह जन्मनि तत्फलम्॥ १ ॥
भा० टी ० — हे देवि! अब रोहिणी के चौथे चरण को सुनो, जो पूर्वसंचित कर्म किये हैं, वे इस जन्म में भोगे जाते हैं ॥ १ ॥
बुद्धिशर्मा द्विजः कश्चिदन्तर्वेद्यां बभूव ह ।
पुरोहितो महाभ्रष्टः परपाके सदा रतः ॥ २ ॥
भा० टी० – कोई बुद्धिशर्मा नामक ब्राह्मण गंगा-यमुना के मध्य देश में रहता था । वह पुरोहित पदवी वाला और महाभ्रष्ट था सदा अन्यों की रसोई बनाया करता था ॥ २ ॥
भार्या पररता तस्य चञ्चला चपला सदा ।
धनं च संचितं तेन प्रतिग्रहप्रसङ्गतः ॥ ३ ॥
भा० टी०-o - उसकी स्त्री पर- पुरुष - रत और चंचल तथा चपला थी । उस ब्राह्मण नें सदा प्रतिग्रह के प्रभाव से धन- संचित किया ॥ ३ ॥
मरणं तस्य वै जातं पश्चाद्भार्या मृता तु सा ।
गतोऽसौ नरके घोरे पूर्वजन्मविपाकतः ॥ ४ ॥
भा० टी० — उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी । फिर उसकी स्त्री भी मर गई । वह अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण घोर नरक में गया ॥४ ॥
युगमेकं वरारोहे भुक्त्वा नरकयातनाम् ।
वृषयोनिं च संप्राप्तो रासभत्वं ततोऽलभत् ॥ ५ ॥
भा० टी० — हे वरारोहे! एक युग तक वहाँ नरक की पीड़ा को भोग कर बैल की योनि को प्राप्त हुआ पश्चात् गधे की योनि में पैदा हुआ ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ७१ मानुषत्वं पुनर्याति मध्यदेशे वरानने! अपुत्रता भवेद्देवि कन्यका चैव जायते ॥ ६ ॥
भा० टी० — हे वरानने! पश्चात् मध्यदेश में मनुष्य योनि में पैदा हुआ है । हे देवि!
उसका पुत्र नहीं है । कन्या ही जन्मती है ॥ ६ ॥
शरीरे रोगमुत्पन्नं सुखं नैव प्रजायते ।
प्रायश्चित्तं ततो देवि प्रवक्ष्यामि वरानने! ॥७ ॥
भा० टी० – शरीर में रोग उत्पन्न हो रहा है । उसे सुख नहीं मिलता है । हे देवि! हे वरानने! अब इसका प्रायश्चित्त कहूँगा ॥ ७ ॥
आकृष्णेति जपेन्मन्त्रं लक्षं वै विधिवत्प्रिये! होमं कुर्यात्प्रयत्नेन तिलाज्यमधुना सह ॥ ८ ॥
भा० टी० – ‘ आकृष्णेनरजसा० ' इस मंत्र का विधिपूर्वक एक लाख तक जप करायें, फिर यत्न से तिल, घृत, मधु आदि करके होम करे ॥८ ॥
कुण्डे वै वर्त्तुलाकारे दशांशं तर्पणं तथा ।
मार्जनं तु विशेषेण ततो ब्राह्मणभोजनम्॥ ९ ॥
भा० टी० – वर्त्तुल ( गोल) आकार वाले कुंड में हवन करे और दशांश तर्पण तथा मार्जन कराये पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराये॥९ ॥
दशवर्णाः प्रदातव्या गुडधेनुस्तथा प्रिये! शय्यां दद्यात्प्रयत्नेन विधिवद्ब्राह्मणाय च ॥१० ॥
भा० टी० – दश प्रकार के वर्णों वाली दश गौओं का दान करे । हे प्रिये! गुडधेनु अर्थात् शास्त्रोक्त विधि से लाई हुई गुडकी धेनु तथा शय्या को विधिपूर्वक यत्न से ब्राह्मण को दान करे ॥ १० ॥
भोजयेद्ब्राह्मणान् शुद्धान् वेदपाठरतान् प्रिये! सप्तसप्ततिसंख्यान् वै दीक्षितान् शुद्धमानसान्॥ ११ ॥
भा० टी० — हे प्रिये! वेदपाठ में तत्पर हुए शुद्ध दीक्षित अर्थात् यज्ञादि करने वाले शुद्ध मन वाले ७७ ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥ ११ ॥
प्रयागे माघमासे वै प्रातःस्नानं सभार्यया ।
एवं कृते न संदेहः पुत्रस्तस्य प्रजायते ॥ १२ ॥
भा० टी० - माघ महीने में प्रयागजी में प्रातः काल स्त्री सहित स्नान करे ऐसा करने से निश्चय ही पुत्र उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥
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७२ कर्मविपाकसंहिता
रोगः प्रमुच्यते तस्य वन्ध्यत्वं च प्रणश्यति ।
मृतवत्सा लभेत्पुत्रं कन्यका नैव जायते ॥ १३ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वती० रोहिणीनक्ष० चतुर्थचरणप्रा० नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ भा० टी०-०- उसका रोग दूर हो और वंध्यापन दूर हो, यदि उसकी संतान नहीं जीती हो तो उसके पुत्र जीयें और कन्या उत्पन्न नहीं हो ॥ १३ ॥
इति श्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां रोहिणीनक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥