कर्म विपाक संहिता — पृष्ठ 81–90
कर्म विपाक संहिता · पृष्ठ 81–90
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॥२० ॥
मृगशिरानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनम् शिव उवाच ॥
अथ वक्ष्ये महादेवि चन्द्रनक्षत्रजं फलम्।
यत्कृतं मानुषैः पूर्वं तच्छृणुष्व वरानने!॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे महादेवि! अब मृगशिरा नक्षत्र में जन्मने वाले मनुष्यों द्वारा पूर्व जन्म में किये कर्मों के फल को कहता हूँ हे वरानने! उसको सुनो ॥१ ॥
मध्यदेशे पुरे शुभ्रे वसत्येको द्विजः खलु ।
ब्रह्मकर्मरतो नित्यं वेदवेदाङ्गपारगः ॥ २ ॥
भा० टी० — मध्यदेश में सुंदरपुर में एक ब्राह्मण रहता था, वह ब्राह्मण के कर्म में हमेशा तत्पर रहता था और वेद - वेदांग के सार को जानने वाला था ॥ २ ॥
प्रत्यहं पाठयामास चतुर्वेदान्तविस्तरान् ।
वेदशर्मा द्विजः ख्यातस्तस्य पत्नी सुशीलका ॥ ३ ॥
भा० टी० — वेदशर्मा नामक वह प्रतिदिन विस्तार सहित चारों वेदों को पढ़ाया करता था । उसकी स्त्री का नाम सुशीला था ॥ ३ ॥
प्रत्यहं पाठयेद्वेदं जीविकार्थं वरानने! लोहकारस्य मरणं तत्पुरेऽभूद्वरानने!॥ ४ ॥
भा० टी० - हे वरानने! वह आजीविका के लिए नित्यप्रति वेद पढ़ाया करता था । हे वरानने! उस नगरी में एक लोहकार की मृत्यु हो गई ॥ ४ ॥
न दत्तं तस्य वै स्वर्णं लोहकारस्य संस्थितम् ।
तत्स्वर्णं प्रत्यहं देवि बुभोज सह भार्यया ॥ ५ ॥
भा० टी ० - उसके पास उस लोहकार का जमा किया हुआ सुवर्ण उस ब्राह्मण ने वापस उसे नहीं दिया । हे देवि! उस सुवर्ण को दिन प्रतिदिन स्त्री समेत वह भोगता गया ॥ ५ ॥
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७४ कर्मविपाकसंहिता
एवं बहुगते काले मरणं ब्राह्मणस्य वै ।
सूर्यलोकोऽभवद्देवि यतः सूर्यस्य सेवकः ॥ ६ ॥
भा० टी० – इसप्रकार बहुत-सा काल बीत जाने पर उस ब्राह्मण की मृत्यु हो गयी । तब उसे सूर्य का लोक प्राप्त हुआ । क्योंकि वह सूर्य का ( भक्त ) सेवक था ॥६ ॥
विंशद्वर्षसहस्राणि सूर्यलोकेऽवसत्प्रिये! ततः पुण्यक्षये जाते मर्त्यलोके च मानवः ॥ ७ ॥
भा० टी० — हे प्रिये! वह बीस हजार वर्षों तक सूर्यलोक में रहता रहा, फिर पुण्यक्षीण हो जाने पर मृत्यु लोक में मनुष्य योनि में पैदा हुआ है ॥ ७ ॥
पुत्रकन्याविहीनस्तु धनधान्यसमन्वितः ।
लोहकारस्य स्वर्णं हि गृहीतं नैव दत्तवान् ॥ ८ ॥
भा० टी ० – पुत्र- कन्या से हीन है और धनधान्य से संयुक्त है । उसने पूर्वजन्म में जो लोहकार ( लुहार) का सुवर्ण लेकर वापस नहीं दिया था ॥८ ॥
तेन कर्मविपाकेन लोहकारः सुतोऽभवत् ।
प्रीतिमांश्चैव सर्वेषां पितृमातृप्रियंकरः ॥ ९ ॥
भा० टी००.- उस कर्म -विपाक से लुहार इसका पुत्र हुआ, जो कि सबसे प्रीति रखने वाला और माता- पिता से प्यार करने वाला हुआ॥९॥
युवरूपसमापन्नस्तदा मृत्युर्भवेदनु ।
पुत्रः पुत्रस्य चाभावः कन्या चैव प्रजायते ॥ १० ॥
भा० टी० — जब वह जवान हुआ, तब उसकी मृत्यु हो गई, फिर उसके पुत्र नहीं होता केवल कन्या जन्मती है ॥ १० ॥
तत्पापस्य विशुद्ध्यर्थं प्रायश्चित्तमतः शृणु ।
गायत्रीलक्षजाप्येन दुर्गायाः पूजने न च ॥ ११ ॥
दशवर्णाप्रदानेन भूमिदानेन पार्वति!।
सर्वं पापं क्षयं याति पूर्वजन्मसमुद्भवम्॥ १२ ॥
भा० टी० – उस पाप की शुद्धि के लिए मुझसे उसका प्रायश्चित्त सुनो, गायत्री मंत्र का एक लाख तक जप, दुर्गापूजन, दशवर्ण वाली गौओं का दान, भूमिदान, इनके करने से हे पार्वति! पूर्वजन्म का सब पाप नष्ट होता है ॥ १२ ॥
गयाश्राद्धं प्रयत्नेन तदर्थं नियतः प्रिये! प्रयागे मकरे मासि स्नानं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥ १३ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ७५ भा० टी० - हे प्रिये! उसके लिए नियम से गया में श्राद्ध करें । मकर के महीने में यत्न से प्रयागजी में स्नान करें ॥ १३ ॥
ततः पापं क्षयं याति पुनः पुत्रश्च जीवति ।
रोगाः सर्वे क्षयं यान्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिता० पार्वती० मृगशिरानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनंनाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
भा० टी ० — तब पाप नष्ट होता है और पुत्र जीता है संपूर्ण रोग नष्ट हो जाते हैं ।
इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १४ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहिता० पार्वति० मृगशिरानक्षत्रस्य प्रथमचरणप्रायश्चित्तकथनंनाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
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॥२१ ॥
मृगशिराद्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् शिव उवाच ॥
कान्यकुब्जे शुभे देशे कश्चिच्च नन्दने पुरे ।
बोधशर्मा द्विजश्चासीत् भिक्षुवृत्तिस्तु निर्धनः ॥ १ ॥
भा ० टी ० – शिवजी कहते हैं - सुंदर कान्यकुब्ज देश में नंदनपुर में कोई बोधशर्मा नामक भिक्षुक वृत्ति करने वाला निर्धन ब्राह्मण रहता था ॥ १ ॥
परान्नं भुज्यते नित्यं परप्रेष्यरतः सदा ।
तस्य पत्नी समाख्याता बाधमानाम वैपुरा ॥ २ ॥
भा० टी० - वह नित्य पराये अन्न का भोजन करता और सदा पराई प्रेरणा से घूमता था । उसकी बाधमा नामकी स्त्री थी, जो कि यत्र- तत्र विख्यात थी ॥ २ ॥
जन्मतो मरणं यावत् परान्नं भुज्यते च वै ।
नरके पतनं तेन तयोर्जातं प्रतिग्रहात्॥ ३ ॥
भा० टी० – उसने जन्म से मरण पर्यंत पराये अन्न का भोजन किया । जिससे प्रतिग्रह के प्रभाव से उन दोनों का नरक में वास हुआ ॥ ३ ॥
बहुवर्षसहस्त्राणि प्रवासो नरकेऽभवत् ।
नरकान्निःसृतो देवि काकश्चैव मृगोऽभवत्॥ ४ ॥
भा० टी० – उसका बहुत हजार वर्षों तक नरक में वास रहा । हे देवि! नरक से निकल कर बाद मे वह काक और फिर मृग की योनि को प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
पुनर्वै मेषयोनिश्च पूर्वकर्मविपाकतः ।
ततो वै मानुषो जातो मध्यदेशे वरानने!। ५ ॥
भा० टी० — पश्चात् पूर्व कर्म विपाक से मेंढा हुआ । हे वरानने! तदनन्तर मध्यदेश में मनुष्य- योनि में पैदा हुआ है ॥ ५ ॥
रोगवान्नृत्यशीलश्च पुत्रकन्याविवर्जितः ।
परान्नं प्रत्यहं भुङ्क्ते श्राद्धं नैव कृतं पुरा ॥ ६ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ७७
भा० टी०.- वह रोगवान् है और नाचने में तत्पर रहता है । पुत्र- कन्या से हीन है ।
उसने पहले नित्य प्रति पराये अन्न का भोजन किया, कभी श्राद्ध नहीं किया ॥ ६ ॥
अतो वंशस्य वै छेदः फलं चैव तु पूर्वजम् ।
शान्तिं तस्य प्रवक्ष्यामि पूर्वपापक्षयो यतः ॥ ७ ॥
भा० टी० – इसलिये पूर्व जन्म के फल से वंश नष्ट हो गया है, अब इसकी शांति को कहता हूँ जिससे कि पूर्व पाप नष्ट हो जायेगा ॥७ ॥
गायत्रीजातवेदाभ्यां द्विलक्षं जापयेच्छिवे! ततः पापविशुद्धिः स्याद्दशांशहवनं यदा ॥ ८ ॥
भा ० टी० —– ' गायत्री ' मंत्र तथा " जात वेदसे सुन० " इस मंत्र से दो लाख तक
जप करायें । हे शिवे! जप के दशांश तक होम करायें । तब पाप की शुद्धि होती है ॥ ८ ॥
तर्पणं मार्जनं देवि ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः ।
शतसंख्यामितान् शुद्धान्गृहस्थानतिभक्तितः ॥ ९ ॥
भा० टी० - हे देवि! तर्पण तथा मार्जन करायें और शुद्ध तथा गृहस्थी सौ ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन करवायें ॥ ९ ॥
वृषमेकं प्रदद्यात्तु नीलवर्णं विभूषितम् ।
एवं कृते न संदेहो रोगनाशो भवेद्ध्रुवम्॥ १० ॥
भा० टी० — तत्पश्चात् नील वर्ण वाले विभूषित किये हुए एक बैल का दान करें । ऐसा करने से निश्चय ही रोग का नाश होता है, इसमें संदेह नहीं है ॥१० ॥
पुत्रस्तु जायते देवि वन्ध्यत्वं च प्रणश्यति । इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे मृगशिराद्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥
भा ० टी ० — हे देवि! उसका पुत्र उत्पन्न होगा और उसकी पत्नी का वंध्यापन दूर होगा ॥ इतिश्रीकर्मविपाकसंहिताभाषाटीकायां पार्वतीहरसंवादे मृगशिराद्वितीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥
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॥२२ ॥
मृगशिरानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनम् शिव उवाच ॥
नर्मदादक्षिणे तीरे पुरीका नाम वै पुरी ।
तस्यां पुर्य्यां विशालाक्षि कुलालो धनवानपि ॥ १ ॥
भा० टी० - शिवजी कहते हैं - हे विशालाक्षि! नर्मदा नदी के दक्षिण तट पर पुरीका नाम वाली नगरी थी, जहाँ कोई धनाढ्य ( कुलाल ) कुम्हार रहता था ॥ १ ॥
कुलालकर्मतो देवि बहु द्रव्यमुपार्जितम् ।
कर्मचन्द्र इतिख्यातस्तस्य पत्नी च देवकी ॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! उसने कुम्हार के कर्म से बहुत-सा द्रव्य संचित किया वह कर्म चंद्र नाम से विख्यात था और उसकी स्त्री का नाम देवकी था ॥ २ ॥
स्वकर्मनिरतो नित्यं पात्रं कृत्वा दिने दिने ।
एवं सर्वं वयो जातं वृद्धत्वं च ततोऽभवत् ॥ ३ ॥
भा० टी० - वह दिन प्रतिदिन घट आदि पात्र बनाकर निरंतर अपने कर्म में रत रहता था, ऐसे ही संपूर्ण अवस्था बीत गई, तदनन्तर वह वृद्ध हो गया ॥ ३ ॥
वृद्धे जाते तदा देवि दारिद्र्यत्वमजायत ।
शूर्पकारस्य वै द्रव्यं व्यवहारे गृहीतवान् ॥ ४ ॥
भा० टी० — हे देवि! वृद्ध होने पर वह दरिद्र हो गया, तब व्यवहार के लिए उसने छाज बनाने वाले ( धानक ) के धन को ग्रहण किया ॥ ४ ॥
शतसंख्यामितं स्वर्णं व्ययं सर्वं कृतं शिवे! कुलालस्याभवन्मृत्युः पत्नी तस्य मृता पुरा ॥ ५ ॥
भा० टी० - हे शिवे! सुवर्ण की सौ मोहरें, जो उसने धानक से ली थी, वे सब उसने खर्च कर दीं । बाद में उस कुम्हार की मृत्यु हो गई और उसकी स्त्री पहले ही मर गई थी ॥ ५ ॥
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कर्मविपाकसंहिता ७९
नर्मदायां महादेवि तावुभौ मृत्युमापतुः ।
तत्तीर्थस्य फलाद्देवि स्वर्गलोकं गतावुभौ ॥ ६ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! वे दोनों नर्मदा नदी पर मृत्यु को प्राप्त हुए । जिस तीर्थ के प्रभाव से वे दोनों स्वर्गलोक को प्राप्त हुए ॥ ६ ॥
बहुवर्षसहस्त्राणि ताभ्यां भुक्तं फलं शुभम् ।
ततः पुण्यक्षये जाते मृत्युलोके च जायते ॥७ ॥
भा० टी०—– उन्होंने बहुत हजार वर्षों तक सुंदर फल भोगे, फिर पुण्यक्षीण हो जाने पर मृत्यु लोक में जन्म लिया है ॥ ७ ॥
मानुषेऽपि शुभं जन्म धनधान्यसमन्वितः ।
पुनर्विवाहिता नारी पूर्वजन्मप्रसङ्गतः ॥ ८ ॥
भा० टी० - मनुष्य लोक में उनका जीवन सुखमय है वह धनधान्य से युक्त पूर्वजन्म के प्रसंग से उसी स्त्री से फिर उसका विवाह हुआ ॥ ८ ॥
ऋणसंबन्धतो देवि पुत्रो जातस्तदा शिवे! सूर्पकारो महादेवि वैरुध्यं बालतः कृतम्॥ ९ ॥
भा० टी० — हे देवि! हे शिवे!! ऋण के संबंध से ही वह सूर्पकार ( छाज बनाने
वाला ) धानक, इसके पुत्र रूप में पैदा हुआ । उसने बचपन से इसका विरोध किया॥९॥
प्रत्यहं वसु यल्लब्धं तत्सर्वं च व्ययं तथा ।
द्यूतवेश्याप्रदानेन धनं सर्वं व्ययं गतम् ॥ १० ॥
भा० टी० – प्रतिदिन जो धन प्राप्त होता है वह सब खर्चकर देता है जुआ खेलता है और वेश्या - संग करने में सब धन खर्च करता है ॥ १० ॥
युवा जातो यदा देवि पुत्रकन्यासमन्वितः ।
मरणं तस्य वै जातं पुनः पुत्रो न जायते ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे देवि! जब वह पुत्र जवान हुआ और उसके लड़का- लड़की हुए, तब उसके पुत्र की मृत्यु हो गयीफिर उसके संतान नहीं हुई है ॥ ११ ॥
अथ शान्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं वरानने! गायत्रीलक्षजाप्येन त्र्यम्बकेन तथा प्रिये! ॥ १२ ॥
भा० टी० — हे वरानने! अब इसकी शांति कहता हूँ सब सुनो । हे प्रिये! गायत्री का अथवा‘त्र्यंबकं यजामहे ' इस मंत्र का एक लाख तक कराने से शांति होगी ॥ १२ ॥
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८० कर्मविपाकसंहिता कर्तव्यं कुण्डमुच्चैस्तु त्रिकोणं विधिवत्प्रिये! होमं च कारयेद्देवि दशांशं तर्पणं ततः ॥ १३ ॥
भा० टी० — हे देवि! त्रिकोण ऊँचा कुंड विधिपूर्वक बनवायें दशांश होम करायें और दशांश तर्पण करायें ॥ १३ ॥
ततो वै कपिलां दद्याद्धेमशृङ्गीं सहाम्बराम् ।
एवं कृत्वा वरारोहे पुनः पुत्रः प्रजायते ॥ १४ ॥
भा० टी० - फिर सुवर्ण के सींग और वस्त्र से युक्त कपिला गौ का दान करें । हे वरारोहे! ऐसा करने से फिर पुत्र प्राप्त होगा ॥ १४ ॥
शूर्पकारस्य प्रतिमां पलसप्तदशस्य तु ।
सुवर्णस्यैव भो देवि रचितां वस्त्रच्छादिताम्॥ १५ ॥
शूर्पं रौप्यस्य वैकुर्य्यात्पलषष्टिप्रमाणतः ।
प्रदद्याद्वेदविदुषे ब्राह्मणाय सुतेजसे ॥ १६ ॥
भा० टी० - और सतरह पल सोने की ( सूपकार की ) मूर्ति बनाकर हे देवि! उस पर वस्त्र ओढायें और साठ पल अर्थात् २४० तोले चांदी का छाज बनायें फिर इन सब को सुंदर तेजस्वी वेदपाठी ब्राह्मण को दान दें ॥ १५ ॥ १६ ॥
तस्योद्देशेन भो देवि ऋणबन्धात्प्रमुच्यते ।
पुत्रश्च जायते देवि नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां पार्वतीहरसंवादे मृगशिरानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
भा० टी० — हे देवि! उस ( सूर्पकार ( छाज बनाने वाले) धानक के निमित्त ) इस दान को देने से, पूर्वजन्म के ऋणपापबन्धन से छुटकारा मिलता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १७ ॥
इतिश्रीकर्मविपाकसंहितायां भाषाटीकायां मृगशिरानक्षत्रस्य तृतीयचरणप्रायश्चित्तकथनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥
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॥२३ ॥
मृगशिरानक्षत्रस्य चतुर्थचरणप्रायश्चित्तकथनम् ॥ शिव उवाच ॥
अथ वक्ष्याम्यहं देवि चतुर्थचरणं तथा ।
मृगशिरो नाम नक्षत्रं तस्य पूर्वं च सञ्चितम् ॥ १ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! अब मृगशिरा नक्षत्र के चौथे चरण में जन्म लेने वालों के पूर्व संचित कर्म को कहता हूँ ॥ १ ॥
अवन्तीपुरतो देवि दक्षिणे क्रोशपञ्चके ।
पुरं तच्चैव विख्यातं केशवं नाम शोभनम्॥ २ ॥
भा० टी० — हे देवि! उज्जैन नगरी से दक्षिण में पांच कोश की दूरी पर केशव नामक सुंदर पुर है ॥ २ ॥
वसत्येको हि देवेशि ब्राह्मणो वेदपारगः ।
किशोरशर्म्मा विख्यातो मृतगेहे प्रभुज्यते ॥ ३ ॥
भा० टी० - हे देवेश्वरि! वहां किशोरशर्मा नामक एक वेदपाठी ब्राह्मण रहता था । वह प्रतिदिन मृतक के घर भोजन करता था ॥३ ॥
कष्टेनैव महादेवि व्ययं कुर्य्याद्दिने दिने ।
धनं च बहुधा कृत्वा पुण्यकार्यं न कारयेत् ॥ ४ ॥
भा० टी० - हे महादेवि! उसने बड़ी कृपणता से खर्च चला कर बहुत सा धन संचित किया और पुण्य कार्य कुछ नहीं किया ॥ ४ ॥
ततो भ्रातुः कनिष्ठस्य भागं नैव ददौ च सः ।
त्रिकोटिप्रमितं द्रव्यं स्वगृहे चैव सञ्चितम्॥ ५ ॥
भा० टी ० — पश्चात् उसने अपने छोटे भाई को धन का हिस्सा नहीं दिया उसने तीन करोड़ रुपयों का धन अपने ही घर में संचित कर दिया ॥ ५ ॥
द्रव्यस्यैव विभागाय मरणं ब्राह्मणोपरि ।
कृतं भ्रात्रा कनिष्ठेन द्रव्यं तस्मै न दत्तवान्॥ ६ ॥
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८२ कर्मविपाकसंहिता भा० टी० - फिर द्रव्य के विभाग के लिए उस छोटे भाई ने उस ब्राह्मण के कारण अपनी मृत्यु ( आत्माहत्या) कर दी, किन्तु उसने उसको द्रव्य नहीं दिया ॥ ६ ॥
एवं बहुतिथे काले किशोरः स मृतस्तु वै ।
गतो वै नरके घोरे युगमेकोनविंशतिम् ॥ ७ ॥
भा० टी० – इसप्रकार बहुत काल बीत जाने पर तब वह किशोर शर्मा ब्राह्मण मर गया फिर उन्नीस युगों तक घोर नरक में उसका वास हुआ ॥ ७ ॥
पुनः कर्मवशाद्देवि गर्द्दभत्वं च जायते ।
वृकयोनिस्ततो जातो मानुषत्वं भवेत्पुनः ॥ ८ ॥
भा० टी० - हे देवि! पश्चात् कर्म के कारण वह गधे की योनि को प्राप्त हुआ, फिर भेड़िये की योनि को और फिर मनुष्य योनि में पैदा हुआ ॥ ८ ॥
मध्यदेशे वरारोहे पुत्रो नैव प्रजायते ।
कन्यका बहवो गर्भा विनश्यन्ति वरानने॥ ९ ॥
भा० टी० - हे वरारोहे! वर्तमान में वह मध्य देश में जन्मा है । उसके पुत्र नहीं होता, कन्या जन्मती है, बहुत गर्भ खंडित होते हैं ॥ ९ ॥
पूर्वजन्मकृतं कर्म भुज्यते देवि मानवैः ।
इह लोके वरारोहे पुण्यं पापमनूनकम्॥ १० ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म -पुण्य अथवा पाप -संपूर्ण मनुष्यों द्वारा इस लोक में भोगा जाता है ॥ १० ॥
भ्रातुस्तस्य कनिष्ठस्य मरणं पूर्वजन्मनि ।
तदुद्देशेन भो देवि तस्माद्रोगं च जायते ॥ ११ ॥
भा० टी० - हे देवि! पूर्वजन्म में उसके भाई ने उसके कारण आत्माहत्या की थी, इसलिये उसको रोग होता है ॥ ११ ॥
तस्य पापस्य शुद्धिं च शृणु देवि प्रयत्नतः ।
गायत्रीमूलमन्त्रेण लक्षजाप्यं च कारयेत् ॥ १२ ॥
भा० टी० - हे देवि! अब ध्यान से उसके पाप की शुद्धि को सुनो । गायत्री मूल मंत्र का एक लाख तक जप करायें ॥ १२ ॥
गृहवित्तषडंशेन पुण्यकार्य्यं च कारयेत् ।
गायत्रीजातवेदेन त्र्यम्बकेन तथैव च ॥ १३ ॥