कठोपनिषद — पृष्ठ 1–10
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10
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- हिन्दीविज्ञानभाष्य कठोपनिषत् यजुर्वेदीय पं. मोतीलालशास्त्री वेदवीथीपथिक राजस्थान पत्रिका वैदिक श्रृंखला - 61
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यजुर्वेदीय-कठोपनिषत - हिन्दीविज्ञानभाष्य पं ० मोतीलालशास्त्री विद्यापुर . 994.592.18 : SHA KAN मूल्य: ३०० ) रुपये माथ
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प्रकाशक-राजस्थान पत्रिका लिमिटेड, केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । © सर्वाधिकार - लेखकाधीन प्रथमावृत्ति - जनवरी, १६६७ ग्रन्थ - प्राप्ति-पुस्तकालय, राजस्थान पत्रिका केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । राजस्थान विकतत्त्वशोध संस्थान " मानवाश्रम ", दुर्गापुरा रोड, जयपुर - ३०२०१८ मुद्रक-श्रीबासचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', दुर्गापुरा रोड जयपुर -१६
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प्रकाशकीय स्व ० पं ० मोतीलालजो शास्त्री के द्वारा निबद्ध वैदिक साहित्य के प्रकाशनक्रम में " कठोपनिषद-हिन्दी विज्ञान माष्य ” के प्रकाशित होने पर मुझे प्रत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है । इससे पूर्व स्व ० शास्त्रीजी के ईशोपनिषत् केनोपनिषत्, मुण्डकोपनिषत्, माण्डूक्योपनिषत् एवं प्रश्नोपनिषत् पर हिन्दी भाष्य प्रकाशित हो चुके हैं । कठोपनिषत् उपनिषदों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है । यह उपनिषत् नचिकेता और यम के बीच हुए परस्पर संबाध के रूप में प्रसिद्ध है । नचिकेता यश में दक्षिणा - रूप से पिता द्वारा दिए जाने के उपरान्त शरीर छोड़ कर प्रातिवाहिक शरीर से परलोक में पहुंचता है । तीन रात्रियों के बाद उसका यमराज से साक्षात्कार होता है । यमराज नचिकेता को तीन वर मांगने के लिए कहते हैं । नचिकेता बर मांगने के साथ - साथ गूढ प्रश्न भी यमराज से करते रहते हैं एवं यमराज उनका समाधान भी करते हैं । कठोपनिषत् में यद्यपि अनेकों विषयों का समावेश हुआ है परन्तु स्व ० शास्त्रीजी के अनुसार इस उपनिषत् में प्रधानतया ' मोकात्मा ' का ही निरूपण है । भोकात्मा का निरूपण करने वाला यह उपनिषद्विज्ञानमाध्य स्व ० शास्त्रीजी के श्रेष्ठ भाष्यों में से एक कहा जा सकता है । स्व ० शास्त्रीजी द्वारा विरचित ग्रन्थों के प्रकाशन कार्य्यं से जुड़े हुए प्रो ० मदनमोहन शर्मा ने प्रस्तुत ग्रन्थ के मूलपाठ - निर्धारण, भाषा सम्पादन एवं मूल संस्कृत - अंशों के प्रामाणिक पाठ - निर्धारण में जो बहुमूल्य योगदान किया है, इसके लिए मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ । स्व ० शास्त्रीजी के सुपोत्र चि ० प्रद्युम्नकुमार शम्र्मा ने इस प्रत्यन्त दुरूह ग्रन्थ को व्यवस्थित करने, त्रुटित स्थानों को पूर्ण करने, अधूरे सन्दर्भों को ग्रन्थों से खोजकर यथास्थान लगाने, पाद-टिप्पणियों को देने, विषय - सूची आदि बनाने का जो कार्य निमाया है उसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं । श्री हीरालाल गहलोत मूलपाण्डुलिपि के सुपाठ्य पुनर्लेखन, प्रूफसंशोधन एवं सन्दर्भ - शोधन में सहायता प्रदान करने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं । मैं आशा करता हूँ कि वेदनिष्ठ महानुभाव हमारे इस प्रयास से लाभान्वित होंगे । मकर संक्रान्ति वि ० सं ० २०५३ - कर्पूरचन्द्र ' फुलिश '
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वेदवाचस्पति पं. मोतीलाल शास्त्री
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ग्रन्थ- परिचय कठोपनिषत् ( भोक्तात्मवर्णन परेयमुपनिषत् ) कठोपनिषत् में यद्यपि प्रधानतया ' भोक्तात्मा ' का ही निरूपण है, तथापि गोणदृष्टि से इसमें प्रायः सभी विषयों का समावेश हुआ है । स्वर्ग, नरक, यम, धम्मं, अग्नि, खण्डात्मविवनं श्रश्वत्थ, योग, विद्या, विभूति, आदि तत्वों का संक्षेप से विश्लेषण करने वाली यह उपनिषत् अपना एक विशेष महत्त्व रखती है । ' नचिकेता ' नामक ब्राह्मण बालक: ' सर्ववेदसयज ' में दक्षिणारूप से प्रदत्त मीनि से शरीर छोड़ कर मातिवाहिक शरीर से परलोक में पहुँचता है । तीन रात्रियों के अनन्तर उसका यमराज से साक्षात्कार होता है । जिस प्रकार साध्वी सावित्री की पतिभक्ति पर प्रसन्न यम ने उसे तीन वर प्रदान किए थे, वैसे ही नचिकेता की पितृभक्ति पर तथा तीन रात्रियों तक निराहार रहने के प्रतिकाररूप तीन वर मांगने का नचिकेता को यम द्वारा आदेश मिलता है । नचिकता प्रश्न करता है कि कितन ही विद्वान् आत्मा को ' रथवत् ' मानते हैं । धुरा पहिया, कस्तम्भी, प्रउग, आदि की समष्टि ही रथ है । रथावयवों से ' रथ ' नामक अवयवी पृथक नहीं है- एवमेव हस्त - पद - मस्तकादि अवयवसमष्टि ही आत्मा है । शरीरातिरिक्त श्रात्मा कोई नित्य तत्त्व नहीं है । एवं कितने ही ब्रह्मवादियों का कहना है कि आत्मा ' सरोवत् ' है । सरोवर के सूख जाने का तात्पर्य यही है कि पानी सूक्ष्मरूप ( बाष्परूप ) में परिणत होकर लाकान्तर ( अन्तरिक्ष ) में चला जाता है- एवभव स्थूलशरीर के निधनानन्तर प्रात्मा अङ्गुष्ठ-मात्र आतिवाहिक शरीर धारण कर स्वकम्र्मानुसार तत्तल्लाकविशेषों में गमन करता रहता है । इस प्रकार ' प्रेतात्मा ' के सम्बन्ध में चिरकाल से विद्वानों में मतभेद चला ना रहा है । में जानना चाहता हूँ कि वस्तुस्थिति क्या है? । Safar के आत्मविषयक उक्त प्रश्न का सुनकर पात्रता परीक्षा के लिए यमराज उसे प्रलोभनों में डालना चाहते हैं । परन्तु सस्कारी बालक अपने प्रश्न पर दृढ रहता है और कहने लगता है—
अन्यत्र धर्म्मात् प्रन्यत्राधम्र्मात्, अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताद्, भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥
उत्तर में अव्यय - क्षरविशिष्ट उसी अक्षरब्रह्म को लक्ष्य बनाते हुए यमराज कहते हैं-सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । विच्छन्तो ब्रह्मचय्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॥ " ओम् इत्येतत् ” । + [ ५ }
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' ग्रोम् ' के एकाक्षरत्त्व का क्या स्वरूप है?, स्वयग्नि का क्या स्वरूप है?, उसकी प्राप्ति का क्या उपाय है?, इत्यादि प्रश्नसमाधिपूर्वक इस उपनिषत् में अश्वत्थविद्या, ब्रह्मसत्यविद्या, देवसत्यविद्या, कम्मयोग, ज्ञानयोग, प्रादि विद्या तथा योगों का अपूर्व विश्लेषण हुआ है । संक्षेपतः मोक्तात्मद्वारा अक्षरलक्ष्यावाप्ति बतलाते हुए इस उपनिषत् ने धात्मन्वी को विद्यात्मिका विभूति एवं कम्मत्मिक योग, इन दो पर्वो का अनेक दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया है जैसा कि उपनिषत् के निम्नलिखित उपसंहार-वचन से प्रमाणित है-मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽय लब्ध्वा ' विद्यामेतां ' ' योगविधि ' च कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ ( कठ ० २।३।१८ ) [ ६ ]
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विद्या- कर्मनिरूपणात्मक-कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय - सूची प्रथमा वल्ली-मूलपाठ: विषय fear ( ज्ञान ) निरूपणात्मक प्रथमाध्याय -हिन्दी विज्ञान माध्य - उपोद्घातप्रकरण ( १ से 8 मन्त्रपथ्यंन्त ) १- ब्रह्म और ब्राह्मण विभाग २- ब्रह्म और ब्राह्मण के ६ विभाग ३- ज्ञान व कम्मंमाग का भविनाभाव Y - परिभाषाओं को बतलाने की अनिवाय्यता ५ - उपनिषद बोर जीवात्मा का प्रतिपादन ६- प्रविष्टात्मा ७ कम्मं बीर ज्ञान की व्यापकता ८- प्रथम पुरुष - मध्यमपुरुष तथा उत्तमपुरुष ६- आत्मा के ज्ञान भोर कम्मंभाग १० - मात्मा का धानन्दस्वरूप ११ - विषयानन्द लालसा १२ - ईश्वर के निःश्वासरूप वेद १३- वेदभगवान् द्वारा निर्दिष्टमार्ग १४- वेद के ब्राह्मण, प्रारण्यक एवं उपनिषद्भाग १५ - संहिता ब्रह्म [ " }
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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय १६ - विज्ञान स्तुति - इतिहासानुमोदित - उपासना १७- कर्म्म - ज्ञानकाण्डमूलक सुख एवं प्रभ्युदय - निःशेषण १८ - नाकस्वर्ग १६ - काम लोक एवं प्रपुनमरि लोक २० - जीवात्मा प्रोर प्रजापति / २१ - प्राण धोर प्राणी / २२ - प्राण की अनन्तता २३- अन्तः प्राण बोर बहिः प्राण २४ - व्यक्ति पर प्रजापति २५- प्रात्मा - प्राण- पशु २६ - ब्रह्मोदन और प्रवग्यं २७ - पुरुष - प्रकृति और विकृति २८ - प्रजापति के ईश्वर- जीव - शिपिविष्ट भेद २६- आत्मा की ओरूप से उपासना ३० - वर्ण और अक्षर में भेद ३१ - ओम् से पोडशी पुरुष गतार्थ होना ३२- पञ्च प्राकृत प्राण ३३- गूढोत्मा और उक्थ - प्रात्मा ३४ - वर्ण व मात्रा में भेद ३५ - प्रणवस्वरूप प्रत्यगात्मा ३६ - प्राणात्मा और उसके तीन भाग ३७ - अव्यक्त स्वयम्भू वेद भोर महान् परमेष्ठी सुबेद ३८ - संसार का बीज - शुक्र / ३ ९ - बुद्धि - मन का प्रविनाभाव ४० - प्राणात्मा का विज्ञान- प्रज्ञान में प्रन्तर्भाव ४१ - चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ४२ - प्रन्तरात्मा और बाह्यात्मा ४३ - कठोपनिषत् का प्रधान प्रतिपाद्य विषय - ' भोकात्मा ' ४४ - जीवात्मा का कम्मभोक्ता भाग ४५ - गूढोत्मा नाम का अक्षरात्मा ४६- शरीर का आधार पहंकार ४७ - अहंभाव एवं शरीर के निम्मपिक माढा उपयपृथिवी [ " }
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षय ४८ - मर्त्यपिण्ड शरीर और प्रमृतमय बहंकार ४६ - वितेविषेय बाबद श्ववयव बारमेयप्राण ५० - प्राणमय चितेनिधेय प्राणात्मा ५१ - महंगा व कम्मरमा ५२ - प्राणरूप पचि प्राकृतात्या एवं एक स्कूल पात्मा ५३ – यात्मा - शाम से सम्बन्धित धोम का वर्ष ५४ - बोम्भाव का सर्वव्याप्तत्व ११- प्राणरूपपोर् - ५६ - ममः - प्राण - याहमय घोम् १७- खोम् तस्य का बक्षर शब्द से ग्रहण १८- उपचित् का प्रकार ' शब्द मूढोत्मा का उपलक्षण ६० - यज्ञान का प्रकृतिमहान् से सम्बन्ध ६१ - शरीर का आकृतिमहान् से सम्बन्ध ६२ - पोडशी का उपनिषदों में ' अक्षर ' शब्द से ग्रहण ६३ अक्षरात्मा और भोक्तास्मा ६४ - सत्यप्रजापति के दो भाग ६६ - विभिन्न उपनिषदों के प्रतिपाद्य विषय ६६ - उपनिषत् - अर्थ समझने हेतु सप्त प्रतिक्षा सूच ६७ - उपनिषदर्थ ६८- श्रमणमत एवं ब्राह्मणमत ६१ - सरोवरवत् भ्रात्मा एवं रथवत् ग्रात्मा ७० - खात्मा के सम्बन्ध में प्रचलित दो भत ७१ - हिन्दुत्व बोर बात्मबाद ७२ - मरणधर्म्मा मृत्यु एवं धमरणधर्म्मा अमृत ७३- भूतचिति देवचिति - बीजचिति ७४ - भूतथिति ग्रन्थि - बन्धन और स्थूलशरीर ७५ - देवचिति ग्रन्थि - बन्धन जोर सूक्ष्मशरीर ७६ - बीजथिति ग्रन्थि - बन्धन घोर कारणशरीर ७७ - प्रात्मा की मुक्ति ७८- अमृत मृत्युमय ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थित सम्बं ७१ - प्रसंग - निष शुद्ध विज्ञान ( विषय - सूची ) पृठ १५ २१ २५ २६ १६ २६ २७ २७ II २५ २८ १६ २५ २८ २६ २६ १० ३२ ३३ ३३ ३३ ३४ १५ ३५ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ ३६ ३७ ११- विज्ञान एवं प्राणात्मा का बहंकृति भाष से सम्बन्ध