कठोपनिषद — पृष्ठ 11–20

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य बिषय ८०- देवयान- पितृयाण ८१ - देवपथ प्रोर ब्रह्मपथ ८२ - पितृपथ और यमपथ ६३ - देवयान पितृयाण गतियों का विभाजक चन्द्रमा ८४ - मात्मा ( मोक्तात्मा ) की स्वर्ग व नरक गतिएं ८५ मंराज और यमराज ८६ - प्रात्मगति के रहस्यप्रतिपादक हैं पुराण ८७- पुराणशास्त्र का महत्व ८८- शनिग्रह प्रोर घम्मराज यमराज शनिग्रह और पितृस्वगं तथा पितृनरक ६० - शनिग्रह की नदी भौर शनिवलय ६१ - वैतरणी नदी ६२ सहस्र गो ३ - गोपशु का ज्योतिर्भाग भौर गौभाग ६४ - गोदान का महत्त्व ६५ गी से प्राणवृद्धि ६६ -- शनिमण्डल की कृष्ण रश्मिऍ ६७ - शनिपिण्ड की धवल रश्मिएँ - यमराज और धम्मंराज केदूत ६६ - आग्नेय और बंधुत् प्राण १०० - प्राणत्रयी पर निर्भर है मंटोरियल जगत् १०१ - महषियों के ज्ञान को श्रेष्ठता १०३ - स्वप्नज्ञानरोग परीक्षा उपाय १०४ - जाग्रत् जगत् में भूतप्रेतादि की सत्ता १०५ - अष्टविष देवसर्ग १०६ - महाराज जनकसम्बन्धी भाख्यान १०७ - आरुणी उद्दालक का याज्ञवल्क्य से प्रश्न करना १०८ - स्वप्नफल और उसके प्रतिरोध के उपाय १० ९ - आत्मा की षट् प्रवस्थाएँ ११० - जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति प्रवस्थाएँ १११ - नचिकेता की. मुग्धावस्था [ १० ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या ३७ ३७ ३७ ३७ ३७ ३७ ३५ ३६ ३६ ३६ E Yo ४० ४० ** ४१ ४२ ४२ ४२ II * II ४५ ४६ ४६ II ४७ ४८ II ४८ I * & १०२ - राक्षस - प्रासुर स्वप्नदर्शन तथा आयुर्वेदशास्त्र प्रमाण

पृष्ठ 12

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विषय ११२ - सर्ववेदस यज्ञ ११३ - गौतम ( उशन् ) द्वारा सर्ववेदस यज्ञ से यजन ११४ - गौतम द्वारा नचिकेता को दक्षिणा में देना ११५ - न पिता का पिता से प्रश्न करना ११६ - पिता का नचिकेता को उत्तर देना ११७ – मन्त्रगत ' मनुपश्य ' और ' प्रतिपश्य ' शब्द ११५ - मन्त्रगत ' पच्यते ' शब्द का प्र ११६ - नचिकेता का मूच्छित होना १२० - दूतों द्वारा यमराज को प्रातिष्य धम्मं बतलाना १२१ - भारतवर्ष का प्रतिविधम्मं १२२ - वंश्वानराग्निमय ब्राह्मण का सर्वप्राधान्य १२३ - बव्यथं शास्त्र साम १२४ - पीड़ा के चार प्रषिष्ठाता देवता १२५ - शिवसता ओर यश १२६ - संहारकर्ता रुद्र १२७- परमेश्वरीय मागधेय १२८ - भागधेय के दो विभाग १३० - तिस्रो रात्री का प्रयं १- नचिकेता का प्रथम वर मांगना २- मूर्द्धावस्था में प्राणों का ब्रह्मरन्ध में चढना ३- ' मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ' का प्रयं ५- यमराज का प्रथम वर प्रदान करना ६- ' सुखं रात्री: शयिता ' का व्यवहारभाषा से सम्बन्ध १- नचिकेता का द्वितीय वर मांगना २ - जीवात्मा की छः कम्मिएं [ ११ ] ( विषय - सू ) पृष्ठसंख्या ५१ ५१ ५१ ५२ ** ५६ ५६ १७ १८ ५६ ** ५६ ६० ६० ६० ६१ ६१ ६२ ६२ ६३ II II * ६६ ६६ ६६ ६६ ६७ १२६ - यमराज द्वारा नचिकेता को तीन वर मांगने के लिए कहना २- प्रथमवरवरणं तद्दानं च ( 10 से 11 मन्त्रपर्यन्त ) ४ - सावित्री सत्यवान्, माख्यान का नचिकेतोपाख्यान से समन्वय ३ - स्वग्र्याग्नि जिज्ञासारूप द्वितीयवरवरणं तद्दानं च ( १२ से १६ मन्त्रपर्यन्स ) ३ - नचिकेता द्वारा यमराज से अग्निरहस्य प्रकट करने का निवेदन

पृष्ठ 13

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय ४- स्वर्गलोक नाम से प्रसिद्ध यजमान ५ - शिव में श्रद्धा का पूर्ण रूप से होना ६- श्रद्धावान् मनुष्य ७- चयनाग्नि और मानुषात्मा का स्वर्ग में जाना ८- यमराज द्वारा सूत्ररूप से समाधान ६- मन्त्रगत ' प्रजानन् ' शब्द का अर्थ १० - चित्य - चितेनिषेय अग्नि ११- सोम पर चिति १२- संवत्सराग्नि १३- सोमयज्ञ के चार प्रकार १४ - हवियंज्ञ ( दपूर्णमास यज्ञ ) १५ - ग्रहमज्ञ ( ज्योतिष्टोमयज्ञ ) १६ - ग्रहयाग की सात संस्थाएं १७- चितियज्ञ ( श्रग्निचयन यज्ञ ) १८ वषट्कार मण्डल १६- सप्त वं देवस्वर्गाः २० - त्रिणाचिकेत स्वयं २१ - चयनयज्ञ से अमृतप्राप्ति २२- नवाहयज्ञ २३- वैश्वानर - तंजस प्राज्ञ २४- अग्नि वाक् इन्द्र २५- पृथिवी प्रन्तरिक्ष- द्यौ २६ - ' लोकादिम ' ( अग्नि ) २७ - नाचिकेताग्नि २८ - त्रिणाचिकेत यज्ञ २६- तीनवार चयनयज्ञ करना ३० - पञ्च यज्ञक्षर ३१ - ' ब्रह्मवास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ३२- ब्रह्मयज्ञ तथा ब्रह्मज पाठ ३३- या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ४- तृतीयवराभ्यर्थना ( २० से २२ मन्त्रपर्यन्त ) १- यमराज द्वारा नचिकेता की परीक्षा लेना [ १२ ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ - सूची ६७ ६७ ६७ ६८ ६८ ५८ ६६ II ६६ ६६ ६६ Ee ७० ७० ७० ७० ७१ ७२ ७२ ७२ ७२ ७३ ७३ ७३ ७४ ७५ ७६ ७७ ७८

पृष्ठ 14

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कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विषय ५- सृङ्काप्रदानप्रस्ताव ( २३ से २५ मन्त्रपर्यन्त ) २- अप्सराएं प्रदान करने का लालच देना ३- छन्द से भवच्छिन्न देवता भूत ६ - नचिकेतोविमर्श: ( २६ से २६ मन्त्रपर्यन्त ) १- वोभाव २- अन्तक यमराज ३ - मनुष्य की तृष्णा ४- ससृष्ण पदार्थ ५- उत्कृष्ट तस्व की याच्या ३ - जीयं मत्यं सांसारिक वैभव ॥ इति प्रथमाध्याये प्रथमा बल्ली ॥ २- अथ द्वितीया बहली-मूलसंस्कृतपाठः । हिन्दोविज्ञाननाथ्य । १ - नचिकेतोप्रशंसा ( १ से १३ मन्त्रपर्यन्त ) १- परीक्षा में उत्तीर्ण नचिकेता २ - विकि प्रेम और प्रेय ३- श्रेयस्कर - प्रेयस्कर उभयविध पदार्थ ४ - ' साघु भवति होयते ' ५ - शास्त्रानुसार श्रेय प्रेय का ग्रहण ६- प्रेम - प्रेय के सामान्य लक्षण ७- महर्षियों की दृष्टि की व्यापकता ८- गुण - दोषस्वरूप श्रेय प्रेय की छाँट ६ - विवेक का अधिष्ठाता धीरभाव [ १३ } ( विषय - सूची ) पृष्ठ - सूची ७६ ७६ ८० ८१ ८१ ८२ ८३ ८३ ८३ ८४ ८५ ८६ ६३ ६३ ६३ ६३ ६४ ६६ ६७ १७ ६८ ६८ २ - यमराज द्वारा नचिकेता से अन्य वर मांगने के लिए कहना ३- देवं पद का अर्थ १ - यमराज द्वारा नचिकेता को धन सम्पत्ति का लालच देना

पृष्ठ 15

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय १०- योग - क्षेम का साधन श्रेय ११ - वित्तमयी सृखा १२- उपासना के अधिकारी भेद १३ - विद्या और अविद्या का अविनाभाव १४ - नानात्वभावमूल अविद्या ११- शरीरस्थ बारमा की नित्यमति १६- शरीरस्य धात्मा की सप्रसादगति १७- शरीरस्थ बात्मा की यक्षगति १८- शरीरस्थ मात्मा की सांपरायगति १६-परोक्ष यज्ञगति और सांपरायगति २० - दुर्लभ जाता गुरु - शिष्य २१ -पराय विद्या का माहात्म्य २२ - ' महाजनो येन गतः स पन्थाः ' २३- तर्क और कुत्सित तर्क २४ - शेवधि पदार्थ २५- अधुष तथा ध्रुव पदार्थ २६ -- वरीर और बारमा २७- प्रारमा बोर विश्व २८ - अनित्य शरीर मौर नित्य आत्मा २६ - चयन से आनन्त्यप्राप्ति ३० - बबराध्यं तथा परार्ध्य भाग ३१ - बमय स्वर्ग ३२- १ बमय स्थान ३३- बर्षा बराक् अभय ३४- धमयस्य पारम् ' ३५ - स्तोममय आत्मा १ - नचिकेता का यमराज से प्रश्न करना २- अन्तर्यामी और सूत्रात्मा ३- पद - पुनः पद ४- अक्षरमय यजुर्ब्रह्म [ १४ } ( विषय - सूची ) पृष्ठ - सूची १६ १०० १०२ १०३ १०३ १०४ १०३ १०५ १०५ १०५ १०६ १०८ १० ९ १० ९ ११० ११ १११ २११ १११ ११२ ११२ ११२ ११२ ११२ ११३ ११३ ११४ ११४ ११४ ११५ २- परात्परस्थ पुरुषत्रय विज्ञानम् ( १४ से १६ मन्त्रपर्यन्त )

पृष्ठ 16

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कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विषय ५- स्थिति और गति ६- गति के दो भेद ७- ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ८ - हृ - द - यम् E - ' ब्रह्म वं सर्वस्य प्रतिष्ठा ' १० - खग्नि - सोमसमष्टि सूत्रात्मा ११ - प्राणवायु के दो भेद १२ - सत्पसूत्र - सूत्र १३- ब्रह्मा के पांच विवर्त १४- बिरज बोर रज पदार्थ १५ - पांच प्राकृतात्माएँ १६- पांच वैकारिकात्माएं १७- ईश्वर के चारभाग १६- प्रकार की सर्वव्यापकता -१ ९ - सत्यमश्वत्थ २०- बह्यारवत्थ भोर कम्मश्वत्य ११-मौर प्रश्वत्थ २२- शुक्ररूप पश्यत्य २३- स्थिर प्रश्वत्थक्ष २४ - प्रश्वत्थ की सहस्र बलशा २५- सहस्रवणायुक्त सत्य अश्वत्थ २६ - प्रक्षर की पांच कलाएं २७ -- पांच ब्रह्मसत्य २५- प्राणादि पांच आत्मक्षर २ ९- ब्रह्मादि पांच अक्षर ३० - ब्रह्मसत्य - साक्षी देवसस्य - भोक्ता देवसत्य ३१ - पृथिवी पिण्ड के अमृताग्नि - मत्यं प्राण ३२- रथन्तर - साम ३३- चित्यपृथिवीचितेनिधेय पृथिवी ३४- प्रषाढा उख्या पृथिवी ३५ - पिण्डपृथिवी स्तोम्यपृथिवी ३६ - पार्थिवाग्नि के घन - तरल - विरलभाव [ १५ ]

पृष्ठ 17

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कठोपनिषद्विज्ञानवाण्य विषय ३७ - धग्नि - वायु - इन्द्र ३६- चितेनिषेय पृथिवी के तीन लोक ४० - ' एका मूर्तिस्त्रयो देवाः ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ' ४१ - तापरहित अग्नि ४२- वेश्यानर हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ ४३ - श्याम रो यसले सुम्पेण ' ४४ श्यामर हिरण्य - - सर्वश की हैलोक्यस्याप्तता ४५ - पत्रियोकी का रेवसंघ ४१ - रेपसंच देवसस्य ४७-का एकस्थ ४८ - चिदानन्य नाम से प्रसिद्ध महास्व ४४-के. परात्पर धीर पुरुषभाग ५० - सलीम मायावधि ५१ - प्रछति के अमृत - मृत्यु बो. मेद ५२ - प्रविष्ठा ६३ - प्रमुख बौर शुरू ५४ वस्तु के अनुग्राहक पनि धीर सोम ५५ सत्यमूर्ति - हृतमूर्ति ११- बावा - पद - पुनः पद ५८- ' बद '. ब्रह्मभाव पर स्व ' ' शुकमान ५१- राम के मूलभूत बीच का उदाहरण १०- सम्स के माधार से वो पत्ते निकालमा ( १ - अग्नीषोम समष्टि - ब्रह्म ६२ - प्रम्नीषोमसमष्टि शुक ६३ - रक्षक डिल तथा रक्षित दिवल ६४- प्राग्नेय - सौम्यप्राणमय भ्रूण ६५ - आग्नेयप्राण की प्रतिष्ठा प्राग्नेय भाग ६६ - सोम्यप्राण की प्रतिष्ठा - सौम्य भाग १७- वनस्पतियों के बीजों में अग्नि की प्रधानता ६८ अौषधियों में सोम की प्रधानता [ * ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ - सूची १२२ १२२ १२२ १२१ १२३ १२३ १२३ १२३ १२५ १२५ २३७ ११७ ११७ १ ९ ७ १२७ RT ११६ १२८ ११४ १ ९९ ११८ ११० १३० १३१ १३१ १३२ १३२ १३२ १३२ ११३ १३३

पृष्ठ 18

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय १६- बीज का महावृक्षरूप धारण करना ७० - महानात्मा का आकृतिभाग ७१ - ब्रह्मसत्य और देवमत्य ७२ - ब्रह्मसत्य का सत्यपना और ओम् ७३ – ब्रह्मसत्य के स्वयम्भू आदि ६ आत्मा ७४- चौबीसकलयुक्त ब्रह्म ७५ -लोक्यहृदयाविष्ठित देवसत्य ७६ - सर्वश- हिरण्यगमं - वैश्वानर ७७ - जीवेश्वर प्रजापति ७८ - मोक्ता प्रजापति मोर साक्षीप्रजापति ७६ - शिपिविष्ट प्रजापति ८० - जी प्रजापति - निरूपण ८१ - तन्त्र और तन्त्रायी ८२ - प्राणात्मा नाम से प्रसिद्ध कम्मरमा ८३- कम्मत्मा का कर्मबन्धन से विमुक्त होना ५४ - मात्मा के लिए ' स्व ' शब्द प्रयुक्त होना ८५ - स्वतन्त्र भौर परतन्त्र ६६ - दो अग्नि, दो चेतना, दो ब्रह्म, दो आत्मा ८७- डिग्नि - हिरण्यगर्भवायु और सर्वज्ञ इन्द्र ८६- जीवदेवसत्य का निम्मपिक ईश्वर देवसत्य ८६- जीवप्रजापतिगतदेवसत्य निरूपण ६० - दुःख का कारण सप्तदश राशि ११- परात्परस्थ पुरुषत्रप - विज्ञान १२- उपनिषदों के प्रतिपाद्य विषय ६३ - आत्मा के जानाति करोति धम्मं ४ - मात्मा पर रहने वाले धर्मों के दो प्रकार ६५ - स्वरूप धर्म और श्रागन्तुक धर्म ६६ - धम्मं और प्रधम्मं ७- पोडशी पुरुष - पञ्चप्रकृति एवं विकृति ६८ - धम्मं का धम्म से पृथक्त्व ६६ - ज्ञानजनित संस्कार १०० कम्र्म्मजनित संस्कार [ १७ ]

पृष्ठ 19

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कठोपनिषविज्ञान माध्य fre १०१ - बहुत एव कृत भावनावासनासंस्कार १०२- खात्मा का कृताकृतत्व से पृथकृत्व १०३ - प्रशाभूत १०४ - विषया व ज्ञानाज्ञान १०५ - सोमविषयक एवं सुराविषयक ज्ञान १०६ - गीताशास्त्र की धम्र्म्मबुद्धि एवं अधम्मं बुद्धि १०७ - ज्ञानतस्व के दो प्रकार १०८- भूत घोर भव्य १० ९ - उत्पत्रिलोकी के तीन प्रषिष्ठाता देवता ११० - ' मरण मामुप्राक्षीः ' १११ - धम्मं बुद्धि - मधम्मं बुद्धि भावना ११२- भावना - वासना १११-० विद्या ११४- ज्ञानपा विद्या ११५ - स्था का विद्याक ११६ तहत द्वारा आवरण चढना ११७ प्रत्यगात्मा का भाषार परमात्मा ११८ - पूर्णम् - सर्वतः पाणिपाद ईश्वर ११ --- एकत: पाणिपाद जीव ११० - पवान्त ईश्वर १११ - अपदान्त जीव १२२ - खोम् - अहं - ग्रहम् १११ - मात्मा का उपनिषत् - भोम् १२४. बोडी पुरुषयुक्त पचप्रकृति ब्रह्मसत्य १३३ - विश्वासीत प्रवाङ्मनसगोचर परात्परतत्त्व १२६ - धम्र्माधर्म से शून्य परात्परतत्त्व १ ९ - खो से बचिकेता के समस्त प्रश्नों का समाधान ११८- शाम - क्रिया - प्रथम त्रैलोक्य ११ वर्षशक्ति का मन्दिमधान पृथिवी से सम्बन्ध १३० - शिवायक्ति का वाबुधवार पन्तरिक्ष से सम्बन्ध १३१ - बामशक्ति का इन्द्रप्रधान दिव्यलोक से सम्बन्ध १६ वं पोर प्रवराष्यं [ १८ ]

पृष्ठ 20

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steforefat न माध्य विषय १३३ - ज्ञानक्रियायंमय कम्र्मात्मा १३४ - समष्टिरूप प्रोम् ११५ - मन - प्राण वाक् भोर ओम् १३६ - कम्मं - उपासना - ज्ञानमार्ग मोर श्रात्मा १३७ - बोम् से प्रभिप्रेत त्रिपुरुष १३८ - परात्परस्वरूप बुद्ध अध्यय १३६ - मनोवाक्स्वरूप शुद्ध व्ययक्षर १४० - प्राणरूप अक्षर १४१ - शरीरसापेक्ष मारमाशब्द १४२ - सर्वालम्बन प्रव्यय पुरुष १४३ - प्रम्यय - अक्षर - क्षर की समष्टि = प्रोम् १४४ - वैकारिक जगत् का पालम्बन पञ्चजन १४५ - पचजनों का आलम्बन विश्वसृट् १४६ - परागति भौर अपरामुक्ति का माधार अक्षर २४७ - बम्पयत्व से बहालोक की प्राप्ति १४६ - प्रक्षरज्ञान से प्राप्तकामत्व होना १४ ९ - सर्वथा असंग घोडी प्रात्मा : ५० - सम्ययपुरुष के चार प्रकार १५१ - गीता का शाश्वत धम्मं १ - जीवात्मा के सम्बन्ध में विभिन्न मत २ - जीवात्मा व्यापक है. सांख्यमत ३- शांशिमाव के चार भेद ४ - सूपं और सूर्य की रश्मियों का सम्बन्ध ५- व्यक्तयुक्त ' महानात्मा ' ६ - भ्रूणस्थ चेतना और जीवात्मा ७- चियोनिरूपं महान् ८ महानुरूप ८४ लाख शुक्र E - चेतनायुक्त ८४ लाख भ्रूण ११- कृष्ण महान् के सत्त्व - रज - तम भाग [ १६ ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या १५६ १५६ १५७ १५७ १५७ १५८ १५८ १५८ १५८ १५ ९ १६१ १६१ १६१ १६१ १६१ १६१ १६२ १६२ १६२ १६५ १६५ १६५ १६५ १६७ १६७ १६७ १६८ १६८ १६८ १६८ ३ - पारावारो महानात्मा शारीरात्मको धाता ( २० से २५ मन्त्रपर्य्यन्त ) १० - सूय्यं का परमेष्ठी के चारों ओर परिभ्रमण मोर दर्शपूर्णमास