कठोपनिषद
Kathopanishat · Gita Press, Gorakhpur · 486 पृष्ठ · 49 खण्ड
विषय सूची
- - हिन्दीविज्ञानभाष्य कठोपनिषत् यजुर्वेदीय पं. मोतीलालशास्त्री वेदवीथीपथिक राजस्थान पत्रिका वैदिक श्रृंखला - 61 यजुर्वेदीय-कठोपनिषत - हिन्दीविज्ञानभाष्य पं… 1–10
- कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य बिषय ८०- देवयान- पितृयाण ८१ - देवपथ प्रोर ब्रह्मपथ ८२ - पितृपथ और यमपथ ६३ - देवयान पितृयाण गतियों का विभाजक चन्द्रमा ८४ - मात्मा (… 11–20
- कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय १२ - प्रग्यय के मनःप्राणवाङ्मय आत्मभाग का व्यक्तिभाग १३ - महान् के प्राकृति प्रकृति प्रकृति खण्ड १४- महान् का बाकृतियां बनाना… 21–30
- विषय ३१ - शरीरशुद्धिरूप योग प्रक्रिषाएं: ३२- प्रष्टायोग ३३- प्रतीतानागत ज्ञान ३४ - सर्वगुह्यतम बात्मसमर्पणरूप भक्तियोग ३५- ' यद् वाङ्मनसी प्राशः ' मन्त्र… 31–40
- कठोपनि ज्ञानमध्ये विषय ४- द्वैतविनिर्मुक्तिलक्षणा परामुक्ति ५ - निष्कामयोग एवं अनुशासन ७- माडीस्वरूप विज्ञानम् ( १६ से १७ मन्त्रपर्यन्त ) १ - जाडीमेदेन… 41–50
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् होता है । इसका उत्तर देते हुए महर्षि हमें ज्ञान का और कम्मं का वैविध्य सिखलाते हैं… 51–60
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) गुढोत्मा है एवं अव्यक्त नहान् बहकार इन तीनों की समष्टि है । इस प्रकार स्थूलदृष्टि से कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या… 61–70
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य बि निरूपणोपनिषत् पार करने पर प्राप्तव्य स्थान प्राप्त हो सकता है, ग्रतएव उपनिषदर्थं के जिज्ञासुओं से… 71–80
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् क्या अब भी प्रलापियों का प्रलाप दूर न होगा? होगा और भवश्य होगा… 81–90
- Ventre ( प्रथम वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " दक्षिणासु नीयमानासु ( दक्षिणात्येन नीयमानासु ) तं ह कुमारं सन्तं श्रद्धा प्राविवेश… 91–100
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् पानी फिर जाता है एवं संगत भी नष्ट हो जाता है… 101–110
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् निधेयानि प्राणरूप है, प्रतएव इसके लिए ' गुहायां निहितम् ' कहा है… 111–120
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा बल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् लेने पर सचमुच सारी सम्पत्ति प्राप्त हो सकती है… 121–130
- प्रवाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् साथ प्रवृत होते हैं, परन्तु जिनका परिणाम बडा भयङ्कर होता है - वे ही प्रेयस्कर… 131–140
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् उसी श्रविद्या को इन मूढों ने अपना रखा है… 141–150
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् समझता हूँ कि मेरे उपदेश से अवश्य ही नचिकेता का घर खुल गया होगा… 151–160
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( भायसन ) भेद से त्रैलोक्य में व्याप्त होकर वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ नाम से… 161–170
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् मात्मा है । अग्नीषोमब्रह्म प्राण है । प्राणापः पशु है… 171–180
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाग्य विद्या निरूपणोपनिषत् वदात्माओं के रहता नहीं, अतएव बाध्य होकर उसे गौणरूप से सबका प्रतिपादन करना पड़ता… 181–190
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( १ ) अवधपरक ' ओम्'-( १ ) - निविशेषः शुद्धो रसः -- अर्द्धमात्रा ---- सर्वाधार: (… 191–200
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्राकृतात्मा - वर्णनम् -तत्रादी-पारावारो महानात्मा - शारीरात्मको घाता उपनिषत् के… 201–210
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् व्यास कहते हैं-" तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः… 211–220
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् और समुद्र में से निकले हुए पानी बस, ठीक ये ही दो विभाग यहीं है… 221–230
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् को ज्ञान भी नहीं कहा जा सकता… 231–240
- अथ कठोपनिषद--प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली [ मूलपाठ: ] ऋतं पिवन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टो पर परार्थे… 241–250
- प्रथमाध्याय ( बृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिपैं अभिप्रेत हैं । पहले महान् है फिर अव्यक्त है - फिर आत्मक्षर है- फिर अक्षर है - फिर… 251–260
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली, कठोपनिषदिनमा य विद्यातिरूपणोपनिषत् " अ तो घर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं सम "… 261–270
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) ( १ ) स्वयम्भू ( २ ) परमेष्ठी ( ३ ) सूर्य्यं ( ४ ) चन्द्रमा ( ५ ) प्राणरूपभूतात्मा ' ( ६ ) सर्वश ( ७ ) हिरण्यगर्भ ( - )… 271–280
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् चार स्वरूपों में परिणत हो जाते हैं… 281–290
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणापनिषत् महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ”… 291–300
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) 2 कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् राशिरूप शुक्र से अलग होते हुए मुक्त हो जाओ इसी का नाम सद्योमुक्ति है - इसी को… 301–310
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बना डालते हैं । खगल में उनकी तस्वीर बन जाती है… 311–320
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान मा माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " तपस्वियो s धिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः… 321–330
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् उपनिषत् के योगशब्द से यही मनासक्त निष्कामकर्मयोग और ज्ञानयोग दो योग ही अभिप्रेत हैं… 331–340
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषविज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् समस्या उपस्थित हो जाती है… 341–350
- द्वितीयव ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् जब तक यह विज्ञान मध्यद नहीं बनता तब तक न भूतभव्य का ईशान है - न महान् के समीप है - न… 351–360
- द्वितीय ( प्रथमा वल्ली ) कम्मनिरूपणोपनिषद् यह कहा है । अदिति के साथ भूतात्मा यब सम्बन्ध बतलाने का महर्षि का अभिप्राय यही पलंग खांट रखा है- विश्वास करो -… 361–370
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् ३- प्रपरा ऐकात्म्यधारणालक्षणा - योगक्रिया… 371–380
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् हमें उसकी प्राप्ति हो जाती है… 381–390
- द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्म्म निरूपणोपनिषत् सूर्य M अवक्र श्रादर्श चित्र १ आदर्श सूर्य रश्मिएँ सूर्य वक्र आदर्श चित्र २… 391–400
- द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् बोलता है । महीधर ने इस मन्त्र को रथपरक एवं सूर्य्यपरक लगाया… 401–410
- द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् परन्तु मत्यं धवराष्यं की वस्तु मन ( प्रज्ञान ) एक प्रकार से बिलकुल स्वतन्त्र… 411–420
- प्रथ द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली ३ प्रथ कठोपनि eft-द्वितीयाध्याये तृतीया बल्ली [ मूलपाठ: ] ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः… 421–430
- .fat ( तृतीया वली ). कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य G कम्र्मनिरूपणोपनिषत् इमलिए अपने उन ययाश्वत्थ वृक्ष की हजार शाखाएं बतलाई है… 431–440
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् " सर्व वा इदमिन्द्राय तत् स्थानमास - यदिदं किञ्च… 441–450
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् " प्रजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्… 451–460
- कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) इस चतुविध अभिमान को ' समय ' कहा जाता है-१ जड़जातत्याभिमान + प्रजात स्वाभिमान २ -… 461–470
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् अव्यय ' आत्मा ' है । आत्मा देवता भूत ' - तीनों के साथ क्रमशः ज्ञान - क्रिया अर्थ-… 471–480
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य निरूपणोपनिषत् है । जो है जो उपलब्ध है वहीं वह है… 481–486