श्रीगणेशाय नमः।
कठोपनिषद
Kathopanishat · Gita Press, Gorakhpur · 486 पृष्ठ · 49 खण्ड
In English
Kathopanishad with Hindi Commentary
This book contains the Kathopanishad, a Yaju-Veda Upanishad, accompanied by a Hindi commentary titled Hindi Vigyan Bhashya written by Pandit Motilal Shastri. The text details the dialogue between the boy Nachiketa and Yama, the god of death, regarding the nature of the soul and spiritual knowledge.
This book answers
- What is the dialogue between nachiketa and yama?
- What does the kathopanishad say about the soul and death?
- How does one achieve spiritual knowledge according to the text?
- What are the different paths of the soul after death?
विषय सूची
- - हिन्दीविज्ञानभाष्य कठोपनिषत् यजुर्वेदीय पं. मोतीलालशास्त्री वेदवीथीपथिक राजस्थान पत्रिका वैदिक श्रृंखला - 61 यजुर्वेदीय-कठोपनिषत - हिन्दीविज्ञानभाष्य पं… 1–10
- कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य बिषय ८०- देवयान- पितृयाण ८१ - देवपथ प्रोर ब्रह्मपथ ८२ - पितृपथ और यमपथ ६३ - देवयान पितृयाण गतियों का विभाजक चन्द्रमा ८४ - मात्मा (… 11–20
- कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय १२ - प्रग्यय के मनःप्राणवाङ्मय आत्मभाग का व्यक्तिभाग १३ - महान् के प्राकृति प्रकृति प्रकृति खण्ड १४- महान् का बाकृतियां बनाना… 21–30
- विषय ३१ - शरीरशुद्धिरूप योग प्रक्रिषाएं: ३२- प्रष्टायोग ३३- प्रतीतानागत ज्ञान ३४ - सर्वगुह्यतम बात्मसमर्पणरूप भक्तियोग ३५- ' यद् वाङ्मनसी प्राशः ' मन्त्र… 31–40
- कठोपनि ज्ञानमध्ये विषय ४- द्वैतविनिर्मुक्तिलक्षणा परामुक्ति ५ - निष्कामयोग एवं अनुशासन ७- माडीस्वरूप विज्ञानम् ( १६ से १७ मन्त्रपर्यन्त ) १ - जाडीमेदेन… 41–50
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् होता है । इसका उत्तर देते हुए महर्षि हमें ज्ञान का और कम्मं का वैविध्य सिखलाते हैं… 51–60
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) गुढोत्मा है एवं अव्यक्त नहान् बहकार इन तीनों की समष्टि है । इस प्रकार स्थूलदृष्टि से कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या… 61–70
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य बि निरूपणोपनिषत् पार करने पर प्राप्तव्य स्थान प्राप्त हो सकता है, ग्रतएव उपनिषदर्थं के जिज्ञासुओं से… 71–80
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् क्या अब भी प्रलापियों का प्रलाप दूर न होगा? होगा और भवश्य होगा… 81–90
- Ventre ( प्रथम वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " दक्षिणासु नीयमानासु ( दक्षिणात्येन नीयमानासु ) तं ह कुमारं सन्तं श्रद्धा प्राविवेश… 91–100
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् पानी फिर जाता है एवं संगत भी नष्ट हो जाता है… 101–110
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् निधेयानि प्राणरूप है, प्रतएव इसके लिए ' गुहायां निहितम् ' कहा है… 111–120
- प्रथमाध्याय ( प्रथमा बल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् लेने पर सचमुच सारी सम्पत्ति प्राप्त हो सकती है… 121–130
- प्रवाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् साथ प्रवृत होते हैं, परन्तु जिनका परिणाम बडा भयङ्कर होता है - वे ही प्रेयस्कर… 131–140
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् उसी श्रविद्या को इन मूढों ने अपना रखा है… 141–150
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् समझता हूँ कि मेरे उपदेश से अवश्य ही नचिकेता का घर खुल गया होगा… 151–160
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( भायसन ) भेद से त्रैलोक्य में व्याप्त होकर वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ नाम से… 161–170
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् मात्मा है । अग्नीषोमब्रह्म प्राण है । प्राणापः पशु है… 171–180
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाग्य विद्या निरूपणोपनिषत् वदात्माओं के रहता नहीं, अतएव बाध्य होकर उसे गौणरूप से सबका प्रतिपादन करना पड़ता… 181–190
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( १ ) अवधपरक ' ओम्'-( १ ) - निविशेषः शुद्धो रसः -- अर्द्धमात्रा ---- सर्वाधार: (… 191–200
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्राकृतात्मा - वर्णनम् -तत्रादी-पारावारो महानात्मा - शारीरात्मको घाता उपनिषत् के… 201–210
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् व्यास कहते हैं-" तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः… 211–220
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् और समुद्र में से निकले हुए पानी बस, ठीक ये ही दो विभाग यहीं है… 221–230
- प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् को ज्ञान भी नहीं कहा जा सकता… 231–240
- अथ कठोपनिषद--प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली [ मूलपाठ: ] ऋतं पिवन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टो पर परार्थे… 241–250
- प्रथमाध्याय ( बृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिपैं अभिप्रेत हैं । पहले महान् है फिर अव्यक्त है - फिर आत्मक्षर है- फिर अक्षर है - फिर… 251–260
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली, कठोपनिषदिनमा य विद्यातिरूपणोपनिषत् " अ तो घर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं सम "… 261–270
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) ( १ ) स्वयम्भू ( २ ) परमेष्ठी ( ३ ) सूर्य्यं ( ४ ) चन्द्रमा ( ५ ) प्राणरूपभूतात्मा ' ( ६ ) सर्वश ( ७ ) हिरण्यगर्भ ( - )… 271–280
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् चार स्वरूपों में परिणत हो जाते हैं… 281–290
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणापनिषत् महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ”… 291–300
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) 2 कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् राशिरूप शुक्र से अलग होते हुए मुक्त हो जाओ इसी का नाम सद्योमुक्ति है - इसी को… 301–310
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बना डालते हैं । खगल में उनकी तस्वीर बन जाती है… 311–320
- प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान मा माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " तपस्वियो s धिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः… 321–330
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् उपनिषत् के योगशब्द से यही मनासक्त निष्कामकर्मयोग और ज्ञानयोग दो योग ही अभिप्रेत हैं… 331–340
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषविज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् समस्या उपस्थित हो जाती है… 341–350
- द्वितीयव ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् जब तक यह विज्ञान मध्यद नहीं बनता तब तक न भूतभव्य का ईशान है - न महान् के समीप है - न… 351–360
- द्वितीय ( प्रथमा वल्ली ) कम्मनिरूपणोपनिषद् यह कहा है । अदिति के साथ भूतात्मा यब सम्बन्ध बतलाने का महर्षि का अभिप्राय यही पलंग खांट रखा है- विश्वास करो -… 361–370
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् ३- प्रपरा ऐकात्म्यधारणालक्षणा - योगक्रिया… 371–380
- द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् हमें उसकी प्राप्ति हो जाती है… 381–390
- द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्म्म निरूपणोपनिषत् सूर्य M अवक्र श्रादर्श चित्र १ आदर्श सूर्य रश्मिएँ सूर्य वक्र आदर्श चित्र २… 391–400
- द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् बोलता है । महीधर ने इस मन्त्र को रथपरक एवं सूर्य्यपरक लगाया… 401–410
- द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् परन्तु मत्यं धवराष्यं की वस्तु मन ( प्रज्ञान ) एक प्रकार से बिलकुल स्वतन्त्र… 411–420
- प्रथ द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली ३ प्रथ कठोपनि eft-द्वितीयाध्याये तृतीया बल्ली [ मूलपाठ: ] ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः… 421–430
- .fat ( तृतीया वली ). कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य G कम्र्मनिरूपणोपनिषत् इमलिए अपने उन ययाश्वत्थ वृक्ष की हजार शाखाएं बतलाई है… 431–440
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् " सर्व वा इदमिन्द्राय तत् स्थानमास - यदिदं किञ्च… 441–450
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् " प्रजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्… 451–460
- कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) इस चतुविध अभिमान को ' समय ' कहा जाता है-१ जड़जातत्याभिमान + प्रजात स्वाभिमान २ -… 461–470
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् अव्यय ' आत्मा ' है । आत्मा देवता भूत ' - तीनों के साथ क्रमशः ज्ञान - क्रिया अर्थ-… 471–480
- द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य निरूपणोपनिषत् है । जो है जो उपलब्ध है वहीं वह है… 481–486