कठोपनिषद — पृष्ठ 481–486
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–486
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य निरूपणोपनिषत् है । जो है जो उपलब्ध है वहीं वह है । यदि तुमने किस प्रक्रिया - सच्चिदानन्द को पहचान लिया है, क्योंकि सत्ता - चेतना मानन्द तीनों सर्वत्र सप्तारष्टि रखो । सत्ता की उपासना करो वह मिले जाएगा यही निष्कष हैं पूर्वकथनानुसार तुम्हें उपलब्धि का शोक है । विषय को प्राप्त करने का शोक है । यदि ऐसा हैं तोतुम प्रस्ति को उपलब्धि बनाओ जैसा कि पूर्वकथनानुसार अस्ति ही यथार्थ में उपलब्धि है । उपलब्धि ज्ञान का नाम है । घट तो प्रस्ति से पृथक था, परन्तु घटोपहिता, घटोपलब्धि भस्ति से पृथक् नहीं है । घड़ा जानते हैं इस उपलब्धि का ' घटोऽस्ति ' - रूप से ही तो अभिनय किया जाता है. बस्ति ही तो घटज्ञान का स्वरूप है । घटज्ञान ही तो अस्ति है । मस्ति ही भाति है । माति ही मस्ति है । घटविषय तो अस्ति से पृथक था, अतः वह तो तस्वभाव का प्रतिबन्धक था । परन्तु अस्तिमात्र की उपलब्धि प्रस्ति से अभिल है । बस, अस्ति भाति दोनों को तत्त्वभाव को दृष्टि से देखते हुए अमित समझते हुए तुम्हें अस्ति को ही उपलब्ध ( प्राप्त ) करना चाहिए । अस्ति को हो माति का विषय बनाना चाहिए । बस, इस यथार्थतत्त्व को समझता हुषा प्रभ्यास द्वारा जो बीर ' अस्ति - प्रण को प्राप्त कर लेता है - मस्ति को ही उपलब्धि समझ लेता है - वह घटपटादि, मर्त्यप्रपञ्च से अलग होता हुआ - ऐकात्म्यभाव को प्राप्त हो जाता है । अमृतात्मा तत्त्वभाव तत्त्वमाव है है ॥ मेघाच्या मेघाच्छन्न सूप्यं अप्रसन्न म है - मूलिन हो जाती है - चमक पड़ती है । ठीक यही बात यहाँ है । तस्वभाव ) अब तक अप्रसन या मनुदबुद्ध था - वही अस्स्युप-PR FI HIERIPTE है, परन्तु मेघ हटते ही सौरज्योति प्रसन्न घटपटादिमत्यंसंस्कार से जो आत्मा ( जो लब्धि से सतारष्टिसिद्धि से अमृतप्रधान बनकर ' प्रसत हो जाता है । नामरूपादि मृत्यु से मृत्युभाग प्रबल रहता है, मस्तिदृष्टि से अमृतभाग प्रबल हो जाता है मलय कहलाता है । प्रमृत-ree starrerers अतएव मृत्युमय विश्व का मूल है, तब उसे हम यही विष का ' सस्वभाव ' कहने के लिए तय्यार हैं । ममृतरूप सतोपलब्धि से मृत्यु - सी समय स्वभाव हो जाता है । यही प्रमुक्प्राप्ति का उपाय के कहते है--" अस्तीत्येवोपलभ्धव्यस्तत्स्वभावेन चोभयोः ।
प्रस्तीत्येोपलब्धस्य तस्वभावः प्रसीदति ।
॥ इति पसमुक्तौ प्रमृतात्मकैवल्यस्य सत्तात्मकेशनिमयनिवरूप नियम् ॥
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया बल्मी ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य १४- सोवनोदकमेवात् श्रमिकपरामु कर्मनिरूपणोपनिषत विध्यनिरूपणम्-" हृत्वेऽपि कामात्यन्तनिवृत्तौ कैवल्यभूतस्य धीवामृतात्मनः परामृतात्म-प्राप्तिला, हृट्यन्दिन्यत्वम्धनिवृत्तौ तु द्वैतविनिर्मुक्तिलक्षणा च परामुक्ति ” । ffusreer नहीं बन कती सम्भव नहीं हो सकती - सत्तारष्टि भी सम्भव नहीं हो सकती । आप कहते हैं - इन्द्रियधारणा न सही - उचार्यष्टि ही रही । विषय को हो परन्तु दृष्टि दृष्टि सप्ता ' पर रखो । परन्तु को हैं,: सारी पुनःपुनः हम वो ऐसा करने में भी समर्थ ही हैं । मन बहुत कुछ रोकते परन्तु यह विषयों की बोर ही दीक्षा है । इसे तो नामरूप की उपलब्धि अच्छी लगती है । सत्ता की ओर यह शुकता ही नहीं । हयालु ऋषि कहते हैं कि कोई चिन्ता की बात नहीं - निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं । न सही इन्द्रियधारणा योग - न सही सत्तारष्टि । हम अनुमति देते हैं कि तुम रात - दिन विषयों में लिप्त रहो । तुम्हारे मन को जो भच्छा लगे सो करो । कोई रोक - टोक नहीं है । परन्तु जहाँ हम तुम्हें मी स्वता देते है - उसके एवज में हम भी तुमसे एक बात माँगते हैं । वह यही है कि तुम करो सब कुछ, परन्तु अपनी कामना हटा लो अपनापना हटा लो । मैं नहीं करता - अन्तः प्रतिष्ट वर की इच्छा से सब कुछ हो रहा है - यह भावना रखो । विषयरूपकम्पं बन्धन का कारण नहीं है-- हा बम्ब का कारण है । अनासक्तकम् निकिम् बनकर प्रविद्या विनाश का कारण बन जाता है । गीताबम्ब ने ( सम्पूर्ण गीता ने ) केवल इसी तीसरे उपाय पर प्रधानरष्टि रही है एवं इसे वात्मसमर्पणरूप गुह्यतमयोग बतलाया है । इससे होता क्या है? धीरे - धीरे अपने प्राप कामना की निवृत होने लगती है । कामनिवृत्ति से निष्काम बनकर जीव परामृत में मिल जाता है । परामुक्ति के हमने जीणोदर्क- भूमोदर्क दो भेद बतलाए हैं । निष्कामकर्म द्वारा काम की प्रात्यन्तिक निवृति हो गई है, परन्तु अभी हग्रन्थि है । हृदग्रन्थि रहने पर भी ( जीवित दशा में ) यदि कामना का अस्थिपिक उपाय है तो जीव सारं परिग्रहों को छोडकर शुद्ध दिडकेबलरूप में परिणत हो जाता है । कान द्वारा यह परिवह छोडकर शुद्ध बनता है, प्रतएव इस अवस्था को हम क्षोणोदर्क फाईने । इस सुद्धावस्था में यह बुद्धसस्या जीवामृतमाग- पयोदकं शुद्ध शुद्धमासियां साबुनेय बलि ० - इस पूर्वप्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार यहीं इसी जीवनकाल में उस परामृत ( ईश्वराव्यय ) में लीन हो जाता है - इसे वह प्राप्त हो जाता है । समयलय नहीं है क्योंकि अभी हदुग्रन्थि है । ' मुण्डकोपनिषद ' -- ' ' पदरा पश्यति ० ' द्वारा जो भाव बतलाया है वही यहाँ अपेक्षित है । जैसा कि वहाँ जाकर स्पष्ट हो जाएगा । बीवामृतभाग परामृत के साथ युक्त हो जाता है, परन्तु हृदयन्थि है-इसलिए देवासीत्य नहीं है । इसी पहली स्थिति का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं
“ यदा सर्व प्रमुच्यन्ते कामा येस्य हृवि भिताः ।
पथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्य समश्नुते " ॥ १४ ॥
सति ब्रह्म की प्राप्ति बताई है । वैतालीतता नहीं बतलाई है । ४५२ I
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् परन्तु जब भूमोदकंमूलक निष्कामयोग द्वारा कामनाओंों के साथ- साथ ही सारी ग्रन्थिएँ टूट जाती हैं तो द्वैत विनिर्मुक्तिलक्षणा परामुक्ति हो जाती है । निष्काम द्वारा यदि पदार्थों से वैराग्य होता है तो क्षणोदकं होता है । वही निष्कामबुद्धि ' आत्मौपम्येन सर्वत्र ० ' - के अनुसार यदि खात्मदृष्टिप्रधान बन जाती है - दूसरे शब्दों में यह योगी सभी को आत्मबुद्धधा देखने लगता है तो मूमोदर्क होता है । ' यत्र वा अस्य सर्गमात्मंया सूत् ' ' यह श्रुतिवचन द्वैतातीतलक्षण परामुक्तिरूप भूमोदर्क का ही निरूपण करता है । इसी दूसरे भाव का प्रतिपादन करते हुए ऋषि कहते हैं--" या सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । मर्योऽमृतो भवत्येतावद्ध ] धनुशासनम् ” ॥ १५ ॥
ऋषि कहते हैं कि यह हमारा भन्तिम अनुशासन है । प्रात्मप्राप्ति का सरल एवं अन्तिम उपाय केवल यही निष्कामयोग है । जो इसका भी मनुसरण नहीं करता - उसका उद्धार कठिन ही नहीं- अपि सु, प्रसम्भव है । रहते हैं । इन्द्रियधारणालक्षण बनाशकयोग सबसे कठिन है । सत्तारष्टियोग अवधानसाध्य है । निष्कामयोग प्रति सरल है । तीनों का फल समान है । जो तोनों से ही दूर हैं- दंद्रम्यमाण मे मूढ सदा इसी मृत्युचक में फंसे ॥ इति क्षोणोदकं सूमोवर्कमेवात् क्रमिकपरामुकिवं विध्य निरूपणम् ॥ ॥ १४ ॥
-----१५ - अथ नाडीमेवेन गतिमेदाद् विदेहात्मनः सखोमुक्तिलक्षणपरामुक्ति समर्पक-नाडी निरुक्तिः-मान लीजिए एक योगी ने निष्कामयोग द्वारा विदेहभाव प्राप्त कर लिया है । ऐसा विदेहमुक्त भ्रात्मा शरीरत्यागानन्तर शरीर के किस भाग से निकलकर कहाँ जाएगा? दूसरे शब्दों में पूर्व में जिन प्रात्मज्ञानियों का निरूपण किया है उनका बात्मा किधर से कहाँ जाएगा? यह पूर्वपक्ष बच जाता है । इसका समाधान करता हुआ निम्नलिखित मन्त्र हमारे सामने बाता है-१- बृहदा ० उप ० २।४।१४ । [ ४५३ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत्
" शतं चंका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ” ॥१६ ॥
हृदयप्रदेश में से एक सौ एक नाडियाँ निकलती हैं । इसी प्रकार एक सौ एक नाड़ियाँ हृदय से नीचे मी जाती हैं । ऊपर जाने वाली नाड़ियों का देवयानगति से सम्बन्ध है । नीचे भाने वाली नाड़ियों का पितृपाण गति से सम्बन्ध है । एक नाड़ी हृदय से सीधी ऊपर ब्रह्मरन्ध तक गई है इसे ही ' सुषुम्णा ' कहते हैं - यही ' बह्यनाड़ी ' नाम से प्रसिद्ध है । १०१ में यह सबमें मुख्य है- शेष गौण हैं । यही व्यवस्था नीचे है | एक नाडी हृदय से मूलद्वार तक गई है, शेष सो इधर - उधर व्याप्त हैं । इस प्रकार चार प्रकार का नाड़ी विभाग हो जाता है । ये नाड़ी - विभाग पितृपथ - यमपथ - देव पथ ब्रह्मपथ - इन चार भागों से सम्बन्ध रखते हैं । जिसका आत्मा मूलद्वारगत नाड़ी से उत्क्रान्त होता है - वह सीधा यममागं ( निमार्ग में जाता हुमा मसुर्य्यलोक में जाता है । ऐसों के लिए यमराज ने - ' पुन: पुनर्णशमापद्यते में ' - यह कहा है एवं हृदयादषः प्रदेश में व्याप्त इधर - उधर की नाड़ियों में से निकलने वाले का आत्मा पितृपथ में जाकर पितृस्वगं में चला जाता है । अब ऊपर चलिए । जो सोघी नाड़ी से ( जिसे कि प्रश्नोपनिषत् ने तेजोनाड़ी - उदान नाड़ी कहा हे ) जाता है - वह ब्रह्मपण में जाकर मुक्त हो जाता है । इसी के लिए- ' म स पुनरागतेन स पुनरागते ' - यह कहा जाता है । जो इधर - उधर की नाड़ियों में होकर जाता है - वह देवपथ द्वारा देव-स्वर्ग में जाता है । इस नाड़ी - निर्गति की व्यवस्था कम्मं पर निर्भर है । अशास्त्रीय प्रतिषिद्धकर्म्म करने वाले का आत्मा पार्थिव भूतसंस्कारों से प्राक्रान्त रहता है, मतः ऐसा विकम्र्मी प्रकम्र्मी मूलनाड़ी से ही जाता है । विद्यानिरपेक्ष इष्टापूर्त्तदत करने वाला इधर - उधर से निकलता हैं एवं विद्यासाक्षेपप्रवृति-सत्कम्मं करने वाला हृदय से ऊपर की इधर - उधर की नाड़ियों में से निकलता है । परन्तु जो विद्या-सापेक्ष निष्कामकर्म्म करता है - वह उसी ऊध्यंनाड़ी से जाता हुआ सूर्य्यभेदी बनकर सद्यः मुक्त हो जाता है | यहाँ केवल मात्मज्ञानियों को नाड़ी की ही जिज्ञासा थो, मतः ऋषि ने केवल उसी का निरूपण किया है । ' प्रश्नोपनिषत् ' में इन नाड़ियों का हम विशद विवेचन करने वाले हैं, घतः इस प्रकरण को यहीं समाप्त करते हैं । ॥ इति नाडीमेदेन गतिमेदाद् विदेहात्मनः सद्योमुक्तिलक्षणपरामुक्ति-समर्पक नाडी निरुक्तिः ॥ ॥ १५ ॥
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया गल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् १६- श्रथ प्रमितज्योतिषः प्रतिविम्बस्य जलापाये परज्योतिरपोतियत् कामप्रन्थ्यपाये चिदाभासस्य परचिदात्माप्ययसिद्धिः-" अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रहेन्मुजादिवेषीषां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥
अर्थात् -- अन्तरात्मा सबके हृदय में सदा अंगुष्ठमात्र पुरुषरूप में संनिविष्ट है । हम अपने शरीर से उसको ( अंगुष्ठमात्र पुरुष को ) धेय्यंपूर्वक मुञ्ज से इषीका ( सींक ) की तरह प्रवृद्ध करें, अर्थात् अपने शरीर से पृथक् अनुभव करें । उसको ( धन्तरात्मा को ) शुक्र - प्रमृत जानना चाहिए, उसे शुक्र मोर अमृतरूप जानें ॥ १७।३ " मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधि व कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विवध्यात्ममेव " || १६ || ' पर्षात् - इसके बाद नचिकेता मृत्यु ( यमराज ) के द्वारा कहीं हुई विद्या ( अमृताग्निविद्या ) और सम्पूर्ण योग fer को प्राप्तकर ब्रह्म - विरज और विमृत्युमाव ( अमृतभाव ) को प्राप्त हो गया । अग्य मी जो कोई इस विद्या को ( उसी प्रकार ) जानेगा मौर योगविषि का साधन करेगा, वह भी वैसे ही विरज होकर ब्रह्म एवं अमृतत्व को प्राप्त हो जाएगा ॥१८ ॥
॥ इति द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली ॥ ॥ इति कर्मनिरूपणोपनिषत् ॥ “ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेज-स्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॥ इति कठोपनिषद्विज्ञानभाष्यम् ॥ १ - इन १७ वें एवं १८ वे मन्त्र का स्व ० शास्त्रीजी कृत विज्ञान भाष्य उपलब्ध नहीं हो पाया है, अतएव धन मन्त्रों को हिन्दी अनुवाद के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है । ( सं ० ) २ - इस उपनिषत् में मोक्तात्मा द्वारा अक्षरप्राप्ति का उपदेश हैं, प्रतएव ' सह नौ भुनक्तु ' - इत्यादिरूप से शान्ति की गई है । उपक्रमोपसंहार में शान्तिपाठ क्यों किया जाता है? इसका उत्तर भागे के ' प्रश्नोपनिषत् ' में दिया जाएगा । ( लेखक ) { ४५५ ]
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राजस्थान पत्रिका प्रकाशन जयपुर