कठोपनिषद — पृष्ठ 471–480
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् अव्यय ' आत्मा ' है । आत्मा देवता भूत ' - तीनों के साथ क्रमशः ज्ञान - क्रिया अर्थ- इन तीन भावों का सम्बन्ध है । आत्मा की ब्याप्ति तीनों पर है, अतएव मात्मा का ' स वा ए मात्मा वाङ्मयः प्रामयो मनोमय: ' - यह लक्षण किया जाता है । मनोमयाव्यय ज्ञानमय होने से मकुर्वाण है । वाङ्मय क्षरभाग अर्थमय होने से प्रकुर्वाण किन्तु विकुर्वाण है एवं मध्यपतित प्राणमय अक्षर क्रियामय होने से कुर्वाण है, अतएव यही सृष्टिकर्ता है । जैसा कि मुण्डक के - ' तथाक्षराद्विविधा: सोम्य भावाः प्रजायन्ते ' - इस मन्त्र के अर्थ से स्पष्ट हो जाएगा । अक्षर सृष्टिकर्त्ता है । भव्यय साक्षी है । क्षर उपादान है । अव्यय शुद्धज्ञान है । क्षर शुद्धकम्मं है । प्रक्षर ज्ञानक्रियामय है । जब तक अक्षररूप क्रिया कार्य में प्रवृत्त नहीं होती तब तक उसका नाम बल है । अकुवंरूपावस्थापन बल ' बल ' है । कुवंरूपावस्थापन बल प्राण है । रस से निकलता हुआ बल किया है । बल - प्राण - क्रिया एक ही बल की तीन अवस्थाएँ हो जाती हैं । प्राण व्यापार होते ही क्रिया हो पड़ती है, अतः प्राण का क्रिया में जन्त-र्भाव मान लिया जाता है । ऐसी अवस्था में ' मूलरूप बल, तूलरूपा क्रिया ' कम्मं को ये दो अवस्थाएं ही शेष रह जाती हैं । तीसरा ज्ञान है । बस, ज्ञान - बल - क्रियामय अव्ययपुरुष की परा प्रकृति दार्शनिकों के मतानुसार ' बिच्छक्ति ' ही सारे संसार की अधिष्ठात्री है । पुरुष निर्लेप है । ज्ञान - बल - क्रियामयी प्रकृति ही कर्त्री है | इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । पराऽस्य शक्तिविविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलकिया ज " ॥ " यह है - प्रव्ययाक्षरात्मक्षरप्रजापति का स्वरूप । इसी से प्रधिभूत उत्पक्ष होता है । इसी का प्रंश अध्यात्म है | अध्यात्म में मी श्रव्यय - प्रक्षर - क्षर हैं । अधिदेवत में भी हैं । प्रधिभूत में भी तीनों हैं । इसी माघार पर - ' बेवेह तयमुत्र यवमुत्र तन्विह ' - यह निगम चलता है । ईश्वररूप प्रषिदेवत में अव्यय · उल्बण है । अधिभूत में क्षर उल्बण है । अध्यात्म में अक्षर उल्बण है । जैसा कि --१- यो लोकत्रयमाविश्य विमस्यंव्यय ईश्वरः २ - जीमूतां महाबाहो ययेवं धार्यते जगत् ३- अरः सर्वाणि भूतानि -- अषिदेवत - अध्यास्प - अधिभूत +' सर्वम् ' - ये तीनों वाक्य हमारे कथन की ही पुष्टि करते हैं । प्रधिभूत भूतप्रधान है । मध्यात्म प्राण-प्रधान है - देवप्रधान है । अधिदेवत मनःप्रधान है - मात्मप्रधान है । श्रधिभूत का प्रकृत में सम्बन्ध नहीं है, अत: उसे छोड़ते हैं । केवल मध्यात्म की मोर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । यद्यपि प्रव्यात्म १- श्वेताश्वतरोप ० ६।८ । { ४४१ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य I कर्मनिरूपणोपनिषत् को हमने प्रक्षरमय बतलाया है, तथापि इसमें क्षर और अध्यय की भी सत्ता समझनी चाहिए । जो प्रविद्यादिशून्य होते हैं - उनका अक्षर बव्ययानुगृहीत होकर तन्मय बन जाता है । ऐसे ही जोवों के लिए- ' क्लेशकर्म विपाकाशयंरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर: ' - यह कहा जाता है । ये ही सनातनधम्मं के मूलस्तम्भ ' अवतार ' है । स्वभावतः जीव मविद्याग्रस्त रहते हैं । इनका भक्षर क्षरानुगृहीत होकर तत्प्रधान बन जाता है । उपनिषत् का एकमात्र कत्र्तव्य है - अक्षर को ( जीव को ) क्षर से हटाकर अब्यय पर पहुँचा देना । उसमें प्रव्यय - अक्षर - क्षररूप ' आत्मा- देव भूत ' तीन हैं । यहां भी तीन हैं । अध्यात्म का भूतांश कम है । देवांश ज्ञानकम्मंमय है । बात्मांश ज्ञानमय है । बस, इसका उससे तीन ही प्रकार से योग हो सकता है । क्षरभाग से क्षर के साथ योग करना -कम्मकाण्ड है । इसका फल अधिभौतिक स्वर्गप्राप्ति है । इसी के आधार पर मीमांसादर्शन का मूलभूत निम्नलिखित सूत्र प्रतिष्ठित है-" आम्नायस्य क्रियार्थत्वावानर्थक्यमतदर्थानाम् । तस्मादनित्यमुष्यते " | " अक्षरभाग का उसके अक्षर से योग करना - उपासनाकाण्ड है । इसका फल सालोक्य सामीप्य-सारूप्य - सायुज्य मेदभिन्न अपरा - मुक्ति है । इसमें जीवाक्षर अध्ययमय नहीं बनता - उसके पास जाकर उससे युक्त हो जाता है । युक्त होना अपरा - मुक्ति की पराकाष्ठा है । भगवान् शंकराचार्य को छोडकर शेष सारे दार्शनिक इसी मुक्ति को प्रधान मानते हैं । इसी के आधार पर भगवान् शाण्डिल्य का उपासना-मूलक- ' सा परानुरक्तिरोश्वरे'- यह सूत्र प्रतिष्ठित है एवं अव्ययरूप आत्मा का उस अव्ययरूप आत्मा के साथ योग करना ज्ञानकाण्ड है । इसका फल क्षीणोदर्क- भूमोदकं मेदभिन्ना परा - मुक्ति है । शंकरदर्शन में इसकी प्रधानता है । सुप्रसिद्ध ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' - यह व्याससूत्र इसी सिद्धान्त पर प्रतिष्ठित है । तीन मार्ग हैं । तीनों का फल भिन्न - भिन्न है । कम्र्मकाण्ड का भूतप्रपञ्च से सम्बन्ध है । उपासना-काण्ड का देवप्रपञ्च से सम्बन्ध है एवं ज्ञानकाण्ड का आत्मप्रपञ्च से सम्बन्ध है । कम्मकाण्ड में निष्णात कम्मंठ मनुष्य जीवनकाल में संसार का वैभव भोगता हुमा अन्त में यशजनित अतिशय रूप देवात्मा के माकर्षण से आकर्षित होकर सूर्य्यं से नीचे के १७ वें अहर्गण में ( जो कि १७ व बहगंज-नाचिकेतस्वर्ग नाम से प्रसिद्ध है ) प्रतिष्ठित होकर नियतकाल तक वहाँ का सुख भोगता है । धनन्तर -'ओर पुण्ये मत्र्त्यलोके वसन्ति ' - इस सिद्धान्त के अनुसार पुनः जन्ममरण के चक्र में फँस जाता है, प्रतएव यज्ञसत्य का निरूपण करते हुए ' मुण्डकोपनिषत् ' में इस अवरकम्मं के लिए- ' प्लथा हवेते धडा पज्ञरूषा: ' - इत्यादिरूप से निन्दा की है । उपासक जीवनकाल में शरीर को चित्रवत् समझता हुआ - पितृलोक - गन्धर्वलोक - ब्रह्मलोक में जाकर तत्तच्छरीर धारणकर उन्हें स्वाप्नशरीर, पानी में प्रतिबिम्बितशरीर एवं छायामयशरीर समझता हुआ सूर्य्यभेदी बनकर घक्षर में लीन हो जाता है - शुद्ध हो जाता है । वह वापस नहीं लोटता -मपि तु यथाकाम यथाचार बन जाता है । कम्मंकाण्ड में कम्मं का निरूपण है । उपनिषत् मुक्ति से १ - पातञ्जलयोगसूत्र १।२३ । २- पूर्वमीमांसा ११२।१।१ । [ ४४२ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् सम्बन्ध रखता है, प्रतएव इसमें अपरा - मुक्तिलक्षण उपासनाकाण्ड एवं परा - मुक्तिलक्षण ज्ञानकाण्ड को प्रधानता दी जाती है । बस, पूर्व में पूर्व प्रदर्शितक्रम से इन्हीं दोनों का स्वरूप बतलाया गया है । ज्ञानयोगी जीवितदशा में शरीर का एकान्ततः अभिमान छोडकर भन्त में उसमें ( अव्यय में ) जीन हो जाता । मान लीजिए - एक मनुष्य ने ज्ञान द्वारा जीवितदशा में ही उस अव्यय को प्राप्त कर लिया है । तो जैसे प्रक्षर प्राप्त करने वाला उपासक शरीर के साथ - ' पथादर्श तथात्मनि ० ' - इत्यादि प्रकार का सम्बन्ध समझता है - वैसे यह ज्ञानी अपने शरीर के साथ पांचों सत्यात्मानों के साथ कंसा सम्बन्ध समझता है? उपासना में तो सत्यात्मा अक्षररूप होने से उपासक के स्वरूप में ही प्रविष्ट हो जाते हैं, अतः वहाँ तो केवल शरीर का सम्बन्ध ही विजिज्ञास्य रहता है । परन्तु ज्ञान में तो पांचों का परि-त्याग है, भत यहाँ इनका कैसा सम्बन्ध रहता है? - यह जानने की प्राकांक्षा होती है । आगे का प्रकरण इसी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए हमारे सामने आता है-आज दिन सारा संसार भगवान् जैमिनि का शिष्य है । ' आम्नायस्य क्रियार्थत्वात् ० ' - के अनुसार नाज कम्में ही ( भौतिकसम्पतिसंचयरूप कम्मं ही ) सबका पुरुषार्थ बन रहा है । ज्ञान भी मानते हैं, परन्तु क्रत्वर्थं समझते हैं । ज्ञान को कम्मं का नौकर समझते हैं । परन्तु अध्यात्मविद्या का परमगुरु भारतवर्षं ठीक इससे उलटा मानता है । वह भूतजगत् के उपासकों की तरह ब्रह्म को शरीर कम्मं को मात्मा नहीं मानता । अपि तु संसारी मनुष्यों की दृष्टि में ' ससार की सभ्यता ' - रूप कम्मं के ठीक विरुद्ध कम्मं को शरीर समझता है । ज्ञानरूप ब्रह्म को आत्मा समझता है । इसकी दृष्टि में कम्पं साधन है । ज्ञान साध्य है । यह है भारतीयता - भारतीय सभ्यता । सभ्यताभिमानियों की दृष्टि में ज्ञान साधक है । कम्मं साम्य है । यह है - संसारता - संसारसभ्यता | ज्ञान - क्रिया- अर्थरूप जिम आत्मभावों का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है उनकी प्रकारान्तर से निम्नलिखित चार संस्थाएं हो जाती हैं-१ कम्मर्थं ब्रह्म = कम्र्मसाध्य, ज्ञानसाधन = स्वर्गसुखसाधक कम्र्म्मयोग २- ब्रह्मार्थ कम्मं == ज्ञानसाध्य, कम्र्मसाधन = प्रपरा - मुक्तिसाधक उपासनायोग ३ - कम्र्मार्थ कम्मं कर्मसाध्य, कम्मंसाधन = सांसारिक सुख साधक कम्मंयोग ४ - ब्रह्मार्थं ब्रह्म —ज्ञानसाध्य, ज्ञानसाधन - परा- मुक्तिसाधक ज्ञानयोग ज्ञानार्थो योग: - ज्ञानयोगः कर्मयोगः स्वर्गकम्मर्थो योगः उभयार्थी योगः उपासनायोगः - भक्तियोगः प्रवृत्तिमूलक उपासना मी कर्म्मयोग के ही अन्तर्भूत है एव निवृत्तिमूलक कर्म्म योग भी ' काम्यानां करणां न्यासं संन्यासं कवयो विदु: ' - इस सिद्धान्त के अनुसार ज्ञानयोग है । इसी को गीता में भगवान् ने ' बुद्धियोग ' कहा है । यही निष्काम कर्मयोग प्रतएव ज्ञानयोगापरपयपिक बुद्धियोग परामुक्ति का १४४३ J
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् साधक है | भक्तियोग नाम से प्रसिद्ध इस बुद्धियोग के निम्नलिखित चार भेद हैं- १ - मन्त्रयोग, २-हठयोग, ३ - राजयोग, ४ - लययोग ( अमनस्कयोग ) - इन चारों में से जिन योगक्रियाओं का इस उपनिषद् में अनेक स्थानों पर निरूपण भाया है उसका तीसरे ' राजयोग ' से सम्बन्ध है । यह चारों में श्रेष्ठ है, श्रतएव इसे ' राजयोग ' ( योगानां राखा ) कहा जाता है । यह राजयोग सविकल्पक - निर्विकल्पक भेद से दो प्रकार का है । सविकल्पक समाधिरूप राजयोग ही गीता का बुद्धियोगं है एवं निर्विकल्पक योग शुद्ध ज्ञानयोग है । इस प्रकार १ - मन्त्र, २- हठ, ३ - लय, ४ - सविकल्पक राजयोग, ५ - निर्विकल्पक राजयोग भेद से भक्तियोग ५ प्रकार का हो जाता । इनमें अन्त के दोनों राजयोग ही यहाँ साध्य-साघनरूप से विवक्षित हैं । सविकल्पक योग साध्यावस्था है । इसमें आनन्द का अनुभव होता है । इसी अलौकिक आनन्द के लिए - " सुखमात्यन्तिकं यसद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् " - यह कहा जाता है । इसमें ज्ञान - क्रिया दोनों हैं, अतएव अनुभव | निर्विकल्पक योग शुद्ध ज्ञानयोग है । यह सिद्धावस्था है । इस पर पहुंचा हुआ योगी ' युक्त ' कहलाता है । सविकल्पक समाधि में प्रतिष्ठित योगी - ' युञ्जान ' कहलाता है । नित्तकम्मं यज्ञ - तप - दान भेदेन त्रिषा विभक्त है । इसमें योग शब्द का प्रधानरूप से ' तप ' के साथ सम्बन्ध | ' मनसपचेन्द्रियाणां काग्र्यं परमं तपः - के अनुसार मन इन्द्रिय का धारणा - ध्यान - समाषि द्वारा संयम करना ही सविकल्पक योग । निवृत्ति से आहारपरित्याग अपेक्षित है । प्रवृत्ति से माहार-ग्रहण अपेक्षित है । माहार से वासना होती है । इससे परिग्रह बढता है । बनाहार ( विषयमात्र का परित्याग ) से धीरे - धीरे परिग्रहत्याग होता है । अन्त में केवल विशुद्ध बात्मा बच जाता है । इसी
अनशन योग के लिए-" विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवजं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते " ॥
२ - यह कहा जाता है । अक्षरविशिष्ट व्यय को जानने का उपाय निवृत्तिकम्मरूप यज्ञ तप-दानात्मक बुद्धियोग ही है । इसी प्रभिप्राय से ----" तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन " - ( विद्यासमुच्चितयज्ञतपदानेन अनाशकेन ( नियतकर्मणा ) बुद्धियोगेन तं विद्यामयं ज्ञातुमिच्छन्ति ) " ॥ - यह कहा जाता है । इसी को हमने क्षीणोदर्क कहा है । इसमें धीरे - धीरे सारे परिग्रह का त्याग हो जाता है । निष्केवल्य श्रात्मा बच जाता है । परा मुक्तिनिरूपक पूर्वप्रकरण में विद्या से ( ज्ञान १- गीता ६।२१ । ३- बृहदा ० उप ० ४।४।२२ । २ - गीता २।५६ । [ ४४४ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् से ) मुक्ति बतलाई है । विद्या से ही मुक्ति होती है सच है परन्तु विद्योदय कैसे हो? बस, इसी के समाधान के लिए क्षीणोदकंसाधक सविकल्पक राजयोग का निरूपण किया जाता है । यह बुद्धियोग विद्योदय का कारण है, प्रतएव हम इसे ज्ञानयोग कहने के लिए तय्यार हैं । यज्ञ - तप - दान- मनाशका-चार ( कायक्लेश ) रूप बुद्धियोग वास्तव में ज्ञानयोग है । इन चारों योगों में से यहाँ तपोयोग ही अभिप्रेत है । जैसा कि पूर्व के - ' हवा मनीषी मनसा ० ' - इत्यादि से स्पष्ट हो जाता है । तप से होता क्या है? - इसका एकमात्र उत्तर है - सस्वशुद्धि । सत्यशुद्धि से विद्योदय होता है । विद्योदय से अमृत-प्राप्ति द्वारा परा - मुक्ति होती है । सत्त्वशुद्धिप्रयोजक इस तपोयोग के १ - इन्द्रियधारणा योग, २ - सत्ता-दृष्टियोग, ३ – निष्कामता योग - भेद से तीन प्रकार हैं । धागे के प्रकरण में क्रमशः इन्हीं तीनों योगों का उपदेश है । १० वी - ११ व मन्त्र इन्द्रियधारणायोग का निरूपण करते हैं । १२ वा- १३ व मन्त्र सत्ताष्टि-योग का निरूपण करते हैं एवं १४ वीं - १५ व मन्त्र निष्कामतासम्पादक योग का निरूपण करते हैं— १- यदा पञ्चादतिष्ठन्ते ० - १० मन्त्र २- ' तां योगमिति मन्यन्ते ० - ११ वां मन्त्र + ' इन्द्रियधारणायोग- १ १- ' मेव वाचा न मनसा ० - १२ मन्त्र २ - ' अस्तीत्येवोपलब्ध ० - १३ मन्त्र + ' ससारष्टियोग ' -२ १- या सर्व प्रमुच्यन्ते ० ' १४ मन्त्र ' निष्कामतायोग ' कडू २- सर्व प्रभिन्ते ० ' १५ मन्त्र ।': भस्तपोयोगः- - मुक्ति - परा विद्योदयस्ततः ततो सस्यशुद्धिप्रयोस्त्रिदि ' यह तो हुई- सामान्यव्यवस्था । अब पूर्व के शीर्षक से सम्बन्ध रखने वाली विशेषव्यवस्था की ओर प्रापका ध्यान प्राकर्षित करते हैं । हम बतला आए हैं कि ज्ञानयोग द्वारा जिसे पात्मज्ञान हो जाता है - जो अमृतत्व प्राप्त कर लेता है - दूसरे शब्दों में सविकल्पक ज्ञानयोग द्वारा विशुद्धसत्व बनकर सिद्धावस्थारूप निर्विकल्पसमाधि में प्रतिष्ठित हो जाता है - उसके चाहे ( जीवितदशा में ) श्रव्यक्तादि पांचों सत्यप्राण भने ही रहें तथापि उस समाधि के प्रभाव से निष्कैवल्यानन्य का इस जीवितदशा में ही साक्षात्कार हो जाता है । अपरा - मुक्ति वाला शरीर से आदर्शादिवत् सम्बन्ध रखता है । परन्तु पर -1 मुक्ति में शरीर की कौन कहे शरीराधिष्ठाता पांचों का भी इस पर असर नहीं होता । प्रारब्धकम्मरूप शरीरनाशानन्तर परा - मुक्ति को प्राप्त करता हुआ तो इन पाँचों से विमुक्त होता -हुला - निष्कैवल्य में लीन होगा हो, परन्तु शरीरसत्ता से पाँचों के रहने पर भी उस परा - मुक्तिसदृशदशा में कोई बाधा नहीं होती । निष्कर्ष यही हुमा कि सर्वव्यापक अमृतात्मा ( ईश्वरात्मा ) सर्वत्र रहता हुआ भी-‘ मूतमृन्न च भूतस्यो ममात्मा भूतभावनः ' के अनुसार निर्लेप रहता है- एवमेव विद्यमान शरीरप्राण [ ४४५ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषहिज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् पञ्चक में रहता हुआ भी योगी निर्विकल्पक समाधिदशा में उसी अमृतरूप को प्राप्त करने के कारण निर्दोष रहता है । इसी सारे रहस्य को लक्ष्य में रखकर महर्षि कठ कहते हैं--" यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । वृद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ( परा - मुक्तिम् ) " ॥१० ॥
शब्द - स्पर्श - रूप - रस - गन्ध - ये पाँच विषय हैं । इन विषयों के कारण मन में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है । इन्द्रियों के साथ विषयरूप पांचों भूतमात्राओं का अविनाभाव है । इन्हीं विषयों के कारण बहिर्मुख बन रही हैं । बहिरंग मत्यै श्रतएव आत्मविरोधी विषयों से युक्त होकर इन्द्रियाश्व दुष्ट ( दोषाक्रान्त ) हो जाते हैं । इन्द्रियों का उवथ मन हैं । इन्द्रिएँ जिन विषयों से संसृष्ट होती हैं-इन्द्रियों द्वारा वह मलिनसंस्कार मन पर माता है - इससे मन भी दुष्ट हो जाता है । विज्ञान प्रज्ञानें-मन से संपरिष्वक्त रहता है, अतएव प्रज्ञान के मलिन होने से विज्ञान भी मलिन हो जाता है । विज्ञान महान् से अविनाभूत है, मतः वह भी मलिन हो जाता है - उसके मलिन होने से तत्प्रतिष्ठित चिदंश भी मलिन हो जाता है । इस प्रकार इन्द्रियों की कृपा से सारा प्रपञ्च दोषाक्रान्त हो जाता है । इस मलिनताका सम्बन्धी क्षोभ का एकमात्र मूलकारण विषय ( शब्दादिभूतमात्राएँ ) हैं । इन्द्रिएं इनके प्रविष्ट होने का प्रधानद्वार है, अतः सबसे पहले इनका रोकना आवश्यक है । खाना - पीना छोडना रोकना नहीं है - अपि तु जितना साविक अल्पाहार जीवनोपयोगी है - उससे अतिरिक्त इन्द्रिय कामनावर्द्धक सुस्वादु पदार्थों का छोडना ही विषयों का रोकमा है । ' यशार्थात् कर्म्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म्मबन्धनः- का भी यही अर्थ है । इस वासनामूला विषया-सक्ति के परित्याग से ऐन्द्रियज्ञान शान्त हो जाता है । इसी ने मन को चञ्चल बना रखा था । इनके स्थिर होते ही उक्थरूप मन भी स्थिर हो जाता है । मन के शान्त होते हो बुद्धि का क्षोभ जाता रहता है । उसी समय स्थिर श्रतएव सबल विज्ञानात्मा से सस्वशुद्धि हो जाती है । उसी समय शान्त-स्थिर पात्र में चिद्घन महदक्षर का पूर्ण विकास हो जाता है - यही परमगति है । इसी का नाम निकंबल्य है । पाँचों ज्ञानों को ( ऐन्द्रिय ज्ञानों को ) अनाशक भावमय तप के द्वारा मन में स्थिर करो । जब मन के साथ युक्त होकर पांचों ज्ञान स्थिर हो जाते हैं तो बुद्धि का चाञ्चस्य जाता रहता है । गीता के शब्दों में अनेकरूपमच प्रव्यवसाय जाता रहता है । व्यवसायरूप स्थिरत्व एवं एकत्व आ जाता है । इस परागतिलक्षणयोग को किस नाम से व्यवहृत किया जाता इसका समाधान करते हुए ऋषि कहते हैं ---एवं इसका फल क्या है?
" तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
श्रप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययो ” ॥११ ॥
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाज्य कर्मनिरूपणोपनिषत् इन्द्रियों का निरोध करने तो लगे, परन्तु स तु दीर्घकास्न सत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः " -इत्यादि नियम के यथावत् पालन न करने से योग भंग हो गया । प्रतिशा की थी- अब कभी मीठा न खाऊँगा । परन्तु किसी दिन बितल गई और मीठा खा लिया । यह अस्थिर योगधारणा है । ऐसी मनुष्य ' मोष्ट ' कहलाता है । ऐसी स्थिर इन्द्रियधारणालक्षणा योगप्रक्रिया को योगविद योग नहीं मानते । अर्थात् ऐसा योग इस मोक्कात्मा का उस प्रन्ययात्मा के साथ योग कराने में असमर्थं है । इन्द्रियधारणालक्षण स्थिर योग हो योग ( अमृतात्मा के साथ होने वाले योग का कारण ) हैं । ऐसे योग में ममत के साथ योग है । जिस योग ने उसके साथ योग न कराया वह कैसा योग? वह तो भोग का पय है । योगक्रिया तो ' तात्स्थ्यातान्यन्यम् ' - न्याय के अनुसार उसके साथ योग कराने में साधनभूत होने से ' योग ' नाम से व्यवहृत होती है । अस्थिरभाव में योग नहीं, अतः तत्साधनरूपता से व्यर्थ होता हुआ यह योग भी योग नहीं । ऊपर अव्ययानुगृहीत प्रक्षरपुरुष है । भोकात्मा का यही निशाना है-लक्ष्य है | निशाना मारने वाला यदि गाफिल रहता है तो वह निशाना नहीं मार सकता । वही तीरंदाज निशाने पर तीर चला सकता है - जो बडा सावधान है । लक्ष्य पर न जाकर किसी और पर इष्टि है - इस स् का नाम प्रमाद है । विषयसम्बन्ध से मन चाल है । जिसका हाथ घूजता हो - यह क्या लक्ष्य भेद करेगा? मन भोकात्मा का हाथ है । यही वहाँ लक्ष्य लगायेगा | यह चन्चल हो रहा है-यही प्रभाव है । पूर्वोक्त इन्द्रियधारणालक्षणा स्थिरयोगप्रक्रिया से वह चाबल्य दूर हो जाता है । मन
प्रम हो जाता है । बस-" धनुर्गृहीत्वोपनिषवं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं संबधीत ।
प्रायम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि " ॥
“ श्रप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवसन्मयो भवेत् " ॥ " - इस श्रुति के अनुसार अवश्य ही लक्ष्यवेध हो जाता है - जैसा कि ' मुण्डकोपनिषत् ' में भली-aff स्पष्ट हो जाएगा । अमृतात्मप्राप्ति के साघनभूत इस अमृतयोग को वैज्ञानिक लोग प्रभवाप्यय-रूप समझते हैं । योग से मृतात्मा अभिप्रेत है । अमृतात्मा- ' यान पृथग्भावम् इत्यादि के अनुसार उपयास्तरूप है- सारे प्रपच का प्रभव प्रतिष्ठा परायण है । उसमें सबका लय हो जाता है । इस प्रभवाप्ययरूप अमृत के साथ योग करा देने वाला यह तपोरूप योग भी प्रप्यय का कारण बनकर उसी पूर्वोक्त ' तात्म्यासाच्छाम् ' - इत्यादि न्याय से प्रभवाप्यय कहला सकता है । स्थिर इन्द्रियधारणा-योग करो । इससे सत्वशुद्धि होगी । सत्त्वशुद्धि से घप्रमाद होगा । इससे प्रभवाप्ययरूप योगसम्पत्ति-प्राप्ति होगी । इस योग के प्रभवाप्ययरूप धमृतात्मा के साथ युक्त होकर आप भी सर्वाधार बनते हुए सबके प्रभाव प्रतिष्ठा -परायण बन जाओगे । तीनों योगों में से पहले योग का यही संक्षिप्त निरूपण है । १- पात खलयोगसूत्र १।१४ । मुण्डकोप ० २२३३४ । [ ४४७ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् इति योगिना निर्विकल्प कसमाधिदशायां प्रारणावित्यात्मसत्वेऽपि परमुक्तिदशावद मृतात्म केवल्यानन्द साक्षात्कारः ॥ ॥ १२ ॥
१३- अथ परमुक्तौ - अमृतात्मकैवल्यस्य सत्तात्मकज्ञानमयानन्दरूपत्वम्-अहर्निश सांसारिक विषयों में फँसे रहने वाले विषयलोलुप जीवों को इन्द्रियधारणालक्षण योग का उपदेश देना, रसवर्ज - श्रनाशक ( कायक्लेश ) असे दुस्तरमार्ग के ऊपर चलने के लिए प्रेरित करना उसी प्रकार निरर्थक हैं- जैसे शीत में बैठे हुए बन्दर को कबूतर की शिक्षा देना । ऐसी शिक्षाओं का उन पर उलटा बुरा असर होता है । वे सोचने लगते हैं कि अनाशकयोग तो अपने से बन नहीं सकता । ऐसी भवस्था में आत्मप्राप्ति असम्भव है । चलो पतन तो सभी तरह से है । फिर सांसारिक सुख भी क्यों खोजें यह सोचकर वे मूवी और भी गहरी अविद्या में निमग्न हो जाते हैं । वास्तव में बात यथार्थ है । पूर्व में जिस योग का निरूपण किया गया है - वह असम्भव नहीं तो कठिनतम तो अवश्य ही है, अतएव हमारे जैसे सांसारिक मनुष्य उस मार्ग पर नहीं चल सकते । बस, हमारे जैसे साधारण afterf रयों के लिए ' सत्तावृष्टियोग ' - नाम से प्रसिद्ध एक अतिसरल उपाय बतलाते हुए ऋषि
कहते हैं-" नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतो s न्यत्र कथं तनुपलभ्यते " ॥१२ ॥
' वं सर्णम् ' - श्रुति कहती है कि सारा विश्व ब्रह्म है । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' - श्रुति कहती है कि सर्वव्यापक वह ब्रह्म सत्य है - ज्ञान हे अनन्त है । सत्य सत्ता का वाचक है । ज्ञान चित् है । आनन्द बनत है । सत्य - ज्ञान- अनन्त कहो या सचिवानन्द कहो एक ही बात है । सच्चिदानन्द हो ब्रह्म हैं । इस ब्रह्म से उत्पन्न होने वाला विश्व मी सच्चिदानन्द ही है । सत्ता - चेतना - श्रानन्द कहने को वीन मान हैं । वस्तुतः तीनों एकतस्व है । तीनों अभिन्न हैं । सत्ता क्या वस्तु है? इसका उत्तर है - मन-प्राणवाक्समष्टि । चित् क्या है? इसका उत्तर है - विज्ञान | मानन्द तो प्रसिद्ध है ही । श्रानन्द - विज्ञान-मन - प्राण - वाक् नाम से प्रसिद्ध पञ्चकोशात्मक अव्ययपुरुष हो सच्चिदानन्द है । इन पाँचों में ही मत्यं बोरअमृत दो - दो मात्र हैं । विषयानन्द मर्त्य है क्षणिक है । निष्कैवल्य नाम से प्रसिद्ध निर्विषयानन्द मृत है - नित्य है । सविषयकज्ञान मर्त्य है - क्षणिक है । निर्विकल्पक नाम से प्रसिद्ध निर्विषयक ज्ञान मृत है - नित्य है । इसी प्रकार मन - प्राणवाक् में भी दोनों भाव हैं । अमृतभाग मन नाम से ही प्रसिद्ध हैं । मत्यंभाग रूप नाम से प्रसिद्ध है । प्राण श्रमृतभाग है । कर्म्म मर्त्यभाग है । वाक् श्रमृता है । नाम मृत्यंभाग है । सविषयानन्द - सविषयक ज्ञान - रूप - कम - नाम- इन पाँचों मत्यों का प्रभव प्रतिष्ठा -परायण [ ४४८ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) १ - गीता ६।१६ । ३- शतः ब्रा ० १०।१।३।२ । कर्मनिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विशान भाच्य २ पास ० डा ० १०।५।२।४ । ४- शत ० वा ० ६।१।१।११ । [ ४४ I क्रमशः निर्विषयकानन्द- निविषयक ज्ञान- मन - प्राण - वाक्ये पाँचों कलाएं उक्थ- ब्रह्म - खाम हैं । संसार में पांचों मत्यंभाग उल्बण रहते हैं । श्रभूतभाग दबे रहते हैं । मुक्तिदशा में मत्यभान मनुस्वण रहते हैं । है-अमृतभाग उल्ब रहता है । इस एक ही ब्रह्म में अमृत - मत्यें दो भाव कैसे हो गए? इसका उत्तर प्रमृतमृत्युवाच- सदसद्वाव । ' ग्रह ' नाम से प्रसिद्ध अव्ययपुरुष का स्वरूप बरसाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-" प्रमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन " - इति ॥ ' अन्तर स्वोर प्रभूत रसंभाग का नाम है । मृत्यु बलभाग का नाम है । रस - दस दोनों - लेने पर त्याचमृतमाहितम् के अनुसार तावात्म्यापस हैं । दोनों की एक सता है, धतएव पर दो मान वह मी- ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म - वाले मद्वैत का कोई विरोध नहीं प्राता । इसी आधार गर्यो मृत है - यहीं प्रजापतेरात्मनो मत्यमासोदर्द्धमभूतम् " - यह कहा जाता है । रवमथान है । वसत्रित दोनों की समष्टि प्रथापति मात्मा है । बलप्रधान रसगमित पांचों मत्यं हूँ यही विश्वका का राज्य है । विश्व नामरूप-है । ' प्रजापतिस्स्वेवेयं सर्ववसृजत यविवं कि ४ - के अनुसार सर्वत्र इसी में घट नामरूपकम् का वष्टिरूप कम्मत्मिक है । इसका आधार वही सच्चिदानन्य है । ' ख'- प्रस्थितस्थ का धव्यभिचार मर्त्यभाग है, मस्ति अमृतभाग है । संसार में भाव हो या अभाव, सर्वच धाप पर - पचायतच्चापि प पायेंगे | घड़ा है- में भी ' है ' है, नहीं है में भी ' है ' है 1 । इसी बाधार नहीं बढाना चाहते । यहाँ पर ० ' इत्यादि कहा जाता है । अस्तु, इस विषय को हम अधिक पदार्थों को देखते हो, उन सबका केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि संसार में तुम बिन घटपटादि होता है - थान होता है । बस्सि भी तुम्हें यह घड़ा है यह वस्त्र है - इत्यादिरूप से ( अस्तिरूप से ) ज्ञान तुम जानते हो वह ग्राम-सविषय है, मान भी सविषय है । जिसका ज्ञान होता है- बर्बाद जिसे पदार्थ भी विषय है । वस्ति - नाति frent भूत पदार्थ नामरूपकम्मत्मिक विषय है । वो है वह ससाभव सर्वत्र व्यापा एवं सर्वसाधारण-etai विषयान्त हैं । कहने को बस्ति भाति विश्वासीत है, ' - वस्तुतः इस प्रकार विचवावति प्रस्ति माहि गम्य है | बच्चे से लेकर वृद्ध तक को ' re मस्ति - पटं वानामि है, वही पटपटाविवाकाशवत् का साक्षात्कार हो रहा है । विषयातीता -सामान्या सत्ता एक है - अ की हो रही है । ऋषि मादेश ferntu सृष्ट बनकर नानारूप में परिणत हो रही है । यही अबस्था हाथ को मनुस्यूत देश रहे करते हैं कि तुमको अस्तित्व का ज्ञान है । प्रत्येक विषय के साथ तुम अस्तित्व बस्ति पर दृष्टि रखने की ग्राम-हो । विषय का परित्याग यदि तुम नहीं कर सकते तो न सही, केवल सुम पूर्व के प्रकरण से भली - भांति श्यकता है । माति अस्ति विना विषय के दोनों ही अनुपपत्र है - यह विषय से प्रेम हो है वो प्रति माति समझ गए होंगे । अब हम तुम्हें यही कहना चाहते हैं कि यदि बस्ति तुम्हें को भावि का विषय समझो | माहि दोनों को परस्पर विषय - विषयिभाव में परिणत कर हो ।
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्मं निरूपणोपनिषत् को मस्ति का विषय समभो । अभी तक तुमने घटपटादि नामरूपात्मक पदार्थों को अस्ति - माति का विषय समझ रखा है । " तुम सम कते हो कि घट ज्ञान का विषय है - घट अस्ति का विषय है, प्रतएव घड़ा है एवं उसे जानतें है । हम कहते हैं कि अस्ति भाति को उपपत्ति का घट से कोई सम्बन्ध नहीं है । वस्तुतः प्रस्ति से माति की सत्ता है - सत्ता से भाति की सत्ता है । है इसलिए जानते हैं । जानते हैं इसलिए है । प्रस्ति - अतः माति, माति अतः अस्ति- इस व्यवहार में प्रस्ति भाति का विषय है । अस्तिका विषय है । इस दृष्टि से तुम्हारी विषयपिपासा मी शान्त हो जाएगी एवं नामरूपा-श्मक घटपटादि के छूट जाने से तस्वभाव भी प्रसन्न हो जाएगा । इन्द्रियधारणा- योग में विषयों को-भशान्ति का कारण बतलाया था । उन्हें छोडने के लिए अनाशक योग का उपदेश था । वह तुम नहीं कर सकते न सही । खूब विषयों में रत रहो- केवल दृष्टि मस्ति भाति पर रखो । सोते - खाते - पीते-उठते सूर्वत्र सब काल में प्रस्ति माति को लक्ष्य बनाओ । सबको अस्तिमातिरूप समझो । इससे कालान्तर में अपने माप विषय हट जाएंगे । विषयों ने ही तो भेद कर रखा था । बस, सत्ता के अभ्यास से जिस दिन अशेषमेद प्रत्यस्त हो जाएंगे उस दिन— “ प्रत्यस्ता शेषमेदं यत्सत्तामात्रमंगोचरम् । बचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् " ॥ ' -- ऐसा तत्व तुम्हें अपने पाप मिल जाएगा । अभी तक तुम घटपटादि विषय की उपलब्धि करते हो । विषय पर तुम्हारी दृष्टि है । विषय नानारूप मृत्यु है, अतः उसको अपनाकर - ' मृत्योः स मृत्युमा जोति वह तानेव पश्यति ' - के अनुसार तुम नानारूप विषय के साथ पड़कर मृत्युभाव को प्राप्त हो रहे हो । हम कहते है - प्रदादितुम्हारे लिए उपलब्धग्य नहीं है- ' अस्ति ' उपलब्धव्य है । यथार्थ में ऐसह ही है । क्या घर को तुम सपने उदर में ले सकते हो? कदापि नहीं । घट का जो अस्तित्व है — उछ मात्र का मातिरूप से ग्रहण है । घटोऽस्ति का ज्ञान होता है - घट की तो तुमसे छूत भी नहीं होने पाती । तुमने से बन्ध समझ रखा । यही भ्रम तुम्हारे दुःख का मूलकारण है । बडा थापयं है तुम उसे सोजते फिरते हो । परन्तु विश्वास करो न वह वाणी से पकड़ा जा सकता - अ मन से शाप्त किया जा सकता और न चक्षु से प्राप्त किया जा सकता है - जैसा कि ' केनोपनिषत् ' में ' न - तत्र ममो अकुछ सि - न- सह त्यादि के अर्थ करते समय विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । यद्यपि समाइत्यादिरूप से मन को प्राप्ति का कारण बतलाया है, परन्तु समुद्धि करता हुआ प्रात्मज्ञान में परम्परया कारण है । जैसा कि ' मुण्डकोप--इत्यादि मन्त्र में स्पष्ट हो जाएगा । ' श्रस्ति ' यह बोल रहे ऐसा नहीं है । मन निषत् ' के ' नायमात्मा प्रबचन हो - अस्तित्व का साक्षात्कार कर रहे हो फिर उसे ढूंढते हो । भोले मनुष्य! प्रस्ति को छोडकर उसे तुम कहाँ पाप्रोगे? ' अस्ति ' यही तो उसकी उपलब्धि । प्रस्ति सत्ता है । उसकी उपलब्धि ज्ञान १- पञ्चदशी । [ ४५० ]