महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 121–130

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 121 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

निकट आकर उन्होंने देखा, राजा दुर्योधन युद्धके मुहानेपर इस दुर्दशामें पड़ा था । यह देखकर महारथी अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि ' मैं धृष्टद्युम्न आदि सम्पूर्ण पांचालों और मन्त्रियोंसहित समस्त पाण्डवोंका वध किये बिना अपना कवच नहीं उतारूंगा ' ॥ २ ९३-२९ ४ ॥

यत्रैवमुक्त्वा राजानमपक्रम्य त्रयो रथाः ।

सूर्यास्तमनवेलायामासेदुस्ते महद् बनम् ॥ २ ९ ५ ॥

सौप्तिकपर्वमें राजा दुर्योधनसे ऐसी बात कहकर वे तीनों महारथी वहाँसे चले गये और सूर्यास्त होते - होते एक बहुत बड़े वनमें जा पहुँचे ॥ २ ९ ५ ॥

न्यग्रोधस्याथ महतो यत्राधस्ताद् व्यवस्थिताः ।

ततः काकान् बहून् रात्रौ दृष्ट्वोलूकेन हिंसितान् ॥ २ ९ ६ ॥

द्रौणिः क्रोधसमाविष्टः पितुर्वधमनुस्मरन् ।

पञ्चालानां प्रसुप्तानां वधं प्रति मनो दधे ॥ २ ९ ७ ॥

वहाँ तीनों एक बहुत बड़े बरगदके नीचे विश्रामके लिये बैठे । तदनन्तर वहाँ एक उल्लूने आकर रातमें बहुत - से कौओंको मार डाला । यह देखकर क्रोधमें भरे अश्वत्थामाने अपने पिताके अन्यायपूर्वक मारे जानेकी घटनाको स्मरण करके सोते समय ही पांचालोंके वधका निश्चय कर लिया ॥ २ ९६-२९ ७ ॥

गत्वा च शिविरद्वारि दुर्दृशं तत्र राक्षसम् ।

घोररूपमपश्यत् स दिवमावृत्य धिष्ठितम् ॥ २ ९ ८ ॥

तत्पश्चात् पाण्डवोंके शिविरके द्वारपर पहुँचकर उसने देखा, एक बड़ा भयंकर राक्षस, जिसकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वहाँ खड़ा है । उसने पृथ्वीसे लेकर आकाशतकके प्रदेशको घेर रखा था ॥ २ ९ ८ ॥

तेन व्याघातमस्त्राणां क्रियमाणमवेक्ष्य च ।

द्रौणिर्यत्र विरूपाक्षं रुद्रमाराध्य सत्वरः ॥ २९९ ॥

अश्वत्थामा जितने भी अस्त्र चलाता, उन सबको वह राक्षस नष्ट कर देता था । यह देखकर द्रोणकुमारने तुरंत ही भयंकर नेत्रोंवाले भगवान् रुद्रकी आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया ॥ २ ९९ ॥

प्रसुप्तान् निशि विश्वस्तान् धृष्टद्युम्नपुरोगमान् ।

पञ्चालान् सपरीवारान् द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥ ३०० ॥

कृतवर्मणा च सहितः कृपेण च निजघ्निवान् ।

यत्रामुच्यन्त ते पार्थाः पञ्च कृष्णबलाश्रयात् ॥ ३०१ ॥

सात्यकिश्च महेष्वासः शेषाश्च निधनं गताः ।

पञ्चालानां प्रसुप्तानां यत्र द्रोणसुताद् वधः ॥ ३०२ ॥

धृष्टद्युम्नस्य सूतेन पाण्डवेषु निवेदितः ।

पृष्ठ 122

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 122 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्रौपदी पुत्रशोकार्ता पितृभ्रातृवधार्दिता ॥ ३०३ ॥

तत्पश्चात् अश्वत्थामाने रातमें निःशंक सोये हुए धृष्टद्युम्न आदि पांचालों तथा द्रौपदीपुत्रोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यकी सहायतासे परिजनोंसहित मार डाला । भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिका आश्रय लेनेसे केवल पाँच पाण्डव और महान् धनुर्धर सात्यकि बच गये, शेष सभी वीर मारे गये । यह सब प्रसंग सौप्तिकपर्वमें वर्णित है । वहीं यह भी कहा गया है कि धृष्टद्युम्नके सारथिने जब पाण्डवोंको यह सूचित किया कि द्रोणपुत्रने सोये हुए पांचालोंका वध कर डाला है, तब द्रौपदी पुत्रशोकसे पीड़ित तथा पिता और भाईकी हत्यासे व्यथित हो उठी ॥ ३००–३०३ ॥

कृतानशनसंकल्पा यत्र भर्तृनुपाविशत् ।

द्रौपदीवचनाद् यत्र भीमो भीमपराक्रमः ॥ ३०४ ॥

प्रियं तस्याश्चिकीर्षन् वै गदामादाय वीर्यवान् ।

अन्वधावत् सुसंक्रुद्धो भारद्वाजं गुरोः सुतम् ॥ ३०५ ॥

वह पतियोंको अश्वत्थामासे इसका बदला लेनेके लिये उत्तेजित करती हुई आमरण अनशनका संकल्प ले अन्न- जल छोड़कर बैठ गयी । द्रौपदीके कहनेसे भयंकर पराक्रमी महाबली भीमसेन उसका प्रिय करनेकी इच्छासे हाथमें गदा ले अत्यन्त क्रोधमें भरकर गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पीछे दौड़े ॥ ३०४-३०५ ॥

भीमसेनभयाद् यत्र दैवेनाभिप्रचोदितः ।

अपाण्डवायेति रुषा द्रौणिरस्त्रमवासृजत् ॥ ३०६ ॥

तब भीमसेनके भयसे घबराकर दैवकी प्रेरणासे पाण्डवोंके विनाशके लिये अश्वत्थामाने रोषपूर्वक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३०६ ॥

मैवमित्यब्रवीत् कृष्णः शमयंस्तस्य तद् वचः ।

यत्रास्त्रमस्त्रेण च तच्छमयामास फाल्गुनः ॥ ३०७ ॥

किंतु भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाके रोषपूर्ण वचनको शान्त करते हुए कहा —‘मैवम्’ — ‘ पाण्डवोंका विनाश न हो । ' साथ ही अर्जुनने अपने दिव्यास्त्रद्वारा उसके अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ ३०७ ॥

द्रौणेश्च द्रोहबुद्धित्वं वीक्ष्य पापात्मनस्तदा ।

द्रौणिद्वैपायनादीनां शापाश्चान्योन्यकारिताः ॥ ३०८ ॥

उस समय पापात्मा द्रोणपुत्रके द्रोहपूर्ण विचारको देखकर द्वैपायन व्यास एवं श्रीकृष्णने अश्वत्थामाको और अश्वत्थामाने उन्हें शाप दिया । इस प्रकार दोनों ओरसे एक- दूसरेको शाप प्रदान किया गया ॥ ३०८ ॥

मणिं तथा समादाय द्रोणपुत्रान्महारथात् ।

पाण्डवाः प्रददुर्हृष्टा द्रौपद्यै जितकाशिनः ॥ ३० ९ ॥

पृष्ठ 123

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 123 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

महारथी अश्वत्थामासे मणि छीनकर विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डवोंने प्रसन्नतापूर्वक द्रौपदीको दे दी ॥ ३० ९ ॥

एतद् वै दशामं पर्व सौप्तिकं समुदाहृतम् ।

अष्टादशास्मिन्नध्यायाः पर्वण्युक्ता महात्मना ॥ ३१० ॥

इन सब वृत्तान्तोंसे युक्त सौप्तिकपर्व दसवाँ कहा गया है । महात्मा व्यासने इसमें अठारह ( १८ ) अध्याय कहे हैं ॥ ३१० ॥

श्लोकानां कथितान्यत्र शतान्यष्टौ प्रसंख्यया ।

श्लोकाश्च सप्ततिः प्रोक्ता मुनिना ब्रह्मवादिना ॥ ३११ ॥

इसी प्रकार उन ब्रह्मवादी मुनिने इस पर्वमें श्लोकोंकी संख्या आठ सौ सत्तर ( ८७० ) बतायी है ॥ ३११ ॥

सौप्तिकैषीके सम्बद्धे पर्वण्युत्तमतेजसा ।

अत ऊर्ध्वमिदं प्राहुः स्त्रीपर्व करुणोदयम् ॥ ३१२ ॥

उत्तम तेजस्वी व्यासजीने इस पर्वमें सौप्तिक और ऐषीक दोनोंकी कथाएँ सम्बद्ध कर दी हैं । इसके बाद विद्वानोंने स्त्रीपर्व कहा है, जो करुणरसकी धारा बहानेवाला है ॥ ३१२ ॥

पुत्रशोकाभिसंतप्तः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः ।

कृष्णोपनीतां यत्रासावायसीं प्रतिमां दृढाम् ॥ ३१३ ॥

भीमसेनद्रोहबुद्धिर्धृतराष्ट्रो बभञ्ज ह ।

तथा शोकाभितप्तस्य धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥ ३१४ ॥

संसारगहनं बुद्धया हेतुभिर्मोक्षदर्शनैः ।

विदुरेण च यत्रास्य राज्ञ आश्वासनं कृतम् ॥ ३१५ ॥

प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रने पुत्रशोकसे संतप्त हो भीमसेनके प्रति द्रोहबुद्धि कर ली और श्रीकृष्णद्वारा अपने समीप लायी हुई लोहेकी मजबूत प्रतिमाको भीमसेन समझकर भुजाओंमें भर लिया तथा उसे दबाकर टूक - टूक कर डाला । उस समय पुत्रशोकसे पीड़ित बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रको विदुरजीने मोक्षका साक्षात्कार करानेवाली युक्तियों तथा विवेकपूर्ण बुद्धिके द्वारा संसारकी दुःखरूपताका प्रतिपादन करते हुए भलीभाँति समझा-बुझाकर शान्त किया ॥ ३१३–३१५ ॥

धृतराष्ट्रस्य चात्रैव कौरवायोधनं तथा ।

सान्तःपुरस्य गमनं शोकार्तस्य प्रकीर्तितम् ॥ ३१६ ॥

इसी पर्वमें शोकाकुल धृतराष्ट्रका अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ कौरवोंके युद्धस्थानमें जानेका वर्णन है ॥ ३१६ ॥

विलापो वीरपत्नीनां यत्रातिकरुणः स्मृतः ।

क्रोधावेशः प्रमोहश्च गान्धारीधृतराष्ट्रयोः ॥ ३१७ ॥

पृष्ठ 124

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 124 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वहीं वीरपत्नियोंके अत्यन्त करुणापूर्ण विलापका कथन है। वहीं गान्धारी और धृतराष्ट्रके क्रोधावेश तथा मूर्च्छित होनेका उल्लेख है ॥ ३१७ ॥

यत्र तान् क्षत्रियाः शूरान् संग्रामेष्वनिवर्तिनः ।

पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄंश्चैव ददृशुर्निहतान् रणे ॥ ३१८ ॥

उस समय उन क्षत्राणियोंने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले अपने शूरवीर पुत्रों, भाइयों और पिताओंको रणभूमिमें मरा हुआ देखा ॥ ३१८ ॥

पुत्रपौत्रवधार्तायास्तथात्रैव प्रकीर्तिता ।

गान्धार्याश्चापि कृष्णेन क्रोधोपशमनक्रिया ॥ ३१ ९ ॥

पुत्रों और पौत्रोंके वधसे पीड़ित गान्धारीके पास आकर भगवान् श्रीकृष्णने उनके क्रोधको शान्त किया । इस प्रसंगका भी इसी पर्वमें वर्णन किया गया है ॥ ३१ ९ ॥

यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतां वरः ।

राज्ञां तानि शरीराणि दाहयामास शास्त्रतः ॥ ३२० ॥

वहीं यह भी कहा गया है कि परम बुद्धिमान् और सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने वहाँ मारे गये समस्त राजाओंके शरीरोंका शास्त्रविधिसे दाह - संस्कार किया और कराया ॥ ३२० ॥

तोयकर्मणि चारब्धे राज्ञामुदकदानिके ।

गूढोत्पन्नस्य चाख्यानं कर्णस्य पृथयाऽऽत्मनः ॥ ३२१ ॥

सुतस्यैतदिह प्रोक्तं व्यासेन परमर्षिणा ।

एतदेकादशं पर्व शोकवैक्लव्यकारणम् ॥ ३२२ ॥

प्रणीतं सज्जनमनोवैक्लव्याश्रुप्रवर्तकम् ।

सप्तविंशतिरध्यायाः पर्वण्यस्मिन् प्रकीर्तिताः ॥ ३२३ ॥

श्लोकसप्तशती चापि पञ्चसप्ततिसंयुता ।

संख्यया भारताख्यानमुक्तं व्यासेन धीमता ॥ ३२४ ॥

तदनन्तर राजाओंको जलांजलिदानके प्रसंगमें उन सबके लिये तर्पणका आरम्भ होते ही कुन्तीद्वारा गुप्तरूपसे उत्पन्न हुए अपने पुत्र कर्णका गूढ़ वृत्तान्त प्रकट किया गया, यह प्रसंग आता है । महर्षि व्यासने ये सब बातें स्त्रीपर्वमें कही हैं । शोक और विकलताका संचार करनेवाला यह ग्यारहवाँ पर्व श्रेष्ठ पुरुषोंके चित्तको भी विह्वल करके उनके नेत्रोंसे आँसूकी धारा प्रवाहित करा देता है । इस पर्वमें सत्ताईस ( २७ ) अध्याय कहे गये हैं । इसके श्लोकोंकी संख्या सात सौ पचहत्तर ( ७७५ ) कही गयी है । इस प्रकार परम बुद्धिमान् व्यासजीने महाभारतका यह उपाख्यान कहा है ॥ ३२१–३२४ ॥

अतः परं शान्तिपर्व द्वादशं बुद्धिवर्धनम् ।

यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३२५ ॥

घातयित्वा पितॄन् भ्रातॄन् पुत्रान् सम्बन्धिमातुलान् ।

पृष्ठ 125

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 125 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शान्तिपर्वणि धर्माश्च व्याख्याताः शारतल्पिकाः ॥ ३२६ ॥

स्त्रीपर्वके पश्चात् बारहवाँ पर्व शान्तिपर्वके नामसे विख्यात है । यह बुद्धि और विवेकको बढ़ानेवाला है । इस पर्वमें यह कहा गया है कि अपने पितृतुल्य गुरुजनों, भाइयों, पुत्रों, सगे-सम्बन्धी एवं मामा आदिको मरवाकर राजा युधिष्ठिरके मनमें बड़ा निर्वेद ( दुःख एवं वैराग्य ) हुआ । शान्तिपर्वमें बाणशय्यापर शयन करनेवाले भीष्मजीके द्वारा उपदेश किये हुए धर्मोंका वर्णन है ॥ ३२५-३२६ ॥

राजभिर्वेदितव्यास्ते सम्यग्ज्ञानबुभुत्सुभिः ।

आपद्धर्माश्च तत्रैव कालहेतुप्रदर्शिनः ॥ ३२७ ॥

यान् बुद्ध्वा पुरुषः सम्यक् सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात् ।

मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा बहुविस्तराः ॥ ३२८ ॥

उत्तम ज्ञानकी इच्छा रखनेवाले राजाओंको उन्हें भलीभाँति जानना चाहिये । उसी पर्वमें काल और कारणकी अपेक्षा रखनेवाले देश और कालके अनुसार व्यवहारमें लानेयोग्य आपद्धर्मोंका भी निरूपण किया गया है, जिन्हें अच्छी तरह जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है। शान्तिपर्वमें विविध एवं अद्भुत मोक्ष- धर्मोंका भी बड़े विस्तारके साथ प्रतिपादन किया गया है ॥ ३२७-३२८ ॥

द्वादशं पर्व निर्दिष्टमेतत् प्राज्ञजनप्रियम् ।

अत्र पर्वणि विज्ञेयमध्यायानां शतत्रयम् ॥ ३२ ९ ॥

त्रिंशच्चैव तथाध्याया नव चैव तपोधनाः ।

चतुर्दश सहस्राणि तथा सप्त शतानि च ॥ ३३० ॥

सप्त श्लोकास्तथैवात्र पञ्चविंशतिसंख्यया ।

अत ऊर्ध्वं च विज्ञेयमनुशासनमुत्तमम् ॥ ३३१ ॥

इस प्रकार यह बारहवाँ पर्व कहा गया है, जो ज्ञानीजनोंको अत्यन्त प्रिय है । इस पर्वमें तीन सौ उन्तालीस ( ३३ ९ ) अध्याय हैं और तपोधनो! इसकी श्लोक- संख्या चौदह हजार सात सौ बत्तीस ( १४,७३२ ) है । इसके बाद उत्तम अनुशासनपर्व है, यह जानना चाहिये ॥ ३२ ९ –३३१ ॥

यत्र प्रकृतिमापन्नः श्रुत्वा धर्मविनिश्चयम् ।

भीष्माद् भागीरथीपुत्रात् कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३३२ ॥

जिसमें कुरुराज युधिष्ठिर गंगानन्दन भीष्मजीसे धर्मका निश्चित सिद्धान्त सुनकर प्रकृतिस्थ हुए, यह बात कही गयी है ॥ ३३२ ॥

व्यवहारोऽत्र कार्त्स्न्येन धर्मार्थी यः प्रकीर्तितः ।

विविधानां च दानानां फलयोगाः प्रकीर्तिताः ॥ ३३३ ॥

इसमें धर्म और अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हितकारी आचार- व्यवहारका निरूपण किया गया है । साथ ही नाना प्रकारके दानोंके फल भी कहे गये हैं ॥ ३३३ ॥

पृष्ठ 126

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 126 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तथा पात्रविशेषाश्च दानानां च परो विधिः ।

आचारविधियोगश्च सत्यस्य च परा गतिः ॥ ३३४ ॥

महाभाग्यं गवां चैव ब्राह्मणानां तथैव च ।

रहस्यं चैव धर्माणां देशकालोपसंहितम् ॥ ३३५ ॥

एतत् सुबहुवृत्तान्तमुत्तमं चानुशासनम् ।

भीष्मस्यात्रैव सम्प्राप्तिः स्वर्गस्य परिकीर्तिता ॥ ३३६ ॥

दानके विशेष पात्र, दानकी उत्तम विधि, आचार और उसका विधान, सत्यभाषणकी पराकाष्ठा, गौओं और ब्राह्मणोंका माहात्म्य, धर्मोंका रहस्य तथा देश और काल ( तीर्थ और पर्व) -की महिमा — ये सब अनेक वृत्तान्त जिसमें वर्णित हैं, वह उत्तम अनुशासन -पर्व है । इसीमें भीष्मको स्वर्गकी प्राप्ति कही गयी है ॥ ३३४–३३६ ॥

एतत् त्रयोदशं पर्व धर्मनिश्चयकारकम् ।

अध्यायानां शतं त्वत्र षट्चत्वारिंशदेव तु ॥ ३३७ ॥

धर्मका निर्णय करनेवाला यह पर्व तेरहवाँ है । इसमें एक सौ छियालीस ( १४६ ) अध्याय हैं ॥ ३३७ ॥

श्लोकानां तु सहस्राणि प्रोक्तान्यष्टौ प्रसंख्यया ।

ततोऽश्वमेधिकं नाम पर्व प्रोक्तं चतुर्दशम् ॥ ३३८ ॥

और पूरे आठ हजार ( ८,००० ) श्लोक कहे गये हैं । तदनन्तर चौदहवें आश्वमेधिक नामक पर्वकी कथा है ॥ ३३८ ॥

तत् संवर्तमरुत्तीयं यत्राख्यानमनुत्तमम् ।

सुवर्णकोषसम्प्राप्तिर्जन्म चोक्तं परीक्षितः ॥ ३३ ९ ॥

जिसमें परम उत्तम योगी संवर्त तथा राजा मरुत्तका उपाख्यान है । युधिष्ठिरको सुवर्णके खजानेकी प्राप्ति और परीक्षित्के जन्मका वर्णन है ॥ ३३ ९ ॥

दग्धस्यास्त्राग्निना पूर्वं कृष्णात् संजीवनं पुनः ।

चर्यायां हयमुत्सृष्टं पाण्डवस्यानुगच्छतः ॥ ३४० ॥

तत्र तत्र च युद्धानि राजपुत्रैरमर्षणैः ।

चित्राङ्गदायाः पुत्रेण पुत्रिकाया धनंजयः ॥ ३४१ ॥

संग्रामे बभ्रुवाहेण संशयं चात्र दर्शितः ।

अश्वमेधे महायज्ञे नकुलाख्यानमेव च ॥ ३४२ ॥

इत्याश्वमेधिकं पर्व प्रोक्तमेतन्महाद्भुतम् ।

अध्यायानां शतं चैव त्रयोऽध्यायाश्च कीर्तिताः ॥ ३४३ ॥

त्रीणि श्लोकसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ।

विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥ ३४४ ॥

पृष्ठ 127

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 127 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पहले अश्वत्थामाके अस्त्रकी अग्निसे दग्ध हुए बालक परीक्षित्का पुनः श्रीकृष्णके अनुग्रहसे जीवित होना कहा गया है । सम्पूर्ण राष्ट्रोंमें घूमनेके लिये छोड़े गये अश्वमेधसम्बन्धी अश्वके पीछे पाण्डुनन्दन अर्जुनके जाने और उन उन देशोंमें कुपित राजकुमारोंके साथ उनके युद्ध करनेका वर्णन है। पुत्रिकाधर्मके अनुसार उत्पन्न हुए चित्रांगदाकुमार बभ्रुवाहनने युद्धमें अर्जुनको प्राणसंकटकी स्थितिमें डाल दिया था; यह कथा भी अश्वमेधपर्वमें ही आयी है । वहीं अश्वमेध- महायज्ञमें नकुलोपाख्यान आया है । इस प्रकार यह परम अद्भुत आश्वमेधिकपर्व कहा गया है । इसमें एक सौ तीन अध्याय पढ़े गये हैं । तत्त्वदर्शी व्यासजीने इस पर्वमें तीन हजार तीन सौ बीस ( ३, ३२० ) श्लोकोंकी रचना की है ॥ ३४०–३४४ ॥

ततस्त्वाश्रमवासाख्यं पर्व पञ्चदशं स्मृतम् ।

यत्र राज्यं समुत्सृज्य गान्धार्या सहितो नृपः ॥ ३४५ ॥

धृतराष्ट्रोऽऽश्रमपदं विदुरश्च जगाम ह ।

यं दृष्ट्वा प्रस्थितं साध्वी पृथाप्यनुययौ तदा ॥ ३४६ ॥

पुत्रराज्यं परित्यज्य गुरुशुश्रूषणे रता । तदनन्तर आश्रमवासिक नामक पंद्रहवें पर्वका वर्णन है । जिसमें गान्धारीसहित राजा धृतराष्ट्र और विदुरके राज्य छोड़कर वनके आश्रममें जानेका उल्लेख हुआ है । उस समय धृतराष्ट्रको प्रस्थान करते देख सती साध्वी कुन्ती भी गुरुजनोंकी सेवामें अनुरक्त हो अपने पुत्रका राज्य छोड़कर उन्हींके पीछे- पीछे चली गयीं ॥ ३४५-३४६३ ॥ यत्र राजा हतान् पुत्रान् पौत्रानन्यांश्च पार्थिवान् ॥ ३४७ ॥

लोकान्तरगतान् वीरानपश्यत् पुनरागतान् ।

ऋषेः प्रसादात् कृष्णस्य दृष्ट्वाश्चर्यमनुत्तमम् ॥ ३४८ ॥

त्यक्त्वा शोकं सदारश्च सिद्धिं परमिकां गतः ।

यत्र धर्मं समाश्रित्य विदुरः सुगतिं गतः ॥ ३४ ९ ॥

संजयश्च सहामात्यो विद्वान् गावल्गणिर्वशी ।

ददर्श नारदं यत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥

जहाँ राजा धृतराष्ट्रने युद्धमें मरकर परलोकमें गये हुए अपने वीर पुत्रों, पौत्रों तथा अन्यान्य राजाओंको भी पुनः अपने पास आया हुआ देखा । महर्षि व्यासजीके प्रसादसे यह उत्तम आश्चर्य देखकर गान्धारीसहित धृतराष्ट्रने शोक त्याग दिया और उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली । इसी पर्वमें यह बात भी आयी है कि विदुरजीने धर्मका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की । साथ ही मन्त्रियोंसहित जितेन्द्रिय विद्वान् गवल्गणपुत्र संजयने भी उत्तम पद प्राप्त कर लिया । इसी पर्वमें यह बात भी आयी है कि धर्मराज युधिष्ठिरको नारदजीका दर्शन हुआ ॥ ३४७–३५० ॥ नारदाच्चैव शुश्राव वृष्णीनां कदनं महत् ।

पृष्ठ 128

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 128 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एतदाश्रमवासाख्यं पर्वोक्तं महदद्भुतम् ॥ ३५१ ॥

नारदजीसे ही उन्होंने यदुवंशियोंके महान् संहारका समाचार सुना । यह अत्यन्त अद्भुत आश्रमवासिकपर्व कहा गया है ॥ ३५१ ॥

द्विचत्वारिंशदध्यायाः पर्वैतदभिसंख्यया ।

सहस्रमेकं श्लोकानां पञ्च श्लोकशतानि च ॥ ३५२ ॥

षडेव च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ।

अतः परं निबोधेदं मौसलं पर्व दारुणम् ॥ ३५३ ॥

इस पर्वमें अध्यायोंकी संख्या बयालीस ( ४२ ) है । तत्त्वदर्शी व्यासजीने इसमें एक हजार -पाँच सौ छः ( १,५०६ ) श्लोक रखे हैं । इसके बाद मौसलपर्वकी सूची सुनो – यह पर्व अत्यन्त दारुण है ॥ ३५२-३५३ ॥

यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शस्त्रस्पर्शहता युधि ।

ब्रह्मदण्डविनिष्पिष्टाः समीपे लवणाम्भसः ॥ ३५४ ॥

इसीमें यह बात आयी है कि वे श्रेष्ठ यदुवंशी वीर क्षारसमुद्रके तटपर आपसके युद्धमें अस्त्र- शस्त्रोंके स्पर्शमात्रसे मारे गये । ब्राह्मणोंके शापने उन्हें पहले ही पीस डाला था ॥ ३५४

आपाने पानकलिता देवेनाभिप्रचोदिताः ।

एरकारूपिभिर्वज्ञैर्निजघ्नुरितरेतरम् ॥ ३५५ ॥

उन सबने मधुपानके स्थानमें जाकर खूब पीया और नशेसे होश- हवास खो बैठे । फिर दैवसे प्रेरित हो परस्पर संघर्ष करके उन्होंने एरकारूपी वज्रसे एक- दूसरेको मार डाला ॥ ३५५ ॥

यत्र सर्वक्षयं कृत्वा तावुभौ रामकेशवौ ।

नातिचक्रामतुः कालं प्राप्तं सर्वहरं महत् ॥ ३५६ ॥

वहीं सबका संहार करके बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाइयोंने समर्थ होते हुए भी अपने ऊपर आये हुए सर्वसंहारकारी महान् कालका उल्लंघन नहीं किया ( महर्षियोंकी वाणी सत्य करनेके लिये कालका आदेश स्वेच्छासे अंगीकार कर लिया ) ॥ ३५६ ॥

यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम् ।

दृष्ट्वा विषादमगमत् परां चार्तिं नरर्षभः ॥ ३५७ ॥

वहीं यह प्रसंग भी है कि नरश्रेष्ठ अर्जुन द्वारकामें आये और उसे वृष्णिवंशियोंसे सूनी

देखकर विषादमें डूब गये । उस समय उनके मनमें बड़ी पीड़ा हुई ॥ ३५७ ॥

स संस्कृत्य नरश्रेष्ठं मातुलं शौरिमात्मनः ।

ददर्श यदुवीराणामापाने वैशसं महत् ॥ ३५८ ॥

उन्होंने अपने मामा नरश्रेष्ठ वसुदेवजीका दाहसंस्कार करके आपानस्थानमें जाकर यदुवंशी वीरोंके विकट विनाशका रोमांचकारी दृश्य देखा ॥ ३५८ ॥

पृष्ठ 129

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 129 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शरीरं वासुदेवस्य रामस्य च महात्मनः ।

संस्कारं लम्भयामास वृष्णीनां च प्रधानतः ॥ ३५ ९ ॥

वहाँसे भगवान् श्रीकृष्ण, महात्मा बलराम तथा प्रधान-प्रधान वृष्णिवंशी वीरोंके शरीरोंको लेकर उन्होंने उनका संस्कार सम्पन्न किया ॥ ३५ ९ ॥

स वृद्धबालमादाय द्वारवत्यास्ततो जनम् ।

ददर्शापदि कष्टायां गाण्डीवस्य पराभवम् ॥ ३६० ॥

तदनन्तर अर्जुनने द्वारकाके बालक, वृद्ध तथा स्त्रियोंको साथ ले वहाँसे प्रस्थान किया; परंतु उस दुःखदायिनी विपत्तिमें उन्होंने अपने गाण्डीव धनुषकी अभूतपूर्व पराजय देखी ॥ ३६० ॥

सर्वेषां चैव दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् ।

नाशं वृष्णिकलत्राणां प्रभावाणामनित्यताम् ॥ ३६१ ॥

दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नो व्यासवाक्यप्रचोदितः ।

धर्मराजं समासाद्य संन्यासं समरोचयत् ॥ ३६२ ॥

उनके सभी दिव्यास्त्र उस समय अप्रसन्न-से होकर विस्मृत हो गये । वृष्णिकुलकी स्त्रियोंका देखते - देखते अपहरण हो जाना और अपने प्रभावोंका स्थिर न रहना -यह सब देखकर अर्जुनको बड़ा निर्वेद (दुःख ) हुआ । फिर उन्होंने व्यासजीके वचनोंसे प्रेरित हो धर्मराज युधिष्ठिरसे मिलकर संन्यासमें अभिरुचि दिखायी ॥ ३६१-३६२ ॥

इत्येतन्मौसलं पर्व षोडशं परिकीर्तितम् ।

अध्यायाष्टौ समाख्याताः श्लोकानां च शतत्रयम् ॥ ३६३ ॥

श्लोकानां विंशतिश्चैव संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ।

महाप्रस्थानिकं तस्मादूर्ध्वं सप्तदशं स्मृतम् ॥ ३६४ ॥

इस प्रकार यह सोलहवाँ मौसलपर्व कहा गया है । इसमें तत्त्वज्ञानी व्यासने गिनकर आठ ( ८ ) अध्याय और तीन सौ बीस ( ३२० ) श्लोक कहे हैं। इसके पश्चात् सत्रहवाँ महाप्रस्थानिकपर्व कहा गया है ॥ ३६३ - ३६४ ॥

यत्र राज्यं परित्यज्य पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ।

द्रौपद्या सहिता देव्या महाप्रस्थानमास्थिताः ॥ ३६५ ॥

जिसमें नरश्रेष्ठ पाण्डव अपना राज्य छोड़कर द्रौपदीके साथ महाप्रस्थानके * पथपर आ गये || ३६५ ॥

यत्र तेऽग्निं ददृशिरे लौहित्यं प्राप्य सागरम् ।

यत्राग्निना चोदितश्च पार्थस्तस्मै महात्मने ॥ ३६६ ॥

ददौ सम्पूज्य तद् दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ।

यत्र भ्रातॄन् निपतितान् द्रौपदीं च युधिष्ठिरः ॥ ३६७ ॥

दृष्ट्वा हित्वा जगामैव सर्वाननवलोकयन् ।

पृष्ठ 130

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एतत् सप्तदशं पर्व महाप्रस्थानिकं स्मृतम् ॥ ३६८ ॥

उस यात्रामें उन्होंने लाल सागरके पास पहुँचकर साक्षात् अग्निदेवको देखा और उन्हींकी प्रेरणासे पार्थने उन महात्माको आदरपूर्वक अपना उत्तम एवं दिव्य गाण्डीव धनुष अर्पण कर दिया । उसी पर्वमें यह भी कहा गया है कि राजा युधिष्ठिरने मार्गमें गिरे हुए अपने भाइयों और द्रौपदीको देखकर भी उनकी क्या दशा हुई यह जाननेके लिये पीछेकी ओर फिरकर नहीं देखा और उन सबको छोड़कर आगे बढ़ गये । यह सत्रहवाँ महाप्रस्थानिकपर्व कहा गया है ॥ ३६६-३६८ ॥

यत्राध्यायास्त्रयः प्रोक्ताः श्लोकानां च शतत्रयम् ।

विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥ ३६ ९ ॥

इसमें तत्त्वज्ञानी व्यासजीने तीन ( ३ ) अध्याय और एक सौ तेईस ( १२३ ) श्लोक गिनकर कहे हैं ॥ ३६ ९ ॥

स्वर्गपर्व ततो ज्ञेयं दिव्यं यत् तदमानुषम् ।

प्राप्तं दैवरथं स्वर्गान्नेष्टवान् यत्र धर्मराट् ॥ ३७० ॥

आरोढुं सुमहाप्राज्ञ आनृशंस्याच्छुना विना ।

तामस्याविचलां ज्ञात्वा स्थितिं धर्मे महात्मनः ॥ ३७१ ॥

श्वरूपं यत्र तत् त्यक्त्वा धर्मेणासौ समन्वितः ।

स्वर्गं प्राप्तः स च तथा यातना विपुला भृशम् ॥ ३७२ ॥

देवदूतेन नरकं यत्र व्याजेन दर्शितम् ।

शुश्राव यत्र धर्मात्मा भ्रातॄणां करुणा गिरः ॥ ३७३ ॥

निदेशे वर्तमानानां देशे तत्रैव वर्तताम् ।

अनुदर्शितश्च धर्मेण देवराजेन पाण्डवः ॥ ३७४ ॥

तदनन्तर स्वर्गारोहणपर्व जानना चाहिये । जो दिव्य वृत्तान्तोंसे युक्त और अलौकिक है । उसमें यह वर्णन आया है कि स्वर्गसे युधिष्ठिरको लेनेके लिये एक दिव्य रथ आया, किंतु महाज्ञानी धर्मराज युधिष्ठिरने दयावश अपने साथ आये हुए कुत्तेको छोड़कर अकेले उसपर चढ़ना स्वीकार नहीं किया । महात्मा युधिष्ठिरकी धर्ममें इस प्रकार अविचल स्थिति जानकर कुत्तेने अपने मायामय स्वरूपको त्याग दिया और अब वह साक्षात् धर्मके रूपमें स्थित हो गया । धर्मके साथ युधिष्ठिर स्वर्गमें गये । वहाँ देवदूतने व्याजसे उन्हें नरककी विपुल यातनाओंका दर्शन कराया । वहीं धर्मात्मा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंकी करुणाजनक पुकार सुनी थी । वे सब वहीं नरकप्रदेशमें यमराजकी आज्ञाके अधीन रहकर यातना भोगते थे । तत्पश्चात् धर्मराज तथा देवराजने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको वास्तवमें उनके भाइयोंको जो सद्गति प्राप्त हुई थी, उसका दर्शन कराया ॥ ३७०—३७४ ॥

आप्लुत्याकाशगङ्गायां देहं त्यक्त्वा स मानुषम् ।

स्वधर्मनिर्जितं स्थानं स्वर्गे प्राप्य स धर्मराट् ॥ ३७५ ॥