महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 131–140
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140
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मुमुदे पूजितः सर्वैः सेन्द्रैः सुरगणैः सह ।
एतदष्टादशं पर्व प्रोक्तं व्यासेन धीमता ॥ ३७६ ॥
इसके बाद धर्मराजने आकाशगंगामें गोता लगाकर मानवशरीरको त्याग दिया और स्वर्गलोकमें अपने धर्मसे उपार्जित उत्तम स्थान पाकर वे इन्द्रादि देवताओंके साथ उनसे सम्मानित हो आनन्दपूर्वक रहने लगे । इस प्रकार बुद्धिमान् व्यासजीने यह अठारहवाँ पर्व कहा है ॥ ३७५-३७६ ॥
अध्यायाः पञ्च संख्याताः पर्वण्यस्मिन् महात्मना ।
श्लोकानां द्वे शते चैव प्रसंख्याते तपोधनाः ॥ ३७७ ॥
नव श्लोकास्तथैवान्ये संख्याताः परमर्षिणा ।
अष्टादशैवमेतानि पर्वाण्युक्तान्यशेषतः ॥ ३७८ ॥
तपोधनो! परम ऋषि महात्मा व्यासजीने इस पर्वमें गिने - गिनाये पाँच ( ५ ) अध्याय और दो सौ नौ ( २० ९ ) श्लोक कहे हैं । इस प्रकार ये कुल मिलाकर अठारह पर्व कहे गये हैं ॥ ३७७-३७८ ॥
खिलेषु हरिवंशश्च भविष्यं च प्रकीर्तितम् ।
दशश्लोकसहस्राणि विंशच्छ्लोकशतानि च ॥ ३७ ९ ॥
खिलेषु हरिवंशे च संख्यातानि महर्षिणा ।
एतत् सर्वं समाख्यातं भारते पर्वसंग्रहः ॥ ३८० ॥
खिलपर्वोंमें हरिवंश तथा भविष्यका वर्णन किया गया है । हरिवंशके खिलपर्वोंमें महर्षि व्यासने गणनापूर्वक बारह हजार ( १२,००० ) श्लोक रखे हैं । इस प्रकार महाभारतमें यह सब पर्वोंका संग्रह बताया गया है ॥ ३७ ९ -३८० ॥
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ।
तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥ ३८१ ॥
कुरुक्षेत्रमें युद्धकी इच्छासे अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं और वह महाभयंकर युद्ध अठारह दिनोंतक चलता रहा ॥ ३८१ ॥
यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः ।
न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥ ३८२ ॥
जो द्विज अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंको जानता है, परंतु इस महाभारत-इतिहासको नहीं जानता, वह विशिष्ट विद्वान् नहीं है ॥ ३८२ ॥
अर्थशास्त्रमिदं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमिदं महत् ।
कामशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥ ३८३ ॥
असीम बुद्धिवाले महात्मा व्यासने यह अर्थशास्त्र कहा है । यह महान् धर्मशास्त्र भी है, इसे कामशास्त्र भी कहा गया है ( और मोक्षशास्त्र तो यह है ही ) ॥ ३८३ ॥
श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यन्न रोचते ।
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पुंस्कोकिलरुतं श्रुत्वा रूक्षा ध्वाङ्क्षस्य वागिव ॥ ३८४ ॥
इस उपाख्यानको सुन लेनेपर और कुछ सुनना अच्छा नहीं लगता । भला कोकिलका कलरव सुनकर कौओंकी कठोर ' काँय- काँय' किसे पसंद आयेगी? ॥ ३८४ ॥
इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः ।
पञ्चभ्य इव भूतेभ्यो लोकसंविधयस्त्रयः ॥ ३८५ ॥
जैसे पाँच भूतोंसे त्रिविध ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ) लोकसृष्टियाँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार इस उत्तम इतिहाससे कवियोंको काव्यरचनाविषयक बुद्धियाँ प्राप्त होती हैं ॥ ३८५ ॥
अस्याख्यानस्य विषये पुराणं वर्तते द्विजाः ।
अन्तरिक्षस्य विषये प्रजा इव चतुर्विधाः ॥ ३८६ ॥
द्विजवरो! इस महाभारत - इतिहासके भीतर ही अठारह पुराण स्थित हैं, ठीक उसी तरह, जैसे आकाशमें ही चारों प्रकारकी प्रजा (जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्भिज्ज ) विद्यमान हैं ॥ ३८६ ॥
क्रियागुणानां सर्वेषामिदमाख्यानमाश्रयः ।
इन्द्रियाणां समस्तानां चित्रा इव मनः क्रियाः ॥ ३८७ ॥
जैसे विचित्र मानसिक क्रियाएँ ही समस्त इन्द्रियोंकी चेष्टाओंका आधार हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण लौकिक- वैदिक कर्मोंके उत्कृष्ट फल- साधनोंका यह आख्यान ही आधार है ॥ ३८७ ॥
अनाश्रित्यैतदाख्यानं कथा भुवि न विद्यते ।
आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥ ३८८ ॥
जैसे भोजन किये बिना शरीर नहीं रह सकता, वैसे ही इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसी कथा नहीं है जो इस महाभारतका आश्रय लिये बिना प्रकट हुई हो ॥ ३८८ ॥
इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते ।
उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥ ३८ ९ ॥
अस्य काव्यस्य कवयो न समर्था विशेषणे ।
साधोरिव गृहस्थस्य शेषास्त्रय इवाश्रमाः ॥ ३ ९ ० ॥
सभी श्रेष्ठ कवि इस महाभारतकी कथाका आश्रय लेते हैं और लेंगे । ठीक वैसे ही, जैसे उन्नति चाहनेवाले सेवक श्रेष्ठ स्वामीका सहारा लेते हैं । जैसे शेष तीन आश्रम उत्तम गृहस्थ आश्रमसे बढ़कर नहीं हो सकते, उसी प्रकार संसारके कवि इस महाभारत काव्यसे बढ़कर काव्य - रचना करनेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ३८ ९ -३ ९० ॥ धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां स ह्येक एव परलोकगतस्य बन्धुः । अर्थाः स्त्रियश्च निपुणैरपि सेव्यमाना
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नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥ ३ ९ १ ॥ तपस्वी महर्षियो! ( तथा महाभारतके पाठको! ) आप सब लोग सदा सांसारिक आसक्तियोंसे ऊँचे उठें और आपका मन सदा धर्ममें लगा रहे; क्योंकि परलोकमें गये हुए जीवका बन्धु या सहायक एकमात्र धर्म ही है । चतुर मनुष्य भी धन और स्त्रियोंका सेवन तो करते हैं, किंतु वे उनकी श्रेष्ठतापर विश्वास नहीं करते और न उन्हें स्थिर ही मानते हैं ॥ ३ ९ १ ॥ द्वैपायनोष्ठपुटनिःसृतमप्रमेयं पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च । यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ॥ ३ ९ २ ॥ जो व्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय ( अतुलनीय ) पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है, उसे पुष्करतीर्थके जलमें गोता लगानेकी क्या आवश्यकता है? ॥ ३ ९ २ ॥
यदह्ना कुरुते पापं ब्राह्मणस्त्विन्द्रियैश्चरन् ।
महाभारतमाख्याय संध्यां मुच्यति पश्चिमाम् ॥ ३ ९ ३ ॥
ब्राह्मण दिनमें अपनी इन्द्रियोंद्वारा जो पाप करता है, उससे सायंकाल महाभारतका पाठ करके मुक्त हो जाता है ॥ ३ ९ ३ ॥
यद् रात्रौ कुरुते पापं कर्मणा मनसा गिरा ।
महाभारतमाख्याय पूर्वं संध्यां प्रमुच्यते ॥ ३ ९ ४ ॥
इसी प्रकार वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा रातमें जो पाप करता है, उससे प्रातःकाल महाभारतका पाठ करके छूट जाता है ॥ ३ ९ ४ ॥ यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां शृणुयाच्च नित्यं तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥ ३ ९ ५ ॥ जो गौओंके सींगमें सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणको प्रतिदिन सौ गौएँ दान देता है और जो केवल महाभारत -कथाका श्रवणमात्र करता है, इन दोनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है ॥ ३ ९ ५ आख्यानं तदिदमनुत्तमं महार्थं विज्ञेयं महदिह पर्वसंग्रहेण । श्रुत्वादौ भवति नृणां सुखावगाहं विस्तीर्णं लवणजलं यथा प्लवेन ॥ ३ ९ ६ ॥
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यह महान् अर्थसे भरा हुआ परम उत्तम महाभारत - आख्यान यहाँ पर्वसंग्रहाध्यायके द्वारा समझना चाहिये । इस अध्यायको पहले सुन लेनेपर मनुष्योंके लिये महाभारत - जैसे महासमुद्रमें प्रवेश करना उसी प्रकार सुगम हो जाता है जैसे जहाजकी सहायतासे अनन्त जल - राशिवाले समुद्रमें प्रवेश सहज हो जाता है ॥ ३ ९ ६ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि पर्वसंग्रहपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत पर्वसंग्रहपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
१. अधिक नीचा-ऊँचा होना, काँटेदार वृक्षोंसे व्याप्तहोना तथा कंकड़- पत्थरोंकी अधिकताका होना आदि भूमिसम्बन्धी दोष माने गये हैं । २. समन्त नामक क्षेत्रमें पाँच कुण्ड या सरोवर होनेसे उस क्षेत्र और उसके समीपवर्ती प्रदेशका भी समन्तपंचक नाम हुआ । परंतु उसका समन्त नाम क्यों पड़ा, इसका कारण इस श्लोकमें बता रहे हैं – ' समेतानाम् अन्तो यस्मिन् स समन्तः ’ –समागत सेनाओंका अन्त हुआ हो जिस स्थानपर, उसे समन्त कहते हैं । इसी व्युत्पत्तिके अनुसार वह क्षेत्र समन्त कहलाता है । * घर छोड़कर निराहार रहते हुए, स्वेच्छासे मृत्युका वरण करनेके लिये निकल जाना और विभिन्न दिशाओंमें भ्रमण करते हुए अन्तमें उत्तर दिशा - हिमालयकी ओर जाना - महाप्रस्थान कहलाता है— पाण्डवोंने ऐसा ही किया ।
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(पौष्यपर्व) तृतीयोऽध्यायः जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण, आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना सौतिरुवाच जनमेजयः पारीक्षितः सह भ्रातृभिः कुरुक्षेत्रे दीर्घसत्रमुपास्ते । तस्य भ्रातरस्त्रयः
श्रुतसेन उग्रसेनो भीमसेन इति । तेषु तत्सत्रमुपासीनेष्वागच्छत् सारमेयः ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— परीक्षित्के पुत्र जनमेजय अपने भाइयोंके साथ कुरुक्षेत्रमें दीर्घकालतक चलनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करते थे । उनके तीन भाई थे — श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन । वे तीनों उस यज्ञमें बैठे थे । इतनेमें ही देवताओंकी कुतिया सरमाका पुत्र सारमेय वहाँ आया ॥ १ ॥
स जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतो रोरूयमाणो मातुः समीपमुपागच्छत् ॥ २ ॥
जनमेजयके भाइयोंने उस कुत्तेको मारा । तब वह रोता हुआ अपनी माँके पास गया ॥ २ ॥
तं माता रोरूयमाणमुवाच । किं रोदिषि केनास्यभिहत इति ॥ ३ ॥
बार- बार रोते हुए अपने उस पुत्रसे माताने पूछा - ' बेटा! क्यों रोता है? किसने तुझे मारा है? ' ॥ ३ ॥
स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतोऽस्मीति ॥ ४ ॥
माताके इस प्रकार पूछनेपर उसने उत्तर दिया- ' माँ! मुझे जनमेजयके भाइयोंने मारा है ' ॥ ४ ॥
तं माता प्रत्युवाच व्यक्तं त्वया तत्रापराद्धं येनास्यभिहत इति ॥ ५ ॥
तब माता उससे बोली- ' बेटा! अवश्य ही तूने उनका कोई प्रकटरूपमें अपराध किया होगा, जिसके कारण उन्होंने तुझे मारा है ' ॥ ५ ॥
स तां पुनरुवाच नापराध्यामि किंचिन्नावेक्षे हवींषि नावलिह इति ॥ ६ ॥
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तब उसने मातासे पुनः इस प्रकार कहा-' मैंने कोई अपराध नहीं किया है । न तो उनके हविष्यकी ओर देखा और न उसे चाटा ही है ' ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा तस्य माता सरमा पुत्रदुःखार्ता तत् सत्रमुपागच्छद् यत्र स जनमेजयः सह भ्रातृभिर्दीर्घ - सत्रमुपास्ते ॥ ७ ॥
यह सुनकर पुत्रके दुःखसे दुःखी हुई उसकी माता सरमा उस सत्रमें आयी, जहाँ जनमेजय अपने भाइयोंके साथ दीर्घकालीन सत्रका अनुष्ठान कर रहे थे ॥ ७ ॥
स तया क्रुद्धया तत्रोक्तोऽयं मे पुत्रो न किंचिदपराध्यति नावेक्षते हवींषि नावलेढि किमर्थमभिहत इति ॥ ८ ॥
वहाँ क्रोधमें भरी हुई सरमाने जनमेजयसे कहा- ' मेरे इस पुत्रने तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया था, न तो इसने हविष्यकी ओर देखा और न उसे चाटा ही था, तब तुमने इसे क्यों मारा? ' ॥ ८ ॥
न किञ्चिदुक्तवन्तस्ते सा तानुवाच यस्मादयमभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भयमागमिष्यतीति ॥ ९ ॥
किंतु जनमेजय और उनके भाइयोंने इसका कुछ भी उत्तर नहीं दिया । तब सरमाने उनसे कहा, ‘ मेरा पुत्र निरपराध था, तो भी तुमने इसे मारा है; अतः तुम्हारे ऊपर अकस्मात् ऐसा भय उपस्थित होगा, जिसकी पहलेसे कोई सम्भावना न रही हो' ॥ ९ ॥
जनमेजय एवमुक्तो देवशुन्या सरमया भृशं सम्भ्रान्तो विषण्णश्चासीत् ॥ १० ॥
देवताओंकी कुतिया सरमाके इस प्रकार शाप देनेपर जनमेजयको बड़ी घबराहट हुई और वे बहुत दुःखी हो गये ॥ १० ॥
स तस्मिन् सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विच्छमानः परं यत्नमकरोद् यो मे पापकृत्यां शमयेदिति ॥ ११ ॥
उस सत्रके समाप्त होनेपर वे हस्तिनापुरमें आये और अपनेयोग्य पुरोहितकी खोज करते हुए इसके लिये बड़ा यत्न करने लगे । पुरोहितके ढूँढ़नेका उद्देश्य यह था कि वह मेरी इस शापरूप पापकृत्याको ( जो बल, आयु और प्राणका नाश करनेवाली है ) शान्त कर दे ॥ ११ ॥
स कदाचिन्मृगयां गतः पारीक्षितो जनमेजयः कस्मिंश्चित् स्वविषय आश्रममपश्यत् ॥ १२ ॥
एक दिन परीक्षित्पुत्र जनमेजय शिकार खेलनेके लिये वनमें गये । वहाँ उन्होंने एक आश्रम देखा, जो उन्हींके राज्यके किसी प्रदेशमें विद्यमान था ॥ १२ ॥
तत्र कश्चिदृषिरासांचक्रे श्रुतश्रवा नाम । तस्य तपस्यभिरतः पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम ॥ १३ ॥
उस आश्रममें श्रुतश्रवा नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि रहते थे । उनके पुत्रका नाम था सोमश्रवा । सोमश्रवा सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे ॥ १३ ॥
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तस्य तं पुत्रमभिगम्य जनमेजयः पारीक्षितः पौरोहित्याय वव्रे ॥ १४ ॥
परीक्षित्कुमार जनमेजयने महर्षि श्रुतश्रवाके पास जाकर उनके पुत्र सोमश्रवाका पुरोहितपदके लिये वरण किया ॥ १४ ॥
स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच भगवन्नयं तव पुत्रो मम पुरोहितोऽस्त्विति ॥ १५ ॥
राजाने पहले महर्षिको नमस्कार करके कहा- ' भगवन्! आपके ये पुत्र सोमश्रवा मेरे पुरोहित हों ' ॥ १५ ॥
स एवमुक्तः प्रत्युवाच जनमेजयं भो जनमेजय पुत्रोऽयं मम सर्प्य जातो महातपस्वी स्वाध्याय- सम्पन्नो मत्तपोवीर्यसम्भृतो मच्छुक्रं पीतवत्यास्तस्याः कुक्षौ जातः ॥ १६ ॥
उनके ऐसा कहनेपर श्रुतश्रवाने जनमेजयको इस प्रकार उत्तर दिया –‘महाराज जनमेजय! मेरा यह पुत्र सोमश्रवा सर्पिणीके गर्भसे पैदा हुआ है । यह बड़ा तपस्वी और स्वाध्यायशील है । मेरे तपोबलसे इसका भरण- पोषण हुआ है । एक समय एक सर्पिणीने मेरा वीर्यपान कर लिया था, अतः उसीके पेटसे इसका जन्म हुआ है ॥ १६ ॥
समर्थोऽयं भवतः सर्वाः पापकृत्याः शमयितु - मन्तरेण महादेवकृत्याम् ॥ १७ ॥
यह तुम्हारी सम्पूर्ण पापकृत्याओं ( शापजनित उपद्रवों) का निवारण करने में समर्थ है । केवल भगवान् शंकरकी कृत्याको यह नहीं टाल सकता ॥ १७ ॥
अस्य त्वेकमुपांशुव्रतं यदेनं कश्चिद् ब्राह्मणः कंचिदर्थमभियाचेत् तं तस्मै दद्यादयं यद्येतदुत्सहसे ततो नयस्वैनमिति ॥ १८ ॥
किंतु इसका एक गुप्त नियम है । यदि कोई ब्राह्मण इसके पास आकर इससे किसी वस्तुकी याचना करेगा तो यह उसे उसकी अभीष्ट वस्तु अवश्य देगा । यदि तुम उदारतापूर्वक इसके इस व्यवहारको सहन कर सको अथवा इसकी इच्छापूर्तिका उत्साह दिखा सको तो इसे ले जाओ ' ॥ १८ ॥
तेनैवमुक्तो जनमेजयस्तं प्रत्युवाच भगवंस्तत् तथा भविष्यतीति ॥ १ ९ ॥ श्रुतश्रवाके ऐसा कहनेपर जनमेजयने उत्तर दिया-' भगवन्! सब कुछ उनकी रुचिके अनुसार ही होगा ' ॥ १ ९ ॥ स तं पुरोहितमुपादायोपावृत्तो भ्रातॄनुवाच मयायं वृत उपाध्यायो यदयं ब्रूयात् तत् कार्यमविचारयद्भिर्भवद्भिरिति । तेनैवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्रुः । स तथा भ्रातॄन् संदिश्य तक्षशिलां प्रत्यभिप्रतस्थे तं च देशं वशे स्थापयामास ॥ २० ॥
फिर वे सोमश्रवा पुरोहितको साथ लेकर लौटे और अपने भाइयोंसे बोले — ' इन्हें मैंने अपना उपाध्याय ( पुरोहित) बनाया है । ये जो कुछ भी कहें, उसे तुम्हें बिना किसी सोच-विचारके पालन करना चाहिये। ' जनमेजयके ऐसा कहनेपर उनके तीनों भाई पुरोहितकी प्रत्येक आज्ञाका ठीक-ठीक पालन करने लगे । इधर राजा जनमेजय अपने भाइयोंको
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पूर्वोक्त आदेश देकर स्वयं तक्षशिला जीतनेके लिये चले गये और उस प्रदेशको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ २० ॥
नामायोदस्तस्य शिष्यास्त्रयोबभूवुरुपमन्युरारुणिर्वेदश्चेतिएतस्मिन्नन्तरे कश्चिदृषिर्धोम्यो॥ २१ ॥
(गुरुकी आज्ञाका किस प्रकार पालन करना चाहिये, इस विषयमें आगेका प्रसंग कहा जाता है— ) इन्हीं दिनों आयोदधौम्य नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे । उनके तीन शिष्य हुए-उपमन्यु, आरुणि पांचाल तथा वेद ॥ २१ ॥
स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्यं प्रेषयामास गच्छ केदारखण्डं बधानेति ॥ २२ ॥
एक दिन उपाध्यायने अपने एक शिष्य पांचालदेशवासी आरुणिको खेतपर भेजा और कहा — ‘ वत्स! जाओ, क्यारियोंकी टूटी हुई मेड़ बाँध दो ' ॥ २२ ॥
स उपाध्यायेन संदिष्ट आरुणिः पाञ्चाल्यस्तत्र गत्वा तत् केदारखण्डं बद्धुं नाशकत् । स क्लिश्यमानोऽपश्यदुपायं भवत्वेवं करिष्यामि ॥ २३ ॥
उपाध्यायके इस प्रकार आदेश देनेपर पांचालदेशवासी आरुणि वहाँ जाकर उस धानकी क्यारीकी मेड़ बाँधने लगा; परंतु बाँध न सका । मेड़ बाँधनेके प्रयत्नमें ही परिश्रम करते - करते उसे एक उपाय सूझ गया और वह मन- ही - मन बोल उठा-‘अच्छा; ऐसा ही करूँ' ॥ २३ ॥
स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ ॥ २४ ॥
वह क्यारीकी टूटी हुई मेड़की जगह स्वयं ही लेट गया । उसके लेट जानेपर वहाँका बहता हुआ जल रुक गया ॥ २४ ॥
ततः कदाचिदुपाध्याय आयोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत् क्व आरुणिः पाञ्चाल्यो गत इति ॥ २५ ॥
फिर कुछ कालके पश्चात् उपाध्याय आयोदधौम्यने अपने शिष्योंसे पूछा —'पांचालनिवासी आरुणि कहाँ चला गया? ' ॥ २५ ॥
ते तं प्रत्यूचुर्भगवंस्त्वयैव प्रेषितो गच्छ केदारखण्डं बधानेति । स एवमुक्तस्ताञ्छिष्यान् प्रत्युवाच तस्मात् तत्र सर्वे गच्छामो यत्र स गत इति ॥ २६ ॥
शिष्योंने उत्तर दिया— ' भगवन्! आपहीने तो उसे यह कहकर भेजा था कि ' जाओ, क्यारीकी टूटी हुई मेड़ बाँध दो । ' शिष्योंके ऐसा कहनेपर उपाध्यायने उनसे कहा — ‘ तो चलो, हम सब लोग वहीं चलें, जहाँ आरुणि गया है ' ॥ २६ ॥
स तत्र गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार । भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि वत्सैहीति ॥ २७ ॥
वहाँ जाकर उपाध्यायने उसे आनेके लिये आवाज दी- ' पांचालनिवासी आरुणि! कहाँ हो वत्स! यहाँ आओ ' ॥ २७ ॥
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स तच्छ्रुत्वा आरुणिरुपाध्यायवाक्यं तस्मात् केदारखण्डात् सहसोत्थाय तमुपाध्यायमुपतस्थे ॥ २८ ॥
उपाध्यायका यह वचन सुनकर आरुणि पांचाल सहसा उस क्यारीकी मेड़से उठा और उपाध्यायके समीप आकर खड़ा हो गया ॥ २८ ॥
प्रोवाच चैनमयमस्म्यत्र केदारखण्डे निःसरमाणमुदकमवारणीयं संरोद्धुं संविष्टो भगवच्छब्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थितः ॥ २९ ॥
फिर उनसे विनयपूर्वक बोला- ' भगवन्! मैं यह हूँ, क्यारीकी टूटी हुई मेड़से निकलते हुए अनिवार्य जलको रोकनेके लिये स्वयं ही यहाँ लेट गया था । इस समय आपकी आवाज सुनते ही सहसा उस मेड़को विदीर्ण करके आपके पास आ खड़ा हुआ ॥ २ ९ ॥ तदभिवादये भगवन्तमाज्ञापयतु भवान् कमर्थं करवाणीति ॥ ३० ॥
' मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, आप आज्ञा दीजिये, मैं कौन- सा कार्य करूँ? ' ॥ ३० ॥
स एवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच यस्माद् भवान् केदारखण्डंविदार्योत्थितस्तस्मादुद्दालक एव नाम्ना भवान् भविष्यतीत्युपाध्यायेनानुगृहीतः ॥ ३१ ॥
आरुणिके ऐसा कहनेपर उपाध्यायने उत्तर दिया- ' तुम क्यारीके मेड़को विदीर्ण करके उठे हो, अतः इस उद्दलनकर्मके कारण उद्दालक नामसे ही प्रसिद्ध होओगे । ' ऐसा कहकर उपाध्यायने आरुणिको अनुगृहीत किया ॥ ३१ ॥
यस्माच्च त्वया मद्वचनमनुष्ठितं तस्माच्छ्रेयोऽवाप्स्यसि । सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति ॥ ३२ ॥
साथ ही यह भी कहा कि, ' तुमने मेरी आज्ञाका पालन किया है, इसलिये तुम कल्याणके भागी होओगे । सम्पूर्ण वेद और समस्त धर्मशास्त्र तुम्हारी बुद्धिमें स्वयं प्रकाशित हो जायँगे ' ॥ ३२ ॥
स एवमुक्त उपाध्यायेनेष्टं देशं जगाम । अथापरः शिष्यस्तस्यैवायोदस्य धौम्यस्योपमन्युर्नाम ॥ ३३ ॥
उपाध्यायके इस प्रकार आशीर्वाद देनेपर आरुणि कृतकृत्य हो अपने अभीष्ट देशको चला गया । उन्हीं आयोदधौम्य उपाध्यायका उपमन्यु नामक दूसरा शिष्य था ॥ ३३ ॥
तं चोपाध्यायः प्रेषयामास वत्सोपमन्यो गा रक्षस्वेति ॥ ३४ ॥
उसे उपाध्यायने आदेश दिया- ' वत्स उपमन्यु! तुम गौओंकी रक्षा करो ' ॥ ३४ ॥
स उपाध्यायवचनादरक्षद् गाः; स चाहनि गा रक्षित्वा दिवसक्षये गुरुगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ ३५ ॥
उपाध्यायकी आज्ञासे उपमन्यु गौओंकी रक्षा करने लगा । वह दिनभर गौओंकी रक्षामें रहकर संध्याके समय गुरुजीके घरपर आता और उनके सामने खड़ा हो नमस्कार
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करता ॥ ३५ ॥
तमुपाध्यायः पीवानमपश्यदुवाच चैनं वत्सोपमन्यो केन वृत्तिं कल्पयसि पीवानसि दृढमिति ॥ ३६ ॥
उपाध्यायने देखा उपमन्यु खूब मोटा-ताजा हो रहा है, तब उन्होंने पूछा— ' बेटा उपमन्यु! तुम कैसे जीविका चलाते हो, जिससे इतने अधिक हृष्ट- पुष्ट हो रहे हो? ' ॥ ३६ ॥
स उपाध्यायं प्रत्युवाच भो भैक्ष्यैण वृत्तिं कल्पयामीति ॥ ३७ ॥
उसने उपाध्यायसे कहा— ' गुरुदेव! मैं भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता हूँ' ॥ ३७ ॥
तमुपाध्यायः प्रत्युवाच मय्यनिवेद्य भैक्ष्यं नोपयोक्तव्यमिति । स तथेत्युक्त्वा भैक्ष्यं चरित्वोपाध्यायाय न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥
यह सुनकर उपाध्याय उपमन्युसे बोले- ' मुझे अर्पण किये बिना तुम्हें भिक्षाका अन्न अपने उपयोगमें नहीं लाना चाहिये । ' उपमन्युने ' बहुत अच्छा ' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली । अब वह भिक्षा लाकर उपाध्यायको अर्पण करने लगा ॥ ३८ ॥
स तस्मादुपाध्यायः सर्वमेव भैक्ष्यमगृह्णात् । स तथेत्युक्त्वा पुनररक्षद् गाः ।
अहनि रक्षित्वा निशामुखे गुरुकुलमागम्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ ३ ९ ॥
उपाध्याय उपमन्युसे सारी भिक्षा ले लेते थे । उपमन्यु ' तथास्तु' कहकर पुनः पूर्ववत् गौओंकी रक्षा करता रहा । वह दिनभर गौओंकी रक्षामें रहता और ( संध्याके समय ) पुनः गुरुके घरपर आकर गुरुके सामने खड़ा हो नमस्कार करता था ॥ ३ ९ ॥ तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वोवाच वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैक्ष्यं गृह्णामि केनेदानीं वृत्तिं कल्पयसीति ॥ ४० ॥
उस दशामें भी उपमन्युको पूर्ववत् हृष्ट- पुष्ट ही देखकर उपाध्यायने पूछा- ' बेटा उपमन्यु! तुम्हारी सारी भिक्षा तो मैं ले लेता हूँ, फिर तुम इस समय कैसे जीवन- निर्वाह करते हो? ' ॥ ४० ॥
स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच भगवते निवेद्य पूर्वमपरं चरामि तेन वृत्तिं कल्पयामीति ॥ ४१ ॥
उपाध्यायके ऐसा कहनेपर उपमन्युने उन्हें उत्तर दिया- ' भगवन्! पहलेकी लायी हुई भिक्षा आपको अर्पित करके अपने लिये दूसरी भिक्षा लाता हूँ और उसीसे अपनी जीविका चलाता हूँ' ॥ ४१ ॥
तमुपाध्यायः प्रत्युवाच नैषा न्याय्या गुरुवृत्तिरन्येषामपि भैक्ष्योपजीविनां वृत्त्युपरोधं करोषि इत्येवं वर्तमानो लुब्धोऽसीति ॥ ४२ ॥
यह सुनकर उपाध्यायने कहा –' यह न्याययुक्त एवं श्रेष्ठ वृत्ति नहीं है । तुम ऐसा करके दूसरे भिक्षाजीवी लोगोंकी जीविकामें बाधा डालते हो; अतः लोभी हो ( तुम्हें दुबारा भिक्षा नहीं लानी चाहिये ) ' ॥ ४२ ॥