महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1281–1290
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1281–1290
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एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप अर्जुन उवाच
राज्ञा कल्माषपादेन गुरौ ब्रह्मविदां वरे ।
कारणं किं पुरस्कृत्य भार्या वै संनियोजिता ॥ १ ॥
अर्जुनने पूछा- गन्धर्वराज! किस कारणको सामने रखकर राजा कल्माषपादने ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठजीके साथ अपनी पत्नीका नियोग कराया था? ॥ १ ॥
जानता वै परं धर्मं वसिष्ठेन महात्मना ।
अगम्यागमनं कस्मात् कृतं तेन महर्षिणा ॥ २ ॥
तथा उत्तम धर्मके ज्ञाता महात्मा महर्षि वसिष्ठने यह परस्त्रीगमनका पाप कैसे किया? ॥ २ ॥
अधर्मिष्ठं वसिष्ठेन कृतं चापि पुरा सखे ।
एतन्मे संशयं सर्वं छेत्तुमर्हसि पृच्छतः ॥ ३ ॥
सखे! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने जो यह अधर्म- कार्य किया, उसका क्या कारण है? यह मेरा संशय है, जिसे मैं पूछता हूँ । आप मेरे इन सारे संशयोंका निवारण कीजिये ॥ ३ ॥
गन्धर्व उवाच
धनंजय निबोधेदं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
वसिष्ठं प्रति दुर्धर्ष तथा मित्रसहं नृपम् ॥ ४ ॥
गन्धर्वने कहा — दुर्धर्ष वीर धनंजय! आप महर्षि वसिष्ठ तथा राजा मित्रसहके विषयमें जो कुछ मुझसे पूछ रहे हैं, उसका समाधान सुनिये ॥ ४ ॥
कथितं ते मया सर्वं यथा शप्तः स पार्थिवः ।
शक्तिना भरतश्रेष्ठ वासिष्ठेन महात्मना ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठपुत्र महात्मा शक्तिसे राजा कल्माषपादको जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ, वह सब प्रसंग मैं आपसे कह चुका हूँ ॥ ५ ॥
स तु शापवशं प्राप्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ।
निर्जगाम पुराद् राजा सहदारः परंतपः ॥ ६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा कल्माषपाद शापके परवश हो अपनी पत्नीके साथ नगरसे बाहर निकल गये । उस समय उनकी आँखें क्रोधसे व्याप्त हो रही थीं ॥ ६ ॥
अरण्यं निर्जनं गत्वा सदारः परिचक्रमे ।
नानामृगगणाकीर्णं नानासत्त्वसमाकुलम् ॥ ७ ॥
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अपनी स्त्रीके साथ निर्जन वनमें जाकर वे चारों ओर चक्कर लगाने लगे । वह महान् वन भाँति - भाँतिके मृगोंसे भरा हुआ था । उसमें नाना प्रकारके जीव-जन्तु निवास करते थे ॥ ७ ॥
नानागुल्मलताच्छन्नं नानाद्रुमसमावृतम् ।
अरण्यं घोरसंनादं शापग्रस्तः परिभ्रमन् ॥ ८ ॥
अनेक प्रकारकी लताओं तथा गुल्मोंसे आच्छादित और विविध प्रकारके वृक्षोंसे आवृत वह ( गहन ) वन भयंकर शब्दोंसे गूँजता रहता था । शापग्रस्त राजा कल्माषपाद उसीमें भ्रमण करने लगे ॥ ८ ॥
स कदाचित् क्षुधाविष्टो मृगयन् भक्ष्यमात्मनः ।
ददर्श सुपरिक्लिष्टः कस्मिंश्चिन्निर्जने वने ॥ ९ ॥
ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव मिथुनायोपसंगतौ ।
तौ तं वीक्ष्य सुवित्रस्तावकृतार्थौ प्रधावितौ ॥ १० ॥
एक दिन भूखसे व्याकुल हो वे अपने लिये भोजनकी तलाश करने लगे । बहुत क्लेश उठानेके बाद उन्होंने देखा कि उस वनके किसी निर्जन प्रदेशमें एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी मैथुनके लिये एकत्र हुए हैं । वे दोनों अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पाये थे, इतनेहीमें उन राक्षसाविष्ट कल्माषपादको देखकर अत्यन्त भयभीत हो (वहाँसे ) भाग चले ॥ ९ -१० ॥
तयोः प्रद्रवतोर्विप्रं जग्राह नृपतिर्बलात् ।
दृष्ट्वा गृहीतं भर्तारमथ ब्राह्मण्यभाषत ॥ ११ ॥
उन भागते हुए दम्पतिमेंसे ब्राह्मणको राजाने बलपूर्वक पकड़ लिया । पतिको राक्षसके हाथमें पड़ा देख ब्राह्मणी बोली– ॥ ११ ॥
शृणु राजन् मम वचो यत् त्वां वक्ष्यामि सुव्रत ।
आदित्यवंशप्रभवस्त्वं हि लोके परिश्रुतः ॥ १२ ॥
‘ राजन्! मैं आपसे जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले
नरेश! आपका जन्म सूर्यवंशमें हुआ है । आप सम्पूर्ण जगत् में विख्यात हैं ॥ १२ ॥
अप्रमत्तः स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतः ।
शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि ॥ १३ ॥
‘ आप सदा प्रमादशून्य होकर धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं । गुरुजनोंकी सेवामें सदा संलग्न रहते हैं । दुर्धर्ष वीर! यद्यपि आप इस समय शापसे ग्रस्त हैं, तो भी आपको पापकर्म नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥
ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते भर्तृव्यसनकर्शिता ।
अकृतार्था ह्यहं भर्त्रा प्रसवार्थं समागता ॥ १४ ॥
प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्तायं मे विसृज्यताम् ।
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' मेरा ऋतुकाल प्राप्त है, मैं पतिके कष्टसे दुःख पा रही हूँ । मैं संतानकी इच्छासे पतिके समीप आयी थी और उनसे मिलकर अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पायी हूँ । नृपश्रेष्ठ! ऐसी दशामें आप मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे इन पतिदेवताको छोड़ दीजिये ' ॥ १४ ॥
एवं विक्रोशमानायास्तस्यास्तु स नृशंसवत् ॥ १५ ॥
भर्तारं भक्षयामास व्याघ्रो मृगमिवेप्सितम् ।
तस्याः क्रोधाभिभूताया यान्यश्रूण्यपतन् भुवि ॥ १६ ॥
सोऽग्निः समभवद् दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत् ।
ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता ॥ १७ ॥
कल्माषपादं राजर्षिमशपद् ब्राह्मणी रुषा ।
यस्मान्ममाकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत् ॥ १८ ॥
प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेऽद्य प्रियो भर्ता महायशाः ।
तस्मात् त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षतः ॥ १ ९ ॥
पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम् ।
यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिताः ॥ २० ॥
तेन संगम्य ते भार्या तनयं जनयिष्यति ।
स ते वंशकरः पुत्रो भविष्यति नृपाधम ॥ २१ ॥
इस प्रकार ब्राह्मणी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याघ्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्मणीके पतिको खा लिया । उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरीं, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं । उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया । तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया -' ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते -देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा । जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी । नृपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा ' ॥ १५–२१ ॥
एवं शप्त्वा तु राजानं सा तमाङ्गिरसी शुभा ।
तस्यैव संनिधौ दीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ॥ २२ ॥
इस प्रकार राजाको शाप देकर वह सती साध्वी आंगिरसी राजा कल्माषपादके समीप ही प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर गयी ॥ २२ ॥
वसिष्ठश्च महाभागः सर्वमेतदवैक्षत ।
ज्ञानयोगेन महता तपसा च परंतप ॥ २३ ॥
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शत्रुसूदन अर्जुन! महाभाग वसिष्ठजी अपनी बड़ी भारी तपस्या तथा ज्ञानयोगके प्रभावसे ये सब बातें जानते थे ॥ २३ ॥
मुक्तशापश्च राजर्षिः कालेन महता ततः ।
ऋतुकालेऽभिपतितो मदयन्त्या निवारितः ॥ २४ ॥
दीर्घकालके पश्चात् वे राजर्षि जब शापसे मुक्त हुए, तब ऋतुकालमें अपनी पत्नीके पास गये । परंतु उनकी रानी मदयन्तीने उन्हें ( उक्त शापकी याद दिलाकर) रोक दिया ॥ २४ ॥
न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः ।
देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा सम्भ्रान्तो नृपसत्तमः ॥ २५ ॥
राजा कल्माषपाद कामसे मोहित हो रहे थे । इसलिये उन्हें शापका स्मरण नहीं रहा । महारानी मदयन्तीकी बात सुनकर वे नृपश्रेष्ठ बड़े सम्भ्रम ( घबराहट) में पड़ गये ॥ २५ ॥
तं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यद् भृशं तदा ।
एतस्मात् कारणाद् राजा वसिष्ठं संन्ययोजयत् ।
स्वदारेषु नरश्रेष्ठ शापदोषसमन्वितः ॥ २६ ॥
उस शापको बार- बार याद करके उन्हें बड़ा संताप हुआ । नृपश्रेष्ठ! इसी कारण शापदोषसे युक्त राजा कल्माषपादने महर्षि वसिष्ठका अपनी पत्नीके साथ नियोग कराया ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वसिष्ठोपाख्याने एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठोपाख्यानविषयक एक सौ इक्यासीवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १८१ ॥
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द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका धौम्यको अपना पुरोहित बनाना अर्जुन उवाच
अस्माकमनुरूपो वै यः स्याद् गन्धर्व वेदवित् ।
पुरोहितस्तमाचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा- गन्धर्वराज! हमारे अनुरूप जो कोई वेदवेत्ता पुरोहित हों, उनका नाम बताओ; क्योंकि तुम्हें सब कुछ ज्ञात है ॥ १ ॥
गन्धर्व उवाच
यवीयान् देवलस्यैष वने भ्राता तपस्यति ।
धौम्य उत्कोचके तीर्थे तं वृणुध्वं यदीच्छथ ॥ २ ॥
गन्धर्व बोला –कुन्तीनन्दन! इसी वनके उत्कोचक तीर्थमें महर्षि देवलके छोटे भाई धौम्य मुनि तपस्या करते हैं । यदि आपलोग चाहें तो उन्हींका पुरोहितके पदपर वरण करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽर्जुनोऽस्त्रमाग्नेयं प्रददौ तद् यथाविधि ।
गन्धर्वाय तदा प्रीतो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तब अर्जुनने (बहुत ) प्रसन्न होकर गन्धर्वको विधिपूर्वक आग्नेयास्त्र प्रदान किया और यह बात कही- ॥ ३ ॥
त्वय्येव तावत् तिष्ठन्तु हया गन्धर्वसत्तम ।
कार्यकाले ग्रहीष्यामः स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥
तेऽन्योन्यमभिसम्पूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश्च ह ।
रम्याद् भागीरथीतीराद् यथाकामं प्रतस्थिरे ॥ ५ ॥
‘ गन्धर्वप्रवर! तुमने जो घोड़े दिये हैं, वे अभी तुम्हारे ही पास रहें । आवश्यकताके समय हम तुमसे ले लेंगे, तुम्हारा कल्याण हो । ' अर्जुनकी यह बात पूरी होनेपर गन्धर्वराज और पाण्डवोंने एक- दूसरेका बड़ा सत्कार किया । फिर पाण्डवगण गंगाके रमणीय तटसे अपनी इच्छाके अनुसार चल दिये ॥ ४-५ ॥
तत उत्कोचकं तीर्थं गत्वा धौम्याश्रमं'तुतु ते ।
तं वव्रुः पाण्डवा धौम्यं पौरोहित्याय भारत ॥ ६ ॥
जनमेजय! तदनन्तर उत्कोचक तीर्थमें धौम्यके आश्रमपर जाकर पाण्डवोंने धौम्यका पौरोहित्य - कर्मके लिये वरण किया ॥ ६ ॥
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तान् धौम्यः प्रतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः ।
वन्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह ॥ ७ ॥
सम्पूर्ण वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ धौम्यने जंगली फल- मूल अर्पण करके तथा पुरोहितीके लिये स्वीकृति देकर उन सबका सत्कार किया ॥ ७ ॥
ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवाः ।
ब्राह्मणं तै पुरस्कृत्य पाञ्चालीं च स्वयंवरे ॥ ८ ॥
पाण्डवोंने उन ब्राह्मणदेवताको पुरोहित बनाकर यह भलीभाँति विश्वास कर लिया कि ‘ हमें अपना राज्य और धन अब मिले हुएके ही समान है । ' साथ ही उन्हें यह भी भरोसा हो गया कि ‘ स्वयंवरमें द्रौपदी हमें मिल जायगी' ॥ ८ ॥
पुरोहितेन तेनाथ गुरुणा संगतास्तदा ।
नाथवन्तमिवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः ॥ ९ ॥
उन गुरु एवं पुरोहितके साथ हो जानेसे उस समय भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ पाण्डवोंने अपने-आपको सनाथ - सा समझा ॥ ९ ॥
स हि वेदार्थतत्त्वज्ञस्तेषां गुरुरुदारधीः ।
तेन धर्मविदा पार्था याज्या धर्मविदः कृताः ॥ १० ॥
उदारबुद्धि धौम्य वेदार्थके तत्त्वज्ञ थे, वे पाण्डवोंके गुरु हुए । उन धर्मज्ञ मुनिने धर्मज्ञ कुन्तीकुमारोंको अपना यजमान बना लिया ॥ १० ॥
वीरांस्तु सहितान् मेने प्राप्तराज्यान् स्वधर्मतः ।
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बुद्धिवीर्यबलोत्साहैर्युक्तान् देवानिव द्विजः ॥ ११ ॥
धौम्यको भी यह विश्वास हो गया कि ये बुद्धि, वीर्य, बल और उत्साहसे युक्त देवोपम वीर संगठित होकर स्वधर्मके अनुसार अपना राज्य अवश्य प्राप्त कर लेंगे ॥ ११ ॥
कृतस्वस्त्ययनास्तेन ततस्ते मनुजाधिपाः ।
मेनिरे सहिता गन्तुं पाञ्चाल्यास्तं स्वयंवरम् ॥ १२ ॥
धौम्यने पाण्डवोंके लिये स्वस्तिवाचन किया । तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने एक साथ द्रौपदीके स्वयंवरमें जानेका निश्चय किया ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि धौम्यपुरोहितकरणे द्वयशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें धौम्यको पुरोहित बनानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८२ ॥
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(स्वयंवरपर्व) त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत वैशम्पायन उवाच
ततस्ते नरशार्दूला भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ।
प्रययुर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब वे नरश्रेष्ठ पाँचों भाई पाण्डव राजकुमारी द्रौपदी, उसके पंचालदेश और वहाँके महान् उत्सवको देखनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥
ते प्रयाता नरव्याघ्राः सह मात्रा परंतपाः ।
ब्राह्मणान् ददृशुर्मार्गे गच्छतः संगतान् बहून् ॥ २ ॥
मनुष्योंमें सिंहके समान वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ यात्रा कर रहे थे ।
उन्होंने मार्गमें देखा, बहुत - से ब्राह्मण एक साथ जा रहे हैं ॥ २ ॥
त ऊचुर्ब्राह्मणा राजन् पाण्डवान् ब्रह्मचारिणः ।
क्व भवन्तो गमिष्यन्ति कुतो वाभ्यागता इह ॥ ३ ॥
राजन्! उन ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंने पाण्डवोंसे पूछा- ' आपलोग कहाँ जायँगे और कहाँसे आ रहे हैं? ' ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आगतानेकचक्रायाः सोदर्यानेकचारिणः ।
भवन्तो वै विजानन्तु सह मात्रा द्विजर्षभाः ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर बोले – विप्रवरो! आपलोगोंको मालूम हो कि हमलोग एक साथ विचरनेवाले सहोदर भाई हैं और अपनी माताके साथ एकचक्रा नगरीसे आ रहे हैं ॥ ४ ॥
ब्राह्मणाऊचुः
गच्छताद्यैव पञ्चालान् द्रुपदस्य निवेशने ।
स्वयंवरो महांस्तत्र भविता सुमहाधनः ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंने कहा- आज ही पंचालदेशको चलिये । वहाँ राजा द्रुपदके दरबारमें महान् धन- धान्यसे सम्पन्न स्वयंवरका बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ५ ॥
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एकसार्थं प्रयाताः स्म वयं तत्रैव गामिनः ।
तत्र ह्यद्भुतसंकाशो भविता सुमहोत्सवः ॥ ६ ॥
हम सबलोग एक साथ चले हैं और वहीं जा रहे हैं । वहाँ अत्यन्त अद्भुत और बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ६ ॥
यज्ञसेनस्य दुहिता द्रुपदस्य महात्मनः ।
वेदीमध्यात् समुत्पन्ना पद्मपत्रनिभेक्षणा ॥ ७ ॥
यज्ञसेन नामवाले महाराज द्रुपदके एक पुत्री है, जो यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई है । उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर हैं ॥ ७ ॥
दर्शनीयानवद्याङ्गी सुकुमारी मनस्विनी ।
धृष्टद्युम्नस्य भगिनी द्रोणशत्रोः प्रतापिनः ॥ ८ ॥
उसका एक- एक अंग निर्दोष है । वह मनस्विनी सुकुमारी द्रुपदकन्या देखने ही योग्य है । द्रोणाचार्यके शत्रु प्रतापी धृष्टद्युम्नकी वह बहिन है ॥ ८ ॥
यो जातः कवची खड्गी सशरः सशरासनः ।
सुसमिद्धे महाबाहुः पावके पावकोपमः ॥ ९ ॥
धृष्टद्युम्न वे ही हैं, जो कवच, खड्ग, धनुष और बाणके साथ उत्पन्न हुए हैं । महाबाहु धृष्टद्युम्न प्रज्वलित अग्निसे प्रकट होनेके कारण अग्निके समान ही तेजस्वी हैं ॥ ९ ॥
स्वसा तस्यानवद्याङ्गी द्रौपदी तनुमध्यमा ।
नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात् प्रवाति वै ॥ १० ॥
द्रौपदी निर्दोष अंगों तथा पतली कमरवाली है और उसके शरीरसे नीलकमलके समान
सुगन्ध निकलकर एक कोसतक फैलती रहती है । वह उन्हीं धृष्टद्युम्नकी बहिन है ॥ १० ॥
यज्ञसेनस्य च सुतां स्वयंवरकृतक्षणाम् ।
गच्छामो वै वयं द्रष्टुं तं च दिव्यं महोत्सवम् ॥ ११ ॥
यज्ञसेनकी पुत्री द्रौपदीका स्वयंवर नियत हुआ है । अतः हमलोग उस राजकुमारीको तथा उस स्वयंवरके दिव्य महोत्सवको देखनेके लिये वहाँ जा रहे हैं ॥ ११ ॥
राजानो राजपुत्राश्च यज्वानो भूरिदक्षिणाः ।
स्वाध्यायवन्तः शुचयो महात्मानो यतव्रताः ॥ १२ ॥
तरुणा दर्शनीयाश्च नानादेशसमागताः ।
महारथाः कृतास्त्राश्च समुपैष्यन्ति भूमिपाः ॥ १३ ॥
(वहाँ) कितने ही प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, यज्ञ करनेवाले, स्वाध्यायशील, पवित्र, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, महात्मा एवं तरुण अवस्थावाले दर्शनीय राजा और राजकुमार अनेक देशोंसे पधारेंगे । अस्त्रविद्यामें निपुण महारथी भूमिपाल भी वहाँ आयेंगे ॥ १२-१३ ॥ ते तत्र विविधान् दायान् विजयार्थं नरेश्वराः ।
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प्रदास्यन्ति धनं गाश्च भक्ष्यं भोज्यं च सर्वशः ॥ १४ ॥
वे नरपतिगण अपनी - अपनी विजयके उद्देश्यसे वहाँ नाना प्रकारके उपहार, धन, गौएँ, भक्ष्य और भोज्य आदि सब प्रकारकी वस्तुएँ दान करेंगे ॥ १४ ॥
प्रतिगृह्य च तत् सर्वं दृष्ट्वा चैव स्वयंवरम् ।
अनुभूयोत्सवं चैव गमिष्यामो यथेप्सितम् ॥ १५ ॥
उनका वह सब दान ग्रहण कर, स्वयंवरको देखकर और उत्सवका आनन्द लेकर फिर हमलोग अपने - अपने अभीष्ट स्थानको चले जायँगे ॥ १५ ॥
नटा वैतालिकास्तत्र नर्तकाः सूतमागधाः ।
नियोधकाश्च देशेभ्यः समेष्यन्ति महाबलाः ॥ १६ ॥
वहाँ अनेक देशोंके नट, वैतालिक, नर्तक, सूत, मागध तथा अत्यन्त बलवान् मल्ल आयेंगे ॥ १६ ॥
एवं कौतूहलं कृत्वा दृष्ट्वा च प्रतिगृह्य च ।
सहास्माभिर्महात्मानः पुनः प्रतिनिवर्त्स्यथ ॥ १७ ॥
महात्माओ! इस प्रकार हमारे साथ खेल करके, तमाशा देखकर और नाना प्रकारके दान ग्रहण करके फिर आपलोग भी लौट आइयेगा ॥ १७ ॥
दर्शनीयांश्च वः सर्वान् देवरूपानवस्थितान् ।
समीक्ष्य कृष्णा वरयेत् संगत्यैकतमं वरम् ॥ १८ ॥
आप सब लोगोंका रूप तो देवताओंके समान है, आप सभी दर्शनीय हैं, आपलोगोंको ( वहाँ उपस्थित) देखकर द्रौपदी दैवयोगसे आपमेंसे ही किसी एकको अपना वर चुन सकती है ॥ १८ ॥
अयं भ्राता तव श्रीमान् दर्शनीयो महाभुजः ।
नियुज्यमानो विजये संगत्या द्रविणं बहु ।
आहरिष्यन्नयं नूनं प्रीतिं वो वर्धयिष्यति ॥ १ ९ ॥
आपलोगोंके ये भाई अर्जुन तो बड़े सुन्दर और दर्शनीय हैं । इनकी भुजाएँ बहुत बड़ी हैं । इन्हें यदि विजयके कार्यमें नियुक्त कर दिया जाय, तो ये दैवात् बहुत बड़ी धनराशि जीत लाकर निश्चय ही आपलोगोंकी प्रसन्नता बढ़ायेंगे ॥ १ ९ ॥ युधिष्ठिर उवाच
परमं भो गमिष्यामो द्रष्टुं चैव महोत्सवम् ।
भवद्भिः सहिताः सर्वे कन्यायास्तं स्वयंवरम् ॥ २० ॥
युधिष्ठिर बोले-ब्राह्मणो! हम भी द्रुपदकन्याके उस श्रेष्ठ स्वयंवर-महोत्सवको देखनेके लिये आपलोगोंके साथ चलेंगे ॥ २० ॥