श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1271–1280

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1271–1280

पृष्ठ 1271

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प्रसादं कुरु लोकानां नियच्छ क्रोधमात्मनः ॥ १४ ॥

पितर बोले — बेटा और्व! तुम्हारी उग्र तपस्याका प्रभाव हमने देख लिया । अब अपना क्रोध रोको और सम्पूर्ण लोकोंपर प्रसन्न हो जाओ ॥ १४ ॥

नानी शैर्हि तदा तात भृगुभिर्भावितात्मभिः ।

वधो ह्युपेक्षितः सर्वैः क्षत्रियाणां विहिंसताम् ॥ १५ ॥

तात! यह न समझना कि जिस समय क्षत्रियलोग हमारी हिंसा कर रहे थे, उस समय शुद्ध अन्तःकरणवाले हम भृगुवंशी ब्राह्मणोंने असमर्थ होनेके कारण अपने कुलके वधको चुपचाप सह लिया ॥ १५ ॥

आयुषा विप्रकृष्टेन यदा नः खेद आविशत् ।

तदास्माभिर्वधस्तात क्षत्रियैरीप्सितः स्वयम् ॥ १६ ॥

वत्स! जब हमारी आयु बहुत बड़ी हो गयी ( और तब भी मौत नहीं आयी ), उस दशामें हमलोगोंको ( बड़ा ) खेद हुआ और हमने (जान-बूझकर) क्षत्रियोंसे स्वयं अपना वध करानेकी इच्छा की ॥ १६ ॥

निखातं यच्च वै वित्तं केनचिद् भृगुवेश्मनि ।

वैरायैव तदा न्यस्तं क्षत्रियान् कोपयिष्णुभिः ॥ १७ ॥

किसी भृगुवंशीने अपने घरमें जो धन गाड़ दिया था, वह भी वैर बढ़ानेके लिये ही किया गया था । हम चाहते थे कि क्षत्रियलोग हमारे ऊपर कुपित हो जायँ ॥ १७ ॥

किं हि वित्तेन नः कार्य स्वर्गेप्सूनां द्विजोत्तम ।

यदस्माकं धनाध्यक्षः प्रभूतं धनमाहरत् ॥ १८ ॥

द्विजश्रेष्ठ! ( यदि ऐसी बात न होती तो ) स्वर्ग - लोककी इच्छावाले हम भार्गवोंको धनसे क्या काम था; क्योंकि साक्षात् कुबेरने हमें प्रचुर धनराशि लाकर दी थी ॥ १८ ॥

यदा तु मृत्युरादातुं न नः शक्नोति सर्वशः ।

तदास्माभिरयं दृष्ट उपायस्तात सम्मतः ॥ १ ९ ॥

तात! जब मौत हमें अपने अंकमें न ले सकी, तब हमलोगोंने सर्वसम्मतिसे यह उपाय ढूँढ़ निकाला था ॥ १ ९ ॥

आत्महा च पुमांस्तात न लोकाँल्लभते शुभान् ।

ततोऽस्माभिः समीक्ष्यैवं नात्मनाऽऽत्मा निपातितः ॥ २० ॥

बेटा! आत्महत्या करनेवाला पुरुष शुभ लोकोंको नहीं पाता, इसीलिये हमने खूब सोच -विचारकर अपने ही हाथों अपना वध नहीं किया ॥ २० ॥

न चैतन्नः प्रियं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि ।

नियच्छेदं मनः पापात् सर्वलोकपराभवात् ॥ २१ ॥

वत्स! तुम जो यह ( सब ) करना चाहते हो, वह भी हमें प्रिय नहीं है । सम्पूर्ण लोकोंका पराभव बहुत बड़ा पाप है, अतः उधरसे मनको रोको ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1272

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मा वधीः क्षत्रियांस्तात न लोकान् सप्त पुत्रक ।

दूषयन्तं तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि ॥ २२ ॥

तात! क्षत्रियोंको न मारो । बेटा! भू आदि सात लोकोंका भी संहार न करो । यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, वह ( तुम्हारे ) तपस्याजनित तेजको दूषित करनेवाला है, अतः इसीको मारो ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्ववारणे अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वक्रोधनिवारण-विषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥

पृष्ठ 1273

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एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः और्व और पितरोंकी बातचीत तथा और्वका अपनी क्रोधाग्निको बडवानलरूपसे समुद्रमें त्यागना और्वउवाच

उक्तवानस्मि यां क्रोधात् प्रतिज्ञां पितरस्तदा ।

सर्वलोकविनाशाय न सा मे वितथा भवेत् ॥ १ ॥

और्वने कहा — पितरो! मैंने क्रोधवश उस समय जो सम्पूर्ण लोकोंके विनाशकी प्रतिज्ञा कर ली थी, वह झूठी नहीं होनी चाहिये ॥ १ ॥

वृथारोषप्रतिज्ञो वै नाहं भवितुमुत्सहे ।

अनिस्तीर्णो हि मां रोषो देहेदग्निरिवारणिम् ॥ २ ॥

जिसका क्रोध और प्रतिज्ञा निष्फल होते हों, ऐसा बननेकी मेरी इच्छा नहीं है । यदि मेरा क्रोध सफल नहीं हुआ तो वह मुझको उसी प्रकार जला देगा, जैसे आग अरणी काष्ठको जला देती है ॥ २ ॥

यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति ।

नालं स मनुजः सम्यक् त्रिवर्गं परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥

जो किसी कारणवश उत्पन्न हुए क्रोधको सह लेता है, वह मनुष्य धर्म, अर्थ और कामकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं होता ॥ ३ ॥

अशिष्टानां नियन्ता हि शिष्टानां परिरक्षिता ।

स्थाने रोषः प्रयुक्तः स्यान्नृपैः सर्वजिगीषुभिः ॥ ४ ॥

सबको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले राजाओंद्वारा उचित अवसरपर प्रयोगमें लाया हुआ रोष दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंकी रक्षा करनेवाला हो ॥ ४ ॥

श्रीषमहमूरुस्थ गर्भशय्यागतस्तदा ।

आसवं मातृवर्गस्थ भृगूणां क्षत्रियैर्वधे ॥ ५ ॥

मैं जिन दिनों माताकी एक जाँघमें गर्भ- शय्यापर सोता था, उन दिनों क्षत्रियोंद्वारा भार्गवोंका वध होनेपर माताओंका करुण क्रन्दन मुझे स्पष्ट सुनायी देता था ॥ ५ ॥

संहारो हि यदा लोके भृगूणां क्षत्रियाधमैः ।

आगर्भोच्छेदनात् क्रान्तस्तदा मां मन्युराविशत् ॥ ६ ॥

इन नीच क्षत्रियोंने जब गर्भके बच्चोंतकके सिर काट- काटकर संसारमें भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार आरम्भ कर दिया, तब मुझमें क्रोधका आवेश हुआ ॥ ६ ॥

सम्पूर्णकोशाः किल मे मातरः पितरस्तथा ।

पृष्ठ 1274

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भयात् सर्वेषु लोकेषु नाधिजग्मुः परायणम् ॥ ७ ॥

जिनकी कोख भरी हुई थी, वे मेरी माताएँ और पितृगण भी भयके मारे समस्त लोकोंमें भागते फिरे; किंतु उन्हें कहीं भी शरण नहीं मिली ॥ ७ ॥

तान् भृगूणां यदा दारान् कश्चिन्नाभ्युपपद्यत ।

माता तदा दधारेयमूरुणैकेन मां शुभा ॥ ८ ॥

जब भार्गवोंकी पत्नियोंका कोई भी रक्षक नहीं मिला, तब मेरी इस कल्याणमयी माताने मुझे अपनी एक जाँघमें छिपाकर रखा था ॥ ८ ॥

प्रतिषेद्धा हि पापस्य यदा लोकेषु विद्यते ।

तदा सर्वेषु लोकेषु पापकृन्नोपपद्यते ॥ ९ ॥

जबतक जगत्में कोई भी पापकर्मको रोकनेवाला होता है, तबतक सम्पूर्ण लोकोंमें पापियोंका होना सम्भव नहीं होता ॥ ९ ॥

यदा तु प्रतिषेद्धारं पापों न लभते क्वचित् ।

तिष्ठन्ति बहवो लोकास्तदा पापेषु कर्मसु ॥ १० ॥

जब पापी मनुष्यको कहीं कोई रोकनेवाला नहीं मिलता, तब बहुतेरे मनुष्य पाप करनेमें लग जाते हैं ॥ १० ॥

जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान् न नियच्छति ।

ईशः सन् सोऽपि तेनैव कर्मणा सम्प्रयुज्यते ॥ ११ ॥

जो मनुष्य शक्तिमान् एवं समर्थ होते हुए भी जान- बूझकर पापको नहीं रोकता, वह भी उसी पापकर्मसे लिप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

राजभिश्चेश्वरैश्चैव यदि वै पितरो मम ।

शक्तैर्न शकितास्त्रातुमिष्टं मत्वेह जीवितम् ॥ १२ ॥

अत एषामहं क्रुद्धो लोकानामीश्वरो ह्यहम् ।

भवतां च वचो नालमहं समभिवर्तितुम् ॥ १३ ॥

इस लोकमें अपना जीवन सबको प्रिय है, यह समझकर सबका शासन करनेवाले राजालोग सामर्थ्य होते हुए भी मेरे पिताओंकी रक्षा न कर सके, इसीलिये मैं भी इन सब लोकोंपर कुपित हुआ हूँ । मुझमें इन्हें दण्ड देनेकी शक्ति है । अतः ( इस विषयमें) मैं आपलोगोंका वचन माननेमें असमर्थ हूँ ॥ १२-१३ ॥

ममापि चेद् भवेदेवमीश्वरस्य सतो महत् ।

उपेक्षमाणस्य पुनर्लोकानां किल्बिषाद् भयम् ॥ १४ ॥

यदि मैं भी शक्ति रहते हुए लोगोंके इस महान् पापाचारको उदासीनभावसे चुपचाप देखता रहूँ, तो मुझे भी उनलोगोंके पापसे भय हो सकता है ॥ १४ ॥

यश्चायं मन्युजो मेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति ।

दहेदेष च मामेव निगृहीतः स्वतेजसा ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1275

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मेरे क्रोधसे उत्पन्न हुई जो यह आग ( सम्पूर्ण ) लोकोंको अपनी लपटोंसे लपेट लेना चाहती है, यदि मैं इसे रोक दूँ तो यह मुझे ही अपने तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगी ॥ १५ ॥

भवतां च विजानामि सर्वलोकहितेप्सुताम् ।

तस्माद् विधध्वं यच्छ्रेयो लोकानां मम चेश्वराः ॥ १६ ॥

मैं यह भी जानता हूँ कि आपलोग समस्त जगत्‌का हित चाहनेवाले हैं । अतः शक्तिशाली पितरो! आपलोग ऐसा करें, जिससे इन लोकोंका और मेरा भी कल्याण हो ॥ १६ ॥

पितर ऊचुः

य एष मन्युजस्तेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति ।

अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः ॥ १७ ॥

पितर बोले — और्व! तुम्हारे क्रोधसे उत्पन्न हुई जो यह अग्नि सब लोकोंको अपना ग्रास बनाना चाहती है, उसे तुम जलमें छोड़ दो, तुम्हारा कल्याण हो; क्योंकि ( सभी ) लोक जलमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १७ ॥

आपोमयाः सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगत् ।

तस्मादप्सु विमुञ्चेमं क्रोधाग्निं द्विजसत्तम ॥ १८ ॥

सभी रस जलके परिणाम हैं तथा सम्पूर्ण जगत् ( भी ) जलका परिणाम माना गया है ।

अतः द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी इस क्रोधाग्निको जलमें ही छोड़ दो ॥ १८ ॥

अयं तिष्ठतु ते विप्र यदीच्छसि महोदधौ ।

मन्युजोऽग्निर्दहन्नापो लोका ह्यापोमयाः स्मृताः ॥ १ ९ ॥

विप्रवर! यदि तुम्हारी इच्छा हो तो यह क्रोधाग्नि जलको जलाती हुई समुद्रमें स्थित रहे; क्योंकि सभी लोक जलके परिणाम माने गये हैं ॥ १ ९ ॥

एवं प्रतिज्ञा सत्येयं तवानघ भविष्यति ।

न चैवं सामरा लोका गमिष्यन्ति पराभवम् ॥ २० ॥

अनघ! ऐसा करनेसे तुम्हारी प्रतिज्ञा भी सच्ची हो जायगी और देवताओंसहित समस्त लोक भी नष्ट नहीं होंगे ॥ २० ॥

वसिष्ठ उवाच

ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालये ।

उत्ससर्ज स चैवाप उपयुङ्क्ते महोदधौ ॥ २१ ॥

महद्धयशिरो भूत्वा यत् तद् वेदविदो विदुः ।

तमग्निमुद्गिरद् वक्त्रात् पिबत्यापो महोदधौ ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1276

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वसिष्ठजी कहते हैं — पराशर! तब और्वने ( अपनी ) उस क्रोधाग्निको समुद्रमें डाल दिया । आज भी वह बहुत बड़ी घोड़ीके मुखकी -सी आकृति धारण करके महासागरके जलका पान करती रहती है । वेदज्ञ पुरुष उससे ( भली- भाँति परिचित हैं । वह बड़वा अपने मुखसे वही आग उगलती हुई महासागरका जल पीती रहती है ॥ २१-२२ ॥

तस्मात् त्वमपि भद्रं ते न लोकान् हन्तुमर्हसि ।

पराशर पराँल्लोकान् जानञ्ज्ञानवतां वर ॥ २३ ॥

ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पराशर! तुम्हारा कल्याण हो, तुम परलोकको भलीभाँति जानते हो; अतः तुम्हें भी समस्त लोकोंका विनाश नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्वोपाख्याने एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वोपाख्यानविषयक एक सौ उनासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥

पृष्ठ 1277

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अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः स विप्रर्षिर्वसिष्ठेन महात्मना ।

न्ययच्छदात्मनः क्रोधं सर्वलोकपराभवात् ॥ १ ॥

गन्धर्व कहता है — अर्जुन! महात्मा वसिष्ठके यों कहनेपर उन ब्रह्मर्षि पराशरने अपने क्रोधको समस्त लोकोंके पराभवसे रोक लिया ॥ १ ॥

ईजे च स महातेजाः सर्ववेदविदां वरः ।

ऋषी राक्षससत्रेण शाक्तेयोऽथ पराशरः ॥ २ ॥

तब सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी शक्ति- नन्दन पराशरने राक्षससत्रका अनुष्ठान किया ॥ २ ॥

ततो वृद्धांश्च बालांश्च राक्षसान् स महामुनिः ।

ददाह वितते यज्ञे शक्तेर्वधमनुस्मरन् ॥ ३ ॥

उस विस्तृत यज्ञमें अपने पिता शक्तिके वधका बार- बार चिन्तन करते हुए महामुनि पराशरने राक्षसजातिके बूढ़ों तथा बालकोंको भी जलाना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

न हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् ।

द्वितीयामस्य मा भाक्षं प्रतिज्ञामिति निश्चयात् ॥ ४ ॥

उस समय महर्षि वसिष्ठने यह सोचकर कि इसकी दूसरी प्रतिज्ञाको न तोनँ, उन्हें राक्षसोंके वधसे नहीं रोका ॥ ४ ॥

त्रयाणां पावकानां च सत्रे तस्मिन् महामुनिः ।

आसीत् पुरस्ताद् दीप्तानां चतुर्थ इव पावकः ॥ ५ ॥

उस सत्रमें तीन प्रज्वलित अग्नियोंके समक्ष महामुनि पराशर चौथे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५ ॥

तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन शक्तिजः ।

तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये ॥ ६ ॥

( पापी राक्षसोंका संहार करनेके कारण ) वह यज्ञ अत्यन्त निर्मल एवं शुद्ध समझा जाता था । शक्तिनन्दन पराशरद्वारा उसमें यज्ञसामग्रीका हवन आरम्भ होते ही ( वह इतना प्रज्वलित हो उठा कि ) उसके तेजसे सम्पूर्ण आकाश ठीक उसी तरह उद्भासित होने लगा, जैसे वर्षा बीतनेपर सूर्यकी प्रभासे उद्दीप्त हो उठता है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1278

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तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे ।

तेजसा दीप्यमानं वै द्वितीयमिव भास्करम् ॥ ७ ॥

उस समय वसिष्ठ आदि सभी मुनियोंको वहाँ तेजसे प्रकाशमान महर्षि पराशर दूसरे सूर्यके समान जान पड़ते थे ॥ ७ ॥

ततः परमदुष्प्रापमन्यैर्ऋषिरुदारधीः ।

समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् ॥ ८ ॥

तदनन्तर दूसरोंके लिये उस यज्ञको बंद करना अत्यन्त कठिन जानकर उदारबुद्धि महर्षि अत्रि स्वयं उस यज्ञको समाप्त करानेकी इच्छासे पराशरके पास आये ॥ ८ ॥

तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः ।

तत्राजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ॥ ९ ॥

शत्रुओंका नाश करनेवाले अर्जुन! उसी प्रकार पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाक्रतुने भी राक्षसोंके जीवनकी रक्षाके लिये वहाँ पदार्पण किया ॥ ९ ॥

पुलस्त्यस्तु वधात् तेषां रक्षसां भरतर्षभ ।

उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिंदमम् ॥ १० ॥

भरतकुलभूषण कुन्तीकुमार! उन राक्षसोंका विनाश होता देख महर्षि पुलस्त्यने शत्रुसूदन पराशरसे यह बात कही- ॥ १० ॥

कच्चित् तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक ।

अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात् ॥ ११ ॥

‘ तात! तुम्हारे इस यज्ञमें कोई विघ्न तो नहीं पड़ा? बेटा! तुम्हारे पिताकी हत्याके विषयमें कुछ भी न जाननेवाले इन सभी निर्दोष राक्षसोंका वध करके क्या तुम्हें प्रसन्नता होती है? ॥ ११ ॥

प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि ।

नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ॥ १२ ॥

‘ वत्स! मेरी संततिका तुम्हें इस प्रकार उच्छेद नहीं करना चाहिये । तात! यह हिंसा तपस्वी ब्राह्मणोंका धर्म कभी नहीं मानी गयी ॥ १२ ॥

शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर ।

अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ॥ १३ ॥

‘ पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका ) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो । तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो? ॥ १३ ॥

शक्तिं चापि हि धर्मज्ञं नातिक्रान्तुमिहार्हसि ।

प्रजायाश्च ममोच्छेदं न चैवं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥

' तुम्हारे पिता शक्ति धर्मके ज्ञाता थे, तुम्हें ( इस अधर्मकृत्यद्वारा ) उनकी मर्यादाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये । फिर मेरी संतानोंका विनाश करना तुम्हारे लिये कदापि उचित

पृष्ठ 1279

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नहीं है ॥ १४ ॥

शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् ।

आत्मजेन स दोषेण शक्तिर्नीत इतो दिवम् ॥ १५ ॥

वसिष्ठकुलभूषण! शक्तिके शापसे ही उस समय वैसी दुर्घटना हो गयी थी । वे अपने ही अपराधसे इस लोकको छोड़कर स्वर्गवासी हुए हैं (इसमें राक्षसोंका कोई दोष नहीं है ) ॥ १५ ॥

न हि तं राक्षसः कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने ।

आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाभवत् ॥ १६ ॥

' मुने! कोई भी राक्षस उन्हें खा नहीं सकता था । अपने ही शापसे ( राजाको नरभक्षी राक्षस बना देनेके कारण) उन्हें उस समय अपनी मृत्यु देखनी पड़ी ॥ १६ ॥

निमित्तभूतस्तत्रासीद् विश्वामित्रः पराशर ।

राजा कल्माषपादश्च दिवमारुह्य मोदते ॥ १७ ॥

‘ पराशर! विश्वामित्र तथा राजा कल्माषपाद भी इसमें निमित्तमात्र ही थे ( तुम्हारे पूर्वजोंकी मृत्युमें तो प्रारब्ध ही प्रधान है ) । इस समय तुम्हारे पिता शक्ति स्वर्गमें जाकर आनन्द भोगते हैं ॥ १७ ॥

ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुने ।

ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः ॥ १८ ॥

' महामुने! वसिष्ठजीके शक्तिसे छोटे जो पुत्र थे, वे सभी देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग रहे हैं ॥ १८ ॥

सर्वमेतद् वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने ।

रक्षसां च समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् ॥ १ ९ ॥

निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन ।

तत् सत्रं मुञ्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते ॥ २० ॥

‘ महर्षे! तुम्हारे पितामह वसिष्ठजीको ये सब बातें विदित हैं । तात शक्तिनन्दन! तेजस्वी राक्षसोंके विनाशके लिये आयोजित इस यज्ञमें तुम भी निमित्तमात्र ही बने हो ( वास्तवमें यह सब उन्हींके पूर्वकर्मोंका फल है) । अतः अब इस यज्ञको छोड़ दो । तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे इस सत्रकी समाप्ति हो जानी चाहिये ' ॥ १ ९-२० ॥ गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्ठेन च धीमता ।

तदा समापयामास सत्रं शाक्तो महामुनिः ॥ २१ ॥

गन्धर्व कहता है — अर्जुन! पुलस्त्यजी तथा परम बुद्धिमान् वसिष्ठजीके यों कहनेपर महामुनि शक्तिपुत्र पराशरने उसी समय यज्ञको समाप्त कर दिया ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1280

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सर्वराक्षससत्राय सम्भृतं पावकं तदा ।

उत्तरे हिमवत्पार्श्वे उत्ससर्ज महावने ॥ २२ ॥

सम्पूर्ण राक्षसोंके विनाशके उद्देश्यसे किये जाने वाले उस सत्रके लिये जो अग्नि संचित की गयी थी, उसे उन्होंने उत्तरदिशामें हिमालयके आस-पासके विशाल वनमें छोड़ दिया ॥ २२ ॥

स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च ।

भक्षयन् दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ॥ २३ ॥

वह अग्नि आज भी वहाँ सदा प्रत्येक पर्वके अवसरपर राक्षसों, वृक्षों और पत्थरोंको जलाती हुई देखी जाती है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्वोपाख्याने अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वोपाख्यानविषयक एक सौ अस्सीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८० ॥