महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1311–1320
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1311–1320
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नहीं' ॥ ७ ॥
ब्राह्मणाऊचुः
नावहास्या भविष्यामो न च लाघवमास्थिताः ।
न च विद्विष्टतां लोके गमिष्यामो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मण बोले— ( भाइयो! ) हमारी हँसी नहीं होगी । न हमें किसीके सामने छोटा ही बनना पड़ेगा और लोकमें हमलोग राजाओंके द्वेषपात्र भी नहीं होगे । (अतः इन बातोंकी चिन्ता छोड़ दो ) ॥ ८ ॥
केचिदाहुर्युवा श्रीमान् नागराजकरोपमः ।
पीनस्कन्धोरुबाहुश्च धैर्येण हिमवानिव ॥ ९ ॥
कुछ ब्राह्मणोंने कहा— ' यह सुन्दर युवक नागराज ऐरावतके शुण्ड- दण्डके समान हृष्ट-पुष्ट दिखायी देता है । इसके कंधे सुपुष्ट और भुजाएँ बड़ी - बड़ी हैं । यह धैर्यमें हिमालयके समान जान पड़ता है ॥ ९ ॥
सिंहखेलगतिः श्रीमान् मत्तनागेन्द्रविक्रमः ।
सम्भाव्यमस्मिन् कर्मेदमुत्साहाच्चानुमीयते ॥ १० ॥
‘ इसकी सिंहके समान मस्तानी चाल है । यह शोभाशाली तरुण मतवाले गजराजके समान पराक्रमी प्रतीत होता है । इस वीरके लिये यह कार्य करना सम्भव है । इसका उत्साह देखकर भी ऐसा ही अनुमान होता है ॥ १० ॥
शक्तिरस्य महोत्साहा न ह्यशक्तः स्वयं व्रजेत् ।
न च तद् विद्यते किंचित् कर्म लोकेषु यद् भवेत् ॥ ११ ॥
ब्राह्मणानामसाध्यं च नृषु संस्थानचारिषु ।
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रताः ॥ १२ ॥
दुर्बल अपि विप्रा हि बलीयांसः स्वतेजसा ।
ब्राह्मणो नावमन्तव्यः सदसद् वा समाचरन् ॥ १३ ॥
सुखं दुःखं महद् ह्रस्वं कर्म यत् समुपागतम् ।
( धनुर्वेदे च वेदे च योगेषु विविधेषु च ।
न तं पश्यामि मेदिन्यां ब्राह्मणाभ्यधिको भवेत् ॥
मन्त्रयोगबलेनापि महताऽऽत्मबलेन वा । जृम्भयेयुरमुं लोकमथवा द्विजसत्तमाः ॥ ) जामदग्न्येन रामेण निर्जिताः क्षत्रिया युधि ॥ १४ ॥
इसमें शक्ति और महान् उत्साह है । यदि यह असमर्थ होता तो स्वयं ही धनुषके पास जानेका साहस नहीं करता । सम्पूर्ण लोकोंमें देवता, असुर आदिके रूपमें विचरनेवाले पुरुषोंका ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणोंके लिये असाध्य हो । ब्राह्मणलोग जल पीकर,
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हवा खाकर अथवा फलाहार करके ( भी ) दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हैं । अतः वे शरीरसे दुबले होनेपर भी अपने तेजके कारण अत्यन्त बलवान् होते हैं । ब्राह्मण भला - बुरा, सुखद-दुःखद और छोटा - बड़ा जो भी कर्म प्राप्त होता है, कर लेता है; अतः किसी भी कर्मको करते समय उस ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। मैं भूमण्डलमें ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता जो धनुर्वेद, वेद तथा नाना प्रकारके योगोंमें ब्राह्मणसे बढ़ - चढ़कर हो । श्रेष्ठ ब्राह्मण मन्त्रबल, योगबल अथवा महान् आत्मबलसे इस सम्पूर्ण जगत्को स्तब्ध कर सकते हैं । ( अतः उनके प्रति तुच्छ बुद्धि नहीं रखनी चाहिये । ) देखो, जमदग्निनन्दन परशुरामजीने अकेले ही ( सम्पूर्ण) क्षत्रियोंको युद्धमें जीत लिया था ॥ ११–१४ ॥
पीतः समुद्रोऽगस्त्येन ह्यगाधो ब्रह्मतेजसा ।
तस्माद् ब्रुवन्तु सर्वेऽत्र बटुरेष धनुर्महान् ॥ १५ ॥
आरोपयतु शीघ्रं वै तथेत्यूचुर्द्विजर्षभाः । ‘ महर्षि अगस्त्यने अपने ब्रह्मतेजके प्रभावसे अगाध समुद्रको पी डाला । इसलिये आप सब लोग यहाँ आशीर्वाद दें कि यह महान् ब्रह्मचारी शीघ्र ही इस धनुषको चढ़ा दे ( और लक्ष्य- वेध करनेमें सफल हो) । यह सुनकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण उसी प्रकार आशीर्वादकी वर्षा करने लगे ॥ १५३ ॥
एवं तेषां विलपतां विप्राणां विविधा गिरः ॥ १६ ॥
अर्जुनो धनुषोऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः ।
स तद् धनुः परिक्रष्य प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब ब्राह्मणलोग भाँति- भाँतिकी बातें कर रहे थे, उसी समय अर्जुन धनुषके पास जाकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये । फिर उन्होंने धनुषके चारों ओर घूमकर उसकी परिक्रमा की ॥ १६-१७ ॥
प्रणम्य शिरसा देवमीशानं वरदं प्रभुम् ।
कृष्णं च मनसा कृत्वा जगृहे चार्जुनो धनुः ॥ १८ ॥
इसके बाद वरदायक भगवान् शंकरको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन - ही - मन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करके अर्जुनने वह धनुष उठा लिया ॥ १८ ॥
यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथवक्रैः राधेयदुर्योधनशल्यशाल्वैः । तदा धनुर्वेदपरैर्नृसिंहैः कृतं न सज्यं महतोऽपि यत्नात् ॥ १ ९ ॥ तदर्जुनो वीर्यवतां सदर्प- स्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभावः । सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण शरांश्च जग्राह दशार्धसंख्यान् ॥ २० ॥
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रुक्म, सुनीथ, वक्र, कर्ण, दुर्योधन, शल्य तथा शाल्व आदि धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् पुरुषसिंह राजालोग महान् प्रयत्न करके भी जिस धनुषपर डोरी न चढ़ा सके, उसी धनुषपर विष्णुके समान प्रभावशाली एवं पराक्रमी वीरोंमें श्रेष्ठताका अभिमान रखनेवाले इन्द्रकुमार अर्जुनने पलक मारते - मारते प्रत्यंचा चढ़ा दी । इसके बाद उन्होंने वे पाँच बाण भी अपने हाथमें ले लिये ॥ १ ९ -२० ॥ विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम् । ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः समाजमध्ये च महान् निनादः ॥ २१ ॥
और उन्हें चलाकर बात - की- बातमें ( लक्ष्य ) वेध दिया । वह बिंधा हुआ लक्ष्य अत्यन्त छिन्न- भिन्न हो यन्त्रके छेदसे सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा । उस समय आकाशमें बड़े जोरका हर्षनाद हुआ और सभामण्डपमें तो उससे भी महान् आनन्द- कोलाहल छा गया ॥ २१ ॥
पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः ॥ २२ ॥
देवतालोग शत्रुहन्ता अर्जुनके मस्तकपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ २२ ॥
चैलानि विव्यधुस्तत्र ब्राह्मणाश्च सहस्रशः ।
विलक्षितास्ततश्चक्रुर्हाहाकारांश्च सर्वशः ।
न्यपतंश्चात्र नभसः समन्तात् पुष्पवृष्टयः ॥ २३ ॥
शताङ्गानि च तूर्याणि वादकाः समवादयन् ।
सूतमागधसङ्घाश्चाप्यस्तुवंस्तत्र सुस्वराः ॥ २४ ॥
सहस्रों ब्राह्मण ( हर्षमें भरकर) वहाँ अपने दुपट्टे हिलाने लगे ( मानो अर्जुनकी विजय-ध्वजा फहरा रहे हों), फिर तो जो लोग ( लक्ष्यवेध करनेमें असमर्थ हो, हार मान चुके थे ) वे राजा लोग सब ओरसे हाहाकार करने लगे । उस रंगभूमिमें आकाशसे सब ओर फूलोंकी वर्षा हो रही थी । बाजा बजानेवाले लोग सैकड़ों अंगोंवाली तुरही आदि बजाने लगे । सूत और मागधगण वहाँ मीठे स्वरसे यशोगान करने लगे ॥ २३-२४ ॥
तं दृष्ट्वा द्रुपदः प्रीतो बभूव रिपुसूदनः ।
सह सैन्यैश्च पार्थस्य साहाय्यार्थमियेष सः ॥ २५ ॥
अर्जुनको देखकर शत्रुसूदन द्रुपदके हर्षकी सीमा न रही । उन्होंने अपनी सेनाके साथ उनकी सहायता करनेका निश्चय किया ॥ २५ ॥
तस्मिंस्तु शब्दे महति प्रवृद्धे युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः । आवासमेवोपजगाम शीघ्रं सार्धं यमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम् ॥ २६ ॥
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उस समय जब महान् कोलाहल बढ़ने लगा, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर पुरुषोत्तम नकुल और सहदेवको साथ लेकर डेरेपर ही चले गये ॥ २६ ॥
विद्धं तु लक्ष्यं प्रसमीक्ष्य कृष्णा पार्थं च शक्रप्रतिमं निरीक्ष्य । आदाय शुक्लं वरमाल्यदाम जगाम कुन्तीसुतमुत्स्मयन्ती ॥ २७ ॥
( स्वभ्यस्तरूपापि नवेव नित्यं
विनापि हासं हसतीव कन्या ।
मदादृतेऽपि स्खलतीव भावै- र्वाचा विना व्याहरतीव दृष्ट्या ॥
समेत्य तस्योपरि सोत्ससर्ज समागतानां पुरतो नृपाणाम् । विन्यस्य मालां विनयेन तस्थौ विहाय राज्ञः सहसा नृपात्मजा ॥ शचीव देवेन्द्रमथाग्निदेवं स्वाहेव लक्ष्मीश्च यथा मुकुन्दम् । उषेव सूर्यं मदनं रतिश्च महेश्वरं पर्वतराजपुत्री । रामं यथा मैथिलराजपुत्री भैमी यथा राजवरं नलं हि ॥ ) लक्ष्यको बिधंकर धरतीपर गिरा देख इन्द्रके तुल्य पराक्रमी अर्जुनपर दृष्टि डालकर हाथमें सुन्दर श्वेत फूलोंकी जयमाला लिये द्रौपदी मन्द मन्द मुसकराती हुई कुन्तीकुमारके समीप गयी । उसका रूप जिन्होंने बार-बार देखा था, उनके लिये भी वह नित्य नयी - सी जान पड़ती थी । वह द्रुपदकुमारी बिना हँसीके भी हँसती - सी प्रतीत होती थी । मदसेवनके बिना भी ( आन्तरिक अनुराग-सूचक ) भावोंके द्वारा लड़खड़ाती -सी चलती थी और बिना बोले भी केवल दृष्टिसे ही बातचीत करती- सी जान पड़ती थी । निकट जाकर राजकुमारी द्रौपदीने वहाँ जुटे हुए समस्त राजाओंके समक्ष उन सबकी उपेक्षा करके सहसा वह माला अर्जुनके गलेमें डाल दी और विनयपूर्वक खड़ी हो गयी । जैसे शचीने देवराज इन्द्रका, स्वाहाने अग्निदेवका, लक्ष्मीने भगवान् विष्णुका, उषाने सूर्यदेवका रतिने कामदेवका, गिरिराजकुमारी उमाने महेश्वरका, विदेहराजनन्दिनी सीताने श्रीरामका तथा भीमकुमारी दमयन्तीने नृपश्रेष्ठ नलका वरण किया था, उसी प्रकार द्रौपदीने पाण्डुपुत्र अर्जुनका वरण कर लिया ॥ २७ ॥
स तामुपादाय विजित्य रङ्गे
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द्विजातिभिस्तैरभिपूज्यमानः । रङ्गान्निरक्रामदचिन्त्यकर्मा पत्न्या तया चाप्यनुगम्यमानः ॥ २८ ॥
अद्भुत कर्म करनेवाले अर्जुन इस प्रकार उस स्वयंवरसभामें ( स्त्रीरत्न द्रौपदीको जीतकर) उसे अपने साथ ले रंगभूमिसे बाहर निकले। पत्नी द्रौपदी उनके पीछे - पीछे चल रही थी । उस समय उपस्थित ब्राह्मणोंने उनका बड़ा सत्कार किया ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि लक्ष्यच्छेदने सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें लक्ष्यछेदनविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं ) OF FUTE
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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपदको मारनेके लिये उद्यत हुए राजाओंका सामना करनेके लिये भीम और अर्जुनका उद्यत होना और उनके विषयमें भगवान् श्रीकृष्णका बलरामजीसे वार्तालाप वैशम्पायन उवाच
तस्मै दित्सति कन्यां तु ब्राह्मणाय तदा नृपे ।
कोप आसीन्महीपानामालोक्यान्योन्यमन्तिकात् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा द्रुपद उस ब्राह्मणको कन्या देना चाहते हैं, यह जानकर उस समय राजाओंको बड़ा क्रोध हुआ और वे एक- दूसरेको देखकर तथा समीप आकर इस प्रकार कहने लगे- ॥ १ ॥
अस्मानयमतिक्रम्य तृणीकृत्य च संगतान् ।
दातुमिच्छति विप्राय द्रौपदीं योषितां वराम् ॥ २ ॥
' ( अहो! देखो तो सही, ) यह राजा द्रुपद (यहाँ ) एकत्र हुए हमलोगोंको तिनकेकी तरह तुच्छ समझकर और हमारा उल्लंघन करके युवतियोंमें श्रेष्ठ अपनी कन्याका विवाह एक ब्राह्मणके साथ करना चाहता है ॥ २ ॥
अवरोप्येह वृक्षं तु फलकाले निपात्यते ।
निहन्मैनं दुरात्मानं योऽयमस्मान् न मन्यते ॥ ३ ॥
‘ यह वृक्ष लगाकर अब फल लगनेके समय उसे काटकर गिरा रहा है । अतः हमलोग इस दुरात्माको मार डालें; क्योंकि यह हमें कुछ नहीं समझ रहा है ॥ ३ ॥
न ह्यर्हत्येष सम्मानं नापि वृद्धक्रमं गुणैः ।
हमैनं सह पुत्रेण दुराचारं नृपद्विषम् ॥ ४ ॥
' यह राजा द्रुपद गुणोंके कारण हमसे वृद्धोचित सम्मान पानेका अधिकारी भी नहीं है; राजाओंसे द्वेष करनेवाले इस दुराचारीको पुत्रसहित हमलोग मार डालें ॥ ४ ॥
अयं हि सर्वानाहूय सत्कृत्य च नराधिपान् ।
गुणवद् भोजयित्वान्नं ततः पश्चान्न मन्यते ॥ ५ ॥
‘ पहले तो इसने हम सब राजाओंको बुलाकर सत्कार किया, उत्तम गुणयुक्त भोजन कराया और ऐसा करनेके बाद यह हमारा अपमान कर रहा है ॥ ५ ॥
अस्मिन् राजसमावाये देवानामिव संनये ।
किमयं सदृशं कञ्चिन्नृपतिं नैव दृष्टवान् ॥ ६ ॥
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‘ देवताओंके समूहकी भाँति उत्तम नीतिसे सुशोभित राजाओंके इस समुदायमें क्या इसने किसी भी नरेशको अपनी पुत्रीके योग्य नहीं देखा है? ॥ ६ ॥
न च विप्रेष्वधीकारो विद्यते वरणं प्रति ।
स्वयंवरः क्षत्रियाणामितीयं प्रथिता श्रुतिः ॥ ७ ॥
‘ स्वयंवरमें कन्याद्वारा वरण प्राप्त करनेका अधिकार ही ब्राह्मणोंको नहीं है । ( लोगोंमें ) यह बात प्रसिद्ध है कि स्वयंवर क्षत्रियोंका ही होता है ॥ ७ ॥
अथवा यदि कन्येयं न च कञ्चिद् बुभूषति ।
अग्नावेनां परिक्षिप्य याम राष्ट्राणि पार्थिवाः ॥ ८ ॥
‘ अथवा राजाओ! यदि यह कन्या हमलोगोंमेंसे किसीको अपना पति बनाना न चाहे तो हम इसे जलती हुई आगमें झोंककर अपने - अपने राज्यको चल दें ॥ ८ ॥
ब्राह्मणो यदि चापल्याल्लोभाद् वा कृतवानिदम् ।
विप्रियं पार्थिवेन्द्राणां नैष वध्यः कथंचन ॥ ९ ॥
‘ यद्यपि इस ब्राह्मणने चपलताके कारण अथवा राजकन्याके प्रति लोभ होनेसे हम राजाओंका अप्रिय किया है, तथापि ब्राह्मण होनेके कारण हमें किसी प्रकार इसका वध नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
ब्राह्मणार्थं हि नो राज्यं जीवितं हि वसूनि च ।
पुत्रपौत्रं च यच्चान्यदस्माकं विद्यते धनम् ॥ १० ॥
‘ क्योंकि हमारा राज्य, जीवन, रत्न, पुत्र - पौत्र तथा और भी जो धन - वैभव है, वह सब ब्राह्मणोंके लिये ही है । (ब्राह्मणोंके लिये हम इन सब चीजोंका त्याग कर सकते हैं ) ॥ १० ॥
अवमानभयाच्चैव स्वधर्मस्य च रक्षणात् ।
स्वयंवराणामन्येषां मा भूदेवंविधा गतिः ॥ ११ ॥
' द्रुपदको तो हम इसलिये दण्ड देना चाहते हैं कि ( हमारा ) अपमान न हो, हमारे धर्मकी रक्षा हो और दूसरे स्वयंवरोंकी भी ऐसी दुर्गति न हो ' ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा राजशार्दूला हृष्टाः परिघबाहवः ।
द्रुपदं तु जिघांसन्तः सायुधाः समुपाद्रवन् ॥ १२ ॥
यों कहकर परिघ - जैसी मोटी बाँहोंवाले वे श्रेष्ठ भूपाल हर्ष ( और उत्साह ) -में भरकर हाथोंमें अस्त्र- शस्त्र लिये द्रुपदको मारनेकी इच्छासे उनकी ओर वेगसे दौड़े ॥ १२ ॥
तान् गृहीतशरावापान् क्रुद्धानापततो बहून् ।
द्रुपदो वीक्ष्य संत्रासाद् ब्राह्मणाञ्छरणं गतः ॥ १३ ॥
उन बहुत - से राजाओंको क्रोधमें भरकर धनुष लिये आते देख द्रुपद अत्यन्त भयभीत हो ब्राह्मणोंकी शरणमें गये ॥ १३ ॥
वेगेनापततस्तांस्तु प्रभिन्नानिव वारणान् ।
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पाण्डुपुत्रौ महेष्वासौ प्रतियातावरिंदमौ ॥ १४ ॥
मदकी धारा बहानेवाले मदोन्मत्त गजराजोंकी भाँति उन नरेशोंको वेगसे आते देख शत्रुदमन महाधनुर्धर पाण्डुनन्दन भीम और अर्जुन उनका सामना करनेके लिये आ गये ॥ १४ ॥
ततः समुत्पेतुरुदायुधास्ते
महीक्षितो बद्धगोधाङ्गुलित्राः ।
जिघांसमानाः कुरुराजपुत्रा- वमर्षयन्तोऽर्जुनभीमसेनौ ॥ १५ ॥
तब हाथोंमें गोहके चमड़ेके दस्ताने पहने और आयुधों को ऊपर उठाये अमर्षमें भरे हुए वे ( सभी ) नरेश कुरुराजकुमार अर्जुन और भीमसेनको मारनेके लिये उनपर टूट पड़े ॥ १५ ॥
ततस्तु भीमो ऽद्भुत भीमकर्मा महाबलो वज्रसमानसारः । उत्पाट्य दोर्भ्यां द्रुममेकवीरो निष्पत्रयामास यथा गजेन्द्रः ॥ १६ ॥
तब तो वज्रके समान शक्तिशाली तथा अद्भुत एवं भयानक कर्म करनेवाले अद्वितीय वीर महाबली भीमसेनने गजराजकी भाँति अपने दोनों हाथोंसे एक वृक्षको उखाड़ लिया और उसके पत्ते झाड़ दिये ॥ १६ ॥
तं वृक्षमादाय रिपुप्रमाथी दण्डीव दण्डं पितृराज उग्रम् । तस्थौ समीपे पुरुषर्षभस्य पार्थस्य पार्थः पृथुदीर्घबाहुः ॥ १७ ॥
फिर मोटी और विशाल भुजाओंवाले शत्रुनाशन कुन्तीकुमार भीमसेन उसी वृक्षको हाथमें लेकर भयंकर दण्ड उठाये हुए दण्डधारी यमराजकी भाँति पुरुषोत्तम अर्जुनके समीप खड़े हो गये ॥ १७ ॥
तत् प्रेक्ष्य कर्मातिमनुष्यबुद्धि- र्जिष्णुः स हि भ्रातुरचिन्त्यकर्मा । विसिष्मिये चापि भयं विहाय तस्थौ धनुर्गृह्य महेन्द्रकर्मा ॥ १८ ॥
असाधारण बुद्धिवाले तथा देवराज इन्द्रके समान महापराक्रमी, अचिन्त्यकर्मा अर्जुन अपने भाई भीमसेनके ( अद्भुत) कार्यको देखकर चकित हो उठे और छोड़कर धनुष हाथमें लिये हुए युद्धके लिये गये ॥ १८ ॥
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तत् प्रेक्ष्य कर्मातिमनुष्यबुद्धि- र्जिष्णोः सह भ्रातुरचिन्त्यकर्मा । दामोदरो भ्रातरमुग्रवीर्यं हलायुधं वाक्यमिदं बभाषे ॥ १ ९ ॥ जिनकी बुद्धि लोकोत्तर और कर्म अचिन्त्य हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुन तथा उनके भाई भीमसेनका वह ( साहसपूर्ण) कार्य देखकर भयंकर पराक्रमी एवं हलको ही आयुधके रूपमें धारण करनेवाले अपने भ्राता बलरामजीसे यह बात कही— ॥ १ ९ ॥ य एष सिंहर्षभखेलगामी महद्धनुः कर्षति तालमात्रम् । एषोऽर्जुनो नात्र विचार्यमस्ति यद्यस्मि संकर्षण वासुदेवः ॥ २० ॥
यस्त्वेष वृक्षं तरसावभज्य राज्ञां निकारे सहसा प्रवृत्तः । वृकोदरान्नान्य इहैतदद्य कर्तुं समर्थः समरे पृथिव्याम् ॥ २१ ॥
‘ भैया संकर्षण! ये जो श्रेष्ठ सिंहके समान चालसे लीलापूर्वक चल रहे हैं और तालके * बराबर विशाल धनुषको खींच रहे हैं, ये अर्जुन ही हैं; इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है । यदि मैं वासुदेव हूँ तो मेरी यह बात झूठी नहीं है और ये जो बड़े वेगसे वृक्ष उखाड़कर
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सहसा समस्त राजाओंका सामना करनेके लिये उद्यत हुए हैं, भीमसेन हैं; क्योंकि इस समय पृथ्वीपर भीमसेनके सिवा दूसरा कोई ऐसा वीर नहीं है, जो युद्ध - भूमिमें यह अद्भुत पराक्रम कर सके ॥ २०-२१ ॥ योऽसौ पुरस्तात् कमलायताक्ष- स्तनुर्महासिंहगतिर्विनीतः । गौरः प्रलम्बोज्ज्वलचारुघोणो विनिःसृतः सोऽच्युत धर्मपुत्रः ॥ २२ ॥
‘ अच्युत! जो विकसित कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले, दुबले - पतले, विनयशील, गोरे, महान् सिंहकी - सी चालसे चलनेवाले तथा लंबी, सुन्दर एवं मनोहर नाकवाले पुरुष ( अभी यहाँसे ) निकले हैं, वे धर्मपुत्र युधिष्ठिर हैं ॥ २२ ॥
यौ तौ कुमाराविव कार्तिकेयौ द्वावश्विनेयाविति मे वितर्कः । मुक्ता हि तस्माज्जतुवेश्मदाहा- न्मया श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा च ॥ २३ ॥
‘ उनके साथ युगल कार्तिकेय जैसे जो दो कुमार थे, वे अश्विनीकुमारोंके पुत्र नकुल और सहदेव रहे हैं —ऐसा मेरा अनुमान है; क्योंकि मैंने सुन रखा है कि उस लाक्षागृहके दाहसे पाण्डव और कुन्तीदेवी - सभी बचकर निकल गये थे ॥ २३ ॥
(यथा नृपाः पाण्डवमाजिमध्ये तं प्राब्रवीच्चक्रधरो हलायुधम् । बलं विजानन् पुरुषोत्तमस्तदा न कार्यमार्येण च सम्भ्रमस्त्वया ॥ भीमानुजो योधयितुं समर्थ एको हि पार्थः ससुरासुरान् बहुन् । अलं विजेतुं किमु मानुषान् नृपान् साहाय्यमस्मान् यदि सव्यसाची । स वाञ्छति स्म प्रयताम वीर पराभवः पाण्डुसुते न चास्ति II ) राजालोग रणभूमिमें पाण्डुपुत्र अर्जुनके प्रति अपना क्रोध जैसे प्रकट कर रहे थे, उसे सुनकर अर्जुनके बलको जानते हुए चक्रधारी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीसे कहा — ‘ भैया! आपको घबराना नहीं चाहिये । यदि बहुत-से देवता और असुर एकत्र हो जायँ, तो भी भीमके छोटे भाई कुन्तीकुमार अर्जुन उन सबके साथ अकेले ही युद्ध करनेमें समर्थहैं । फिर इन मानव--भूपालोंपर विजय पाना कौन बड़ी बात है । यदि सव्यसाची अर्जुन