श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1321–1330
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1321–1330
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हमारी सहायता लेना चाहेंगे तो हम इसके लिये प्रयत्न करेंगे । वीरवर! मेरा विश्वास है कि पाण्डुपुत्र अर्जुनकी पराजय नहीं हो सकती । ' तमब्रवीन्नर्जलतोयदाभो हलायुधोऽनन्तरजं प्रतीतः । प्रीतोऽस्मि दृष्ट्वा हि पितृष्वसारं पृथां विमुक्तांसह कौरवाग्रयैः ॥ २४ ॥
जलहीन मेघके समान गौरवर्णवाले हलधर ( बलरामजी ) -ने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णकी बातपर विश्वास करके उनसे कहा –' भैया! कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर पाण्डवोंसहित अपनी बुआ कुन्तीको लाक्षागृहसे बची हुई देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ' ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि कृष्णवाक्ये अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ अट्ठासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३ श्लोक मिलाकर कुल २६३ श्लोक हैं । ) ऊर्ध्वविस्तृतदोर्माने तालमित्यभिधीयते । इस वचनके अनुसार एक मनुष्य अपनी बाँहको ऊपर उठाकर खड़ा हो तो उस हाथसे लेकर पैरतककी लम्बाईको ' ताल' कहते हैं ।
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एकोननवत्यधिकशततमोध्यायः अर्जुन और भीमसेनके द्वारा कर्ण तथा शल्यकी पराजय और द्रौपदीसहित भीम- अर्जुनका अपने डेरेपर जाना वैशम्पायन उवाच
अजिनानि विधुन्वन्तः करकांश्च द्विजर्षभाः ।
ऊचुस्ते भीर्न कर्तव्या वयं योत्स्यामहे परान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय अपने मृगचर्म और कमण्डलुओंको हिलाते और उछालते हुए वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्जुनसे कहने लगे- ' तुम डरना नहीं, हम ( सब ) -लोग ( तुम्हारी ओरसे ) शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे' ॥ १ ॥
तानेवं वदतो विप्रानर्जुनः प्रहसन्निव ।
उवाच प्रेक्षका भूत्वा यूयं तिष्ठथ पार्श्वतः ॥ २ ॥
इस प्रकारकी बातें करनेवाले उन ब्राह्मणोंसे अर्जुनने हँसते हुए-से कहा — ‘ आपलोग दर्शक होकर बगलमें चुपचाप खड़े रहें ॥ २ ॥
अहमेनानजिह्माग्रैः शतशो विकिरञ्छरैः ।
वारयिष्यामि संक्रुद्धान् मन्त्रैराशीविषानिव ॥ ३ ॥
' मैं ( अकेला ही ) सीधी नोकवाले सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके क्रोधमें भरे हुए इन शत्रुओंको उसी प्रकार रोक दूँगा, जैसे मन्त्रज्ञ लोग अपने मन्त्रों ( के बल) -से विषैले सर्पोंको कुण्ठित कर देते हैं ' ॥ ३ ॥
इति तद् धनुरानम्य शुल्कावाप्तं महाबलः ।
भ्रात्रा भीमेन सहितस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ४ ॥
यों कहकर महाबली अर्जुनने उसी स्वयंवरमें लक्ष्यवेधके लिये प्राप्त हुए धनुषको झुकाकर ( उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी और उसे हाथमें लेकर ) भाई भीमसेनके साथ वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये ॥ ४ ॥
ततः कर्णमुखान् दृष्ट्वा क्षत्रियान् युद्धदुर्मदान् ।
सम्पेततुरभीतौ तौ गजौ प्रतिगजानिव ॥ ५ ॥
तदनन्तर कर्ण आदि रणोन्मत्त क्षत्रियोंको आते देख वे दोनों भाई निर्भय हो उनपर उसी तरह टूट पड़े, जैसे दो ( मतवाले ) हाथी अपने विपक्षी हाथियोंकी ओर बढ़े जा रहे हों ॥ ५ ॥
ऊचुश्च वाचः परुषास्ते राजानो युयुत्सवः ।
आहवे हि द्विजस्यापि वधो दृष्टो युयुत्सतः ॥ ६ ॥
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तब युद्धके लिये उत्सुक उन राजाओंने कठोर स्वरमें ये बातें कहीं—' युद्धकी इच्छावाले ब्राह्मणका भी रणभूमिमें वध शास्त्रानुकूल देखा गया है ' ॥ ६ ॥
इत्येवमुक्त्वा राजानः सहसा दुद्रुवुर्द्विजान् ।
ततः कर्णो महातेजा जिष्णुं प्रति ययौ रणे ॥ ७ ॥
यों कहकर वे राजालोग सहसा ब्राह्मणोंकी ओर दौड़े । महातेजस्वी कर्ण अर्जुनकी ओर युद्धके लिये बढ़ा ॥ ७ ॥
युद्धार्थी वासिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा ।
भीमसेनं ययौ शल्यो मद्राणामीश्वरो बली ॥ ८ ॥
ठीक उसी तरह, जैसे हथिनीके लिये लड़नेकी इच्छा रखकर एक हाथी अपने प्रतिद्वन्द्वी दूसरे हाथीसे भिड़नेके लिये जा रहा हो, महाबली मद्रराज शल्य भीमसेनसे जा भिड़े ॥ ८ ॥
दुर्योधनादयः सर्वे ब्राह्मणैः सह संगताः ।
मृदुपूर्वमयत्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाहवे ॥ ९ ॥
दुर्योधन आदि सभी ( भूपाल) एक साथ अन्यान्य ब्राह्मणोंके साथ उस युद्धभूमिमें बिना किसी प्रयासके ( खेल - सा करते हुए) कोमलतापूर्वक ( शीत ) युद्ध करने लगे ॥ ९ ॥
ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं शितैः शरैः ।
कर्णं वैकर्तनं श्रीमान् विकृष्य बलवद् धनुः ॥ १० ॥
तब तेजस्वी अर्जुनने अपने धनुषको जोरसे खींचकर अपनी ओर वेगसे आते हुए सूर्यपुत्र कर्णको कई तीक्ष्ण बाण मारे ॥ १० ॥
तेषां शराणां वेगेन शितानां तिग्मतेजसाम् ।
विमुह्यमानो राधेयो यत्नात् तमनुधावति ॥ ११ ॥
उन दुःसह तेजवाले तीखे बाणोंके वेगपूर्वक आघातसे राधानन्दन कर्णको मूर्च्छा आने लगी । वह बड़ी कठिनाईसे अर्जुनकी ओर बढ़ा ॥ ११ ॥
तावुभावप्यनिर्देश्यौ लाघवाज्जयतां वरौ ।
अयुध्येतां सुसंरब्धावन्योन्यविजिगीषिणौ ॥ १२ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे दोनों योद्धा हाथोंकी फुर्ती दिखानेमें बेजोड़ थे, उनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा —यह बताना असम्भव था । दोनों ही एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखकर बड़े क्रोधसे लड़ रहे थे ॥ १२ ॥
कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य बाहुबलं च मे ।
इति शूरार्थवचनैरभाषेतां परस्परम् ॥ १३ ॥
‘ देखो, तुमने जिस अस्त्रका प्रयोग किया था, उसे रोकनेके लिये मैंने यह अस्त्र चलाया है । देख लो, मेरी भुजाओंका बल! ' इस प्रकार शौर्यसूचक वचनोंद्वारा वे आपसमें बातें भी करते जाते थे ॥ १३ ॥
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ततोऽर्जुनस्य भुजयोर्वीर्यमप्रतिमं भुवि ।
ज्ञात्वा वैकर्तनः कर्णः संरब्धः समयोधयत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर अर्जुनके बाहुबलकी इस पृथ्वीपर कहीं समता नहीं है, यह जानकर सूर्यपुत्र कर्ण अत्यन्त क्रोधपूर्वक जमकर युद्ध करने लगा ॥ १४ ॥
अर्जुनेन प्रयुक्तांस्तान् बाणान् वेगवतस्तदा ।
प्रतिहत्य ननादोच्चैः सैन्यानि तदपूजयन् ॥ १५ ॥
उस समय अर्जुनद्वारा चलाये हुए उन सभी वेगशाली बाणोंको काटकर कर्ण बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा । समस्त सैनिकोंने उसके इस अद्भुत कार्यकी सराहना की ॥ १५ ॥
कर्णउवाच
तुष्यामि ते विप्रमुख्य भुजवीर्यस्य संयुगे ।
अविषादस्य चैवास्य शस्त्रास्त्रविजयस्य च ॥ १६ ॥
कर्ण बोला - विप्रवर! युद्धमें आपके बाहुबलसे मैं ( बहुत ) संतुष्ट हूँ । आपमें थकावट या विषादका कोई चिह्न नहीं दिखायी देता और आपने सभी अस्त्र - शस्त्रोंको जीतकर मानो अपने काबूमें कर लिया है । ( आपकी यह सफलता देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ) ॥ १६ ॥
किं त्वं साक्षाद् धनुर्वेदो रामो वा विप्रसत्तम ।
अथ साक्षाद्धरिहयः साक्षाद् वा विष्णुरच्युतः ॥ १७ ॥
विप्रशिरोमणे! आप मूर्तिमान् धनुर्वेद हैं? या परशुराम? अथवा आप स्वयं इन्द्र या अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले साक्षात् भगवान् विष्णु हैं? ॥ १७ ॥
आत्मप्रच्छादनार्थं वै बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।
विप्ररूपं विधायेदं मन्ये मां प्रतियुध्यसे ॥ १८ ॥
मैं समझता हूँ, आप इन्हींमेंसे कोई हैं और अपने स्वरूपको छिपानेके लिये यह ब्राह्मणवेष धारण करके बाहुबलका आश्रय ले मेरे साथ युद्ध कर रहे हैं ॥ १८ ॥
न हि मामाहवे क्रुद्धमन्यः साक्षाच्छचीपतेः ।
पुमान् योधयितुं शक्तः पाण्डवाद् वा किरीटिनः ॥ १ ९ ॥
क्योंकि युद्धमें मेरे कुपित होनेपर साक्षात् शचीपति इन्द्र अथवा किरीटधारी पाण्डु-नन्दन अर्जुनके अतिरिक्त दूसरा कोई मेरा सामना नहीं कर सकता ॥ १ ९ ॥
तमेवं वादिनं तत्र फाल्गुनः प्रत्यभाषत ।
नास्मि कर्ण धनुर्वेदो नास्मि रामः प्रतापवान् ॥ २० ॥
कर्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उसे इस प्रकार उत्तर दिया- ' कर्ण! न तो मैं धनुर्वेद हूँ और न प्रतापी परशुराम' ॥ २० ॥
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ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
ब्राह्मे पौरंदरे चास्त्रे निष्ठितो गुरुशासनात् ॥ २१ ॥
स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वै वीर स्थिरो भव । मैं तो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें उत्तम और योद्धाओंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मण हूँ । गुरुका उपदेश पाकर ब्रह्मास्त्र तथा इन्द्रास्त्र दोनोंमें पारंगत हो गया हूँ । वीर! आज मैं तुम्हें युद्धमें जीतने के लिये खड़ा हूँ, तुम भी स्थिरतापूर्वक खड़े रहो ॥ २१३ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राधेयो युद्धात् कर्णो न्यवर्तत ॥ २२ ॥
बाह्मं तेजस्तदाजय्यं मन्यमानो महारथः । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनकी यह बात सुनकर महारथी कर्ण ब्राह्मतेजको अजेय मानता हुआ उस समय युद्ध छोड़कर हट गया ॥ २२३ ॥
अपरस्मिन् वनोद्देशे वीरौ शल्यवृकोदरौ ॥ २३ ॥
बलिनौ युद्धसम्पन्नौ विद्यया च बलेन च ।
अन्योन्यमाह्वयन्तौ तु मत्ताविव महागजौ ॥ २४ ॥
इसी समय दूसरे स्थानको अपना रणक्षेत्र बनाकर वहीं बलवान् वीर शल्य और भीमसेन एक - दूसरेको ललकारते हुए दो मतवाले गजराजोंकी भाँति युद्ध कर रहे थे । दोनों ही विद्या, बल और युद्धकी कलासे सम्पन्न थे ॥ २३-२४ ॥
मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव निघ्नन्तावितरेतरम् ।
प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः ॥ २५ ॥
वे घूँसों और घुटनोंसे एक- दूसरेको मारने लगे । दोनों एक- दूसरेको दूरतक ठेल ले जाते, नीचे गिरानेका प्रयत्न करते, कभी अपनी ओर खींचते और कभी अगल- बगलसे पैतरें देकर गिरानेकी चेष्टा करते थे ॥ २५ ॥
आचकर्षतुरन्योन्यं मुष्टिभिश्चापि जघ्नतुः ।
ततश्चटचटाशब्दः सुघोरो ह्यभवत् तयोः ॥ २६ ॥
पाषाणसम्पातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ।
मुहूर्तं तौ तदान्योन्यं समरे पर्यकर्षताम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार वे एक- दूसरेको खींचते और मुक्कोंसे मारते थे । उस समय घूँसोंकी मारसे दोनोंके शरीरोंपर अत्यन्त भयंकर ' चट- चट' शब्द हो रहा था । वे परस्पर इस प्रकार प्रहार कर रहे थे, मानो पत्थर टकरा रहे हों । लगभग दो घड़ीतक दोनों उस युद्धमें एक- दूसरेको खींचते और ठेलते रहे ॥ २६-२७ ॥
ततो भीमः समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां शल्यमाहवे ।
अपातयत् कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणा जहसुस्तदा ॥ २८ ॥
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तदनन्तर कुरुश्रेष्ठ भीमसेनने दोनों हाथोंसे शल्यको ऊपर उठाकर उस युद्धभूमिमें पटक दिया । यह देख ब्राह्मणलोग हँसने लगे ॥ २८ ॥
तत्राश्चर्यं भीमसेनश्चकार पुरुषर्षभः ।
यच्छल्यं पातितं भूमौ नावधीद् बलिनं बली ॥ २ ९ ॥
कुरुश्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने एक आश्चर्यकी बात यह की कि महाबली शल्यको पृथ्वीपर पटककर भी मार नहीं डाला ॥ २ ९ ॥
पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते ।
शङ्किताः सर्वराजानः परिवव्रुर्वृकोदरम् ॥ ३० ॥
भीमसेनके द्वारा शल्यके पछाड़ दिये जाने और अर्जुनसे कर्णके डर जानेपर सभी राजा ( युद्धका विचार छोड़) शंकित हो भीमसेनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३० ॥
ऊचुश्च सहितास्तत्र साध्विमौ ब्राह्मणर्षभौ ।
विज्ञायेतां क्वजन्मानौ क्वनिवासौ तथैव च ॥ ३१ ॥
और एक साथ ही बोल उठे — ' अहो! ये दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण धन्य हैं । पता तो लगाओ, इनकी जन्मभूमि कहाँ है तथा ये रहनेवाले कहाँके हैं? ॥ ३१ ॥
कोहि राधासुतं कर्णं शक्तो योधयितुं रणे ।
अन्यत्र रामाद् द्रोणाद् वा पाण्डवाद् वा किरीटिनः ॥ ३२ ॥
' परशुराम, द्रोण अथवा पाण्डुनन्दन अर्जुनके सिवा दूसरा ऐसा कौन है, जो युद्धमें राधानन्दन कर्णका सामना कर सके ॥ ३२ ॥
कृष्णाद् वा देवकीपुत्रात् कृपाद् वापि शरद्वतः ।
को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतियोधयितुं रणे ॥ ३३ ॥
‘ ( इसी प्रकार ) देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अथवा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यके सिवा दूसरा कौन है, जो समरभूमिमें दुर्योधनके साथ लोहा ले सके ॥ ३३ ॥
तथैव मद्राधिपतिं शल्यं बलवतां वरम् ।
बलदेवादृते वीरात् पाण्डवाद् वा वृकोदरात् ॥ ३४ ॥
वीराद् दुर्योधनाद् वान्यः शक्तः पातयितुं रणे ।
क्रियतामवहारोऽस्माद् युद्धाद् ब्राह्मणसंवृतात् ॥ ३५ ॥
‘ बलवानोंमें श्रेष्ठ मद्रराज शल्यको भी वीरवर बलदेव, पाण्डुनन्दन भीमसेन अथवा वीर दुर्योधनको छोड़कर दूसरा कौन रणभूमिमें गिरा सकता है । अतः ब्राह्मणोंसे घिरे हुए इस युद्धक्षेत्रसे हमलोगोंको हट जाना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥
ब्राह्मणा हि सदा रक्ष्याः सापराधापि नित्यदा ।
अथैनानुपलभ्येह पुनर्योत्स्याम हृष्टवत् ॥ ३६ ॥
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‘ क्योंकि ब्राह्मण अपराधी हों, तो भी सदा ही उनकी रक्षा करनी चाहिये । पहले इनका ठीक- ठीक परिचय ले लें, फिर ( ये चाहें तो ) हम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करेंगे ' ॥ ३६ ॥
तांस्तथावादिनः सर्वान् प्रसमीक्ष्य क्षितीश्वरान् ।
अथान्यान् पुरुषांश्चापि कृत्वा तत् कर्म संयुगे ॥ ३७ ॥
उन सब राजाओं तथा अन्य लोगोंको ऐसी बातें करते देख और युद्धमें वह महान् पराक्रम दिखाकर भीमसेन और अर्जुन बड़े प्रसन्न थे ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच तत् कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः । निवारयामास महीपतींस्तान् धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वान् ॥ ३८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! भीमसेनका वह अद्भुत कार्य देख भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचते हुए कि ये दोनों भाई कुन्तीकुमार भीमसेन और अर्जुन ही हैं, उन सब राजाओंको यह समझाकर कि ' इन्होंने धर्मपूर्वक द्रौपदीको प्राप्त किया है ' अनुनयपूर्वक युद्धसे रोका ॥ ३८ ॥
एवं ते विनिवृत्तास्तु युद्धाद् युद्धविशारदाः ।
यथावासं ययुः सर्वे विस्मिता राजसत्तमाः ॥ ३ ९ ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णके समझानेसे वे सभी युद्धकुशल श्रेष्ठ नरेश युद्धसे निवृत्त हो गये और विस्मित होकर अपने - अपने डेरोंको चले गये ॥ ३ ९ ॥
वृत्तो ब्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली ब्राह्मणैर्वृता ।
इति ब्रुवन्तः प्रययुर्ये तत्रासन् समागताः ॥ ४० ॥
वहाँ जो दर्शक एकत्र हुए थे, वे ' इस रंग- मण्डपके उत्सवसे ब्राह्मणोंकी श्रेष्ठता सिद्ध हुई; पांचालराजकुमारी द्रौपदीको ब्राह्मणोंने प्राप्त किया, यों कहते हुए (अपने- अपने निवासस्थानको) चले गये ॥ ४० ॥
ब्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नौ रौरवाजिनवासिभिः ।
कृच्छ्रेण जग्मतुस्तौ तु भीमसेनधनंजयौ ॥ ४१ ॥
रुरुमृगके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले ब्राह्मणोंसे घिरे होनेके कारण भीमसेन और अर्जुन बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे ॥ ४१ ॥
विमुक्तौ जनसम्बाधाच्छत्रुभिः परिवीक्षितौ ।
कृष्णयानुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः ॥ ४२ ॥
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जनताकी भीड़से बाहर निकलनेपर शत्रुओंने उन्हें अच्छी तरह देखा । आगे - आगे वे दोनों नरवीर थे और उनके पीछे - पीछे द्रौपदी चली जा रही थी । द्रौपदीके साथ वहाँ उन दोनोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४२ ॥
पौर्णमास्यां घनैर्मुक्तौ चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।
तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत् ॥ ४३ ॥
अनागच्छत्सु पुत्रेषु भैक्षकालेऽभिगच्छति ।
धार्तराष्ट्रैर्हता न स्युर्विज्ञाय कुरुपुङ्गवाः ॥ ४४ ॥
मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः ।
विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः ॥ ४५ ॥
वे ऐसे लगते थे, जैसे पूर्णमासी तिथिको मेघोंकी घटासे निकलकर चन्द्रमा और सूर्य प्रकाशित हो रहे हों । इधर भिक्षाका समय बीत जानेपर भी जब पुत्र नहीं लौटे, तब उनकी माता कुन्तीदेवी स्नेहवश अनेक प्रकारकी चिन्ताओंमें डूबकर उनके विनाशकी आशंका करने लगीं — ' कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंने कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको पहचानकर उनकी हत्या कर डाली हो? अथवा दृढ़तापूर्वक वैरभावको मनमें रखनेवाले महाभयंकर मायावी राक्षसोंने तो मेरे बच्चोंको नहीं मार डाला? क्या महात्मा व्यासके भी निश्चित मतके विपरीत कोई बात हो गयी? ' ॥ ४३ – ४५ ॥
इत्येवं चिन्तयामास सुतस्नेहावृता पृथा ।
ततः सुप्तजनप्राये दुर्दिने मेघसम्प्लुते ॥ ४६ ॥
महत्यथापराह्णे तु घनैः सूर्य इवावृतः ।
ब्राह्मणैः प्राविशत् तत्र जिष्णुर्भार्गववेश्म तत् ॥ ४७ ॥
इस प्रकार पुत्रस्नेहमें पगी कुन्तीदेवी जब चिन्तामें मग्न हो रही थीं, आकाशमें मेघोंकी भारी घटा घिर आनेके कारण जब दुर्दिन- सा हो रहा था और जनता सब काम छोड़कर सोये हुएकी भाँति अपने- अपने घरोंपर निश्चेष्ट होकर बैठी थी, उसी समय दिनके तीसरे पहरमें बादलोंसे घिरे हुए सूर्यके समान ब्राह्मणमण्डलीसे घिरे हुए अर्जुनने वहाँ उस कुम्हारके घरमें प्रवेश किया ॥ ४६-४७ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवप्रत्यागमने एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें पाण्डवप्रत्यागमनविषयक एक सौ नवासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १८९ ॥
Fara
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नवत्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्ती, अर्जुन और युधिष्ठिरकी बातचीत, पाँचों पाण्डवोंका द्रौपदीके साथ विवाहका विचार तथा बलराम और श्रीकृष्णकी पाण्डवोंसे भेंट वैशम्पायन उवाच गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ । तां याज्ञसेनीं परमप्रतीतौ भिक्षेत्यथावेदयतां नराग्रयौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! मनुष्योंमें श्रेष्ठ महानुभाव कुन्तीपुत्र भीमसेन और अर्जुन कुम्हारके घरमें प्रवेश करके अत्यन्त प्रसन्न हो माताको द्रौपदीकी प्राप्ति सूचित करते हुए बोले — ‘ माँ! हमलोग भिक्षा लाये हैं ' ॥ १ ॥
कुटीगता सा त्वनवेक्ष्य पुत्री प्रोवाच भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे । पश्चाच्च कुन्ती प्रसमीक्ष्य कृष्णां कष्टं मया भाषितमित्युवाच ॥ २ ॥
उस समय कुन्तीदेवी कुटियाके भीतर थीं। उन्होंने अपने पुत्रोंको देखे बिना ही उत्तर दे दिया — ' ( भिक्षा लाये हो तो ) तुम सभी भाई मिलकर उसे पाओ । ' तत्पश्चात् द्रौपदीको देखकर कुन्तीने चिन्तित होकर कहा-' हाय! मेरे मुँहसे बड़ी अनुचित बात निकल गयी ' ॥ २ ॥
साधर्मभीता परिचिन्तयन्ती तां याज्ञसेनीं परमप्रतीताम् । पाणी गृहीत्वोपजगाम कुन्ती युधिष्ठिरं वाक्यमुवाच चेदम् ॥ ३ ॥
कुन्तीदेवी अधर्मके भयसे बड़ी चिन्तामें पड़ गयीं; ( परंतु मनोनुकूल पतिकी प्राप्तिसे ) द्रौपदीके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी । कुन्तीदेवी द्रौपदीका हाथ पकड़कर युधिष्ठिरके पास गयीं और उनसे उन्होंने यह बात कही - ॥ ३ ॥
कुन्त्युवाच इयं तु कन्या द्रुपदस्य राज्ञः तवानुजाभ्यां मयि संनिविष्टा ।
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यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ॥ ४ ॥
कुन्तीने कहा — बेटा! यह राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी है । तुम्हारे छोटे भाई भीमसेन और अर्जुनने इसे भिक्षा कहकर मुझे समर्पित किया और मैंने भी ( इसे देखे बिना ही ) भूलसे ( भिक्षा ही समझकर) अनुरूप उत्तर दे दिया- ' तुम सब लोग मिलकर इसे पाओ ' ॥ ४ ॥
मया कथं नानृतमुक्तमद्य भवेत् कुरूणामृषभ ब्रवीहि । पाञ्चालराजस्य सुतामधर्मो न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बताओ, अब कैसे मेरी बात झूठी न हो? और क्या किया जाय, जिससे इस पांचालराज- कुमारी कृष्णाको न तो पाप लगे और न नीच योनियोंमें ही भटकना पड़े ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच स एवमुक्तो मतिमान् नृवीरो मात्रा मुहूर्तं तु विचिन्त्य राजा । कुन्तीं समाश्वास्य कुरुप्रवीरो