महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 141–150

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षत् । रक्षित्वा च पुनरुपाध्यायगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ ४३ ॥

उसने ‘ तथास्तु ' कहकर गुरुकी आज्ञा मान ली और पूर्ववत् गौओंकी रक्षा करने लगा । एक दिन गायें चराकर वह फिर ( सायंकालको ) उपाध्यायके घर आया और उनके सामने खड़े होकर उसने नमस्कार किया ॥ ४३ ॥

तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वा पुनरुवाच वत्सोपमन्यो अहं ते सर्वं भैक्ष्यं गृह्णामि न चान्यच्चरसि पीवानसि भृशं केन वृत्तिं कल्पयसीति ॥ ४४ ॥

उपाध्यायने उसे फिर भी मोटा-ताजा ही देखकर पूछा- ' बेटा उपमन्यु! मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ और अब तुम दुबारा भिक्षा नहीं माँगते, फिर भी बहुत मोटे हो । आजकल कैसे खाना- पीना चलाते हो?' ॥ ४४ ॥

स एवमुक्तस्तमुपाध्यायं प्रत्युवाच भो एतासां गवां पयसा वृत्तिं कल्पयामीति ।

तमुवाचोपाध्यायो नैतन्न्याय्यं पय उपयोक्तुं भवतो मया नाभ्यनुज्ञातमिति ॥ ४५ ॥

इस प्रकार पूछनेपर उपमन्युने उपाध्यायको उत्तर दिया- ' भगवन्! मैं इन गौओंके दूधसे जीवन - निर्वाह करता हूँ। ' ( यह सुनकर) उपाध्यायने उससे कहा— ' मैंने तुम्हें दूध पीनेकी आज्ञा नहीं दी है, अतः इन गौओंके दूधका उपयोग करना तुम्हारे लिये अनुचित है ' ॥ ४५ ॥

स तथेति प्रतिज्ञाय गा रक्षित्वा पुनरुपाध्यायगृहमेत्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ ४६ ॥

उपमन्युने ‘ बहुत अच्छा ' कहकर दूध न पीनेकी भी प्रतिज्ञा कर ली और पूर्ववत् गोपालन करता रहा । एक दिन गोचारणके पश्चात् वह पुनः उपाध्यायके घर आया और उनके सामने खड़े होकर उसने नमस्कार किया ॥ ४६ ॥

तमुपाध्यायः पीवानमेव दृष्ट्वोवाच वत्सोपमन्यो भैक्ष्यं नाश्नासि न चान्यच्चरसि पयो न पिबसि पीवानसि भृशं केनेदानीं वृत्तिं कल्पयसीति ॥ ४७ ॥

उपाध्यायने अब भी उसे हृष्ट- पुष्ट ही देखकर पूछा — ' बेटा उपमन्यु! तुम भिक्षाका अन्न नहीं खाते, दुबारा भिक्षा भी नहीं माँगते और गौओंका दूध भी नहीं पीते; फिर भी बहुत मोटे हो । इस समय कैसे निर्वाह करते हो? ' ॥ ४७ ॥

स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच भोः फेनं पिबामि यमिमे वत्सा मातॄणां स्तनात् पिबन्त उद्गिरन्ति ॥ ४८ ॥

इस प्रकार पूछनेपर उसने उपाध्यायको उत्तर दिया- ' भगवन्! ये बछड़े अपनी माताओंके स्तनोंका दूध पीते समय जो फेन उगल देते हैं, उसीको पी लेता हूँ' ॥ ४८ ॥

तमुपाध्यायः प्रत्युवाच– एते त्वदनुकम्पया गुणवन्तो वत्साः प्रभूततरं फेनमुद्गिरन्ति । तदेषामपि वत्सानां वृत्त्युपरोधं करोष्येवं वर्तमानः । फेनमपि भवान् न पातुमर्हतीति । स तथेति प्रतिश्रुत्य पुनररक्षद् गाः ॥ ४ ९ ॥

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यह सुनकर उपाध्यायने कहा– ' ये बछड़े उत्तम गुणोंसे युक्त हैं, अतः तुमपर दया करके बहुत- सा फेन उगल देते होंगे । इसलिये तुम फेन पीकर तो इन सभी बछड़ोंकी जीविकामें बाधा उपस्थित करते हो, अतः आजसे फेन भी न पिया करो । ' उपमन्युने ' बहुत अच्छा' कहकर उसे न पीनेकी प्रतिज्ञा कर ली और पूर्ववत् गौओंकी रक्षा करने लगा ॥ ४ ९ ॥

तथा प्रतिषिद्धो भैक्ष्यं नाश्नाति न चान्यच्चरति पयो न पिबति फेनं नोपयुङ्क्ते ।

स कदाचिदरण्ये क्षुधार्तोऽर्कपत्राण्यभक्षयत् ॥ ५० ॥

इस प्रकार मना करनेपर उपमन्यु न तो भिक्षाका अन्न खाता, न दुबारा भिक्षा लाता, न गौओंका दूध पीता और न बछड़ोंके फेनको ही उपयोगमें लाता था ( अब वह भूखा रहने लगा) । एक दिन वनमें भूखसे पीड़ित होकर उसने आकके पत्ते चबा लिये ॥ ५० ॥

स तैरर्कपत्रैर्भक्षितैः क्षारतिक्तकटुरूक्षैस्तीक्ष्णविपाकैश्चक्षुष्युपहतोऽन्धो बभूव । ततः सोऽन्धोऽपि चङ्क्रम्यमाणः कूपे पपात ॥ ५१ ॥

आकके पत्ते खारे, तीखे, कड़वे और रूखे होते हैं । उनका परिणाम तीक्ष्ण होता है ( पाचनकालमें वे पेटके अंदर आगकी ज्वाला- सी उठा देते हैं ); अतः उनको खानेसे उपमन्युकी आँखोंकी ज्योति नष्ट हो गयी । वह अन्धा हो गया। अन्धा होनेपर भी वह इधर-उधर घूमता रहा; अतः कुएँमें गिर पड़ा ॥ ५१ ॥

अथ तस्मिन्ननागच्छति सूर्ये चास्ताचलावलम्बिनि उपाध्यायः शिष्यानवोचत्— नायात्युपमन्युस्त ऊचुर्वनं गतो गा रक्षितुमिति ॥ ५२ ॥

तदनन्तर जब सूर्यदेव अस्ताचलकी चोटीपर पहुँच गये, तब भी उपमन्यु गुरुके घरपर नहीं आया, तो उपाध्यायने शिष्योंसे पूछा — ' उपमन्यु क्यों नहीं आया? ' वे बोले — ‘ वह तो गाय चरानेके लिये वनमें गया था ' ॥ ५२ ॥

तानाह उपाध्यायो मयोपमन्युः सर्वतः प्रतिषिद्धः स नियतं कुपितस्ततो नागच्छति चिरं ततोऽन्वेष्य इत्येवमुक्त्वा शिष्यैः सार्धमरण्यं गत्वा तस्याह्वानाय शब्दं चकार भो उपमन्यो क्वासि वत्सैहीति ॥ ५३ ॥

तब उपाध्यायने कहा— ' मैंने उपमन्युकी जीविकाके सभी मार्ग बंद कर दिये हैं, अतः निश्चय ही वह रूठ गया है; इसीलिये इतनी देर हो जानेपर भी वह नहीं आया, अतः हमें चलकर उसे खोजना चाहिये । ' ऐसा कहकर शिष्योंके साथ वनमें जाकर उपाध्यायने उसे बुलानेके लिये आवाज दी- ' ओ उपमन्यु! कहाँ हो बेटा! चले आओ ' ॥ ५३ ॥

स उपाध्यायवचनं श्रुत्वा प्रत्युवाचोच्चैरयमस्मिन् कूपे पतितोऽहमिति तमुपाध्यायः प्रत्युवाच कथं त्वमस्मिन् कूपे पतित इति ॥ ५४ ॥

उसने उपाध्यायकी बात सुनकर उच्च स्वरसे उत्तर दिया- ' गुरुजी! मैं कुएँमें गिर पड़ा हूँ। ' तब उपाध्यायने उससे पूछा- ' वत्स! तुम कुएँ में कैसे गिर गये? ' ॥ ५४ ॥

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स उपाध्यायं प्रत्युवाच - अर्कपत्राणि भक्षयित्वान्धी भूतोऽस्म्यतः कूपे पतित इति ॥ ५५ ॥

उसने उपाध्यायको उत्तर दिया- ' भगवन्! मैं आकके पत्ते खाकर अन्धा हो गया हूँ; इसीलिये कुएँमें गिर गया' ॥ ५५ ॥

तमुपाध्यायः प्रत्युवाच - अश्विनौ स्तुहि । तौ देवभिषजौ त्वां चक्षुष्मन्तं कर्ताराविति । स एवमुक्त उपाध्यायेनोपमन्युरश्विनौ स्तोतुमुपचक्रमे देवावश्विनौ वाग्भिरृग्भिः ॥ ५६ ॥

तब उपाध्यायने कहा—' वत्स! दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य हैं । तुम उन्हींकी स्तुति करो । वे तुम्हारी आँखें ठीक कर देंगे । ' उपाध्यायके ऐसा कहनेपर उपमन्युने अश्विनीकुमार नामक दोनों देवताओंकी ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा स्तुति प्रारम्भ की ॥ ५६ ॥

प्रपूर्वगौ पूर्वजौ चित्रभानू

गिरा वाऽऽशंसामि तपसा ह्यनन्तौ ।

दिव्यौ सुपर्णौ विरजौ विमाना- वधिक्षिपन्तौ भुवनानि विश्वा ॥ ५७ ॥

हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों सृष्टिसे पहले विद्यमान थे । आप ही पूर्वज हैं । आप ही चित्रभानु हैं । मैं वाणी और तपके द्वारा आपकी स्तुति करता हूँ; क्योंकि आप अनन्त हैं । दिव्यस्वरूप हैं । सुन्दर पंखवाले दो पक्षीकी भाँति सदा साथ रहनेवाले हैं । रजोगुणशून्य तथा अभिमानसे रहित हैं । सम्पूर्ण विश्वमें आरोग्यका विस्तार करते हैं ॥ ५७ ॥

हिरण्मयौ शकुनी साम्परायौ

नासत्यदस्रौ सुनसौ वै जयन्तौ ।

शुक्लं वयन्तौ तरसा सुवेमा- वधिव्ययन्तावसितं विवस्वतः ॥ ५८ ॥

सुनहरे पंखवाले दो सुन्दर विहंगमोंकी भाँति आप दोनों बन्धु बड़े सुन्दर हैं । पारलौकिक उन्नतिके साधनोंसे सम्पन्न हैं । नासत्य तथा दस्र–ये दोनों आपके नाम हैं । आपकी नासिका बड़ी सुन्दर है । आप दोनों निश्चितरूपसे विजय प्राप्त करनेवाले हैं । आप ही विवस्वान् ( सूर्यदेव) -के सुपुत्र हैं; अतः स्वयं ही सूर्यरूपमें स्थित हो दिन तथा रात्रिरूप काले तन्तुओंसे संवत्सररूप वस्त्र बुनते रहते हैं और उस वस्त्रद्वारा वेगपूर्वक देवयान और पितृयान नामक सुन्दर मार्गोंको प्राप्त कराते हैं ॥ ५८ ॥

ग्रस्तां सुपर्णस्य बलेन वर्तिका- ममुञ्चतामश्विनी सौभगाय । तावत् सुवृत्तावनमन्त मायया वसत्तमा गा अरुणा उदावहन् ॥ ५ ९ ॥

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परमात्माकी कालशक्तिने जीवरूपी पक्षीको अपना ग्रास बना रखा है । आप दोनों अश्विनीकुमार नामक जीवन्मुक्त महापुरुषोंने ज्ञान देकर कैवल्यरूप महान् सौभाग्यकी प्राप्तिके लिये उस जीवको कालके बन्धनसे मुक्त किया है । मायाके सहवासी अत्यन्त अज्ञानी जीव जबतक राग आदि विषयोंसे आक्रान्त हो अपनी इन्द्रियोंके समक्ष नत मस्तक रहते हैं, तबतक वे अपने - आपको शरीरसे आबद्ध ही मानते हैं ॥ ५ ९ ॥ षष्टिश्च गावस्त्रिशताश्च धेनव

एकं वत्सं सुवते तं दुहन्ति ।

नानागोष्ठा विहिता एकदोहना- स्तावश्विनौ दुहतो घर्ममुक्थ्यम् ॥ ६० ॥

दिन एवं रात — ये मनोवांछित फल देनेवाली तीन सौ साठ दुधारू गौएँ हैं । वे सब एक ही संवत्सररूपी बछड़ेको जन्म देती और उसको पुष्ट करती हैं । वह बछड़ा सबका उत्पादक और संहारक है । जिज्ञासु पुरुष उक्त बछड़ेको निमित्त बनाकर उन गौओंसे विभिन्न फल देनेवाली शास्त्रविहित क्रियाएँ दुहते रहते हैं; उन सब क्रियाओंका एक (तत्त्वज्ञानकी इच्छा) ही दोहनीय फल है । पूर्वोक्त गौओंको आप दोनों अश्विनीकुमार ही दुहते हैं ॥ ६० ॥

एकां नाभिं सप्तशता अराः श्रिताः प्रधिष्वन्या विंशतिरर्पिता अराः । अनेमि चक्रं परिवर्ततेऽजरं मायाश्विनौ समनक्ति चर्षणी ॥ ६१ ॥

हे अश्विनीकुमारो! इस कालचक्रकी एकमात्र संवत्सर ही नाभि है, जिसपर रात और दिन मिलाकर सात सौ बीस अरे टिके हुए हैं । वे सब बारह मासरूपी प्रधियों ( अरोंको थामनेवाले पुट्ठों) -में जुड़े हुए हैं । अश्विनीकुमारो! यह अविनाशी एवं मायामय कालचक्र बिना नेमिके ही अनियत गतिसे घूमता तथा इहलोक और परलोक दोनों लोकोंकी प्रजाओंका विनाश करता रहता है ॥ ६१ ॥

एकं चक्रं वर्तते द्वादशारं

षण्णाभिमेकाक्षमृतस्य धारणम् ।

यस्मिन् देवा अधि विश्वे विषक्ता- स्तावश्विनौ मुञ्चतं मा विषीदतम् ॥ ६२ ॥

अश्विनीकुमारो! मेष आदि बारह राशियाँ जिसके बारह अरे, छहों ऋतुएँ जिसकी छ: नाभियाँ हैं और संवत्सर जिसकी एक धुरी है, वह एकमात्र कालचक्र सब ओर चल रहा है । यही कर्मफलको धारण करनेवाला आधार है । इसीमें सम्पूर्ण कालाभिमानी देवता स्थित हैं । आप दोनों मुझे इस कालचक्रसे मुक्त करें, क्योंकि मैं यहाँ जन्म आदिके दुःखसे अत्यन्त कष्ट पा रहा हूँ ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 145

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अश्विनाविन्दुममृतं वृत्तभूयी तिरोधत्तामश्विनौ दासपत्नी । हित्वा गिरिमश्विनौ गा मुदा चरन्तौ तद्वृष्टिमह्ना प्रस्थितौ बलस्य ॥ ६३ ॥

हे अश्विनीकुमारो! आप दोनोंमें सदाचारका बाहुल्य है । आप अपने सुयशसे चन्द्रमा, अमृत तथा जलकी उज्ज्वलताको भी तिरस्कृत कर देते हैं । इस समय मेरु पर्वतको छोड़कर आप पृथ्वीपर सानन्द विचर रहे हैं । आनन्द और बलकी वर्षा करनेके लिये ही आप दोनों भाई दिनमें प्रस्थान करते हैं ॥ ६३ ॥

युवां दिशो जनयथो दशाग्रे समानं मूर्ध्नि रथयानं वियन्ति । तासां यातमृषयोऽनुप्रयान्ति देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ॥ ६४ ॥

हे अश्विनीकुमारो! आप दोनों ही सृष्टिके प्रारम्भकालमें पूर्वादि दसों दिशाओंको प्रकट करते — उनका ज्ञान कराते हैं । उन दिशाओंके मस्तक अर्थात् अन्तरिक्ष - लोकमें रथसे यात्रा करनेवाले तथा सबको समानरूपसे प्रकाश देनेवाले सूर्यदेवका और आकाश आदि पाँच भूतोंका भी आप ही ज्ञान कराते हैं । उन- उन दिशाओंमें सूर्यका जाना देखकर ऋषिलोग भी उनका अनुसरण करते हैं तथा देवता और मनुष्य ( अपने अधिकारके अनुसार ) स्वर्ग या मर्त्यलोककी भूमिका उपयोग करते हैं ॥ ६४ ॥

युवां वर्णान् विकुरुथो विश्वरूपां- स्तेऽधिक्षियन्ते भुवनानि विश्वा । ते भानवोऽप्यनुसृताश्चरन्ति देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ॥ ६५ ॥

हे अश्विनीकुमारो! आप अनेक रंगकी वस्तुओंके सम्मिश्रणसे सब प्रकारकी ओषधियाँ तैयार करते हैं, जो सम्पूर्ण विश्वका पोषण करती हैं । वे प्रकाशमान ओषधियाँ सदा आपका अनुसरण करती हुई आपके साथ ही विचरती हैं । देवता और मनुष्य आदि प्राणी अपने अधिकारके अनुसार स्वर्ग और मर्त्यलोककी भूमिमें रहकर उन ओषधियोंका सेवन करते हैं ॥ ६५ ॥

तौ नासत्यावश्विनौ वां महेऽहं

स्रजं च यां बिभृथः पुष्करस्य ।

तौ नासत्यावमृतावृतावृधा- वृते देवास्तत्प्रपदे न सूते ॥ ६६ ॥

अश्विनीकुमारो! आप ही दोनों ' नासत्य' नामसे प्रसिद्ध हैं । मैं आपकी तथा आपने जो कमलकी माला धारण कर रखी है, उसकी पूजा करता हूँ। आप अमर होनेके साथ ही

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सत्यका पोषण और विस्तार करनेवाले हैं । आपके सहयोगके बिना देवता भी उस सनातन सत्यकी प्राप्तिमें समर्थ नहीं हैं ॥ ६६ ॥

मुखेन गर्भं लभेतां युवानी

गतासुरेतत् प्रपदेन सूते ।

सद्यो जातो मातरमत्ति गर्भ- स्तावश्विनौ मुञ्चथ जीवसे गाः ॥ ६७ ॥

युवक माता- पिता संतानोत्पत्तिके लिये पहले मुखसे अन्नरूप गर्भ धारण करते हैं । तत्पश्चात् पुरुषोंमें वीर्यरूपमेंजन्म लेनेवालाऔर स्त्रीमेंगर्भस्थरजोरूपसेजीव उत्पन्नपरिणतहोते होकरही माताकेवह अन्नस्तनोंकाजड शरीर पीनेबनजाता है । तत्पश्चात् दूधलगता है । हे अश्विनीकुमारो! पूर्वोक्त रूपसे संसार-बन्धनमें बँधे हुए जीवोंको आप तत्त्वज्ञान देकर मुक्त करते हैं। मेरे जीवन - निर्वाहके लिये मेरी नेत्रेन्द्रियको भी रोगसे मुक्त करें ॥ ६७ ॥

स्तोतुं न शक्नोमि गुणैर्भवन्तौ चक्षुर्विहीनः पथि सम्प्रमोहः । दुर्गेऽहमस्मिन् पतितोऽस्मि कूपे युवां शरण्यौ शरणं प्रपद्ये ॥ ६८ ॥

अश्विनीकुमारो! मैं आपके गुणोंका बखान करके आप दोनोंकी स्तुति नहीं कर सकता । इस समय नेत्रहीन ( अन्धा) हो गया हूँ । रास्ता पहचाननेमें भी भूल हो जाती है; इसीलिये इस दुर्गम कूपमें गिर पड़ा हूँ । आप दोनों शरणागतवत्सल देवता हैं; अतः मैं आपकी शरण लेता हूँ ॥ ६८ ॥

इत्येवं तेनाभिष्टुतावश्विनावाजग्मतुराहतुश्चैनं प्रीतौ स्व एष तेऽपूपोऽशानैनमिति ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार उपमन्युके स्तवन करनेपर दोनों अश्विनीकुमार वहाँ आये और उससे बोले – ' उपमन्यु! हम तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हैं । यह तुम्हारे खानेके लिये पूआ है, इसे खा लो' ॥ ६ ९ ॥ स एवमुक्तः प्रत्युवाच नानृतमूचतुर्भगवन्तौ न त्वहमेतमपूपमुपयोक्तुमुत्सहे गुरवेऽनिवेद्येति ॥ ७० ॥

उनके ऐसा कहनेपर उपमन्यु बोला – ' भगवन्! आपने ठीक कहा है, तथापि मैं गुरुजीको निवेदन किये बिना इस पूएको अपने उपयोगमें नहीं ला सकता' ॥ ७० ॥ — ततस्तमश्विनावूचतुः आवाभ्यां पुरस्ताद् भवतउपाध्यायेनैवमेवाभिष्टुताभ्यामपूपो दत्त उपयुक्तः स तेनानिवेद्य गुरवे त्वमपि तथैव

कुरुष्व यथा कृतमुपाध्यायेनेति ॥ ७१ ॥

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तब दोनों अश्विनीकुमार बोले— ' वत्स! पहले तुम्हारे उपाध्यायने भी हमारी इसी प्रकार स्तुति की थी । उस समय हमने उन्हें जो पूआ दिया था, उसे उन्होंने अपने गुरुजीको निवेदन किये बिना ही काममें ले लिया था। तुम्हारे उपाध्यायने जैसा किया है, वैसा ही तुम भी करो ' ॥ ७१ ॥

स एवमुक्तः प्रत्युवाच - एतत् प्रत्यनुनये भवन्तावश्विनौ नोत्सहेऽहमनिवेद्य गुरवेऽपूपमुपयोक्तुमिति ॥ ७२ ॥

उनके ऐसा कहनेपर उपमन्युने उत्तर दिया– ' इसके लिये तो आप दोनों अश्विनीकुमारोंकी मैं बड़ी अनुनय- विनय करता हूँ । गुरुजीके निवेदन किये बिना मैं इस पूएको नहीं खा सकता' ॥ ७२ ॥

दन्तातमश्विनावाहतुःभवतोऽपि प्रीतौहिरण्मयास्वस्तवानयाभविष्यन्तिगुरुभक्त्या उपाध्यायस्यचक्षुष्मांश्च ते भविष्यसीतिकार्ष्णायसा श्रेयश्चावाप्स्यसीति ॥ ७३ ॥

तब अश्विनीकुमार उससे बोले, ' तुम्हारी इस गुरु- भक्तिसे हम बड़े प्रसन्न हैं । तुम्हारे उपाध्यायके दाँत काले लोहेके समान हैं । तुम्हारे दाँत सुवर्णमय हो जायँगे। तुम्हारी आँखें भी ठीक हो जायँगी और तुम कल्याणके भागी भी होओगे ' ॥ ७३ ॥

स एवमुक्तोऽश्विभ्यां लब्धचक्षुरुपाध्यायसकाशमागम्याभ्यवादयत् ॥ ७४ ॥

अश्विनीकुमारोंके ऐसा कहनेपर उपमन्युको आँखें मिल गयीं और उसने उपाध्यायके समीप आकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ७४ ॥

आचचक्षे च स चास्य प्रीतिमान् बभूव ॥ ७५ ॥

तथा सब बातें गुरुजीसे कह सुनायीं । उपाध्याय उसके ऊपर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ७५ ॥

आह चैनं यथाश्विनावाहतुस्तथा त्वं श्रेयोऽवाप्स्यसि ॥ ७६ ॥

और उससे बोले — ‘ जैसा अश्विनीकुमारोंने कहा है, उसी प्रकार तुम कल्याणके भागी होओगे ॥ ७६ ॥

सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति । एषा तस्यापि परीक्षोपमन्योः ॥ ७७ ॥

' तुम्हारी बुद्धिमें सम्पूर्ण वेद और सभी धर्मशास्त्र स्वतः स्फुरित हो जायँगे । ' इस प्रकार यह उपमन्युकी परीक्षा बतायी गयी ॥ ७७ ॥

अथापरः शिष्यस्तस्यैवायोदस्य धौम्यस्य वेदो नाम तमुपाध्यायः समादिदेश वत्स वेद इहास्यतां तावन्मम गृहे कंचित् कालं शुश्रूषुणा च भवितव्यं श्रेयस्ते भविष्यतीति ॥ ७८ ॥

उन्हीं आयोदधौम्यके तीसरे शिष्य थे वेद । उन्हें उपाध्यायने आज्ञा दी, ' वत्स वेद! तुम कुछ कालतक यहाँ मेरे घरमें निवास करो । सदा शुश्रूषामें लगे रहना, इससे तुम्हारा कल्याण होगा' ॥ ७८ ॥

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स तथेत्युक्त्वा गुरुकुले दीर्घकालं गुरुशुश्रूषणपरोऽवसद् गौरिव नित्यं गुरुणा धूर्षु नियोज्यमानः शीतोष्णक्षुत्तृष्णादुःखसहः सर्वत्राप्रतिकूलस्तस्य महता कालेन गुरुः परितोषं जगाम ॥ ७९ ॥

वेद ' बहुत अच्छा ' कहकर गुरुके घरमें रहने लगे । उन्होंने दीर्घकालतक गुरुकी सेवा की । गुरुजी उन्हें बैलकी तरह सदा भारी बोझ ढोनेमें लगाये रखते थे और वेद सरदी - गरमी तथा भूख - प्यासका कष्ट सहन करते हुए सभी अवस्थाओंमें गुरुके अनुकूल ही रहते थे । इस प्रकार जब बहुत समय बीत गया, तब गुरुजी उनपर पूर्णतः संतुष्ट हुए ॥ ७ ९ ॥

तत्परितोषाच्च श्रेयः सर्वज्ञतां चावाप । एषा तस्यापि परीक्षा वेदस्य ॥ ८० ॥

गुरुके संतोषसे वेदने श्रेय तथा सर्वज्ञता प्राप्त कर ली । इस प्रकार यह वेदकी परीक्षाका वृत्तान्त कहा गया ॥ ८० ॥

स उपाध्यायेनानुज्ञातः समावृतस्तस्माद् गुरुकुलवासाद् गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत । तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रयः शिष्या बभूवुः स शिष्यान् न किंचिदुवाच कर्म वा क्रियतां गुरुशुश्रूषा चेति । दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान् परिक्लेशेन योजयितुं नेयेष ॥ ८१ ॥

तदनन्तर उपाध्यायकी आज्ञा होनेपर वेद समावर्तन- संस्कारके पश्चात् स्नातक होकर गुरुगृहसे लौटे । घर आकर उन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश किया । अपने घरमें निवास करते समय आचार्य वेदके पास तीन शिष्य रहते थे, किंतु वे ' काम करो अथवा गुरुसेवामें लगे रहो ' इत्यादि रूपसे किसी प्रकारका आदेश अपने शिष्योंको नहीं देते थे; क्योंकि गुरुके घरमें रहनेपर छात्रोंको जो कष्ट सहन करना पड़ता है, उससे वे परिचित थे । इसलिये उनके मनमें अपने शिष्योंको क्लेशदायक कार्यमें लगानेकी कभी इच्छा नहीं होती थी ॥ ८१ ॥

अथ कस्मिंश्चित् काले वेदं ब्राह्मणं जनमेजयः पौष्यश्च क्षत्रियावुपेत्य वरयित्वोपाध्यायं चक्रतुः ॥ ८२ ॥ स कदाचिद् याज्यकार्येणाभिप्रस्थित

उत्तङ्कनामानं शिष्यं नियोजयामास ॥ ८३ ॥ भो यत् किंचिदस्मद्गृहे परिहीयते

तदिच्छाम्यहमपरिहीयमानं भवता क्रियमाणमिति स एवं प्रतिसंदिश्योत्तङ्कं वेदः प्रवासं जगाम ॥ ८४ ॥

एक समयकी बात है— ब्रह्मवेत्ता आचार्य वेदके पास आकर 'जनमेजय और पौष्य ' नामवाले दो क्षत्रियोंने उनका वरण किया और उन्हें अपना उपाध्याय बना लिया । तदनन्तर एक दिन उपाध्याय वेदने यजमानके कार्यसे बाहर जानेके लिये उद्यत हो उत्तंक नामवाले शिष्यको अग्निहोत्र आदि कार्यमें नियुक्त किया और कहा - ' वत्स उत्तंक! मेरे घरमें मेरे बिना जिस किसी वस्तुकी कमी हो जाय, उसकी पूर्ति तुम कर देना, ऐसी मेरी इच्छा है । ' उत्तंकको ऐसा आदेश देकर आचार्य वेद बाहर चले गये ॥ ८२–८४ ॥ अथोत्तङ्कः शुश्रूषुर्गुरुनियोगमनुतिष्ठमानो गुरुकुले वसति स्म । स तत्र वसमान उपाध्यायस्त्रीभिः सहिताभिराहूयोक्तः ॥ ८५ ॥

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महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 149 का मूल पृष्ठ
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उत्तंक गुरुकी आज्ञाका पालन करते हुए सेवापरायण हो गुरुके घरमें रहने लगे । वहाँ रहते समय उन्हें उपाध्यायके आश्रयमें रहनेवाली सब स्त्रियोंने मिलकर बुलाया और कहा - ॥ ८५ ॥

उपाध्यायानी ते ऋतुमती, उपाध्यायश्च प्रोषितोऽस्या यथायमृतुर्वन्ध्यो न भवति तथा क्रियतामेषा विषीदतीति ॥ ८६ ॥

तुम्हारी गुरुपत्नी रजस्वला हुई हैं और उपाध्याय परदेश गये हैं। उनका यह ऋतुकाल जिस प्रकार निष्फल न हो, वैसा करो; इसके लिये गुरुपत्नी बड़ी चिन्तामें पड़ी हैं ॥ ८६ ॥

एवमुक्तस्ताः स्त्रियः प्रत्युवाच न मया स्त्रीणां वचनादिदमकार्यं करणीयम् । न ह्यहमुपाध्यायेन संदिष्टोऽकार्यमपि त्वया कार्यमिति ॥ ८७ ॥

यह सुनकर उत्तंकने उत्तर दिया- ' मैं स्त्रियोंके कहनेसे यह न करनेयोग्य निन्द्य कर्म नहीं कर सकता । उपाध्यायने मुझे ऐसी आज्ञा नहीं दी है कि ' तुम न करनेयोग्य कार्य भी कर डालना' ॥ ८७ ॥

तस्य पुनरुपाध्यायः कालान्तरेण गृहमाजगाम तस्मात् प्रवासात् । स तु तद् वृत्तं तस्याशेषमुपलभ्य प्रीतिमानभूत् ॥ ८८ ॥

इसके बाद कुछ काल बीतनेपर उपाध्याय वेद परदेशसे अपने घर लौट आये । आनेपर उन्हें उत्तंकका सारा वृत्तान्त मालूम हुआ, इससे वे बड़े प्रसन्न हुए ॥ ८८ ॥

उवाच चैनं वत्सोत्तङ्क किं ते प्रियं करवाणीति । धर्मतो हि शुश्रूषितोऽस्मि भवता तेन प्रीतिः परस्परेण नौ संवृद्धा तदनुजाने भवन्तं सर्वानेव कामानवाप्स्यसि गम्यतामिति ॥ ८ ९ ॥ और बोले — ‘ बेटा उत्तंक! तुम्हारा कौन- सा प्रिय कार्य करूँ? तुमने धर्मपूर्वक मेरी सेवा की है । इससे हम दोनोंकी एक- दूसरेके प्रति प्रीति बहुत बढ़ गयी है । अब मैं तुम्हें घर लौटनेकी आज्ञा देता हूँ— जाओ, तुम्हारी सभी कामनाएँ पूर्ण होंगी' ॥ ८ ९ ॥ स एवमुक्तः प्रत्युवाच किं ते प्रियं करवाणीति, एवमाहुः ॥ ९ ० ॥ गुरुके ऐसा कहनेपर उत्तंक बोले— ' भगवन्! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? वृद्ध पुरुष कहते भी हैं ॥ ९ ० ॥

यश्चाधर्मेण वै ब्रूयाद् यश्चाधर्मेण पृच्छति ।

तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति ॥ ९ १ ॥

जो अधर्मपूर्वक अध्यापन या उपदेश करता है अथवा जो अधर्मपूर्वक प्रश्न या अध्ययन करता है, उन दोनोंमेंसे एक ( गुरु अथवा शिष्य ) मृत्यु एवं विद्वेषको प्राप्त होता है ॥ ९ १ ॥ सोऽहमनुज्ञातो भवतेच्छामीष्टं गुर्वर्थमुपहर्तुमिति । तेनैवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क उष्यतां तावदिति ॥ ९ २ ॥ अतः आपकी आज्ञा मिलनेपर मैं अभीष्ट गुरुदक्षिणा भेंट करना चाहता हूँ। ' उत्तंकके ऐसा कहनेपर उपाध्याय बोले- ' बेटा उत्तंक! तब कुछ दिन और यहीं ठहरो ' ॥ ९ २ ॥

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स कदाचिदुपाध्यायमाहोत्तङ्क आज्ञापयतु भवान् किं ते प्रियमुपाहरामि गुर्वर्थमिति ॥ ९ ३ ॥ तदनन्तर किसी दिन उत्तंकने फिर उपाध्यायसे कहा — ' भगवन्! आज्ञा दीजिये, मैं आपको कौन - सी प्रिय वस्तु गुरुदक्षिणाके रूपमें भेंट करूँ?' ॥ ९ ३ ॥ तमुपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क बहुशो मां चोदयसि गुर्वर्थमुपाहरामीति तद् गच्छैनां प्रविश्योपाध्यायानीं पृच्छ किमुपाहरामीति ॥ ९ ४ ॥ एषा यद् ब्रवीति तदुपाहरस्वेति । यह सुनकर उपाध्यायने उनसे कहा- ' वत्स उत्तंक! तुम बार- बार मुझसे कहते हो कि ' मैं क्या गुरुदक्षिणा भेंट करूँ? ' अतः जाओ, घरके भीतर प्रवेश करके अपनी गुरुपत्नीसे पूछ लो कि ' मैं क्या गुरुदक्षिणा भेंट करूँ?' ॥ ९ ४ ॥ ' वे जो बतावें वही वस्तु उन्हें भेंट करो । ' स एवमुक्त उपाध्यायेनोपाध्यायानीमपृच्छद् भगवत्युपाध्यायेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तुमिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहृत्यानृणो गन्तुमिति ॥ ९ ५ ॥ तदाज्ञापयतु भवती किमुपाहरामि गुर्वर्थमिति । उपाध्यायके ऐसा कहनेपर उत्तंकने गुरुपत्नीसे पूछा –' देवि! उपाध्यायने मुझे घर जानेकी आज्ञा दी है, अतः मैं आपको कोई अभीष्ट वस्तु गुरुदक्षिणाके रूपमें भेंट करके गुरुके ऋणसे उऋण होकर जाना चाहता हूँ ॥ ९ ५ ॥ अतः आप आज्ञा दें; मैं गुरुदक्षिणाके रूपमें कौन- सी वस्तु ला दूँ । ' सैवमुक्तोपाध्यायानी तमुत्तङ्कं प्रत्युवाच गच्छ पौष्यं प्रति राजानं कुण्डले भिक्षितुं तस्य क्षत्रियया पिनद्धे ॥ ९ ६ ॥ उत्तंकके ऐसा कहनेपर गुरुपत्नी उनसे बोलीं- ' वत्स! तुम राजा पौष्यके यहाँ, उनकी क्षत्राणी पत्नीने जो दोनों कुण्डल पहन रखे हैं, उन्हें माँग लानेके लिये जाओ ॥ १६ ॥

ते आनयस्व चतुर्थेऽहनि पुण्यकं भविता ताभ्यामाबद्धाभ्यां शोभमाना ब्राह्मणान् परिवेष्टुमिच्छामि । तत् सम्पादयस्व, एवं हि कुर्वतः श्रेयो भवितान्यथा कुतः श्रेय इति ॥ ९ ७ ॥ ' और उन कुण्डलोंको शीघ्र ले आओ । आजके चौथे दिन पुण्यक व्रत होनेवाला है, मैं उस दिन कानोंमें उन कुण्डलोंको पहनकर सुशोभित हो ब्राह्मणोंको भोजन परोसना चाहती हूँ; अतः तुम मेरा यह मनोरथ पूर्ण करो । तुम्हारा कल्याण होगा । अन्यथा कल्याणकी प्राप्ति कैसे सम्भव है? ' ॥ ९ ७ ॥ स एवमुक्तस्तया प्रातिष्ठतोत्तङ्कः स पथि गच्छन्नपश्यदृषभमतिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुषमतिप्रमाणमेव स पुरुष उत्तङ्कमभ्यभाषत ॥ ९ ८ ॥ गुरुपत्नीके ऐसा कहनेपर उत्तंक वहाँसे चल दिये । मार्गमें जाते समय उन्होंने एक बहुत बड़े बैलको और उसपर चढ़े हुए एक विशालकाय पुरुषको भी देखा । उस पुरुषने उत्तंकसे