महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1501–1510

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1501–1510

पृष्ठ 1501

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1501 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 1502

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1502 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना वैशम्पायन उवाच

सोऽपरान्तेषु तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।

सर्वाण्येवानुपूर्व्येण जगामामितविक्रमः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर अमित- पराक्रमी अर्जुन क्रमशः अपरान्त (पश्चिम समुद्रतटवर्ती ) - देशके समस्त पुण्य तीर्थों और मन्दिरोंमें गये ॥ १ ॥

समुद्रे पश्चिमे यानि तीर्थान्यायतनानि च ।

तानि सर्वाणि गत्वा स प्रभासमुपजग्मिवान् ॥ २ ॥

पश्चिम समुद्रके तटपर जितने तीर्थ और देवालय थे, उन सबकी यात्रा करके वे प्रभासक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ २ ॥

प्रभासदेशं सम्प्राप्तं बीभत्सुमपराजितम् ।

सुपुण्यं रमणीयं च शुश्राव मधुसूदनः ॥ ३ ॥

ततोऽभ्यगच्छत् कौन्तेयं सखायं तत्र माधवः ।

ददृशाते तदान्योन्यं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ ॥ ४ ॥

भगवान् श्रीकृष्णने गुप्तचरोंद्वारा यह सुना कि किसीसे भी परास्त न होनेवाले अर्जुन परम पवित्र एवं रमणीय प्रभासक्षेत्रमें आ गये हैं, तब वे अपने सखा कुन्तीनन्दनसे मिलनेके लिये वहाँ गये । उस समय प्रभासमें श्रीकृष्ण और अर्जुनने एक- दूसरेको देखा ॥ ३-४ ॥

तावन्योन्यं समाश्लिष्य पृष्ट्वा च कुशलं वने ।

आस्तां प्रियसखायौ तौ नरनारायणावृषी ॥ ५ ॥

दोनों ही दोनोंको हृदयसे लगाकर कुशल-प्रश्न पूछनेके पश्चात् वे परस्पर प्रिय मित्र साक्षात् नर- नारायण ऋषि वनमें एक स्थानपर बैठ गये ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1503

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1503 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ततोऽर्जुनं वासुदेवस्तां चर्यां पर्यपृच्छत ।

किमर्थं पाण्डवैतानि तीर्थान्यनुचरस्युत ॥ ६ ॥

तब भगवान् वासुदेवने अर्जुनसे उनकी जीवनचर्याके सम्बन्धमें पूछा — ' पाण्डव! तुम किसलिये तीर्थोंमें विचर रहे हो? ' ॥ ६ ॥

ततोऽर्जुनो यथावृत्तं सर्वमाख्यातवांस्तदा ।

श्रुत्वोवाच च वार्ष्णेय एवमेतदिति प्रभुः ॥ ७ ॥

यह सुनकर अर्जुनने उन्हें सारा वृत्तान्त ज्यों -का - त्यों सुना दिया । सब कुछ सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले- ' यह बात ऐसी ही है ' ॥ ७ ॥

तौ विहृत्य यथाकामं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ ।

महीधरं रैवतकं वासायैवाभिजग्मतुः ॥ ८ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों प्रभासक्षेत्रमें इच्छानुसार घूम- फिरकर रैवतक

पर्वतपर चले गये । उन्हें रातको वहीं ठहरना था ॥ ८ ॥

पूर्वमेव तु कृष्णस्य वचनात् तं महीधरम् ।

पुरुषा मण्डयाञ्चक्रुरुपजहुश्च भोजनम् ॥ ९ ॥

भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे उनके सेवकोंने पहलेसे ही आकर उस पर्वतको सजा रखा था और वहाँ भोजन भी तैयार करके रख लिया था ॥ ९ ॥

प्रतिगृह्यार्जुनः सर्वमुपभुज्य च पाण्डवः ।

पृष्ठ 1504

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1504 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सहैव वासुदेवेन दृष्टवान् नटनर्तकान् ॥ १० ॥

अभ्यनुज्ञाय तान् सर्वानर्चयित्वा च पाण्डवः ।

सत्कृतं शयनं दिव्यमभ्यगच्छन्महामतिः ॥ ११ ॥

पाण्डुकुमार अर्जुनने भगवान् वासुदेवके साथ प्रस्तुत किये हुए सम्पूर्ण भोज्य पदार्थोंको यथारुचि खाकर नटों और नर्तकोंके नृत्य देखे । तत्पश्चात् उन सबको उपहार आदिसे सम्मानित करके जानेकी आज्ञा दे महाबुद्धिमान् पाण्डुकुमार अर्जुन सत्कारपूर्वक बिछी हुई दिव्य शय्यापर सोनेके लिये गये ॥ १०-११ ॥ ततस्तत्र महाबाहुः शयानः शयने शुभे ।

तीर्थानां पल्वलानां च पर्वतानां च दर्शनम् ।

आपगानां वनानां च कथयामास सात्वते ॥ १२ ॥

वहाँ सुन्दर शय्यापर सोये हुए महाबाहु धनंजयने भगवान् श्रीकृष्णसे अनेक तीर्थों, कुण्डों, पर्वतों, नदियों तथा वनोंके दर्शनसम्बन्धी अनुभवकी विचित्र बातें कहीं ॥ १२ ॥

एवं स कथयन्नेव निद्रया जनमेजय ।

कौन्तेयोऽपि हृतस्तस्मिन् शयने स्वर्गसंनिभे ॥ १३ ॥

जनमेजय! इस प्रकार बात करते - करते अर्जुन उस स्वर्गसदृश सुखदायिनी शय्यापर सो गये ॥ १३ ॥

मधुरेणैव गीतेन वीणाशब्देन चैव ह ।

प्रबोध्यमानो बुबुधे स्तुतिभिर्मङ्गलैस्तथा ॥ १४ ॥

तदनन्तर प्रातःकाल मधुर गीत, वीणाकी मीठी ध्वनि, स्तुति और मंगलपाठके शब्दोंद्वारा जगाये जानेपर उनकी नींद खुली ॥ १४ ॥

स कृत्वावश्यकार्याणि वार्ष्णेयेनाभिनन्दितः ।

रथेन काञ्चनाङ्गेन द्वारकामभिजग्मिवान् ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् आवश्यक कार्य करके श्रीकृष्णके द्वारा अभिनन्दित हो उनके साथ सुवर्णमय रथपर बैठकर वे द्वारकापुरीको गये ॥ १५ ॥

अलंकृता द्वारका तु बभूव जनमेजय ।

कुन्तीपुत्रस्य पूजार्थमपि निष्कुटकेष्वपि ॥ १६ ॥

जनमेजय! उस समय कुन्तीकुमारके स्वागतके लिये समूची द्वारकापुरी सजायी गयी थी तथा वहाँके घरोंके बगीचेतक सजाये गये थे ॥ १६ ॥

दिदृक्षन्तश्च कौन्तेयं द्वारकावासिनो जनाः ।

नरेन्द्रमार्गमाजग्मुस्तूर्णं शतसहस्रशः ॥ १७ ॥

कुन्तीनन्दन अर्जुनको देखनेके लिये द्वारका- वासी मनुष्य लाखोंकी संख्यामें मुख्य सड़कपर चले आये थे ॥ १७ ॥

अवलोकेषु नारीणां सहस्राणि शतानि च ।

पृष्ठ 1505

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1505 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भोजवृष्ण्यन्धकानां च समवायो महानभूत् ॥ १८ ॥

जहाँसे अर्जुनका दर्शन हो सके, ऐसे स्थानोंपर सैकड़ों- हजारों स्त्रियाँ आँख लगाये खड़ी थीं तथा भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषोंकी बहुत बड़ी भीड़ एकत्र हो गयी थी ॥ १८ ॥

स तथा सत्कृतः सर्वैर्भोजवृष्ण्यन्धकात्मजैः ।

अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वैश्च प्रतिनन्दितः ॥ १ ९ ॥

भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके सब लोगोंद्वारा इस प्रकार आदर- सत्कार पाकर अर्जुनने वन्दनीय पुरुषोंको प्रणाम किया और उन सबने उनका स्वागत किया ॥ १ ९ ॥

कुमारैः सर्वशो वीरः सत्कारेणाभिचोदितः ।

समानवयसः सर्वानाश्लिष्य स पुनः पुनः ॥ २० ॥

यदुकुलके समस्त कुमारोंने भी वीरवर अर्जुनका बड़ा सत्कार किया । अर्जुन अपने समान अवस्थावाले सब लोगोंसे उन्हें बारंबार हृदयसे लगाकर मिले ॥ २० ॥

कृष्णस्य भवने रम्ये रत्नभोज्यसमावृते ।

उवास सह कृष्णेन बहुलास्तत्र शर्वरीः ॥ २१ ॥

इसके बाद नाना प्रकारके रत्न तथा भाँति- भाँतिके भोज्यपदार्थोंसे भरपूर श्रीकृष्णके रमणीय भवनमें उन्होंने श्रीकृष्णके साथ ही अनेक रात्रियोंतक निवास किया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनद्वारकागमने सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनका द्वारकागमनविषयक दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१७ ॥

पृष्ठ 1506

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1506 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( सुभद्राहरणपर्व) अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना वैशम्पायन उवाच

ततः कतिपयाहस्य तस्मिन् रैवतके गिरौ ।

वृष्ण्यन्धकानामभवदुत्सवो नृपसत्तम ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर कुछ दिन बीतने के बाद रैवतक पर्वतपर वृष्णि और अन्धकवंशके लोगोंका एक बड़ा भारी उत्सव हुआ ॥ १ ॥

तत्र दानं ददुर्वीरा ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ।

भोजवृष्ण्यन्धकाश्चैव महे तस्य गिरेस्तदा ॥२ ॥

पर्वतपर होनेवाले उस उत्सवमें भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंने सहस्रों ब्राह्मणोंको दान दिया ॥ २ ॥

प्रासादै रत्नचित्रैश्च गिरेस्तस्य समन्ततः ।

स देशः शोभितो राजन् कल्पवृक्षैश्च सर्वशः ॥ ३ ॥

राजन्! उस पर्वतके चारों ओर रत्नजटित विचित्र राजभवन और कल्पवृक्ष थे, जिनसे उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३ ॥

वादित्राणि च तत्रान्ये वादकाः समवादयन् ।

ननृतुर्नर्तकाश्चैव जगुर्गेयानि गायनाः ॥ ४ ॥

वहाँ बाजे बजानेमें कुशल मनुष्य अनेक प्रकारके बाजे बजाते, नाचनेवाले नाचते और गायकगण गीत गाते थे ॥ ४ ॥

अलंकृताः कुमाराश्च वृष्णीनां सुमहौजसाम् ।

यानैर्हाटकचित्रैश्च चञ्चूर्यन्ते स्म सर्वशः ॥ ५ ॥

महान् तेजस्वी वृष्णिवंशियोंके बालक वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सुवर्णचित्रित सवारियोंपर बैठकर देदीप्यमान होते हुए चारों ओर घूम रहे थे ॥ ५ ॥

पौराश्च पादचारेण यानैरुच्चावचैस्तथा ।

पृष्ठ 1507

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1507 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सदाराः सानुयात्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६ ॥

ततो हलधरः क्षीबो रेवतीसहितः प्रभुः ।

अनुगम्यमानो गन्धर्वैरचरत् तत्र भारत ॥ ७ ॥

द्वारकापुरीके निवासी सैकड़ों- हजारों मनुष्य अपनी स्त्रियों और सेवकोंके साथ पैदल चलकर अथवा छोटी - बड़ी सवारियोंके द्वारा आकर उस उत्सवमें सम्मिलित हुए थे । भारत! भगवान् बलराम हर्षोन्मत्त होकर वहाँ रेवतीके साथ विचर रहे थे । उनके पीछे - पीछे गन्धर्व ( गायक ) चल रहे थे ॥ ६-७ ॥

तथैव राजा वृष्णीनामुग्रसेनः प्रतापवान् ।

अनुगीयमानो गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसहायवान् ॥ ८ ॥

वृष्णिवंशके प्रतापी राजा उग्रसेन भी वहाँ आमोद -प्रमोद कर रहे थे । उनके पास बहुतसे गन्धर्व गा रहे थे और सहस्रों स्त्रियाँ उनकी सेवा कर रही थीं ॥ ८ ॥

रौक्मिणेयश्च साम्बश्च क्षीबौ समरदुर्मदौ ।

दिव्यमाल्याम्बरधरौ विजहातेऽमराविव ॥ ९ ॥

युद्धमें दुर्मद वीरवर प्रद्युम्न और साम्ब दिव्य मालाएँ तथा दिव्य वस्त्र धारण करके आनन्दसे उन्मत्त हो देवताओंकी भाँति विहार करते थे ॥ ९ ॥

अक्रूरः सारणश्चैव गदो बभ्रुर्विदूरथः ।

निशठश्चारुदेष्णश्च पृथुर्विपृथुरेव च ॥ १० ॥

सत्यकः सात्यकिश्चैव भङ्गकारमहारवौ ।

हार्दिक्य उद्धवश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ११ ॥

एते परिवृताः स्त्रीभिर्गन्धर्वैश्च पृथक् पृथक् ।

तमुत्सवं रैवतके शोभयाञ्चक्रिरे तदा ॥ १२ ॥

अक्रूर, सारण, गद, बभ्रु, विदूरथ, निशठ, चारुदेष्ण, पृथु, विपृथु, सत्यक, सात्यकि, भंगकार, महारव, हृदिकपुत्र कृतवर्मा, उद्धव और जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, ऐसे अन्य यदुवंशी भी सब- के - सब अलग - अलग स्त्रियों और गन्धर्वोंसे घिरे हुए रैवतक पर्वतके उस उत्सवकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १०–१२ ॥

चित्रकौतूहले तस्मिन् वर्तमाने महाद्भुते ।

वासुदेवश्च पार्थश्च सहितौ परिजग्मतुः ॥ १३ ॥

उस अत्यन्त अद्भुत विचित्र कौतूहलपूर्ण उत्सवमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ घूम रहे थे ॥ १३ ॥

तत्र चङ्क्रममाणौ तौ वसुदेवसुतां शुभाम् ।

अलंकृतां सखीमध्ये भद्रां ददृशतुस्तदा ॥ १४ ॥

इसी समय वहाँ वसुदेवजीकी सुन्दरी पुत्री सुभद्रा शृंगारसे सुसज्जित हो सखियोंसे घिरी हुई उधर आ निकली । वहाँ टहलते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनने उसे देखा ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1508

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1508 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दृष्ट्वैव तामर्जुनस्य कन्दर्पः समजायत ।

तं तदैकाग्रमनसं कृष्णः पार्थमलक्षयत् ॥ १५ ॥

उसे देखते ही अर्जुनके हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी । उनका चित्त उसीके चिन्तनमें एकाग्र हो गया। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी इस मनोदशाको भाँप लिया ॥ १५ ॥

अब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः प्रहसन्निव भारत ।

वनेचरस्य किमिदं कामेनालोड्यते मनः ॥ १६ ॥

फिर वे पुरुषोतम हँसते हुए - से बोले — ' भारत! यह क्या, वनवासीका मन भी इस तरह कामसे उन्मथित हो रहा है? ॥ १६ ॥

ममैषा भगिनी पार्थ सारणस्य सहोदरा ।

सुभद्रा नाम भद्रं ते पितुर्मे दयिता सुता ।

यदि ते वर्तते बुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वयम् ॥ १७ ॥

' कुन्तीनन्दन! यह मेरी बहिन और सारणकी सगी बहिन है, तुम्हारा कल्याण हो, इसका नाम सुभद्रा है । यह मेरे पिताकी बड़ी लाड़िली कन्या है । यदि तुम्हारा विचार इससे ब्याह करनेका हो तो मैं पितासे स्वयं कहूँगा' ॥ १७ ॥

अर्जुनउवाच

दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा ।

रूपेण चैषा सम्पन्ना कमिवैषा न मोहयेत् ॥ १८ ॥

अर्जुनने कहा — यह वसुदेवजीकी पुत्री, साक्षात् आप वासुदेवकी बहिन और अनुपम रूपसे सम्पन्न है, फिर यह किसका मन न मोह लेगी ॥ १८ ॥

कृतमेव तु कल्याणं सर्वं मम भवेद् ध्रुवम् ।

यदि स्यान्मम वार्ष्णेयी महिषीयं स्वसा तव ॥ १ ९ ॥

सखे! यदि यह वृष्णिकुलकी कुमारी और आपकी बहिन सुभद्रा मेरी रानी हो सके तो निश्चय ही मेरा समस्त कल्याणमय मनोरथ पूर्ण हो जाय ॥ १ ९ ॥

प्राप्तौ तु क उपायः स्यात् तं ब्रवीहि जनार्दन ।

आस्थास्यामि तदा सर्वं यदि शक्यं नरेण तत् ॥ २० ॥

जनार्दन! बताइये, इसे प्राप्त करनेका क्या उपाय हो सकता है? यदि मनुष्यके द्वारा कर सकने योग्य होगा तो वह सारा प्रयत्न मैं अवश्य करूँगा ॥ २० ॥

वासुदेव उवाच

स्वयंवरः क्षत्रियाणां विवाहः पुरुषर्षभ ।

स च संशयितः पार्थ स्वभावस्यानिमित्ततः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1509

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1509 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- नरश्रेष्ठ पार्थ! क्षत्रियोंके विवाहका स्वयंवर एक प्रकार है, परंतु उसका परिणाम संदिग्ध होता है; क्योंकि स्त्रियोंका स्वभाव अनिश्चित हुआ करता है ( पता नहीं, वे स्वयंवरमें किसका वरण करें) ॥ २१ ॥

प्रसह्य हरणं चापि क्षत्रियाणां प्रशस्यते ।

विवाहहेतुः शूराणामिति धर्मविदो विदुः ॥ २२ ॥

बलपूर्वक कन्याका हरण भी शूरवीर क्षत्रियोंके लिये विवाहका उत्तम हेतु कहा गया है; ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ॥ २२ ॥

स त्वमर्जुन कल्याणीं प्रसह्य भगिनीं मम ।

हर स्वयंवरे ह्यस्याः को वै वेद चिकीर्षितम् ॥ २३ ॥

अतः अर्जुन! मेरी राय तो यही है कि तुम मेरी कल्याणमयी बहिनको बलपूर्वक हर ले जाओ । कौन जानता है, स्वयंवरमें उसकी क्या चेष्टा होगी-वह किसे वरण करना चाहेगी? ॥ २३ ॥

ततोऽर्जुनश्च कृष्णश्च विनिश्चित्येति कृत्यताम् ।

शीघ्रगान् पुरुषानन्याम् प्रेषयामासतुस्तदा ॥ २४ ॥

धर्मराजाय तत् सर्वमिन्द्रप्रस्थगताय वै ।

श्रुत्वैव च महाबाहुरनुजज्ञे स पाण्डवः ॥ २५ ॥

तब अर्जुन और श्रीकृष्णने कर्तव्यका निश्चय करके कुछ दूसरे शीघ्रगामी पुरुषोंको इन्द्रप्रस्थमें धर्मराज युधिष्ठिरके पास भेजा और सब बातें उन्हें सूचित करके उनकी सम्मति जाननेकी इच्छा प्रकट की । महाबाहु युधिष्ठिरने यह सुनते ही अपनी ओरसे आज्ञा दे दी ॥ २४-२५ ॥ ( भीमसेनस्तु तच्छ्रुत्वा कृतकृत्योऽभ्यमन्यत । इत्येवं मनुजैः सार्धमुक्त्वा प्रीतिमुपेयिवान् ॥ ) भीमसेन यह समाचार सुनकर अपनेको कृतकृत्य मानने लगे और दूसरे लोगोंके साथ ये बातें करके उनको बड़ी प्रसन्नता हुई । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सुभद्राहरणपर्वणि युधिष्ठिरानुज्ञायामष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सुभद्राहरणपर्वमें युधिष्ठिरकी आज्ञासम्बन्धी दो सौ अठारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)

पृष्ठ 1510

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1510 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्गार वैशम्पायन उवाच

ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनंजयः ।

गतां रैवतके कन्यां विदित्वा जनमेजय ॥ १ ॥

वासुदेवाभ्यनुज्ञातः कथयित्वेतिकृत्यताम् ।

कृष्णस्य मतमादाय प्रययौ भरतर्षभः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर उस विवाहसम्बन्धी संदेशपर युधिष्ठिरकी आज्ञा मिल जानेके पश्चात् धनंजयको जब यह मालूम हुआ कि सुभद्रा रैवतक पर्वतपर गयी हुई है, तब उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे सलाह ली । श्रीकृष्णने उन्हें आगे क्या

करना है, यह बताकर सुभद्रासे विवाह करने तथा उसे हर ले जानेकी अनुमति दे दी ।

श्रीकृष्णकी सम्मति पाकर भरतश्रेष्ठ अर्जुन अपने विश्रामस्थानपर चले गये ॥ १२ ॥

रथेन काञ्चनाङ्गेन कल्पितेन यथाविधि ।

शैब्यसुग्रीवयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ॥ ३ ॥

सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतरवनादिना ।

ज्वलिताग्निप्रकाशेन द्विषतां हर्षघातिना ॥ ४ ॥

संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।

मृगयाव्यपदेशेन प्रययौ पुरुषर्षभः ॥ ५ ॥

( भगवान्की आज्ञासे दारुकने ) उनके सुवर्णमय रथको विधिपूर्वक सजाकर तैयार किया था । उसमें स्थान-स्थानपर छोटी- छोटी घंटिकाएँ तथा झालरें लगा दी थीं और शैब्य, सुग्रीव आदि अश्व भी उसमें जोत दिये थे । उस रथके भीतर सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र मौजूद थे । उसकी घर्घराहटसे मेघकी गर्जनाके समान आवाज होती थी । वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ता था । उसे देखते ही शत्रुओंका हर्ष हवा हो जाता था । नरश्रेष्ठ धनंजय कवच और तलवार बाँधकर एवं हाथोंमें दस्ताने पहनकर उसी रथके द्वारा शिकार खेलनेके बहाने रैवतक पर्वतपर गये ॥ ३–५ ॥

सुभद्रा त्वथ शैलेन्द्रमभ्यर्यैव हि रैवतम् ।

दैवतानि च सर्वाणि ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ॥ ६ ॥

प्रदक्षिणं गिरेः कृत्वा प्रययौ द्वारकां प्रति । तामभिद्रुत्य कौन्तेयः प्रसह्यारोपयद् रथम् ।