श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1511–1520
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1511–1520
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सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं कामबाणप्रपीडितः ॥ ७ ॥
उधर सुभद्रा गिरिराज रैवतक तथा सब देवताओंकी पूजा करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर पर्वतकी परिक्रमा पूरी करके द्वारकाकी ओर लौट रही थी । अर्जुन कामदेवके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे । उन्होंने दौड़कर सर्वांगसुन्दरी सुभद्राको बलपूर्वक रथपर बिठा लिया ॥ ६-७ ॥
ततः स पुरुषव्याघ्रस्तामादाय शुचिस्मिताम् ।
रथेन काञ्चनाङ्गेन प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥ ८ ॥
इसके बाद पुरुषसिंह धनंजय पवित्र मुसकानवाली सुभद्राको साथ ले उस सुवर्णमय रथद्वारा अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ८ ॥
ह्रियमाणां तु तां दृष्ट्वा सुभद्रां सैनिका जनाः ।
विक्रोशन्तोऽद्रवन् सर्वे द्वारकामभितः पुरीम् ॥ ९ ॥
सुभद्राका अपहरण होता देख समस्त सैनिकगण हल्ला मचाते हुए द्वारकापुरीकी ओर दौड़े गये ॥ ९ ॥
ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम् ।
सभापालस्य तत् सर्वमाचख्युः पार्थविक्रमम् ॥ १० ॥
उन्होंने एक साथ सुधर्मासभामें पहुँचकर सभापालसे अर्जुनके उस साहसपूर्ण पराक्रमका सारा हाल कह सुनाया ॥ १० ॥
तेषां श्रुत्वा सभापालो भेरीं सांनाहिकीं ततः ।
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समाजघ्ने महाघोषां जाम्बूनदपरिष्कृताम् ॥ ११ ॥
उनकी बातें सुनकर सभापालने सबको युद्धके लिये तैयार होनेकी सूवना देनेके उद्देश्यसे सुवर्णखचित नगाड़ा बजाया, जिसकी आवाज बहुत ऊँची और दूरतक फैलनेवाली थी ॥ ११ ॥
क्षुब्धास्तेनाथ शब्देन भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ।
अन्नपानमपास्याथ समापेतुः समन्ततः ॥ १२ ॥
उसकी आवाज सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीर क्षुब्ध हो उठे और खाना-पीना छोड़कर चारों ओरसे दौड़े आये ॥ १२ ॥
तत्र जाम्बूनदाङ्गानि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च ।
मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च ॥ १३ ॥
भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः ॥ १४ ॥
उस सभामें सैकड़ों सिंहासन रखे गये भै, जिनमें सुवर्ण जड़ा गया था । उन सिंहासनोंपर बहुमूल्य बिछौने पड़े थे । वे सभी आसन मणि और मूँगोंसे चित्रित होनेके कारण प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे । भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषसिंह महारथी वीर उन्हीं सिंहासनोंपर आकर बैठे, मानो यज्ञकी वेदियोंपर प्रज्वलित अग्निदेव शोभा पा रहे हों ॥ १३-१४ ॥
तेषां समुपविष्टानां देवानामिव संनये ।
आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः ॥ १५ ॥
देवसमूहकी भाँति वहाँ बैठे हुए उन यदुवंशियोंके समुदायमें सेवकोंसहित सभापालने अर्जुनकी वह सारी करतूत कह सुनायी ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदसंरक्तलोचनाः ।
अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहंकृताः ॥ १६ ॥
यह सुनते ही युद्धोन्मादसे लाल नेत्रोंवाले वृष्णिवंशी वीर अर्जुनके प्रति अमर्षसे भर गये और गर्वसे उछल पड़े ॥ १६ ॥
योजयध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च ।
धनूंषि च महार्हाणि कवचानि बृहन्ति च ॥ १७ ॥
( वे बड़ी उतावलीसे कहने लगे — ) 'जल्दी रथ जोतो, फौरन प्रास ले आओ, धनुष तथा बहुमूल्य एवं विशाल कवच लाओ ' ॥ १७ ॥
सूतानुच्चुक्रुशुः केचिद् रथान् योजयतेति च ।
स्वयं च तुरगान् केचिदयुञ्जन् हेमभूषितान् ॥ १८ ॥
कोई सारथियोंको पुकारकर कहने लगे- ' अरे! जल्दी रथ जोतो। ' कुछ लोग स्वयं ही सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ोंको रथोंमें जोतने लगे ॥ १८ ॥
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रथेष्वानीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च ।
अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत् तुमुलं महत् ॥ १ ९ ॥
रथ, कवच और ध्वजाओंके लाये जाते समय चारों ओर उन नर- वीरोंके कोलाहलसे वहाँ बड़ी भारी तुमुल ध्वनि व्याप्त हो गयी ॥ १ ९ ॥
वनमाली ततः क्षीबः कैलासशिखरोपमः ।
नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
तदनन्तर कैलासशिखरके समान गौरवर्णवाले नील वस्त्र और वनमाला धारण करनेवाले बलरामजी उन यादवोंसे इस प्रकार बोले- ॥ २० ॥
किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णींभूते जनार्दने ।
अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः ॥ २१ ॥
'मूर्खो! श्रीकृष्ण तो चुपचाप बैठे हैं, तुम यह क्या कर रहे हो? इनका अभिप्राय जाने
बिना ही तुम इतने कुपित हो उठे । तुमलोगोंकी यह गर्जना व्यर्थ ही है ॥ २१ ॥
एष तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः ।
यदस्य रुचिरं कर्तुं तत् कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥ २२ ॥
‘ पहले परम बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपना अभिप्राय बतावें । तदनन्तर जो कर्तव्य इन्हें उचित जान पड़े, उसीका आलस्य छोड़कर पालन करो ' ॥ २२ ॥
ततस्ते तद् वचः श्रुत्वा ग्राह्यरूपं हलायुधात् ।
तूष्णीम्भूतास्ततः सर्वे साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥ २३ ॥
बलरामजीकी यह मानने योग्य बात सुनकर सब यादव चुप हो गये और सब लोग उन्हें साधुवाद देने लगे ॥ २३ ॥
समं वचो निशम्यैव बलदेवस्य धीमतः ।
पुनरेव सभामध्ये सर्वे ते समुपाविशन् ॥ २४ ॥
परम बुद्धिमान् बलरामजीके उस वचनको सुननेके साथ ही वे सभी वीर फिर उस सभामें मौन होकर बैठ गये ॥ २४ ॥
ततोऽब्रवीद् वासुदेवं वचो रामः परंतपः ।
किमवागुपविष्टोऽसि प्रेक्षमाणो जनार्दन ॥ २५ ॥
तदनन्तर परंतप बलरामजी भगवान् श्रीकृष्णसे बोले- जनार्दन! यह सब कुछ देखते हुए भी तुम क्यों मौन होकर बैठे हो? ॥ २५ ॥
सत्कृतस्त्वत्कृते पार्थः सर्वैरस्माभिरच्युत ।
न च सोऽर्हति तां पूजां दुर्बुद्धिः कुलपांसनः ॥ २६ ॥
' अच्युत! तुम्हारे संतोषके लिये ही हम सब लोगोंने अर्जुनका इतना सत्कार किया; परंतु वह खोटी बुद्धिवाला कुलांगार उस सत्कारके योग्य कदापि न था ॥ २६ ॥
कोहि तत्रैव भुक्त्वान्नं भाजनं भेत्तुमर्हति ।
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मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुषः क्वचित् ॥ २७ ॥
‘ अपनेको कुलीन माननेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो जिस बर्तनमें खाये, उसीमें छेद करे ॥ २७ ॥
इच्छन्नेव हि सम्बन्धं कृतं पूर्वं च मानयन् ।
को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत् ॥ २८ ॥
‘ सम्बन्धकी इच्छा रहते हुए भी कौन ऐसा कल्याणकामी पुरुष होगा, जो पहलेके उपकारको मानते हुए ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य करे ॥ २८ ॥
सोऽवमन्य तथास्माकमनादृत्य च केशवम् ।
प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥ २९ ॥
‘ उसने हमलोगोंका अपमान और केशवका अनादर करके आज बलपूर्वक सुभद्राका अपहरण किया है, जो उसके लिये अपनी मृत्युके समान है ॥ २ ९ ॥
कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम ।
मर्षयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः ॥ ३० ॥
‘ गोविन्द! जैसे सर्प पैरकी ठोकर नहीं सह सकता, उसी प्रकार मैं उसने जो मेरे सिरपर पैर रख दिया है, उसे कैसे सह सकूँगा? ॥ ३० ॥
अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुंधराम् ।
न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥ ३१ ॥
‘ अर्जुनका यह अन्याय मेरे लिये असह्य है। आज मैं अकेला ही इस वसुन्धराको कुरुवंशियोंसे विहीन कर दूँगा ' ॥ ३१ ॥
तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम् ।
अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ॥ ३२ ॥
मेघ और दुन्दुभिकी गम्भीर ध्वनिके समान बलरामजीकी वैसी गर्जना सुनकर उस समय भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके समस्त वीरोंने उन्हींका अनुसरण किया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सुभद्राहरणपर्वणि बलदेवक्रोधे एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सुभद्राहरणपर्वमें बलदेवक्रोधविषयक दो सौ उन्नीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥
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(हरणाहरणपर्व) विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा वैशम्पायन उवाच
उक्तवन्तो यथा वीर्यमसकृत् सर्ववृष्णयः ।
ततोऽब्रवीद् वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंयुतम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय सभी वृष्णिवंशियोंने अपने - अपने पराक्रमके अनुसार अर्जुनसे बदला लेनेकी बात बार - बार दुहरायी । तब भगवान् वासुदेव यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन बोले— ॥। १ ॥
नावमानं कुलस्यास्य गुडाकेशः प्रयुक्तवान् ।
सम्मानोऽभ्यधिकस्तेन प्रयुक्तोऽयं न संशयः ॥ २ ॥
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‘ निद्राविजयी अर्जुनने इस कुलका अपमान नहीं किया है । अपितु ऐसा करके उन्होंने इस कुलके प्रति अधिक सम्मानका भाव ही प्रकट किया है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
अर्थलुब्धान् न वः पार्थो मन्यते सात्वतान् सदा ।
स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डवः ॥ ३ ॥
'पाण्डुपुत्र अर्जुन यह जानते हैं कि सात्वतवंशके लोग सदासे ही धनके लोभी नहीं हैं, अतः धन देकर कन्या नहीं ली जा सकती । साथ ही पाण्डुपुत्र अर्जुनको यह भी मालूम है कि स्वयंवरमें कन्याके मिल जानेका पूर्ण निश्चय नहीं रहता, अतः वह भी अग्राह्य ही है ॥ ३ ॥
प्रदानमपि कन्यायाः पशुवत् कोऽनुमन्यते ।
विक्रयं चाप्यपत्यस्य कः कुर्यात् पुरुषो भुवि ॥ ४ ॥
' भला, कौन ऐसा वीर पुरुष होगा, जो पशुकी तरह पराक्रमशून्य होकर कन्यादानकी प्रतीक्षामें बैठा रहेगा एवं इस पृथ्वीपर कौन ऐसा अधम पुरुष होगा, जो धन लेकर अपनी संतानको बेचेगा ॥ ४ ॥
एतान् दोषांस्तु कौन्तेयो दृष्टवानिति मे मतिः ।
अतः प्रसह्य हृतवान् कन्यां धर्मेण पाण्डवः ॥ ५ ॥
' मेरा विश्वास है कि कुन्तीकुमारने इन सभी दोषोंकी ओर दृष्टिपात किया है; इसीलिये उन्होंने क्षत्रिय- धर्मके अनुसार बलपूर्वक कन्याका अपहरण किया है ॥ ५ ॥
उचितश्चैव सम्बन्धः सुभद्रां च यशस्विनीम् ।
एष चापीदृशः पार्थः प्रसह्य हृतवानिति ॥ ६ ॥
‘ मेरी समझमें यह सम्बन्ध बहुत उचित है । सुभद्रा यशस्विनी है और ये कुन्तीपुत्र अर्जुन भी ऐसे ही यशस्वी हैं; अतः इन्होंने सुभद्राका बलपूर्वक हरण किया है ॥ ६ ॥
भरतस्यान्वये जातं शान्तनोश्च यशस्विनः ।
कुन्तिभोजात्मजापुत्रं को बुभूषेत नार्जुनम् ॥ ७ ॥
‘ महाराज भरत तथा महायशस्वी शान्तनुके कुलमें जिनका जन्म हुआ है, जो कुन्तिभोजकुमारी कुन्तीके पुत्र हैं, ऐसे वीरवर अर्जुनको कौन अपना सम्बन्धी बनाना न चाहेगा? ॥ ७ ॥
न च पश्यामि यः पार्थं विजयेत रणे बलात् ।
वर्जयित्वा विरूपाक्षं भगनेत्रहरं हरम् ॥ ८ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष । ' आर्य! इन्द्रलोक एवं रुद्रलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले विकराल नेत्रोंवाले भगवान् रुद्रको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो संग्राममें बलपूर्वक पार्थको परास्त कर सके ॥ ८३ ॥
स च नाम रथस्तादृङ्मदीयास्ते च वाजिनः ॥ ९ ॥
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योद्धा पार्थश्च शीघ्रास्त्रः को नु तेन समो भवेत् ।
तमभिद्रुत्य सान्त्वेन परमेण धनंजयम् ॥ १० ॥
न्यवर्तयत संहृष्टा ममैषा परमा मतिः । ‘ इस समय अर्जुनके पास मेरा सुप्रसिद्ध रथ है, मेरे ही अद्भुत घोड़े हैं और स्वयं अर्जुन शीघ्रता - पूर्वक अस्त्र - शस्त्र चलानेवाले योद्धा हैं । ऐसी दशामें अर्जुनकी समानता कौन कर सकता है? आपलोग प्रसन्नताके साथ दौड़े जाइये और बड़ी सान्त्वनासे धनंजयको लौटा लाइये । मेरी तो यही परम सम्मति है ॥ ९ -१०३ ॥ यदि निर्जित्य वः पार्थो बलाद् गच्छेत् स्वकं पुरम् ॥ ११ ॥
प्रणश्येद् वो यशः सद्यो न तु सान्त्वे पराजयः । 'यदि अर्जुन आपलोगोंको बलपूर्वक हराकर अपने नगरमें चले गये, तब तो आपलोगोंका सारा यश तत्काल ही नष्ट हो जायगा और सान्त्वनापूर्वक उन्हें ले आनेमें अपनी पराजय नहीं है ' ॥ ११३ ॥
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा चक्रुर्जनाधिप ॥ १२ ॥
जनमेजय! वासुदेवका यह वचन सुनकर यादवोंने वैसा ही किया ॥ १२ ॥
निवृत्तश्चार्जुनस्तत्र विवाहं कृतवान् प्रभुः ।
उषित्वा तत्र कौन्तेयः संवत्सरपराः क्षपाः ॥ १३ ॥
शक्तिशाली अर्जुन द्वारकामें लौट आये । वहाँ उन्होंने सुभद्रासे विवाह किया और एक सालसे कुछ अधिक दिनतक वे वहीं रहे ॥ १३ ॥
विहृत्य च यथाकामं पूजितो वृष्णिनन्दनैः ।
पुष्करे तु ततः शेषं कालं वर्तितवान् प्रभुः ॥ १४ ॥
द्वारकामें इच्छानुसार विहार करके वृष्णिवंशियोंद्वारा पूजित होकर अर्जुन वहाँसे पुष्करतीर्थमें चले गये और वनवासका शेष समय वहीं व्यतीत किया ॥ १४ ॥
पूर्णे तु द्वादशे वर्षे खाण्डवप्रस्थमागतः ।
( ववन्दे धौम्यमासाद्य मातरं च धनंजयः ॥
बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वे खाण्डवप्रस्थमें आये । उन्होंने धौम्यजीके पास जाकर उनको तथा माता कुन्तीको प्रणाम किया । स्पृष्ट्वा च चरणौ राज्ञो भीमस्य च धनंजयः । यमाभ्यां वन्दितो हृष्टः सस्वजे तौ ननन्द च ॥ ) अभिगम्य च राजानं नियमेन समाहितः ॥ १५ ॥
अभ्यर्च्य ब्राह्मणान् पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान् ।
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इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमके चरण छुये । तदनन्तर नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया । अर्जुनने भी हर्षमें भरकर उन दोनोंको हृदयसे लगा लिया और उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया । फिर वहाँ राजासे मिलकर नियमपूर्वक एकाग्रचित्त हो उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया । तत्पश्चात् वे द्रौपदीके समीप गये ॥ १५३ || तं द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणयात् कुरुनन्दनम् ॥ १६ ॥
तत्रैव गच्छ कौन्तेय यत्र सा सात्वतात्मजा ।
सुबद्धस्यापि भारस्य पूर्वबन्धः श्लथायते ॥ १७ ॥
द्रौपदीने प्रणयकोपवश कुरुनन्दन अर्जुनसे कहा - 'कुन्तीकुमार! यहाँ क्यों आये हो, वहीं जाओ, जहाँ वह सात्वतवंशकी कन्या सुभद्रा है । सच है, बोझको कितना ही कसकर बाँधा गया हो, जब उसे दूसरी बार बाँधते हैं, तब पहला बन्धन ढीला पड़ जाता है ( यही हालत मेरे प्रति तुम्हारे प्रेमबन्धनकी है ) ॥ १६-१७ ॥
तथा बहुविधं कृष्णां विलपन्तीं धनंजयः ।
सान्त्वयामास भूयश्च क्षमयामास चासकृत् ॥ १८ ॥
इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर कृष्णा विलाप करने लगी । तब धनंजयने उसे पूर्ण सान्त्वना दी और अपने अपराधके लिये उससे बार- बार क्षमा माँगी ॥ १८ ॥
सुभद्रां त्वरमाणश्च रक्तकौशेयवासिनीम् ।
पार्थः प्रस्थापयामास कृत्वा गोपालिकावपुः ॥ १ ९ ॥
इसके बाद अर्जुनने लाल रेशमी साड़ी पहनकर आयी हुई अनिन्द्यसुन्दरी सुभद्राका ग्वालिनका- सा वेश बनाकर उसे बड़ी उतावलीके साथ महलमें भेजा ॥ १ ९ ॥
साधिकं तेन रूपेण शोभमाना यशस्विनी ।
भवनं श्रेष्ठमासाद्य वीरपत्नी वराङ्गना ॥ २० ॥
ववन्दे पृथुताम्राक्षी पृथां भद्रा यशस्विनी ।
तां कुन्ती चारुसर्वाङ्गीमुपाजिघ्रत मूर्धनि ॥ २१ ॥
वीरपत्नी, वरांगना एवं यशस्विनी सुभद्रा उस वेशमें और अधिक शोभा पाने लगी । उसकी आँखें विशाल और कुछ-कुछ लाल थीं । उस यशस्विनीने सुन्दर राजभवनके भीतर जाकर राजमाता कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया । कुन्ती उस सर्वांगसुन्दरी पुत्र -वधूको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगी ॥ २०-२१ ॥
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Gray सुभद्राका कुन्ती और द्रौपदीकी सेवामें उपस्थित होना
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प्रीत्या परमया युक्ता आशीर्भिर्युञ्जतातुलाम् ।
ततोऽभिगम्य त्वरिता पूर्णेन्दुसदृशानना ॥ २२ ॥
ववन्दे द्रौपदीं भद्रा प्रेष्याहमिति चाब्रवीत् । और उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस अनुपम वधूको अनेक आशीर्वाद दिये । तदनन्तर पूर्ण चन्द्रमाके सदृश मनोहर मुखवाली सुभद्राने तुरंत जाकर महारानी द्रौपदीके चरण छूए और कहा — ‘ देवि! मैं आपकी दासी हूँ' ॥ २२ ॥
प्रत्युत्थाय तदा कृष्णा स्वसारं माधवस्य च ॥ २३ ॥
परिष्वज्यावदत् प्रीत्या निःसपत्नोऽस्तु ते पतिः ।
तथैव मुदिता भद्रा तामुवाचैवमस्त्विति ॥ २४ ॥
उस समय द्रौपदी तुरंत उठकर खड़ी हो गयी और श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नतासे बोली- ' बहिन! तुम्हारे पति शत्रुरहित हों । ' सुभद्राने भी आनन्दमग्न होकर कहा - ' बहिन! ऐसा ही हो' ॥ २३-२४ ॥
ततस्ते हृष्टमनसः पाण्डवेया महारथाः ।
कुन्ती च परमप्रीता बभूव जनमेजय ॥ २५ ॥
श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्षः सम्प्राप्तं स्वं पुरोत्तमम् ।
अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तदा ॥ २६ ॥
आजगाम विशुद्धात्मा सह रामेण केशवः ।
वृष्ण्यन्धकमहामात्रैः सह वीरैर्महारथैः ॥ २७ ॥