महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1831–1840
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1831–1840
पृष्ठ 1831
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
यज्ञके फाटकपर लगानेयोग्य चौदह ताड़ प्रदान किये । सुवर्णमय कमलपुष्प और मणिजटित शिबिकाएँ भी दीं । मुकुटानि महार्हाणि हेमवर्णांश्च कुण्डलान् हेमपुष्पाण्यनेकानि रुक्ममाल्यानि चापरान् ॥ शङ्खांश्च चन्द्रसंकाशाञ्छतावर्तान् विचित्रिणः । बहुमूल्य मुकुट, सुनहले कुण्डल, सोनेके बने हुए अनेकानेक पुष्प, सोनेके ही हार तथा
चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं विचित्र शतावर्त शंख भेंट किये ।
चन्दनानि च मुख्यानि रुक्मरत्नान्यनेकशः ॥
वासांसि च महार्हाणि कम्बलानि बहून्यपि ।
अन्यांश्च विविधान् राजन् रत्नानि च बहूनि च ॥
स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषणः । ) श्रेष्ठ चन्दन, अनेक प्रकारके सुवर्ण तथा रत्न, महँगे वस्त्र, बहुत-से कम्बल, अनेक जातिके रत्न तथा और भी भाँति- भाँतिके बहुमूल्य पदार्थ राजा विभीषणने सहदेवको भेंट किये ।
ततः सम्प्रेषयामास रत्नानि विविधानि च ।
चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ७५ ॥
वासांसि च महार्हाणि मणींश्चैव महाधनान् । तथा उन्होंने नाना प्रकारके रत्न, चन्दन, अगुरुके काष्ठ, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और विशेष मूल्यवान् मणि- रत्न भी उसके साथ भिजवाये ॥ ७५३ ॥
( विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कचः । तदनन्तर घटोत्कचने हाथ जोड़कर राजा विभीषणको प्रणाम किया और उनकी
परिक्रमा करके वहाँसे प्रस्थान किया ।
तानि सर्वाणि रत्नानि अष्टाशीतिर्निशाचराः ॥
आजहुः समुदा राजन् हैडिम्बेन तदा सह । राजन्! घटोत्कचके साथ अट्ठासी निशाचर उन सब रत्नोंको पहुँचानेके लिये
प्रसन्नतापूर्वक आये ।
रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कचः ॥
ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसैः सह ।
जगाम तूर्णं लङ्कायाः सहदेवपदं प्रति ॥
आसेदुः पाण्डवं सर्वे लङ्घयित्वा महोदधिम् ॥
इस प्रकार उन सब रत्नोंको साथ ले घटोत्कचने राक्षसोंके साथ लंकासे सहदेवके पड़ावकी ओर प्रस्थान किया और समुद्र लाँघकर वे सब- के - सब पाण्डुनन्दन सहदेवके
पृष्ठ 1832
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
निकट आ पहुँचे ।
सहदेवो ददर्शाथ रत्नाहारान् निशाचरान् ।
आगतान् भीमसंकाशान् हैडिम्बं च तथा नृप ॥
राजन्! सहदेवने रत्न लेकर आये हुए भयंकर निशाचरों तथा घटोत्कचको भी देखा ।
द्रमिला नैर्ऋतान् दृष्ट्वा दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः ।
भैमसेनिस्ततो गत्वा माद्रेयं प्राञ्जलिः स्थितः ॥
उस समय उन राक्षसोंको देखकर द्राविड़ सैनिक भयभीत हो सब ओर भागने लगे । इतनेमें ही भीमसेनकुमार घटोत्कच माद्रीनन्दन सहदेवके पास आ हाथ जोड़कर खड़ा हो गया ।
प्रीतिमानभवद् दृष्ट्वा रत्नौघं तं च पाण्डवः ।
तं परिष्वज्य पाणिभ्यां दृष्ट्वा तान् प्रीतिमानभूत् ॥
विसृज्य द्रमिलान् सर्वान् गमनायोपचक्रमे । ) पाण्डुकुमार सहदेव वह रत्न- राशि देखकर बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने घटोत्कचको दोनों हाथोंसे पकड़कर गले लगाया और दूसरे राक्षसोंकी ओर देखकर भी बड़ी प्रसन्नता प्रकट की । इसके बाद समस्त द्राविड़ सैनिकोंको विदा करके सहदेव वहाँसे लौटनेकी तैयारी करने
लगे ।
न्यवर्तत ततो धीमान् सहदेवः प्रतापवान् ॥ ७६ ॥
तैयारी पूरी हो जानेपर प्रतापी और बुद्धिमान् सहदेव इन्द्रप्रस्थकी ओर चल दिये ॥ ७६ ॥
एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च ।
करदान् पार्थिवान् कृत्वा प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार बलपूर्वक जीतकर तथा सामनीतिसे समझा- बुझाकर सब राजाओंको अपने अधीन करके उन्हें करद बनाकर शत्रुदमन माद्रीनन्दन इन्द्रप्रस्थमें वापस आ गये ॥ ७७ ॥
( रत्नभारमुपादाय ययौ सह निशाचरैः ।
इन्द्रप्रस्थं विवेशाथ कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥
रत्नोंका वह भारी भार साथ लिये निशाचरोंके साथ सहदेवने इन्द्रप्रस्थ नगरमें प्रवेश किया । उस समय वे पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित करते हुए - से चल रहे थे ।
दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन् सहदेवः कृताञ्जलिः ।
प्रह्वोऽभिवाद्य तस्थौ स पूजितश्चैव तेन वै ॥
राजन्! युधिष्ठिरको देखते ही सहदेव हाथ जोड़ नम्रतापूर्वक उनके चरणोंमें पड़ गये । फिर विनीतभावसे उनके समीप खड़े हो गये । उस समय युधिष्ठिरने भी उनका बहुत सम्मान किया । लङ्काप्राप्तान् धनौघांश्च दृष्ट्वा तान् दुर्लभान् बहून् ।
पृष्ठ 1833
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रीतिमानभवद् राजा विस्मयं च ययौ तदा ॥ लंकासे प्राप्त हुई अत्यन्त दुर्लभ एवं प्रचुर धनराशियोंको देखकर राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न और विस्मित हुए । कोटीसहस्रमधिकं हिरण्यस्य महात्मने । विचित्रांस्तु मणींश्चैव गोऽजाविमहिषांस्तथा ॥ )
धर्मराजाय तत् सर्वं निवेद्य भरतर्षभ ।
कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय ॥ ७८ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उस धनराशिमें सहस्र कोटिसे भी अधिक सुवर्ण था । विचित्र मणि एवं रत्न थे । गाय, भैंस, भेड़ और बकरियोंकी संख्या भी अधिक थी । राजन्! इन सबको महात्मा धर्मराजकी सेवामें समर्पित करके कृतकृत्य हो सहदेव सुखपूर्वक राजधानीमें रहने लगे ॥ ७८ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि सहदेवदक्षिणदिग्विजये एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें सहदेवके द्वारादक्षिणदिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०० श्लोक मिलाकर कुल १७८ श्लोक हैं ) Fard यह इक्ष्वाकुवंशीय दुर्जयका पुत्र था । इसका दूसरा नाम दुर्योधन था । यह राजा बड़ा धर्मात्मा था । इसकी कथा अनुशासनपर्वके दूसरे अध्यायमें आती है । * जो अपने कानोंसे ही शरीरको ढक लें उन्हें ' कर्णप्रावरण ' कहते हैं । प्राचीन कालमें ऐसी जातिके लोग थे, जिनके कान पैरोंतक लटकते थे ।
पृष्ठ 1834
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वात्रिंशोऽध्यायः नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय वैशम्पायन उवाच
नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा ।
वासुदेवजितामाशां यथासावजयत् प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अब मैं नकुलके पराक्रम और विजयका वर्णन करूँगा । शक्तिशाली नकुलने जिस प्रकार भगवान् वासुदेवद्वारा अधिकृत पश्चिम दिशापर विजय पायी थी, वह सुनो ॥ १ ॥
निर्याय खाण्डवप्रस्थात् प्रतीचीमभितोदिशम् ।
उद्दिश्य मतिमान् प्रायान्महत्या सेनया सह ॥ २ ॥
बुद्धिमान् माद्रीकुमारने विशाल सेनाके साथ खाण्डवप्रस्थसे निकलकर पश्चिम दिशामें जानेके लिये प्रस्थान किया ॥ २ ॥
सिंहनादेन महता योधानां गर्जितेन च ।
रथनेमिनिनादैश्च कम्पयन् वसुधामिमाम् ॥ ३ ॥
वे अपने सैनिकोंके महान् सिंहनाद, गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटकी तुमुल ध्वनिसे इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए जा रहे थे ॥ ३ ॥
ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् ।
कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
जाते -जाते वे बहुत धन- धान्यसे सम्पन्न, गौओंकी बहुलतासे युक्त तथा स्वामिकार्तिकेयके अत्यन्त प्रिय रमणीय रोहीतक* पर्वत एवं उसके समीपवर्ती देशमें जा पहुँचे ॥ ४ ॥
तत्र युद्धं महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकैः ।
मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् ॥ ५ ॥
शैरीषकं महोत्थं च वशे चक्रे महाद्युतिः ।
आक्रोशं चैव राजर्षिं तेन युद्धमभून्महत् ॥ ६ ॥
वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ । उसपर अधिकार करनेके पश्चात् महान् तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि ( मारवाड़ ), प्रचुर धन- धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया । महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया । आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था ॥ ५-६ ॥ तान् दशार्णान् स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः ।
पृष्ठ 1835
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठान् मालवान् पञ्चकर्पटान् ॥ ७ ॥
तथा माध्यमिकांश्चैव वाटधानान् द्विजानथ । तत्पश्चात् दशार्णदेशपर विजय प्राप्त करके पाण्डुनन्दन नकुलने शिबि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंचकर्पट एवं माध्यमिक देशोंको प्रस्थान किया और उन सबको जीतकर वाटधानदेशीय क्षत्रियोंको भी हराया ॥ ७३ ॥
पुनश्च परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिनः ॥ ८ ॥
गणानुत्सवसंकेतान् व्यजयत् पुरुषर्षभः । पुनः उधरसे लौटकर नरश्रेष्ठ नकुलने पुष्करारण्य-निवासी उत्सवसंकेत नामक गणोंको परास्त किया ॥ ८ ॥
सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणीया महाबलाः ॥ ९ ॥
शूद्राभीरगणाश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् ।
वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्ये च पर्वतवासिनः ॥ १० ॥
समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज ) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे - दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया ॥ ९-१० ॥
कृत्स्नं पञ्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम् ।
उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम् ॥ ११ ॥
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः । फिर सम्पूर्ण पंचनददेश ( पंजाब ), अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट नगर और द्वारपालपुरको अत्यन्त कान्तिमान् नकुलने शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ११३ || रामठान् हारहूणांश्च प्रतीच्याश्चैव ये नृपाः ॥ १२ ॥
तान् सर्वान् स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः ।
तत्रस्थः प्रेषयामास वासुदेवाय भारत ॥ १३ ॥
रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया । भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके पास दूत भेजा ॥ १२-१३ ॥
स चास्य गतभी राजन् प्रतिजग्राह शासनम् ।
ततः शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम् ॥ १४ ॥
मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली ।
पृष्ठ 1836
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! उन्होंने केवल प्रेमके कारण नकुलका शासन स्वीकार कर लिया । इसके बाद शाकलदेशको जीतकर बलवान् नकुलने मद्रदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया और वहाँके शासक अपने मामा शल्यको प्रेमसे ही वशमें कर लिया ॥ १४३ ॥
स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्कारार्हो विशाम्पते ॥ १५ ॥
रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधाम्पतिः । राजन्! राजा शल्यने सत्कारके योग्य नकुलका यथावत् सत्कार किया । शल्यसे भेंटमें बहुत - से रत्न लेकर योद्धाओंके अधिपति माद्रीकुमार आगे बढ़ गये ॥ १५३ ॥
ततः सागरकुक्षिस्थान् म्लेच्छान् परमदारुणान् ॥ १६ ॥
पह्लवान् बर्बरांश्चैव किरातान् यवनाञ्छकान् ।
ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् ।
न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्चित्रमार्गवित् ॥ १७ ॥
तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्लव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रस्थकी ओर लौटे ॥ १६-१७ ॥
करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मनः ।
ऊहुर्दश महाराज कृच्छ्रादिव महाधनम् ॥ १८ ॥
महाराज! उन महामना नकुलके बहुमूल्य खजानेका बोझ दस हजार हाथी बड़ी कठिनाईसे ढो रहे थे ॥ १८ ॥
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम् ।
ततो माद्रीसुतः श्रीमान् धनं तस्मै न्यवेदयेत् ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर श्रीमान् माद्रीकुमारने इन्द्रप्रस्थमें विराजमान वीरवर राजा युधिष्ठिरसे मिलकर वह सारा धन उन्हें समर्पित कर दिया ॥ १ ९ ॥
एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् ।
प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् वासुदेवके द्वारा अपने अधिकारमें की हुई, वरुणपालित पश्चिम दिशापर विजय पाकर नकुल इन्द्रप्रस्थ लौट आये ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि नकुलप्रतीचीविजये द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गतदिग्विजयपर्वमें नकुलके द्वारापश्चिमदिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 1837
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* इसीको आजकल रोहतक ( पंजाब ) कहते हैं ।
पृष्ठ 1838
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( राजसूयपर्व) त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे - सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना वैशम्पायन उवाच
(एवं निर्जित्य पृथिवीं भ्रातरः कुरुनन्दन ।
वर्तमानाः स्वधर्मेण शशासुः पृथिवीमिमाम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - कुशनन्दन! इस प्रकार सारी पृथ्वीको जीतकर अपने धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए पाँचों भाई पाण्डव इस भूमण्डलका शासन करने लगे ।
चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभिः सहितो नृपः ।
अनुगृह्य प्रजाः सर्वाः सर्ववर्णानगोपयत् ॥
भीमसेन आदि चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह करते हुए सब वर्णके लोगोंको संतुष्ट रखते थे ।
अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ।
प्रीयतां दीयतां सर्वं मुक्त्वा कोषं बलं विना ॥
साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छ्रयेत भाषितम् । युधिष्ठिर किसीका भी विरोध न करके सबके हितसाधनमें लगे रहते थे । ' सबको तृप्त एवं प्रसन्न किया जाय, खजाना खोलकर सबको खुले हाथ दान दिया जाय, किसीपर बलप्रयोग न किया जाय, धर्म! तुम धन्य हो । ' इत्यादि बातोंके सिवा युधिष्ठिरके मुखसे और
कुछ नहीं सुनायी पड़ता था ।
एवंवृत्ते जगत् तस्मिन् पितरीवान्वरज्यत ॥
न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता । ) उनके ऐसे बर्तावके कारण सारा जगत् उनके प्रति वैसा ही अनुराग रखने लगा, जैसे पुत्र पिताके प्रति अनुरक्त होता है । राजा युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था, इसीलिये वे ' अजातशत्रु ' कहलाते थे ।
पृष्ठ 1839
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
रक्षणाद् धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् ।
शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः ॥ १ ॥
धर्मराज युधिष्ठिर प्रजाकी रक्षा, सत्यका पालन और शत्रुओंका संहार करते थे । उनके इन कार्योंसे निश्चिन्त एवं उत्साहित होकर प्रजावर्गके सब लोग अपने - अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंके पालनमें संलग्न रहते थे ॥ १ ॥
बलीनां सम्यगादानाद् धर्मतश्चानुशासनात् ।
निकामवर्षी पर्जन्यः स्फीतो जनपदोऽभवत् ॥ २ ॥
न्यायपूर्वक कर लेने और धर्मपूर्वक शासन करनेसे उनके राज्यमें मेघ' इच्छानुसार वर्षा करते थे । इस प्रकार युधिष्ठिरका सम्पूर्ण जनपद धन- धान्यसे सम्पन्न हो गया था ॥ २ ॥
सर्वारम्भाः सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्षणं वणिक् ।
विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणः ॥ ३ ॥
गोरक्षा, खेती और व्यापार आदि सभी कार्य अच्छे ढंगसे होने लगे । विशेषतः राजाकी सुव्यवस्थासे ही यह सब कुछ उत्तमरूपसे सम्पन्न होता था ॥ ३ ॥
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन् प्रति परस्परम् ।
राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिरः ॥ ४ ॥
राजन्! औरोंकी तो बात ही क्या है, चोरों, ठगों, राजा अथवा राजाके विश्वासपात्र व्यक्तियोंके मुखसे भी वहाँ कोई झूठी बात नहीं सुनी जाती थी । केवल प्रजाके साथ ही नहीं, आपसमें भी वे लोग झूठ - कपटका बर्ताव नहीं करते थे ॥ ४ ॥
अवर्षं चातिवर्षं च व्याधिपावकमूर्च्छनम् ।
सर्वमेतत् तदा नासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ॥ ५ ॥
धर्मपरायण युधिष्ठिरके शासनकालमें अनावृष्टि, अतिवृष्टि, रोग- व्याधि तथा आग लगने आदि उपद्रवोंका नाम भी नहीं था ॥ ५ ॥
प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्मं स्वभावजम् ।
अभिहर्तुं नृपा जग्मुर्नान्यैः कार्यैः कथंचन ॥ ६ ॥
राजा लोग उनके यहाँ स्वाभाविक भेंट देने अथवा उनका कोई प्रिय कार्य करनेके लिये ही आते थे, युद्ध आदि दूसरे किसी कामसे नहीं ॥ ६ ॥
धर्म्येर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान् ।
कर्तुं यस्य न शक्येत क्षयो वर्षशतैरपि ॥ ७ ॥
धर्मपूर्वक प्राप्त होनेवाले धनकी आयसे उनका महान् धन- भण्डार इतना बढ़ गया था कि सैकड़ों वर्षोंतक खुले हाथ लुटानेपर भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता था ॥ ७ ॥
स्वकोष्ठस्य परीमाणं कोशस्य च महीपतिः ।
विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायैव मनो दधे ॥ ८ ॥
पृष्ठ 1840
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने अन्न-वस्त्रके भंडार तथा खजानेका परिमाण जानकर यज्ञ करनेका ही निश्चय किया ॥ ८ ॥
सुहृदश्चैव ये सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन् ।
यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम् ॥ ९ ॥
उनके जितने हितैषी सुहृद् थे, वे सभी अलग- अलग और एक साथ यही कहने लगे —'प्रभो! यह आपके यज्ञ करनेका उपयुक्त समय आया है; अतः अब उसका आरम्भ कीजिये ' ॥ ९ ॥
अथैवं ब्रुवतामेव तेषामभ्याययौ हरिः ।
ऋषिः पुराणो वेदात्मादृश्यश्चैव विजानताम् ॥ १० ॥
वे सुहृद् इस तरहकी बातें कर ही रहे थे कि उसी समय भगवान् श्रीहरि आ पहुँचे । वे पुराणपुरुष, नारायण ऋषि वेदात्मा एवं विज्ञानीजनोंके लिये भी अगम्य परमेश्वर हैं ॥ १० ॥
जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठः प्रभवश्चाप्ययश्च ह ।
भूतभव्यभवन्नाथः केशवः केशिसूदनः ॥ ११ ॥
वे ही स्थावर- जंगम प्राणियोंके उत्तम उत्पत्ति- स्थान और लयके अधिष्ठान हैं । भूत, वर्तमान और भविष्य- तीनों कालोंके नियन्ता हैं । वे ही केशी दैत्यको मारनेवाले केशव ॥ ११ ॥
प्राकारः सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदोऽरिहा ।
बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम् ॥ १२ ॥
उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधवः ।
धनौघं पुरुषव्याघ्रो बलेन महताऽऽवृतः ॥ १३ ॥
वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं । पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥
तं धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम् ।
नादयन् रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ १४ ॥
उस धनराशिकी कहीं सीमा नहीं थी, मानो रत्नोंका अक्षय महासागर हो । उसे लेकर रथोंकी आवाजसे समूची दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें प्रविष्ट हुए ॥ १४ ॥
पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् ।
असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना ।
कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम् ॥ १५ ॥