श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1821–1830
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1821–1830
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सहदेवने कहा — वत्स! तुम मेरी आज्ञासे कर लेनेके लिये लंकापुरीमें जाओ और वहाँ राक्षसराज महात्मा विभीषणसे मिलकर राजसूययज्ञके लिये भाँति - भाँतिके बहुत - से रत्न प्राप्त करो । महाबली वीर! उनकी ओरसे भेंटमें मिली हुई सब वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ लौट आओ ।
नो चेदेवं वदेः पुत्र समर्थमिदमुत्तरम् ।
विष्णोर्भुजबलं वीक्ष्य राजसूयमथारभत् ॥
कौन्तेयोः भ्रातृभिः सार्धं सर्वं जानीहि साम्प्रतम् ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सर्वं वैश्रवणानुज ॥
इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ मा भूत् कालस्य पर्ययः । बेटा! यदि विभीषण तुम्हें भेंट न दें, तो उन्हें अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस प्रकार कहना — ' कुबेरके छोटे भाई लंकेश्वर! कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके बाहुबलको देखकर भाइयोंसहित राजसूययज्ञ आरम्भ किया है । आप इस समय इन बातोंको अच्छी तरह जान लें । आपका कल्याण हो, अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा । ' इतना कहकर तुम शीघ्र लौट आना; अधिक विलम्ब मत करना । वैशम्पायन उवाच
पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कचः ।
तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ॥
ययौ प्रदक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कचः । ) वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज जनमेजय! पाण्डुकुमार सहदेवके ऐसा कहनेपर घटोत्कच बहुत प्रसन्न हुआ और 'तथास्तु ' कहकर सहदेवकी परिक्रमा करके दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया । ततः कच्छगतो धीमान् दूतं माद्रवतीसुतः ।
प्रेषयामास हैडिम्बं पौलस्त्याय महात्मने ।
विभीषणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिंदमः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार समुद्रके तटपर पहुँचकर बुद्धिमान् शत्रुदमन धर्मात्मा माद्रवतीकुमारने महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणके पास प्रेमपूर्वक घटोत्कचको अपना दूत बनाकर भेजा ॥ ७३ ॥
( लङ्कामभिमुखो राजन् समुद्रमवलोकयत् ॥
कूर्मग्राहझषाकीर्ण नक्रेमनैस्तथाऽऽकुलम् ।
शुक्तिव्रातैः समाकीर्णं शङ्खानां निचयाकुलम् ॥
राजन्! लंकाकी ओर जाते हुए घटोत्कचने समुद्रको देखा । वह कछुओं, मगरों, नाकों तथा मत्स्य आदि जल-जन्तुओंसे भरा हुआ था । उसमें ढेर-के - ढेर शंख और सीपियाँ छा
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रही थीं ।
स दृष्ट्वा रामसेतुं च चिन्तयन् रामविक्रमम् ।
प्रणम्य तमतिक्रम्य याम्यां वेलामलोकयत् ॥
भगवान् श्रीरामके द्वारा बनवाये हुए पुलको देखकर घटोत्कचको भगवान्के पराक्रमका चिन्तन हो आया और उस सेतुतीर्थको प्रणाम करके उसने समुद्रके दक्षिणतटकी ओर दृष्टिपात किया ।
गत्वा पारं समुद्रस्य दक्षिणं स घटोत्कचः ।
ददर्श लङ्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम् ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् दक्षिणतटपर पहुँचकर घटोत्कचने लंकापुरी देखी, जो स्वर्गके समान सुन्दर थी ।
प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्च शोभिताम् ।
प्रासादैर्बहुसाहस्रैः श्वेतरक्तैश्च संकुलाम् ॥
उसके चारों ओर चहारदीवारी बनी थी । सुन्दर फाटक उस रमणीयपुरीकी शोभा बढ़ाते थे । सफेद और लाल रंगके हजारों महलोंसे वह लंकापुरी भरी हुई थी ।
तापनीयगवाक्षेण मुक्ताजालान्तरेण च ।
हमराजतजालेन दान्तजालैश्च शोभिताम् ॥
वहाँके गवाक्ष ( जँगले ) सोनेके बने हुए थे और उनके भीतर मोतियोंकी जाली लगी हुई थी । कितने ही गवाक्ष सोने, चाँदी तथा हाथीदाँतकी जालियोंसे सुशोभित थे ।
हर्म्यगोपुरसम्बाधां रुक्मतोरणसंकुलाम् ।
दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादामुद्यानवनशोभिताम् ॥
कितनी ही अट्टालिकाएँ तथा गोपुर उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे । स्थान- स्थानपर सोनेके फाटक लगे हुए थे । वहाँ दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि गूँजती रहती थी । बहुत- से उद्यान और वन उस नगरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे ।
पुष्पगन्धैश्च संकीर्णां रमणीयमहापथाम् ।
नानारत्नैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥
उसमें चारों ओर फूलोंकी सुगन्ध छा रही थी । वहाँकी लंबी- चौड़ी सड़कें बहुत सुन्दर थीं । भाँति - भाँतिके रत्नोंसे भरी - पुरी लंका इन्द्रकी अमरावतीपुरीको भी लज्जित कर रही थी ।
विवेश स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम् ।
ददर्श राक्षसव्राताञ्छूलप्राशधरान् बहून् ॥
घटोत्कचने राक्षसोंसे सेवित उस लंकापुरीमें प्रवेश किया और देखा, झुंड- के -झुंड राक्षस त्रिशूल और भाले लिये विचर रहे हैं । नानावेषधरान् दक्षान् नारीश्च प्रियदर्शनाः ।
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दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥ वे सभी युद्धमें कुशल हैं और नाना प्रकारके वेष धारण करते हैं । घटोत्कचने वहाँकी नारियोंको भी देखा । वे सब- की सब बड़ी सुन्दर थीं । उनके अंगोंमें दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य हार शोभा दे रहे थे ।
मदरक्तान्तनयनाः पीनश्रोणिपयोधराः ।
भैमसेनिं ततो दृष्ट्वा हृष्टास्ते विस्मयं गताः ॥
उनके नेत्रोंके किनारे मदिराके नशेसे कुछ लाल हो रहे थे । उनके नितम्ब और उरोज उभरे हुए तथा मांसल थे । भीमसेनपुत्र घटोत्कचको वहाँ आया देख लंकानिवासी राक्षसोंको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ ।
आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम् ।
स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥
इधर घटोत्कच इत्रभवनके समान मनोहर राजमहलके द्वारपर जा पहुँचा और द्वारपालसे इस प्रकार बोला । घटोत्कच उवाच
कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः ।
कनीयांस्तस्य दायादः सहदेव इति श्रुतः ॥
घटोत्कचने कहा — कुरुकुलमें एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं । वे महाबली नरेश ' पाण्डु ' के नामसे विख्यात थे । उनके सबसे छोटे पुत्रका नाम ' सहदेव ' है ।
कृष्णमित्रस्य तु गुरो राजसूयार्थमुद्यतः ।
तेनाहं प्रेषितो दूतः करार्थं कौरवस्य च ॥
वे अपने बड़े भाई युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ सम्पन्न करनेके लिये कटिबद्ध हैं । धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं । सहदेवने कुरुराज युधिष्ठिरके लिये कर लेनेके निमित्त मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है । द्रष्टुमिच्छामि पौलस्त्यं त्वं क्षिप्रं मां निवेदय । मैं पुलस्त्यनन्दन महाराज विभीषणसे मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दो । वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्वारपालो महीपते ।
तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदकः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! घटोत्कचका वह वचन सुनकर वह द्वारपाल ‘ बहुत अच्छा ' कहकर सूचना देनेके लिये राजभवनके भीतर गया । साञ्जलिः स समाचष्ट सर्वां दूतगिरं तदा ।
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द्वारपालवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपे मे प्रवेश्यताम् । वहाँ उसने हाथ जोड़कर दूतकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं । द्वारपालकी बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उससे कहा- ' दूतको मेरे समीप ले आओ ' ।
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र धर्मज्ञेन महात्मना ।
अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वाःस्थो हैडिम्बमब्रवीत् ॥
राजेन्द्र! धर्मज्ञ महात्मा विभीषणकी ऐसी आज्ञा होनेपर द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ बाहर निकला और घटोत्कचसे बोला- ।
एहि दूत नृपं द्रष्टुं क्षिप्रं प्रविश च स्वयम् ।
द्वारपालवचः श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कचः ॥
' दूत! आओ । महाराजसे मिलनेके लिये राजभवनमें शीघ्र प्रवेश करो । ' द्वारपालका कथन सुनकर घटोत्कचने राजभवनमें प्रवेश किया ।
स प्रविश्य ददर्शाथ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम् ।
ततः कैलाससंकाशं तप्तकाञ्चनतोरणम् ॥
तदनन्तर उसमें प्रवेश करके उसने राक्षसराज विभीषणका महल देखा, जो अपनी उज्ज्वल आभासे कैलासके समान जान पड़ता था । उसका फाटक तपाकर शुद्ध किये हुए सोनेसे तैयार किया गया था ।
प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम् ।
हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नसमन्वितम् ॥
चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित हो रहा था । उसमें बहुत- सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे । भाँति- भाँतिके रत्न उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे । काञ्चनैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैरपि । वज्रवैडूर्यगर्भैश्च स्तम्भेर्दृष्टिमनोहरैः । नानाध्वजपताकाभिः सुवर्णाभिश्च चित्रितम् । तपाये हुए सुवर्ण, रजत (चाँदी ) तथा स्फटिकमणिके बने हुए खम्भे नेत्र और मनको बरबस अपनी ओर खींच लेते थे । उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे । सुनहरे रंगकी
विविध ध्वजा - पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा हो रही थी ।
चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ॥
तान् दृष्ट्वा तत्र सर्वान् स भैमसेनिर्मनोरमान् ।
प्रविशन्नेव हैडिम्बः शुश्राव मुरजस्वनम् ॥
विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी दे रहा था । उस महलकी इन सारी मनोरम विशेषताओंको देखकर
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घटोत्कचने ज्यों ही भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उसके कानोंमें मृदंगकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ी ।
तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालमिताक्षरम् ।
दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादं वादित्रशतसंकुलम् ॥
वहाँ वीणाके तार झंकृत हो रहे थे और उसके लयपर गीत गाया जा रहा था, जिसका एक - एक अक्षर समतालके अनुसार उच्चारित हो रहा था । सैकड़ों वाद्योंके साथ दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष गूँज रहा था ।
स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत् तदा ।
ततो विगाह्य हैडिम्बो बहुकक्षां मनोरमाम् ॥
स ददर्श महात्मानं द्वाःस्थेन भरतर्षभ ।
तं विभीषणमासीनं काञ्चने परमासने ॥
भरतश्रेष्ठ! वह मधुर शब्द सुनकर घटोत्कचके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने अनेक मनोरम कक्षाओंको पार करके द्वारपालके साथ जा सुन्दर स्वर्ण सिंहासनपर बैठे हुए महात्मा विभीषणका दर्शन किया ।
दिव्ये भास्करसंकाशे मुक्तामणिविभूषिते ।
दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपधरं विभुम् ॥
उनका सिंहासन सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था और उसमें मोती तथा मणि आदि रत्न जड़े हुए थे । दिव्य आभूषणोंसे राक्षसराज विभीषणके अंगोंकी विचित्र शोभा हो रही थी । उनका रूप दिव्य था ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम् ।
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् ॥
वे दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे अभिषिक्त हो बड़े सुन्दर
दिखायी दे रहे थे । उनकी अंगकान्ति सूर्य तथा अग्निके समान उद्भासित हो रही थी ।
उपोपविष्टं सचिवैर्देवैरिव शतक्रतुम् ॥
यक्षैर्महारथैर्दिव्यैर्नारीभिः प्रियदर्शनैः ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिः पूज्यमानं यथाविधि ॥
जैसे इन्द्रके पास बहुत- से देवता बैठते हैं, उसी प्रकार विभीषणके समीप उनके अनेक सचिव बैठे थे । बहुत- से दिव्य सुन्दर महारथी यक्ष अपनी स्त्रियोंके साथ मंगलयुक्त वाणीद्वारा विभीषणका विधिपूर्वक पूजन कर रहे थे । चामरे व्यजने चाग्रये हेमदण्डे महाधने । गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि । दो सुन्दरी नारियाँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित बहुमूल्य चँवर तथा व्यजन लेकर उनके मस्तकपर डुला रही थीं ।
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अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम् ।
धर्मे चैव स्थितं नित्यमद्भुतं राक्षसेश्वरम् ॥
राक्षसराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे । उनके अंगोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी । वे सदा धर्ममें स्थित रहते थे ।
राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा ।
दृष्ट्वा घटोत्कचो राजन् ववन्दे तं कृताञ्जलिः ॥
वे मन- ही- मन इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते थे । राजन्! उन राक्षसराज विभीषणको देख घटोत्कचने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया ।
प्रह्वस्तस्थौ महावीर्यः शक्रं चित्ररथो यथा ।
तं दूतमागतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥
पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् । और जैसे महापराक्रमी चित्ररथ इन्द्रके सामने नम्र रहते हैं, उसी प्रकार महाबली घटोत्कच भी विनीतभावसे उनके सम्मुख खड़ा हो गया । राक्षसराज विभीषणने उस दूतको आया हुआ देख उसका यथायोग्य सम्मान करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा । विभीषण उवाच कस्य वंशे तु संजातः करमिच्छन् महीपतिः ॥
तस्यानुजान् समस्तांश्च पुरं देशं च तस्य वै ।
त्वां च कार्यं च तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
विस्तरेण मम ब्रूहि सर्वानेतान् पृथक् - पृथक् । विभीषणने पूछा — दूत! जो महाराज मुझसे कर लेना चाहते हैं, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं । उनके समस्त भाइयों तथा ग्राम और देशका परिचय दो । मैं तुम्हारे विषयमें भी जानना चाहता हूँ तथा तुम जिस कार्यके लिये कर लेने आये हो, उस समस्त कार्यके विषयमें भी मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी पूछी हुई इन सब बातोंको विस्तारपूर्वक पृथक् - पृथक् बताओ । वैशम्पायनउवाच एवमुक्तस्तु हैडिम्बः पौलस्त्येन महात्मना ॥ कृताञ्जलिरुवाचाथ सान्त्वयन् राक्षसाधिपम् । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महात्मा विभीषणके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने हाथ जोड़कर राक्षसराजको आश्वासन देते हुए कहा । घटोत्कच उवाच सोमस्य वंशे राजाऽऽसीत् पाण्डुर्नाम महाबलः ।
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पाण्डोः पुत्राश्च पञ्चासञ्छक्रतुल्यपराक्रमाः ॥ तेषां ज्येष्ठस्तु नाम्नाभूद् धर्मपुत्र इति श्रुतः । घटोत्कच बोला — महाराज! चन्द्रवंशमें पाण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाबली राजा हो गये हैं । उनके पाँच पुत्र हैं, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हैं । उन पाँचोंमें जो बड़े हैं, वे
धर्मपुत्रके नामसे विख्यात हैं ।
अजातशत्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा प्राप्य राज्यमकारयत् ।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये ॥
उनके मनमें किसीके प्रति शत्रुता नहीं है; इसलिये लोग उन्हें अजातशत्रु कहते हैं । उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है । वे धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते हैं । गंगाके दक्षिणतटपर हस्तिनापुर नामका एक नगर है । राजा युधिष्ठिर वहीं अपना पैतृक राज्य प्राप्त करके उसकी रक्षा करते थे ।
तद् दत्त्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः ।
भ्रातृभि सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थे प्रमोदते ॥
राक्षसराज! कुछ कालके पश्चात् उन्होंने हस्तिनापुरका राज्य धृतराष्ट्रको सौंप दिया और स्वयं वे भाइयोंसहित इन्द्रप्रस्थ चले गये । इन दिनों वे वहीं आनन्दपूर्वक रहते हैं ।
गङ्गायमुनयोर्मध्ये तावुभौ नगरोत्तमौ ।
नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशासति ॥
वे दोनों श्रेष्ठ नगर गंगा- यमुनाके बीचमें बसे हुए हैं । नित्य धर्मपरायण राजा युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थमें ही रहकर शासन करते हैं ।
तस्यानुजो महाबाहुः भीमसेनो महाबलः ।
महातेजा महावीर्यः सिंहतुल्यः स पाण्डवः ॥
उनके छोटे भाई पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेन भी बड़े बलवान् हैं । वे सिंहके समान महापराक्रमी और अत्यन्त तेजस्वी हैं ।
दशनागसहस्राणां बले तुल्यः स पाण्डवः ।
तस्यानुजोऽर्जुनो नाम महावीर्यपराक्रमः ॥
सुकुमारो महासत्त्वो लोके वीर्येण विश्रुतः । उनमें दस हजार हाथियोंका बल है । उनसे छोटे भाईका नाम अर्जुन है, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सुकुमार तथा अत्यन्त धैर्यवान् हैं । उनका पराक्रम विश्वमें विख्यात है । कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले ॥
जामदग्न्यसमो ह्यस्त्रे संख्ये रामसमोऽर्जुनः ।
रूपे शक्रसमः पार्थस्तेजसा भास्करोपमः ॥
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वे कुन्तीनन्दन अर्जुन कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी, सगरपुत्रोंके समान बलवान्, परशुरामजीके समान अस्त्रविद्याके ज्ञाता, श्रीरामचन्द्रजीके समान समरविजयी, इन्द्रके समान रूपवान् तथा भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी हैं ।
देवदानवगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ।
मानुषैश्च समस्तैश्च अजेयः फाल्गुनो रणे ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य ये सब मिलकर भी युद्धमें अर्जुनको परास्त नहीं कर सकते ।
तेन तत् खाण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे ।
तरसा धर्षयित्वा तं शक्रं देवगणैः सह ॥
लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम् । उन्होंने खाण्डववनको जलाकर अग्निदेवको तृप्त किया है । देवताओंसहित इन्द्रको वेगपूर्वक पराजित करके उन्होंने अग्निदेवको संतुष्ट किया और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं ।
तेन लब्धा महाराज दुर्लभा देवतैरपि ।
वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्रुता ॥
महाराज! उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया है, जो
देवताओंके लिये भी दुर्लभ थी ।
अर्जुनस्यानुजो राजन् नकुलश्चेति विश्रुतः ॥
दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथः । राजन्! अर्जुनके छोटे भाई नकुल नामसे विख्यात हैं, जो इस जगत्में मूर्तिमान् कामदेवके समान दर्शनीय हैं ।
तस्यानुजो महातेजाः सहदेव इति श्रुतः ।
तेनाहं प्रेषितो राजन् सहदेवेन मारिष ॥
नकुलके छोटे भाई महातेजस्वी सहदेवके नामसे विख्यात हैं । माननीय महाराज! उन्हीं सहदेवने मुझे यहाँ भेजा है ।
अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली ।
मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी ॥
मेरा नाम घटोत्कच है । मैं भीमसेनका बलवान् पुत्र हूँ । मेरी सौभाग्यशालिनी माताका नाम हिडिम्बा है । वे राक्षसकुलकी कन्या हैं ।
पार्थानामुपकारार्थं चरामि पृथिवीमिमाम् ।
आसीत् पृथिव्याः सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिरः ॥
मैं कुन्तीपुत्रोंका उपकार करनेके लिये ही इस पृथ्वीपर विचरता हूँ । महाराज युधिष्ठिर सम्पूर्ण भूमण्डलके शासक हो गये हैं ।
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राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
संदिदेश च स भ्रातॄन् करार्थं सर्वतोदिशम् ॥
उन्होंने क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करनेकी तैयारी की है। उन्हीं महाराजने अपने सब भाइयोंको कर वसूल करनेके लिये सब दिशाओंमें भेजा है ।
वृष्णिवीरेण सहितः संदिदेशानुजान् नृपः ।
उदीचीमर्जुनस्तूर्णं करार्थं समुपाययौ ॥
वृष्णिवीर भगवान् श्रीकृष्णके साथ धर्मराजने जब अपने भाइयोंको दिग्विजयके लिये आदेश दिया, तब महाबली अर्जुन कर वसूल करनेके लिये तुरंत उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ।
गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबलः ।
जित्वा सर्वान् नृपान् युद्धे हत्वा च तरसा वशी ॥
स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम् । उन्होंने लाख योजनकी यात्रा करके सम्पूर्ण राजाओंको युद्धमें हराया है और सामना करनेके लिये आये हुए विपक्षियोंको वेगपूर्वक मारा है । जितेन्द्रिय अर्जुनने स्वर्गके द्वारतक
जाकर प्रचुर रत्न - राशि प्राप्त की है ।
अश्वांश्च विविधान् दिव्यान् सर्वानादाय फाल्गुनः ॥
धनं बहुविधं राजन् धर्मपुत्राय वै ददौ । नाना प्रकारके दिव्य अश्व उन्हें भेंटमें मिले हैं । इस प्रकार भाँति - भाँतिके धन लाकर
उन्होंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित किये हैं ।
भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलात् ॥
वशे कृत्वा महीपालान् पाण्डवाय धनं ददौ । राजेन्द्र! युधिष्ठिरके दूसरे भाई भीमसेनने पूर्व दिशामें जाकर उसे बलपूर्वक जीता है और वहाँके राजाओंको अपने वशमें करके पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित किया
है ।
दिशं प्रतीचीं नकुलः करार्थं प्रययौ तथा ॥
सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान् महीक्षितः । नकुल कर लेनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये हैं और सहदेव सम्पूर्ण राजाओंको
जीतते हुए दक्षिण दिशामें बढ़ते चले आये हैं ।
मां संदिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृतः ॥
पार्थानां चरितं तुभ्यं संक्षेपात् समुदाहृतम् । राजेन्द्र! उन्होंने बड़े सत्कारपूर्वक मुझे आपके यहाँ राजकीय कर देनेके लिये संदेश भेजा है । महाराज! पाण्डवोंका यह चरित्र मैंने अत्यन्त संक्षेपमें आपके समक्ष रखा है । तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥
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पावकं राजसूयं च भगवन्तं हरिं प्रभुम् ।
एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ करं त्वं दातुमर्हसि ॥
आप धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखिये, पवित्र करनेवाले राजसूययज्ञ तथा जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिकी ओर भी ध्यान दीजिये | धर्मज्ञ नरेश! इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए आपको मुझे कर देना चाहिये । वैशम्पायन उवाच तेन तद् भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः । प्रीतिमानभवद् राजन् धर्मात्मा सचिवैः सह II ) वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! घटोत्कचकी वह बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण अपने मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए ।
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् ।
तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभुः ॥ ७४ ॥
विभीषणने प्रेमपूर्वक ही उनका शासन स्वीकार कर लिया । शक्तिशाली एवं बुद्धिमान् विभीषणने उसे कालका ही विधान समझा ॥ ७४ ॥
( ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च ।
दन्तकाञ्चनपर्यङ्कान् मणिहेमविचित्रितान् ॥
उन्होंने सहदेवके लिये हाथीकी पीठपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल ( कालीन ) तथा हाथीदाँत और सुवर्णके बने हुए पलंग दिये, जिनमें सोने तथा रत्न जड़े हुए थे ।
भूषणानि विचित्राणि महार्हाणि बहूनि च ।
प्रवालानि च शुभ्राणि मणींश्च विविधान् बहून् ॥
काञ्चनानि च भाण्डानि कलशानि घटानि च ।
कटाहान्यपि चित्राणि द्रोण्यश्चैव सहस्रशः ॥
इसके सिवा बहुत - से विचित्र और बहुमूल्य आभूषण भी भेंट किये । सुन्दर मूँगे, भाँति-भाँतिके मणिरत्न, सोनेके बर्तन, कलश, घड़े, विचित्र कड़ाहे और हजारों जलपात्र समर्पित किये ।
राजतानि च भाण्डानि चित्राणि च बहूनि च ।
शस्त्राणि रुक्मचित्राणि मणिमुक्तैर्विचित्रितान् ॥
इनके सिवा चाँदीके भी बहुत से ऐसे बर्तन दिये, जिनमें चित्रकारी की गयी थी । कुछ ऐसे शस्त्र भेंट किये, जिनमें सुवर्ण, मणि और मोती जड़े हुए थे ।
यज्ञस्य तोरणे युक्तान् ददौ तालांश्चतुर्दश ।
रुक्मपङ्कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिताः ॥