महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1991–2000
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1991–2000
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तस्य भीमस्य भीष्मेण वार्यमाणस्य भारत ।
गुरुणा विविधैर्वाक्यैः क्रोधः प्रशममागतः ॥ १४ ॥
भारत! पितामह भीष्मके द्वारा अनेक प्रकारकी बातें कहकर रोके जानेपर भीमसेनका क्रोध शान्त हो गया ॥ १४ ॥
नातिचक्राम भीष्मस्य स हि वाक्यमरिंदमः ।
समुद्वृत्तो घनापाये वेलामिव महोदधिः ॥ १५ ॥
शत्रुदमन भीम भीष्मजीकी आज्ञाका उल्लंघन उसी प्रकार न कर सके, जैसे वर्षाके अन्तमें उमड़ा हुआ होनेपर भी महासागर अपनी तटभूमिसे आगे नहीं बढ़ता है ॥ १५ ॥
शिशुपालस्तु संक्रुद्धे भीमसेने जनाधिप ।
नाकम्पत तदा वीरः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ॥ १६ ॥
राजन्! भीमसेनके कुपित होनेपर भी वीर शिशुपाल भयभीत नहीं हुआ । उसे अपने पुरुषार्थका पूरा भरोसा था ॥ १६ ॥
उत्पतन्तं तु वेगेन पुनः पुनररिंदमः ।
न स तं चिन्तयामास सिंहः क्रुद्धो मृगं यथा ॥ १७ ॥
भीमको बार - बार वेगसे उछलते देख शत्रुदमन शिशुपालने उनकी कुछ भी परवाह नहीं की, जैसे क्रोधमें भरा हुआ सिंह मृगको कुछ भी नहीं समझता ॥ १७ ॥
प्रहसंश्चाब्रवीद् वाक्यं चेदिराजः प्रतापवान् ।
भीमसेनमभिक्रुद्धं दृष्ट्वा भीमपराक्रमम् ॥ १८ ॥
उस समय भयानक पराक्रमी भीमसेनको कुपित देख प्रतापी चेदिराज हँसते हुए बोला - ॥ १८ ॥
मुञ्चैनं भीष्म पश्यन्तु यावदेनं नराधिपाः ।
मत्प्रभावविनिर्दग्धं पतङ्गमिव वह्निना ॥ १ ९ ॥
‘ भीष्म! छोड़ दो इसे, ये सभी राजा देख लें कि यह भीम मेरे प्रभावसे उसी प्रकार दग्ध हो जायगा जैसे फतिंगा आगके पास जाते ही भस्म हो जाता है ' ॥ १ ९ ॥
ततश्चेदिपतेर्वाक्यं श्रुत्वा तत् कुरुसत्तमः ।
भीमसेनमुवाचेदं भीष्मो मतिमतां वरः ॥ २० ॥
तब चेदिराजकी वह बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुरुकुलतिलक भीष्मने भीमसे यह कहा ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीमक्रोधे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें भीमक्रोधविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन भीष्म उवाच
चेदिराजकुले जातस्त्र्यक्ष एष चतुर्भुजः ।
रासभारावसदृशं ररास च ननाद च ॥ १ ॥
भीष्मजी बोले- भीमसेन! सुनो, चेदिराज दमघोषके कुलमें जब यह शिशुपाल उत्पन्न हुआ, उस समय इसके तीन आँखें और चार भुजाएँ थीं। इसने रोनेकी जगह गदहेके रेंकनेकी भाँति शब्द किया और जोर - जोरसे गर्जना भी की ॥ १ ॥
तेनास्य मातापितरौ त्रेसतुस्तौ सबान्धवौ ।
वैकृतं तस्य तौ दृष्ट्वा त्यागायाकुरुतां मतिम् ॥ २ ॥
इससे इसके माता- पिता अन्य भाई-बन्धुओंसहित भयसे थर्रा उठे । इसकी वह विकराल आकृति देख उन्होंने इसे त्याग देनेका निश्चय किया ॥ २ ॥
ततः सभार्यं नृपतिं सामात्यं सपुरोहितम् ।
चिन्तासम्मूढहृदयं वागुवाचाशरीरिणी ॥ ३ ॥
पत्नी, पुरोहित तथा मन्त्रियोंसहित चेदिराजका हृदय चिन्तासे मोहित हो रहा था । उस समय आकाशवाणी हुई— ॥ ३ ॥
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एष ते नृपते पुत्रः श्रीमान् जातो बलाधिकः ।
तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्रः पाहि वै शिशुम् ॥ ४ ॥
' राजन्! तुम्हारा यह पुत्र श्रीसम्पन्न और महाबली है, अतः तुम्हें इससे डरना नहीं चाहिये । तुम शान्तचित्त होकर इस शिशुका पालन करो ॥ ४ ॥
न च वै तस्य मृत्युर्वै न कालः प्रत्युपस्थितः ।
मृत्युर्हन्तास्य शस्त्रेण स चोत्पन्नो नराधिप ॥ ५ ॥
‘ नरेश्वर! अभी इसकी मृत्यु नहीं आयी है और न काल ही उपस्थित हुआ है । जो इसकी मृत्युका कारण है तथा जो शस्त्रद्वारा इसका वध करेगा, वह अन्यत्र उत्पन्न हो चुका है ' ॥ ५ ॥
संश्रुत्योदाहृतं वाक्यं भूतमन्तर्हितं ततः ।
पुत्रस्नेहाभिसंतप्ता जननी वाक्यमब्रवीत् ॥ ६ ॥
तदनन्तर यह आकाशवाणी सुनकर उस अन्तर्हित भूतको लक्ष्य करके पुत्रस्नेहसे संतप्त हुई इसकी माता बोली – ॥ ६ ॥
येनेदमीरितं वाक्यं ममैतं तनयं प्रति ।
प्राञ्जलिस्तं नमस्यामि ब्रवीतु स पुनर्वचः ॥ ७ ॥
याथातथ्येन भगवान् देवो वा यदि वेतरः ।
श्रोतुमिच्छामि पुत्रस्य कोऽस्य मृत्युर्भविष्यति ॥ ८ ॥
' मेरे इस पुत्रके विषयमें जिन्होंने यह बात कही है, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ । चाहे वे कोई देवता हों अथवा और कोई प्राणी? वे फिर मेरे प्रश्नका उत्तर दें । मैं यह यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्रकी मृत्युमें कौन निमित्त बनेगा? ' ॥ ७-८ ॥
अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेदं पुनर्वचः ।
यस्योत्सङ्गे गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ ॥ ९ ॥
पतिष्यतः क्षितितले पञ्चशीर्षाविवोरगौ ।
तृतीयमेतद् बालस्य ललाटस्थं तु लोचनम् ॥ १० ॥
निमज्जिष्यति यं दृष्ट्वा सोऽस्य मृत्युर्भविष्यति । तब पुनः उसी अदृश्य भूतने यह उत्तर दिया- ' जिसके द्वारा गोदमें लिये जानेपर पाँच सिरवाले दो सर्पोंकी भाँति इसकी पाँचों अँगुलियोंसे युक्त दो अधिक भुजाएँ पृथ्वीपर गिर जायँगी और जिसे देखकर इस बालकका ललाटवर्ती तीसरा नेत्र भी ललाटमें लीन हो जायगा, वही इसकी मृत्युमें निमित्त बनेगा' ॥ ९ -१० ॥ त्र्यक्षं चतुर्भुजं श्रुत्वा तथा च समुदाहृतम् ॥ ११ ॥
पृथिव्यां पार्थिवाः सर्वे अभ्यागच्छन् दिदृक्षवः । चार बाँह और तीन आँखवाले बालकके जन्मका समाचार सुनकर भूमण्डलके सभी नरेश उसे देखनेके लिये आये ॥ ११३ ॥
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तान् पूजयित्वा सम्प्राप्तान् यथार्हं स महीपतिः ॥ १२ ॥
एकैकस्य नृपस्याङ्के पुत्रमारोपयत् तदा । चेदिराजने अपने घर पधारे हुए उन सभी नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके अपने पुत्रको हर एककी गोदमें रखा ॥ १२३ ॥
एवं राजसहस्राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम् ॥ १३ ॥
शिशुरङ्कसमारूढो न तत् प्राप निदर्शनम् । इस प्रकार वह शिशु क्रमशः सहस्रों राजाओंकी गोदमें अलग- अलग रखा गया, परन्तु मृत्युसूचक लक्षण कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ ॥ १३३ ॥
एतदेव तु संश्रुत्य द्वारवत्यां महाबलौ ॥ १४ ॥
ततश्चेदिपुरं प्राप्तौ संकर्षणजनार्दनौ ।
यादवौ यादवीं द्रष्टुं स्वसारं तौ पितुस्तदा ॥ १५ ॥
द्वारकामें यही समाचार सुनकर महाबली बलराम और श्रीकृष्ण दोनों यदुवंशी वीर अपनी बुआसे मिलनेके लिये उस समय चेदिराज्यकी राजधानीमें गये ॥ १४-१५ ॥
अभिवाद्य यथान्यायं यथाश्रेष्ठं नृपं च ताम् ।
कुशलानामयं पृष्ट्वा निषण्णौ रामकेशवौ ॥ १६ ॥
वहाँ बलराम और श्रीकृष्णने बड़े - छोटेके क्रमसे सबको यथायोग्य प्रणाम किया एवं
राजा दमघोष और अपनी बुआ श्रुतश्रवासे कुशल और आरोग्यविषयक प्रश्न किया ।
तत्पश्चात् दोनों भाई एक उत्तम आसनपर विराजमान हुए ॥ १६ ॥
साभ्यर्च्य तौ तदा वीरौ प्रीत्या चाभ्यधिकं ततः ।
पुत्रं दामोदरोत्सङ्गे देवी संन्यदधात् स्वयम् ॥ १७ ॥
महादेवी श्रुतश्रवाने बड़े प्रेमसे उन दोनों वीरोंका सत्कार किया और स्वयं ही अपने पुत्रको श्रीकृष्णकी गोदमें डाल दिया ॥ १७ ॥
न्यस्तमात्रस्य तस्याङ्के भुजावभ्यधिकावुभौ ।
पेततुस्तच्च नयनं न्यमज्जत ललाटजम् ॥ १८ ॥
उनकी गोदमें रखते ही बालककी वे दोनों बाँहें गिर गयीं और ललाटवर्ती नेत्र भी वहीं विलीन हो गया ॥ १८ ॥
तद् दृष्ट्वा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमयाचत ।
ददस्व मे वरं कृष्ण भयार्ताया महाभुज ॥ १ ९ ॥
यह देखकर बालककी माता भयभीत हो मन - ही- मन व्यथित हो गयी और श्रीकृष्णसे वर माँगती हुई बोली— ' महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं भयसे व्याकुल हो रही हूँ । मुझे इस पुत्रकी जीवनरक्षाके लिये कोई वर दो ॥ १ ९ ॥
त्वं ह्यार्तानां समाश्वासो भीतानामभयप्रदः ।
एवमुक्तस्ततः कृष्णः सोऽब्रवीद् यदुनन्दनः ॥ २० ॥
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' क्योंकि तुम संकटमें पड़े हुए प्राणियोंके सबसे बड़े सहारे और भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हो । ' अपनी बुआके ऐसा कहनेपर यदुनन्दन श्रीकृष्णने कहा— ॥ २० ॥
मा भैस्त्वं देवि धर्मज्ञे न मत्तोऽस्ति भयं तव ।
ददामि कं वरं किं च करवाणि पितृष्वसः ॥ २१ ॥
‘देवि! धर्मज्ञे! तुम डरो मत । तुम्हें मुझसे कोई भय नहीं है । बुआ! तुम्हीं कहो, मैं तुम्हें कौन--सा वर दूँ? तुम्हारा कौन- सा कार्य सिद्ध कर दूँ? ॥ २१ ॥
शक्यं वा यदि वाशक्यं करिष्यामि वचस्तव ।
एवमुक्ता ततः कृष्णमब्रवीद् यदुनन्दनम् ॥ २२ ॥
‘ सम्भव हो या असम्भव, तुम्हारे वचनका मैं अवश्य पालन करूँगा । ' इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर श्रुतश्रवा यदुनन्दन श्रीकृष्णसे बोली— ॥ २२ ॥
शिशुपालस्यापराधान् क्षमेथास्त्वं महाबल ।
मत्कृते यदुशार्दूल विद्धयेनं मे वरं प्रभो ॥ २३ ॥
‘ महाबली यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! तुम मेरे लिये शिशुपालके सब अपराध क्षमा कर देना । प्रभो! यही मेरा मनोवांछित वर समझो' ॥ २३ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
अपराधशतं क्षाम्यं मया ह्यस्य पितृष्वसः ।
पुत्रस्य ते वधार्हस्य मा त्वं शोके मनः कृथाः ॥ २४ ॥
श्रीकृष्णने कहा- बुआ! तुम्हारा पुत्र अपने दोषोंके कारण मेरे द्वारा यदि वधके योग्य
होगा, तो भी मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूँगा । तुम अपने मनमें शोक न करो ॥ २४ ॥
भीष्म उवाच
एवमेष नृपः पापः शिशुपालः सुमन्दधीः ।
त्वां समाह्वयते वीर गोविन्दवरदर्पितः ॥ २५ ॥
भीष्मजी कहते हैं - वीरवर भीमसेन! इस प्रकार यह मन्दबुद्धि पापी राजा शिशुपाल भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए वरदानसे उन्मत्त होकर तुम्हें युद्धके लिये ललकार रहा है ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवृत्तान्तकथने त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवृत्तान्तवर्णनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
Face
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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना भीष्म उवाच
नैषा चेदिपतेर्बुद्धिर्यया त्वाऽऽह्वयतेऽच्युतम् ।
नूनमेष जगद्भर्तुः कृष्णस्यैव विनिश्चयः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं- भीमसेन यह चेदिराज शिशुपालकी बुद्धि नहीं है, जिसके द्वारा वह युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले तुम जैसे महावीरको ललकार रहा है, अवश्य ही सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् श्रीकृष्णका ही यह निश्चित विधान है ॥ १ ॥
कोहि मां भीमसेनाद्य क्षितावर्हति पार्थिवः ।
क्षेप्तुं कालपरीतात्मा यथैष कुलपांसनः ॥ २ ॥
भीमसेन! कालने ही इसके मन और बुद्धिको ग्रस लिया है, अन्यथा इस भूमण्डलमें कौन ऐसा राजा होगा, जो मुझपर इस तरह आक्षेप कर सके, जैसे यह कुलकलंक शिशुपाल कर रहा है ॥ २ ॥
एष ह्यस्य महाबाहुस्तेजोंऽशश्च हरेर्ध्रुवम् ।
तमेव पुनरादातुमिच्छत्युत तथा विभुः ॥ ३ ॥
यह महाबाहु चेदिराज निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्णके तेजका अंश है । ये सर्वव्यापी भगवान् अपने उस अंशको पुनः समेट लेना चाहते हैं ॥ ३ ॥
येनैष कुरुशार्दूल शार्दूल इव चेदिराट् ।
गर्जत्यतीव दुर्बुद्धिः सर्वानस्मानचिन्तयन् ॥ ४ ॥
कुरुसिंह भीम! यही कारण है कि यह दुर्बुद्धि शिशुपाल हम सबको कुछ न समझकर आज सिंहके समान गरज रहा है ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो न ममृषे चैद्यस्तद् भीष्मवचनं तदा ।
उवाच चैनं संक्रुद्धः पुनर्भीष्ममथोत्तरम् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीष्मकी यह बात शिशुपाल न सह सका । वह पुनः अत्यन्त क्रोधमें भरकर भीष्मको उनकी बातोंका उत्तर देते हुए बोला ॥ ५ ॥
शिशुपाल उवाच
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द्विषतां नोऽस्तु भीष्मैष प्रभावः केशवस्य यः ।
यस्य संस्तववक्ता त्वं वन्दिवत् सततोत्थितः ॥ ६ ॥
शिशुपालने कहा- भीष्म! तुम सदा भाटकी तरह खड़े होकर जिसकी स्तुति गाया करते हो, उस कृष्णका जो प्रभाव है, वह हमारे शत्रुओंके पास ही रहे ॥ ६ ॥
संस्तवे च मनो भीष्म परेषां रमते यदि ।
तदा संस्तौषि राज्ञस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम् ॥ ७ ॥
भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुतिमें ही लगता है तो इस जनार्दनको छोड़कर इन राजाओंकी ही स्तुति करो ॥ ७ ॥
दरदं स्तुहि बाह्लीकमिमं पार्थिवसत्तमम् ।
जायमानेन येनेयमभवद् दारिता मही ॥। ८ ॥
ये दरददेशके राजा हैं, इनकी स्तुति करो । ये भूमिपालोंमें श्रेष्ठ बाह्लीक बैठे हैं, इनके गुण गाओ । इन्होंने जन्म लेते ही अपने शरीरके भारसे इस पृथ्वीको विदीर्ण कर दिया था ॥ ८ ॥
वङ्गाङ्गविषयाध्यक्षं सहस्राक्षसमं बले ।
तुहि कर्णमिमं भीष्म महाचापविकर्षणम् ॥ ९ ॥
भीष्म! ये जो वंग और अंग दोनों देशोंके राजा हैं, इन्द्रके समान बल - पराक्रमसे सम्पन्न हैं तथा महान् धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले हैं, इन वीरवर कर्णकी कीर्तिका गान करो ॥ ९ ॥
यस्येमे कुण्डले दिव्ये सहजे देवनिर्मिते ।
कवचं च महाबाहो बालार्कसदृशप्रभम् ॥ १० ॥
महाबाहो! इन कर्णके ये दोनों दिव्य कुण्डल जन्मके साथ ही प्रकट हुए हैं । किसी देवताने ही इन कुण्डलोंका निर्माण किया है । कुण्डलोंके साथ- साथ इनके शरीरपर यह दिव्य कवच भी जन्मसे ही पैदा हुआ है, जो प्रातःकालके सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥
वासवप्रतिमो येन जरासंधोऽतिदुर्जयः ।
विजितो बाहुयुद्धेन देहभेदं च लम्भितः ॥ ११ ॥
जिन्होंने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अत्यन्त दुर्जय जरासंधको बाहुयुद्धके द्वारा केवल परास्त ही नहीं किया, उनके शरीरको चीर भी डाला, उन भीमसेनकी स्तुति करो ॥ ११ ॥
द्रोणं द्रौणिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ ।
स्तुहि स्तुत्यावुभौ भीष्म सततं द्विजसत्तमौ ॥ १२ ॥
द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा दोनों पिता - पुत्र महारथी हैं तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं, अतएव स्तुत्य भी हैं । भीष्म! तुम उन दोनोंकी अच्छी तरह स्तुति करो ॥ १२ ॥
ययोरन्यतरो भीष्म संक्रुद्धः सचराचराम् ।
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इमां वसुमतीं कुर्यान्निःशेषामिति मे मतिः ॥ १३ ॥
भीष्म! इन दोनों पिता- पुत्रोंमेंसे यदि एक भी अत्यन्त क्रोधमें भर जाय, तो चराचर प्राणियोंसहित इस सारी पृथ्वीको नष्ट कर सकता है, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १३ ॥
द्रोणस्य हि समं युद्धे न पश्यामि नराधिपम् ।
नाश्वत्थाम्नः समं भीष्म न च तौ स्तोतुमिच्छसि ॥ १४ ॥
भीष्म! मुझे तो कोई भी ऐसा राजा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें द्रोण अथवा
अश्वत्थामाकी बराबरी कर सके । तो भी तुम इन दोनोंकी स्तुति करना नहीं चाहते ॥ १४ ॥
पृथिव्यां सागरान्तायां यो वै प्रतिसमो भवेत् ।
दुर्योधनं त्वं राजेन्द्रमतिक्रम्य महाभुजम् ॥ १५ ॥
जयद्रथं च राजानं कृतास्त्रं दृढविक्रमम् ।
द्रुमं किम्पुरुषाचार्यं लोके प्रथितविक्रमम् ।
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥ १६ ॥
इस समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर जो अद्वितीय अनुपम वीर हैं, उन राजाधिराज महाबाहु दुर्योधनको, अस्त्रविद्यामें निपुण और सुदृढ़पराक्रमी राजा जयद्रथको और विश्वविख्यात विक्रमशाली महाबली किम्पुरुषाचार्य द्रुमको छोड़कर तुम कृष्णकी प्रशंसा क्यों करते हो? ॥ १५-१६ ॥
वृद्धं च भारताचार्यं तथा शारद्वतं कृपम् ।
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥ १७ ॥
शरद्वान् मुनिके पुत्र महापराक्रमी कृप भरतवंशके वृद्ध आचार्य हैं। इनका उल्लंघन करके तुम कृष्णका गुण क्यों गाते हो? ॥ १७ ॥
धनुर्धराणां प्रवरं रुक्मिणं पुरुषोत्तमम् ।
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥ १८ ॥
धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पुरुषरत्न महाबली रुक्मीकी अवहेलना करके तुम केशवकी प्रशंसाके गीत क्यों गाते हो? ॥ १८ ॥
भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्रं च भूमिपम् ।
भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम् ॥ १ ९ ॥
विराटद्रुपदौ चोभी शकुनिं च बृहद्बलम् ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तरम् ॥ २० ॥
शङ्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम् ।
एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम् ॥ २१ ॥
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ।
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महापराक्रमी भीष्मक, भूमिपाल दन्तवक्र, भगदत्त, यूपकेतु, जयत्सेन, मगधराज सहदेव, विराट, द्रुपद, शकुनि, बृहद्बल, अवन्तीके राजकुमार विन्द- अनुविन्द, पाण्ड्यनरेश, श्वेत, उत्तर, महाभाग शंख, अभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य तथा महारथी एवं महाबली कलिंगनरेशकी अवहेलना करके कृष्णकी प्रशंसा क्यों कर रहे हो? ॥ १ ९ –२१ ||
शल्यादीनपि कस्मात् त्वं न स्तौषि वसुधाधिपान् ।
स्तवाय यदि ते बुद्धिर्वर्तते भीष्म सर्वदा ॥ २२ ॥
भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुति करनेमें ही लगता है तो इन शल्य आदि श्रेष्ठ राजाओंकी स्तुति क्यों नहीं करते? ॥ २२ ॥
किं हि शक्यं मया कर्तुं यद् वृद्धानां त्वया नृप ।
पुरा कथयतां नूनं न श्रुतं धर्मवादिनाम् ॥ २३ ॥
भीष्म! तुमने पहले बड़े - बूढ़े धर्मोपदेशकोंके मुखसे यदि यह धर्मसंगत बात, जिसे मैं अभी बताऊँगा नहीं सुनी, तो मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ २३ ॥
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः ।
अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ॥ २४ ॥
भीष्म! अपनी निन्दा, अपनी प्रशंसा, दूसरेकी निन्दा और दूसरेकी स्तुति– ये चार प्रकारके कार्य पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ॥ २४ ॥
यदस्तव्यमिमं शश्वन्मोहात् संस्तौषि भक्तितः ।
केशवं तच्च ते भीष्म न कश्चिदनुमन्यते ॥ २५ ॥
भीष्म! जो स्तुतिके सर्वथा अयोग्य है, उसी केशवकी तुम मोहवश सदा भक्तिभावसे जो स्तुति करते रहते हो, उसका कोई अनुमोदन नहीं करता ॥ २५ ॥
कथं भोजस्य पुरुषे वर्गपाले दुरात्मनि ।
समावेशयसे सर्वं जगत् केवलकाम्यया ॥ २६ ॥
दुरात्मा कृष्ण तो राजा कंसका सेवक है, उनकी गौओंका चरवाहा रहा है । तुम केवल स्वार्थवश इसमें सारे जगत्का समावेश कर रहे हो ॥ २६ ॥
अथ चैषा न ते बुद्धिः प्रकृतिं याति भारत ।
मयैव कथितं पूर्वं भूलिङ्गशकुनिर्यथा ॥ २७ ॥
भारत! तुम्हारी बुद्धि ठिकानेपर नहीं आ रही है । मैं यह बात पहले ही बता चुका हूँ कि तुम भूलिंग पक्षीके समान कहते कुछ और करते कुछ हो ॥ २७ ॥
भूलिङ्गशकुनिर्नाम पार्श्वे हिमवतः परे ।
भीष्म तस्याः सदा वाचः श्रूयन्तेऽर्थविगर्हिताः ॥ २८ ॥
भीष्म! हिमालयके दूसरे भागमें भूलिंग नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया रहती है । उसके मुखसे सदा ऐसी बात सुनायी पड़ती है, जो उसके कार्यके विपरीत भावकी सूचक होनेके