महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2001–2010

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2001–2010

पृष्ठ 2001

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कारण अत्यन्त निन्दनीय जान पड़ती है ॥ २८ ॥

मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल ।

साहसं चात्मनातीव चरन्ती नावबुध्यते ॥ २९ ॥

वह चिड़िया सदा यही बोला करती है - ' मा साहसम्' ( अर्थात् साहसका काम न करो ), परंतु वह स्वयं ही भारी साहसका काम करती हुई भी यह नहीं समझ पाती ॥ २ ९ ॥

सा हि मांसार्गलं भीष्म मुखात् सिंहस्य खादतः ।

दन्तान्तरविलग्नं यत् तदादत्तेऽल्पचेतना ॥ ३० ॥

भीष्म! वह मूर्ख चिड़िया मांस खाते हुए सिंहके दाँतोंमें लगे हुए मांसके टुकड़ेको अपनी चोंचसे चुगती रहती है ॥ ३० ॥

इच्छतः सा हि सिंहस्य भीष्म जीवत्यसंशयम् ।

तद्वत् त्वमप्यधर्मिष्ठ सदा वाचः प्रभाषसे ॥ ३१ ॥

निःसंदेह सिंहकी इच्छासे ही वह अबतक जी रही है । पापी भीष्म! इसी प्रकार तुम भी सदा बढ़ - बढ़कर बातें करते हो ॥ ३१ ॥

इच्छतां भूमिपालानां भीष्म जीवस्यसंशयम् ।

लोकविद्विष्टकर्मा हि नान्योऽस्ति भवता समः ॥ ३२ ॥

भीष्म! निःसंदेह तुम्हारा जीवन इन राजाओंकी इच्छासे ही बचा हुआ है; क्योंकि तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा ऐसा नहीं है, जिसके कर्म सम्पूर्ण जगत्से द्वेष करनेवाले हों ॥ ३२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततश्चेदिपतेः श्रुत्वा भीष्मः स कटुकं वचः ।

उवाचेदं वचो राजंश्चेदिराजस्य शृण्वतः ॥ ३३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! शिशुपालका यह कटु वचन सुनकर भीष्मजीने शिशुपालके सुनते हुए यह बात कही— ॥ ३३ ॥

इच्छतां किल नामाहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् ।

सोऽहं न गणयाम्येतांस्तृणेनापि नराधिपान् ॥ ३४ ॥

‘ अहो! शिशुपालके कथनानुसार मैं इन राजाओंकी इच्छापर जी रहा हूँ; परंतु मैं तो इन समस्त भूपालोंको तिनके बराबर भी नहीं समझता' ॥ ३४ ॥

एवमुक्ते तु भीष्मेण ततः संचुक्रुशुर्नृपाः ।

केचिज्जहृषिरे तत्र केचिद् भीष्मं जगहिरे ॥ ३५ ॥

भीष्मके ऐसा कहनेपर बहुत- से राजा कुपित हो उठे । कुछ लोगोंको हर्ष हुआ तथा कुछ भीष्मजीकी निन्दा करने लगे ॥ ३५ ॥

केचिदूचुर्महेष्वासाः श्रुत्वा भीष्मस्य तद् वचः ।

पृष्ठ 2002

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पापोऽवलिप्तो वृद्धश्च नायं भीष्मोऽर्हति क्षमाम् ॥ ३६ ॥

कुछ महान् धनुर्धर नरेश भीष्मकी वह बात सुनकर कहने लगे-' यह बूढ़ा भीष्म पापी और घमण्डी है; अतः क्षमाके योग्य नहीं है ॥ ३६ ॥

हन्यतां दुर्मतिर्भीष्मः पशुवत् साध्वयं नृपाः ।

सर्वैः समेत्य संरब्धैर्दह्यतां वा कटाग्निना ॥ ३७ ॥

‘ राजाओ! क्रोधमें भरे हुए हम सब लोग मिलकर इस खोटी बुद्धिवाले भीष्मको पशुकी भाँति गला दबाकर मार डालें अथवा घास-फूसकी आगमें इसे जीते - जी जला दें ' ॥ ३७ ॥

इति तेषां वचः श्रुत्वा ततः कुरुपितामहः ।

उवाच मतिमान् भीष्मस्तानेव वसुधाधिपान् ॥ ३८ ॥

उन राजाओंकी ये बातें सुनकर कुरुकुलके पितामह बुद्धिमान् भीष्मजी फिर उन्हीं नरेशोंसे बोले - ॥ ३८ ॥

उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षये ।

यत् तु वक्ष्यामि तत् सर्वं शृणुध्वं वसुधाधिपाः ॥ ३ ९ ॥

‘ राजाओ! यदि मैं सबकी बातका अलग - अलग उत्तर दूँ तो यहाँ उसकी समाप्ति होती नहीं दिखायी देती । अतः मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ९ ॥

पशुवद् घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना ।

क्रियतां मूर्ध्नि वो न्यस्तं मयेदं सकलं पदम् ॥ ४० ॥

' तुमलोगोंमें साहस या शक्ति हो, तो पशुकी भाँति मेरी हत्या कर दो अथवा घास-फूसकी आगमें मुझे जला दो । मैंने तो तुमलोगोंके मस्तकपर अपना यह पूरा पैर रख दिया ॥ ४० ॥

एष तिष्ठति गोविन्दः पूजितोऽस्माभिरच्युतः ।

यस्य वस्त्वरते बुद्धिर्मरणाय स माधवम् ॥ ४१ ॥

कृष्णमाह्वयतामद्य युद्धे चक्रगदाधरम् ।

यादवस्यैव देवस्य देहं विशतु पातितः ॥ ४२ ॥

' हमने जिनकी पूजा की है, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे भगवान् गोविन्द तुमलोगोंके सामने मौजूद हैं । तुमलोगोंमेंसे जिसकी बुद्धि मृत्युका आलिंगन करनेके लिये उतावली हो रही हो, वह इन्हीं यदुकुल- तिलक चक्रगदाधर श्रीकृष्णको आज युद्धके लिये ललकारे और इनके हाथों मारा जाकर इन्हीं भगवान्‌के शरीरमें प्रविष्ट हो जाय' ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीष्मवाक्ये चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 2003

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इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 2004

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पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन वैशम्पायन उवाच

ततः श्रुत्वैव भीष्मस्य चेदिराडुरुविक्रमः ।

युयुत्सुर्वासुदेवेन वासुदेवमुवाच ह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनते ही महापराक्रमी चेदिराज शिशुपाल भगवान् वासुदेवके साथ युद्धके लिये उत्सुक हो उनसे इस प्रकार बोला —- ॥ १ ॥

आह्वये त्वां रणं गच्छ मया सार्धं जनार्दन ।

यावदद्य निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवैः ॥ २ ॥

‘जनार्दन! मैं तुम्हें बुला रहा हूँ आओ, मेरे साथ युद्ध करो, जिससे आज मैं समस्त पाण्डवोंसहित तुम्हें मार डालूँ ॥ २ ॥

सह त्वया हि मे वध्याः सर्वथा कृष्ण पाण्डवाः ।

नृपतीन् समतिक्रम्य यैरराजा त्वमर्चितः ॥ ३ ॥

'कृष्ण! तुम्हारे साथ ये पाण्डव भी सर्वथा मेरे वध्य हैं; क्योंकि इन्होंने सब राजाओंकी अवहेलना करके राजा न होनेपर भी तुम्हारी पूजा की ॥ ३ ॥

ये त्वां दासमराजानं बाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् ।

अनर्हमर्हवत् कृष्ण वध्यास्त इति मे मतिः ॥ ४ ॥

' तुम कंसके दास थे तथा राजा भी नहीं हो, इसीलिये राजोचित पूजाके अनधिकारी हो । तो भी कृष्ण! जो लोग मूर्खतावश तुम जैसे दुर्बुद्धिकी पूजनीय पुरुषकी भाँति पूजा करते हैं, वे अवश्य ही मेरे वध्य हैं, मैं तो ऐसा ही मानता हूँ' ॥ ४ ॥

इत्युक्त्वा राजशार्दूलस्तस्थौ गर्जन्नमर्षणः । ऐसा कहकर क्रोधमें भरा हुआ राजसिंह शिशुपाल दहाड़ता हुआ युद्धके लिये डट गया ॥ ४३ ॥

एवमुक्तस्ततः कृष्णो मृदुपूर्वमिदं वचः ।

उवाच पार्थिवान् सर्वान् स समक्षं च वीर्यवान् ॥ ५ ॥

शिशुपालके ऐसा कहनेपर अनन्तपराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने उसके सामने समस्त राजाओंसे मधुर वाणीमें कहा— ॥ ५ ॥

एष नः शत्रुरत्यन्तं पार्थिवाः सात्वतीसुतः ।

पृष्ठ 2005

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सात्वतानां नृशंसात्मा न हितोऽनपकारिणाम् ॥ ६ ॥

' भूमिपालो! यह है तो यदुकुलकी कन्याका पुत्र, परंतु हमलोगोंसे अत्यन्त शत्रुता रखता है । यद्यपि यादवोंने इसका कभी कोई अपराध नहीं किया है, तो भी यह क्रूरात्मा उनके अहितमें ही लगा रहता है ॥ ६ ॥

प्राग्ज्योतिषपुरं यातानस्मान् ज्ञात्वा नृशंसकृत् ।

अदहद् द्वारकामेष स्वस्रीयः सन् नराधिपाः ॥ ७ ॥

‘नरेश्वरो! हम प्राग्ज्योतिषपुरमें गये थे, यह बात जब इसे मालूम हुई, तब इस क्रूरकर्माने मेरे पिताजीका भानजा होकर भी द्वारकामें आग लगवा दी ॥ ७ ॥

क्रीडतो भोजराजस्य एष रैवतके गिरौ ।

हत्वा बद्ध्वा च तान् सर्वानुपायात् स्वपुरं पुरा ॥ ८ ॥

'एक बार भोजराज ( उग्रसेन ) रैवतक पर्वतपर क्रीड़ा कर रहे थे । उस समय यह वहीं जा पहुँचा और उनके सेवकोंको मारकर तथा शेष व्यक्तियोंको कैद करके उन सबको अपने नगरमें ले गया ॥ ८ ॥

अश्वमेधे हयं मेध्यमुत्सृष्टं रक्षिभिर्वृतम् ।

पितुर्मे यज्ञविघ्नार्थमहरत् पापनिश्चयः ॥ ९ ॥

‘ मेरे पिताजी अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ले चुके थे । उसमें रक्षकोंसे घिरा हुआ पवित्र अश्व छोड़ा गया था । इस पापपूर्ण विचारवाले दुष्टात्माने पिताजीके यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये उस अश्वको भी चुरा लिया था ॥ ९ ॥

सौवीरान् प्रति यातां च बभ्रोरेष तपस्विनः ।

भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम् ॥ १० ॥

'इतना ही नहीं, इसने तपस्वी बभ्रुकी पत्नीका, जो यहाँसे द्वारका जाते समय सौवीरदेश पहुँची थी और इसके प्रति जिसके मनमें तनिक भी अनुराग नहीं था, मोहवश अपहरण कर लिया ॥ १० ॥

एष मायाप्रतिच्छन्नः करूषार्थे तपस्विनीम् ।

जहार भद्रां वैशालीं मातुलस्य नृशंसकृत् ॥ ११ ॥

'इस क्रूरकर्माने मायासे अपने असली रूपको छिपाकर करूषराजकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेवाली अपने मामा विशालानरेशकी कन्या भद्राका ( करूषराजके ही वेषमें उपस्थित हो उसे धोखा देकर ) अपहरण कर लिया ॥ ११ ॥

पितृष्वसुः कृते दुःखं सुमहन्मर्षयाम्यहम् ।

दिष्ट्या हीदं सर्वराज्ञां संनिधावद्य वर्तते ॥ १२ ॥

' मैं अपनी बुआके संतोषके लिये ही इसके बड़े दुःखद अपराधोंको सहन कर रहा हूँ; सौभाग्यकी बात है कि आज यह समस्त राजाओंके समीप मौजूद है ॥ १२ ॥

पश्यन्ति हि भवन्तोऽद्य मय्यतीव व्यतिक्रमम् ।

पृष्ठ 2006

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कृतानि तु परोक्षं मे यानि तानि निबोधत ॥ १३ ॥

' आप सब लोग देख ही रहे हैं कि इस समय यह मेरे प्रति कैसा अभद्र बर्ताव कर रहा है । इसने परोक्षमें मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उन्हें भी आप अच्छी तरह जान लें ॥ १३ ॥

इमं त्वस्य न शक्ष्यामि क्षन्तुमद्य व्यतिक्रमम् ।

अवलेपाद् वधार्हस्य समग्रे राजमण्डले ॥ १४ ॥

‘ परंतु आज इसने अहंकारवश समस्त राजाओंके सामने मेरे साथ जो दुर्व्यवहार किया है, उसे मैं कभी क्षमा न कर सकूँगा ॥ १४ ॥

रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थनाऽऽसीन्मुमूर्षतः ।

न च तां प्राप्तवान् मूढः शूद्रो वेदश्रुतीमिव ॥ १५ ॥

'अब यह मरना ही चाहता है । इस मूर्खने पहले रुक्मिणीके लिये उसके बन्धु-बान्धवोंसे याचना की थी, परंतु जैसे शूद्र वेदकी ऋचाओंको श्रवण नहीं कर सकता, उसी प्रकार इस अज्ञानीको वह प्राप्त न हो सकी' ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमादि ततः सर्वे सहितास्ते नराधिपाः ।

वासुदेववचः श्रुत्वा चेदिराजं व्यगर्हयन् ॥ १६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी ये सब बातें सुनकर उन समस्त राजाओंने एक स्वरसे चेदिराज शिशुपालको धिक्कारा और उसकी निन्दा की ॥ १६ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शिशुपालः प्रतापवान् ।

जहास स्वनवद्धासं वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १७ ॥

श्रीकृष्णका उपर्युक्त वचन सुनकर प्रतापी शिशुपाल खिलखिलाकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला – ॥ १७ ॥

मत्पूर्वां रुक्मिणीं कृष्ण संसत्सु परिकीर्तयन् ।

विशेषतः पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुषे कथम् ॥ १८ ॥

'कृष्ण! तुम इस भरी सभामें, विशेषतः सभी राजाओंके सामने रुक्मिणीको मेरी पहलेकी मनोनीत पत्नी बताते हुए लज्जाका अनुभव कैसे नहीं करते? ॥ १८ ॥

मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुषः परिकीर्तयेत् ।

अन्यपूर्वां स्त्रियं जातु त्वदन्यो मधुसूदन ॥ १ ९ ॥

‘ मधुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनी स्त्रीको पहले दूसरेकी वाग्दत्ता पत्नी स्वीकार करते हुए सत्पुरुषोंकी सभामें इसका वर्णन करेगा? ॥ १ ९ ॥ क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम ।

पृष्ठ 2007

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क्रुद्धाद् वापि प्रसन्नाद् वा किं मे त्वत्तो भविष्यति ॥ २० ॥

' कृष्ण! यदि अपनी बुआकी बातोंपर तुम्हें श्रद्धा हो तो मेरे अपराध क्षमा करो या न भी करो, तुम्हारे कुपित होने या प्रसन्न होनेसे मेरा क्या बनने - बिगड़ने - वाला है? ' ॥ २० ॥

तथा ब्रुवत एवास्य भगवान् मधुसूदनः ।

मनसाचिन्तयच्चक्रं दैत्यवर्गनिषूदनम् ॥ २१ ॥

शिशुपाल इस तरहकी बातें कर ही रहा था कि भगवान् मधुसूदनने मन- ही- मन दैत्यवर्गविनाशक सुदर्शन चक्रका स्मरण किया ॥ २१ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु चक्रे हस्तगते सति ।

उवाच भगवानुच्चैर्वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २२ ॥

चिन्तन करते ही तत्काल चक्र हाथमें आ गया । तब बोलनेमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णने उच्च स्वरसे यह वचन कहा— ॥ २२ ॥

शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया ।

अपराधशतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने ॥ २३ ॥

दत्तं मया याचितं च तानि पूर्णानि पार्थिवाः ।

अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम् ॥ २४ ॥

‘ यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते - देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ ' ॥ २३-२४ ॥

एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठश्चेदिराजस्य तत्क्षणात् ।

व्यपाहरच्छिरः क्रुद्धश्चक्रेणामित्रकर्षणः ॥ २५ ॥

ऐसा कहकर कुपित हुए शत्रुहन्ता यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने चक्रसे उसी क्षण चेदिराज शिशुपालका सिर उड़ा दिया ॥ २५ ॥

पृष्ठ 2008

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स पपात महाबाहुर्वज्राहत इवाचलः ।

ततश्चेदिपतेर्देहात् तेजोऽग्रयं ददृशुर्नृपाः ॥ २६ ॥

उत्पतन्तं महाराज गगनादिव भास्करम् ।

ततः कमलपत्राक्षं कृष्णं लोकनमस्कृतम् ।

ववन्दे तत् तदा तेजो विवेश च नराधिप ॥ २७ ॥

महाबाहु शिशुपाल वज्रके मारे हुए पर्वत - शिखरकी भाँति धराशायी हो गया । महाराज! तदनन्तर सभी नरेशोंने देखा; चेदिराजके शरीरसे एक उत्कृष्ट तेज निकलकर ऊपर उठ रहा है; मानो आकाशसे सूर्य उदित हुआ हो । नरेश्वर! उस तेजने विश्ववन्दित कमलदललोचन श्रीकृष्णको नमस्कार किया और उसी समय उनके भीतर प्रविष्ट हो गया ॥ २६-२७ ॥

तदद्भुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षितः ।

यद् विवेश महाबाहुं तत् तेजः पुरुषोत्तमम् ॥ २८ ॥

यह देखकर सभी राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसका तेज महाबाहु पुरुषोत्तममें प्रविष्ट हो गया ॥ २८ ॥

अनभ्रे प्रववर्ष द्यौः पपात ज्वलिताशनिः ।

कृष्णेन निहते चैद्ये चचाल च वसुंधरा ॥ २ ९ ॥

श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालके मारे जानेपर सारी पृथ्वी हिलने लगी, बिना बादलोंके ही आकाशसे वर्षा होने लगी और प्रज्वलित बिजली टूट- टूटकर गिरने लगी ॥ २ ९ ॥

ततः केचिन्महीपाला नाब्रुवंस्तत्र किंचन ।

अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम् ॥ ३० ॥

पृष्ठ 2009

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वह समय वाणीकी पहुँचके परे था । उसका वर्णन करना कठिन था । उस समय कोई भूपाल वहाँ इस विषयमें कुछ भी न बोल सके – मौन रह गये । वे बार- बार केवल श्रीकृष्णके मुखकी ओर देखते रहे ॥ ३० ॥

हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नमर्षिताः ।

अपरे दशनैरोष्ठानदशन् क्रोधमूर्च्छिताः ॥ ३१ ॥

कुछ अन्य नरेश अत्यन्त अमर्षमें भरकर हाथोंसे हाथ मसलने लगे तथा दूसरे लोग क्रोधसे मूर्च्छित होकर दाँतोंसे ओठ चबाने लगे ॥ ३१ ॥

रहश्च केचिद् वार्ष्णेयं प्रशशंसुर्नराधिपाः ।

केचिदेव सुसंरब्धा मध्यस्थास्त्वपरेऽभवन् ॥ ३२ ॥

कुछ राजा एकान्तमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करने लगे । कुछ ही भूपाल अत्यन्त क्रोधके वशीभूत हो रहे थे तथा कुछ लोग तटस्थ थे ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 2010

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शिशुपालके वधके लिये भगवान्‌का हाथमें चक्र ग्रहण करना I 3n दुर्योधनका स्थलके भ्रमसे जलमें गिरना