महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 2081–2090
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2081–2090
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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना शकुनिरुवाच
यां त्वमेतां श्रियं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रे युधिष्ठिरे ।
तप्यसे तां हरिष्यामि द्यूतेन जयतां वर ॥ १ ॥
शकुनि बोला -विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ दुर्योधन! तुम पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी जिस लक्ष्मीको देखकर संतप्त हो रहे हो, उसका मैं द्यूतके द्वारा अपहरण कर लूँगा ॥
आहूयतां परं राजन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अगत्वा संशयमहमयुद्ध्वा च चमूमुखे ॥ २ ॥
अक्षान् क्षिपन्नक्षतः सन् विद्वानविदुषो जये ।
ग्लहान् धनूंषि मे विद्धि शरानक्षांश्च भारत ॥ ३ ॥
परंतु राजन्! तुम कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको बुला लो । मैं किसी संशयमें पड़े बिना, सेनाके सामने युद्ध किये बिना केवल पासे फेंककर स्वयं किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही पाण्डवोंको जीत लूँगा; क्योंकि मैं द्यूतविद्याका ज्ञाता हूँ और पाण्डव इस कलासे अनभिज्ञ हैं । भारत! दावोंको मेरे धनुष समझो और पासोंको मेरे बाण ॥ २-३ ॥ अक्षाणां हृदयं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्तरम् ॥ ४ ॥
पासोंका जो हृदय ( मर्म ) है, उसीको मेरे धनुषकी प्रत्यंचा समझो और जहाँसे पासे फेंके जाते हैं, वह स्थान ही मेरा रथ है ॥ ४ ॥
दुर्योधन उवाच
अयमुत्सहते राजञ्छ्रियमाहर्तुमक्षवित् ।
द्यूतेन पाण्डुपुत्रेभ्यस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ५ ॥
दुर्योधन बोला- राजन्! ये मामाजी पासे फेंकनेकी कलामें निपुण हैं । ये द्यूतके द्वारा पाण्डवोंसे उनकी सम्पत्ति ले लेनेका उत्साह रखते हैं । उसके लिये इन्हें आज्ञा दीजिये ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
स्थितोऽस्मि शासने भ्रातुर्विदुरस्य महात्मनः ।
तेन संगम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥ ६ ॥
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धृतराष्ट्र बोले- बेटा! मैं अपने भाई महात्मा विदुरकी सम्मतिके अनुसार चलता हूँ । उनसे मिलकर यह जान सकूँगा कि इस कार्यके विषयमें क्या निश्चय करना चाहिये? ॥ ६ ॥
दुर्योधन उवाच
व्यपनेष्यति ते बुद्धिं विदुरो मुक्तसंशयः ।
पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव ॥ ७ ॥
दुर्योधन बोला- पिताजी! विदुर सब प्रकारसे संशयरहित हैं । वे आपकी बुद्धिको जूके निश्चयसे हटा देंगे । कुरुनन्दन! वे जैसे पाण्डवोंके हितमें संलग्न रहते हैं, वैसे मेरे हितमें नहीं ॥ ७ ॥
नारभेतान्यसामर्थ्यात् पुरुषः कार्यमात्मनः ।
मतिसाम्यं द्वयोर्नास्ति कार्येषु कुरुनन्दन ॥ ८ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह अपना कार्य दूसरेके बलपर न करे । कुरुराज! किसी भी कार्यमें दो पुरुषोंकी राय पूर्णरूपसे नहीं मिलती ॥ ८ ॥
भयं परिहरन् मन्द आत्मानं परिपालयन् ।
वर्षासु क्लिन्नकटवत् तिष्ठन्नेवावसीदति ॥ ९ ॥
मूर्ख मनुष्य भयका त्याग और आत्मरक्षा करते हुए भी यदि चुपचाप बैठा रहे, उद्योग न करे, तो वह वर्षाकालमें भींगी हुई चटाईके समान नष्ट हो जाता है ॥ ९ ॥
न व्याधयो नापि यमः प्राप्तुं श्रेयः प्रतीक्षते ।
यावदेव भवेत् कल्पस्तावच्छ्रेयः समाचरेत् ॥ १० ॥
रोग अथवा यमराज इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करते कि इसने श्रेय प्राप्त कर लिया या नहीं । अतः जबतक अपनेमें सामर्थ्य हो, तभीतक अपने हितका साधन कर लेना चाहिये ॥ १० ॥
धृतराष्ट्रउवाच
सर्वथा पुत्र बलिभिर्विग्रहो मे न रोचते ।
वैरं विकारं सृजति तद् वै शस्त्रमनायसम् ॥ ११ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – बेटा! मुझे तो बलवानोंके साथ विरोध करना किसी प्रकार भी अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वैर- विरोध बड़ा भारी झगड़ा खड़ा कर देता है, जो ( कुलके विनाशके लिये ) बिना लोहेका शस्त्र है ॥ ११ ॥
अनर्थमर्थं मन्यसे राजपुत्र संग्रन्थनं कलहस्याति घोरम् । तद् वै प्रवृत्तं तु यथा कथंचित् सृजेदसीन् निशितान् सायकांश्च ॥ १२ ॥
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राजकुमार! तुम द्यूतरूपी अनर्थको ही अर्थ मान रहे हो । यह जूआ कलहको ही गूँथनेवाला एवं अत्यन्त भयंकर है । यदि किसी प्रकार यह शुरू हो गया तो तीखी तलवारों और बाणोंकी भी सृष्टि कर देगा ॥ १२ ॥
दुर्योधन उवाच द्यूते पुराणैर्व्यवहारः प्रणीत- स्तत्रात्ययो नास्ति न सम्प्रहारः । तद् रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य सभां क्षिप्रं त्वमिहाज्ञापयस्व ॥ १३ ॥
दुर्योधन बोला – पिताजी! पुराने लोगोंने भी द्यूतक्रीड़ाका व्यवहार किया है । उसमें न तो दोष है और न युद्ध ही होता है । अतः आप शकुनि मामाकी बात मान लीजिये और शीघ्र ही यहाँ ( द्यूतके लिये ) सभामण्डप बन जानेकी आज्ञा दीजिये ॥ १३ ॥
स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्टं तद्वर्तिनां चापि तथैव युक्तम् । भवेदेवं ह्यात्मना तुल्यमेव दुरोदरं पाण्डवैस्त्वं कुरुष्व ॥ १४ ॥
यह जूआ हम खेलनेवालोंके लिये एक विशिष्ट स्वर्गीय सुखका द्वार है । उसके आस-पास बैठनेवाले लोगोंके लिये भी वह वैसा ही सुखद होता है । इस प्रकार इसमें पाण्डवोंको भी हमारे समान ही सुख प्राप्त होगा । अतः आप पाण्डवोंके साथ द्यूतक्रीड़ाकी व्यवस्था कीजिये ॥ धृतराष्ट्रउवाच वाक्यं न मे रोचते यत् त्वयोक्तं यत् ते प्रियं तत् क्रियतां नरेन्द्र । पश्चात् तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं नहीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रने कहा- बेटा! तुमने जो बात कही है, वह मुझे अच्छी नहीं लगती । नरेन्द्र! जैसी तुम्हारी रुचि हो, वैसा करो । जूएका आरम्भ करनेपर मेरी बातोंको याद करके तुम पीछे पछताओगे; क्योंकि ऐसी बातें जो तुम्हारे मुखसे निकली हैं, धर्मानुकूल नहीं कही जा सकतीं ॥ १५ ॥
दृष्टं ह्येतद् विदुरेणैव सर्वं विपश्चिता बुद्धिविद्यानुगेन । तदेवैतदवशस्याभ्युपैति महद् भयं क्षत्रियजीवघाति ॥ १६ ॥
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बुद्धि और विद्याका अनुसरण करनेवाले विद्वान् विदुरने यह सब परिणाम पहलेसे ही देख लिया था। क्षत्रियोंके लिये विनाशकारी वही यह महान् भय मुझ विवशके सामने आ रहा है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च । शशासोच्चैः पुरुषान् पुत्रवाक्ये स्थितो राजा दैवसम्मूढचेताः ॥ १७ ॥
सहस्रस्तम्भां हेमवैदूर्यचित्रां शतद्वारां तोरणस्फाटिकाख्याम् । सभामग्रयां क्रोशमात्रायतां मे तद्विस्तारामाशु कुर्वन्तु युक्ताः ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने दैवको परम दुस्तर माना और दैवके प्रतापसे ही उनके चित्तपर मोह छा गया । वे कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करनेमें असमर्थ हो गये । फिर पुत्रकी बात मानकर उन्होंने सेवकोंको आज्ञा दी कि शीघ्र ही तत्पर होकर तोरणस्फाटिक नामक सभा तैयार कराओ । उसमें सुवर्ण तथा वैदूर्यसे जटित एक हजार खम्भे और सौ दरवाजे हों । उस सुन्दर सभाकी लंबाई और चौड़ाई एक-एक कोसकी होनी चाहिये ॥ १७-१८ ॥ श्रुत्वा तस्य त्वरिता निर्विशङ्काः प्राज्ञा दक्षास्तां तदा चक्रुराशु । सर्वद्रव्याण्युपजह्रुः सभायां सहस्रशः शिल्पिनश्चैव युक्ताः ॥ १ ९ ॥ उनकी यह आज्ञा सुनकर तेज काम करनेवाले चतुर एवं बुद्धिमान् सहस्रों शिल्पी निर्भीक होकर काममें लग गये । उन्होंने शीघ्र ही वह सभा तैयार कर दी और उसमें सब तरहकी वस्तुएँ यथास्थान सजा दीं ॥ १ ९ ॥ कालेनाल्पेनाथ निष्ठां गतां तां
सभां रम्यां बहुरत्नां विचित्राम् ।
चित्रैर्हेमैरासनैरभ्युपेता- माचख्युस्ते तस्य राज्ञः प्रतीताः ॥ २० ॥
थोड़े ही समयमें तैयार हुई उस असंख्य रत्नोंसे सुशोभित रमणीय एवं विचित्र सभाको अद्भुत सोनेके आसनोंद्वारा सजा दिया गया । तत्पश्चात् विश्वस्त सेवकोंने राजा धृतराष्ट्रको उस सभाभवनके तैयार हो जानेकी सूचना दी ॥
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ततो विद्वान् विदुरं मन्त्रिमुख्य- मुवाचेदं धृतराष्ट्रो नरेन्द्रः । युधिष्ठिरं राजपुत्रं च गत्वा मद्वाक्येन क्षिप्रमिहानयस्व ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् विद्वान् राजा धृतराष्ट्रने मन्त्रियोंमें प्रधान विदुरको यह आज्ञा दी कि तुम राजकुमार युधिष्ठिरके पास जाकर मेरी आज्ञासे उन्हें शीघ्र यहाँ लिवा लाओ ॥ सभेयं मे बहुरत्ना विचित्रा शय्यासनैरुपपन्ना महार्हैः । सा दृश्यतां भ्रातृभिः सार्धमेत्य सुहृद्द्द्यूतं वर्ततामत्र चेति ॥ २२ ॥
उनसे कहना, ‘ मेरी यह विचित्र सभा अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित है । इसे बहुमूल्य शय्याओं और आसनोंद्वारा सजाया गया है । युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंके साथ यहाँ आकर इसे देखो और इसमें सुहृदोंकी द्यूतक्रीड़ा प्रारम्भ हो' ॥ इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
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सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः विदुर और धृतराष्ट्रकी बातचीत वैशम्पायन उवाच
मतमाज्ञाय पुत्रस्य धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
मत्वा च दुस्तरं दैवमेतद् राजंश्चकार ह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने पुत्र दुर्योधनका मत जानकर राजा धृतराष्ट्रने दैवको दुस्तर माना और यह कार्य किया ॥ १ ॥
अन्यायेन तथोक्तस्तु विदुरो विदुषां वरः ।
नाभ्यनन्दद् वचो भ्रातुर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २ ॥
विद्वानोंमें श्रेष्ठ विदुरने धृतराष्ट्रका वह अन्यायपूर्ण आदेश सुनकर भाईकी उस बातका अभिनन्दन नहीं किया और इस प्रकार कहा ॥ २ ॥
विदुर उवाच नाभिनन्दे नृपते प्रैषमेतं
मैवं कृथाः कुलनाशाद् बिभेमि ।
पुत्रैर्भिन्नैः कलहस्ते ध्रुवं स्या- देतच्छङ्के द्यूतकृते नरेन्द्र ॥ ३ ॥
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विदुर बोले - महराज! मैं आपके इस आदेशका अभिनन्दन नहीं करता, आप ऐसा काम मत कीजिये । इससे मुझे समस्त कुलके विनाशका भय है । नरेन्द्र! पुत्रोंमें भेद होनेपर निश्चय ही आपको कलहका सामना करना पड़ेगा । इस जूएके कारण मुझे ऐसी आशंका हो रही है ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्रउवाच नेह क्षत्तः कलहस्तप्स्यते मां न चेद् दैवं प्रतिलोमं भविष्यत् । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं सर्वं जगच्चेष्टति न स्वतन्त्रम् ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – विदुर! यदि दैव प्रतिकूल न हो, तो मुझे कलह भी कष्ट नहीं दे सकेगा । विधाताका बनाया हुआ यह सम्पूर्ण जगत् दैवके अधीन होकर ही चेष्टा कर रहा है, स्वतन्त्र नहीं है ॥ ४ ॥
तदद्य विदुर प्राप्य राजानं मम शासनात् ।
क्षिप्रमानय दुर्धर्षं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५ ॥
इसलिये विदुर! तुम मेरी आज्ञासे आज राजा युधिष्ठिरके पास जाकर उन दुर्धर्ष कुन्तीकुमार युधिष्ठिरको यहाँ शीघ्र बुला ले आओ ॥ ५ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला सत्तावनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना वैशम्पायन उवाच ततः प्रायाद् विदुरोऽश्वैरुदारै- महाजवैर्बलिभिः साधुदान्तैः । बलान्नियुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा मनीषिणां पाण्डवानां सकाशे ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर राजा धृतराष्ट्रके बलपूर्वक भेजनेपर विदुरजी अत्यन्त वेगशाली, बलवान् और अच्छी प्रकार काबूमें किये हुए महान् अश्वोंसे जुते रथपर सवार हो परम बुद्धिमान् पाण्डवोंके समीप गये ॥ १ ॥
सोऽभिपत्य तदध्वानमासाद्य नृपतेः पुरम् ।
प्रविवेश महाबुद्धिः पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २ ॥
महाबुद्धिमान् विदुरजी उस मार्गको तय करके राजा युधिष्ठिरकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ द्विजातियोंसे सम्मानित होकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
स राजगृहमासाद्य कुबेरभवनोपमम् ।
अभ्यागच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥
तं वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा
अजातशत्रुर्विदुरं यथावत् ।
पूजापर्यं प्रतिगृह्याजमीढ- स्ततोऽपृच्छद् धृतराष्ट्रं सपुत्रम् ॥ ४ ॥
कुबेरके भवनके समान सुशोभित राजमहलमें जाकर धर्मात्मा विदुर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे मिले । सत्यवादी महात्मा अजमीढनन्दन अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने विदुरजीका यथावत् आदर- सत्कार करके उनसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रकी कुशल पूछी ॥ ३-४ ॥ युधिष्ठिरउवाच विज्ञायते ते मनसोऽप्रहर्षः कच्चित् क्षत्तः कुशलेनागतोऽसि । कच्चित् पुत्राः स्थविरस्यानुलोमा वशानुगाश्चापि विशोऽथ कच्चित् ॥ ५ ॥
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युधिष्ठिर बोले- विदुरजी! आपका मन प्रसन्न नहीं जान पड़ता । आप कुशलसे तो आये हैं? बूढ़े राजा धृतराष्ट्रके पुत्र उनके अनुकूल चलते हैं न? तथा सारी प्रजा उनके वशमें है न? ॥ ५ ॥
विदुर उवाच राजा महात्मा कुशली सपुत्र
आस्ते वृतो ज्ञातिभिरिन्द्रकल्पः ।
प्रीतो राजन् पुत्रगणैर्विनीतै- र्विशोक एवात्मरतिर्महात्मा ॥ ६ ॥
विदुरने कहा— राजन्! इन्द्रके समान प्रभावशाली महामना राजा धृतराष्ट्र अपने जातिभाइयों तथा पुत्रोंसहित सकुशल हैं । अपने विनीत पुत्रोंसे वे प्रसन्न रहते हैं । उनमें शोकका अभाव है । वे महामना अपनी आत्मामें ही अनुराग रखनेवाले हैं ॥ ६ ॥
इदं तु त्वां कुरुराजोऽभ्युवाच पूर्वं पृष्ट्वा कुशलं चाव्ययं च । इयं सभा त्वत्सभातुल्यरूपा भ्रातॄणां ते दृश्यतामेत्य पुत्र ॥ ७ ॥
समागम्य भ्रातृभिः पार्थ तस्यां सुहृद्यूतं क्रियतां रम्यतां च । प्रीयामहे भवतां संगमेन समागताः कुरवश्चापि सर्वे ॥ ८ ॥
कुरुराज धृतराष्ट्रने पहले तुमसे कुशल और आरोग्य पूछकर यह संदेश दिया है कि वत्स! मैंने तुम्हारी सभाके समान ही एक सभा तैयार करायी है । तुम अपने भाइयोंके साथ आकर अपने दुर्योधन आदि भाइयोंकी इस सभाको देखो । इसमें सभी इष्ट - मित्र मिलकर द्यूतक्रीड़ा करें और मन बहलावें । हम सभी कौरव तुम सबसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे ॥ ७-८ ॥ दुरोदरा विहिता ये तु तत्र
महात्मना धृतराष्ट्रेण राज्ञा ।
तान् द्रक्ष्यसे कितवान् संनिविष्टा- नित्यागतोऽहं नृपते तज्जुषस्व ॥ ९ ॥
महामना राजा धृतराष्ट्रने वहाँ जो जूएके स्थान बनवाये हैं, उनको और वहाँ जुटकर बैठे हुए धूर्त जुआरियोंको तुम देखोगे । राजन्! मैं इसीलिये आया हूँ । तुम चलकर उस सभा एवं द्यूतक्रीड़ाका सेवन करो ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
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द्यूते क्षत्तः कलहो विद्यते नः को वै द्यूतं रोचयेद् बुध्यमानः । किं वा भवान् मन्यते युक्तरूपं भवद्वाक्ये सर्व एव स्थिताः स्म ॥ १० ॥
युधिष्ठिरने पूछा- विदुरजी! जूएमें तो झगड़ा- फसाद होता है । कौन समझदार मनुष्य जूआ खेलना पसंद करेगा अथवा आप क्या ठीक समझते हैं; हम सब लोग तो आपकी आज्ञाके अनुसार ही चलनेवाले हैं ॥ १० ॥
विदुर उवाच जानाम्यहं द्यूतमनर्थमूलं कृतश्च यत्नोऽस्य मया निवारणे । राजा च मां प्राहिणोत् त्वत्सकाशं श्रुत्वा विद्वञ्छ्रेय इहाचरस्व ॥ ११ ॥
विदुरजीने कहा- विद्वन्! मैं जानता हूँ, जूआ अनर्थकी जड़ है; इसीलिये मैंने उसे रोकनेका प्रयत्न भी किया तथापि राजा धृतराष्ट्रने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, यह सुनकर तुम्हें जो कल्याणकर जान पड़े, वह करो ॥ ११ ॥
युधिष्ठिरउवाच के तत्राये कितवा दीव्यमाना विना राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः । पृच्छामि त्वां विदुर ब्रूहि नस्तान् यैर्दीव्यामः शतशः संनिपत्य ॥ १२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — विदुरजी! वहाँ राजा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको छोड़कर दूसरे कौन- कौन धूर्त जुआ खेलनेवाले हैं? यह मैं आपसे पूछता हूँ। आप उन सबको बताइये, जिनके साथ मिलकर और सैकड़ोंकी बाजी लगाकर हमें जुआ खेलना पड़ेगा ॥ १२ ॥