महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 21–30

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

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२१- श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाड़ोंको तोड़- फोड़कर तीनोंका नगर एवं राज - भवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद २२- जरासंध और श्रीकृष्णका संवाद तथा जरासंधकी युद्धके लिये तैयारी एवं जरासंधका श्रीकृष्णके साथ वैर होनेके कारणका वर्णन २३- जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट २४- भीमके द्वारा जरासंधका वध, बंदी राजाओंकी मुक्ति, श्रीकृष्ण आदिका भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थमें आना और वहाँसे श्रीकृष्णका द्वारका जाना (दिग्विजयपर्व). २५- अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा २६- अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय २७- अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना २८- किम्पुरुष, हाटक तथा उत्तरकुरुपर विजय प्राप्त करके अर्जुनका इन्द्रप्रस्थ लौटना २ ९- भीमसेनका पूर्व दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना ३०- भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों तथा राजाओंको जीतकर भारी धन - सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थमें लौटना ३१- सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय ३२- नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय ( राजसूयपर्व ) ३३- युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे - सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना ३४- युधिष्ठिरके यज्ञमें सब देशके राजाओं, कौरवों तथा यादवोंका आगमन और उन सबके भोजन -विश्राम आदिकी सुव्यवस्था ३५- राजसूययज्ञका वर्णन (अर्घाभिहरणपर्व). ३६- राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण- महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा ३७- शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन ३८- युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना

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३ ९- सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना (शिशुपालवधपर्व ) ४०- युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना ४१- शिशुपालद्वारा भीष्मकी निन्दा ४२- शिशुपालकी बातोंपर भीमसेनका क्रोध और भीष्मजीका उन्हें शान्त करना ४३- भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन ४४- भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना ४५: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन (द्यूतपर्व) ४६- व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा ४७- दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग- पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना ४८- पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत ४ ९- धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश ५०- दुर्योधनका धृतराष्ट्रको अपने दुःख और चिन्ताका कारण बताना ५१- युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन ५२- युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन ५३- दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन ५४- धृतराष्ट्रका दुर्योधनको समझाना ५५- दुर्योधनका धृतराष्ट्रको उकसाना ५६- धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना ५७- विदुर और धृतराष्ट्रकी बातचीत ५८- विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना ५९- जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठिर और शकुनिका संवाद

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६०- द्यूतक्रीड़ाका आरम्भ ६१- जूएमें शकुनिके छलसे प्रत्येक दाँवपर युधिष्ठिरकी हार ६२- धृतराष्ट्रको विदुरकी चेतावनी ६३ - विदुरजीके द्वारा जूएका घोर विरोध ६४- दुर्योधनका विदुरको फटकारना और विदुरका उसे चेतावनी देना -६५- युधिष्ठिरका धन, राज्य, भाइयों तथा द्रौपदी सहित अपनेको भी हारना ६६- विदुरका दुर्योधनको फटकारना ६७- प्रातिकामीके बुलानेसे न आनेपर दुःशासनका सभामें द्रौपदीको केश पकड़कर घसीटकर लाना एवं सभासदोंसे द्रौपदीका प्रश्न ६८- भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना ६९- द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन ७०- दुर्योधनके छल- कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्गार ७१- कर्ण और दुर्योधनके वचन, भीमसेनकी प्रतिज्ञा, विदुरकी चेतावनी और द्रौपदीको धृतराष्ट्रसे वरप्राप्ति ७२- शत्रुओंको मारनेके लिये उद्यत हुए भीमको युधिष्ठिरका शान्त करना ७३- धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको सारा धन लौटाकर एवं समझा-बुझाकर इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश देना (अनुद्यूतपर्व) ७४- दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुनः द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति ७५- गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना ७६- सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुनः जुआ खेलना और हारना ७७- दुःशासनद्वारा पाण्डवोंका उपहास एवं भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी शत्रुओंको मारनेके लिये भीषण प्रतिज्ञा ७८- युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, विदुरका कुन्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको धर्मपूर्वक रहनेका उपदेश देना ७९- द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर- नारियोंका शोकातुर होना

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- वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन - धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप (सभापर्व सम्पूर्ण)

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चित्र -सूची (सादा) १- उग्रश्रवाजीके द्वारा महाभारतकी कथा २- रुरुके दर्शनसे सहस्रपाद ऋषिकी सर्पयोनिसे मुक्ति ३- भगवान् विष्णुने चक्रसे राहुका सिर काट दिया ४- ब्रह्माजीने शेषजीको वरदान तथा पृथ्वी धारण करनेकी आज्ञा दी ५- आस्तीकने तक्षकको अग्निकुण्डमें गिरनेसे रोक दिया ६- शुक्राचार्य और कच ७- ययातिका पतन ८- देवव्रत ( भीष्म) -की भीषण प्रतिज्ञा ९- धर्मराज और अणीमाण्डव्य १०- अणीमाण्डव्य ऋषि शूलीपर ११- शतशृंग पर्वतपर पाण्डुका तप १२- बालक भीमके शरीरकी चोटसे चट्टान टूट गयी १३- सुरंगद्वारा मातासहित पाण्डवोंका लाक्षागृहसे निकलना १४- भीम अपने चारों भाइयोंको तथा माताको उठाकर ले चले १५- हिडिम्ब- वध १६- भीमसेन और घटोत्कच १७- पाण्डवोंकी व्यासजीसे भेंट १८- धृष्टद्युम्नकी घोषणा १९- कुन्तीद्वारा ब्राह्मण- दम्पतिको सान्त्वना २०- बकासुरपर भीमका प्रहार २१- विश्वामित्रकी सेनापर नन्दिनीका कोप २२- पाण्डव, द्रुपद और व्यासजीमें बातचीत २३- व्यासजीद्वारा पाण्डवोंके पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन २४- सुन्द और उपसुन्दका अत्याचार २५- तिलोत्तमाके लिये सुन्द और उपसुन्दका युद्ध २६- सुभद्राका कुन्ती और द्रौपदीकी सेवामें उपस्थित होना २७- श्रीकृष्ण और अर्जुनका देवताओंसे युद्ध २८- अर्जुन और श्रीकृष्णको इन्द्रका वरदान २९- पाण्डवोंद्वारा देवर्षि नारदका पूजन

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३०- जरासंधके भवनमें श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन ३१- भीमसेन और जरासंधका युद्ध ३२- भीष्मका युधिष्ठिरको श्रीकृष्णकी महिमा बताना ३३- शिशुपालका युद्धके लिये उद्योग ३४- भूमिका भगवान्‌को अदितिके कुण्डल देना ३५- शिशुपालके वधके लिये भगवान्का हाथमें चक्र ग्रहण करना ३६- दुर्योधनका स्थलके भ्रमसे जलमें गिरना ३७- द्यूत-क्रीडामें युधिष्ठिरसे पराजय ३८- दुःशासनका द्रौपदीके केश पकड़कर खींचना ३ ९- द्रौपदी - चीर-हरण ४०- गान्धारीका धृतराष्ट्रको समझाना

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॥ श्रीहरिः ॥ * श्रीगणेशाय नमः * ॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥ श्रीमहाभारतम् आदिपर्व अनुक्रमणिकापर्व प्रथमोऽध्यायः ग्रन्थका उपक्रम, ग्रन्थमें कहे हुए अधिकांश विषयोंकी संक्षिप्त सूची तथा इसके पाठकी महिमा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

‘ बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण तथा श्रीनर ( अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन), उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता महर्षि वेदव्यासको नमस्कार कर ( आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर दैवी सम्पत्तियोंको विजय प्राप्त करानेवाले ) जय ( महाभारत एवं अन्य इतिहास- पुराणादि ) - का पाठ करना चाहिये । ' ± ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । ॐ नमः पितामहाय । ॐ नमः प्रजापतिभ्यः । ॐ नमः कृष्णद्वैपायनाय । ॐ नमः सर्वविघ्नविनायकेभ्यः । ॐकारस्वरूप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है । ॐ कारस्वरूप भगवान् पितामहको नमस्कार है । ॐकारस्वरूप प्रजापतियोंको नमस्कार है । ॐकारस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायनको नमस्कार है । ॐकारस्वरूप सर्व - विघ्नविनाशक विनायकोंको नमस्कार है । लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाः सौतिः पौराणिको नैमिषारण्ये शौनकस्य कुलपतेर्द्वादशवार्षिके सत्रे ॥ १ ॥

सुखासीनानभ्यगच्छद् ब्रह्मर्षीन् संशितव्रतान् ।

विनयावनतो भूत्वा कदाचित् सूतनन्दनः ॥ २ ॥

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एक समयकी बात है, नैमिषारण्यमें कुलपति महर्षि शौनकके बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले सत्रमें जब उत्तम एवं कठोर ब्रह्मचर्यादि व्रतोंका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षिगण अवकाशके समय सुखपूर्वक बैठे थे, सूतकुलको आनन्दित करनेवाले लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवा सौति स्वयं कौतूहलवश उन ब्रह्मर्षियोंके समीप बड़े विनीतभावसे आये । वे पुराणोंके विद्वान् और कथावाचक थे ॥ १-२ ॥

तमाश्रममनुप्राप्तं नैमिषारण्यवासिनाम् ।

चित्राः श्रोतुं कथास्तत्र परिवब्रुस्तपस्विनः ॥ ३ ॥

उस समय नैमिषारण्यवासियोंके आश्रममें पधारे हुए उन उग्रश्रवाजीको, उनसे चित्र-विचित्र कथाएँ सुननेके लिये, सब तपस्वियोंने वहीं घेर लिया ॥ ३ ॥

अभिवाद्य मुनींस्तांस्तु सर्वानेव कृताञ्जलिः ।

अपृच्छत् स तपोवृद्धिं सद्भिश्चैवाभिपूजितः ॥ ४ ॥

उग्रश्रवाजीने पहले हाथ जोड़कर उन सभी मुनियोंको अभिवादन किया और ‘ आपलोगोंकी तपस्या सुखपूर्वक बढ़ रही है न? ' इस प्रकार कुशल- प्रश्न किया । उन सत्पुरुषोंने भी उग्रश्रवाजीका भलीभाँति स्वागत - सत्कार किया ॥ ४ ॥

अथ तेषूपविष्टेषु सर्वेष्वेव तपस्विषु ।

निर्दिष्टमासनं भेजे विनयाल्लौमहर्षणिः ॥ ५ ॥

इसके अनन्तर जब वे सभी तपस्वी अपने - अपने आसनपर विराजमान हो गये, तब लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाजीने भी उनके बताये हुए आसनको विनयपूर्वक ग्रहण किया ॥

सुखासीनं ततस्तं तु विश्रान्तमुपलक्ष्य च ।

अथापृच्छदृषिस्तत्र कश्चित् प्रस्तावयन् कथाः ॥ ६ ॥

तत्पश्चात् यह देखकर कि उग्रश्रवाजी थकावटसे रहित होकर आरामसे बैठे हुए हैं, किसी महर्षिने बातचीतका प्रसंग उपस्थित करते हुए यह प्रश्न पूछा— ॥ ६ ॥

कुत आगम्यते सौते क्व चायं विहृतस्त्वया ।

कालः कमलपत्राक्ष शंसैतत् पृच्छतो मम ॥ ७ ॥

कमलनयन सूतकुमार! आपका शुभागमन कहाँसे हो रहा है? अबतक आपने कहाँ आनन्दपूर्वक समय बिताया है? मेरे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये ॥ ७ ॥

एवं पृष्टोऽब्रवीत् सम्यग् यथावल्लौमहर्षणिः ।

वाक्यं वचनसम्पन्नस्तेषां च चरिताश्रयम् ॥ ८ ॥

तस्मिन् सदसि विस्तीर्णे मुनीनां भावितात्मनाम् । उग्रश्रवाजी एक कुशल वक्ता थे । इस प्रकार प्रश्न किये जानेपर वे शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंकी उस विशाल सभामें ऋषियों तथा राजाओंसे सम्बन्ध रखनेवाली उत्तम एवं यथार्थ कथा कहने लगे ॥ ८३ ॥

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सौतिरुवाच जनमेजयस्य राजर्षेः सर्पसत्रे महात्मनः ॥ ९ ॥

समीपे पार्थिवेन्द्रस्य सम्यक् पारिक्षितस्य च ।

कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः ॥ १० ॥

कथिताश्चापि विधिवद् या वैशम्पायनेन वै ।

श्रुत्वाहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ॥ ११ ॥

उग्रश्रवाजीने कहा- महर्षियो! चक्रवर्ती सम्राट् महात्मा राजर्षि परीक्षित्-नन्दन जनमेजयके सर्पयज्ञमें उन्हींके पास वैशम्पायनने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके द्वारा निर्मित परम पुण्यमयी चित्र-विचित्र अर्थसे युक्त महाभारतकी जो विविध कथाएँ विधिपूर्वक कही हैं, उन्हें सुनकर मैं आ रहा हूँ ॥ ९ –११ ॥

बहूनि सम्परिक्रम्य तीर्थान्यायतनानि च ।

समन्तपञ्चकं नाम पुण्यं द्विजनिषेवितम् ॥ १२ ॥

गतवानस्मि तं देशं युद्धं यत्राभवत् पुरा ।

कुरूणां पाण्डवानां च सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥ १३ ॥

मैं बहुत-से तीर्थों एवं धामोंकी यात्रा करता हुआ ब्राह्मणोंके द्वारा सेवित उस परम पुण्यमय समन्तपंचक क्षेत्र कुरुक्षेत्र देशमें गया, जहाँ पहले कौरव- पाण्डव एवं अन्य सब राजाओंका युद्ध हुआ था ॥ १२-१३ ॥ दिदृक्षुरागतस्तस्मात् समीपं भवतामिह ।

आयुष्मन्तः सर्व एव ब्रह्मभूता हि मे मताः ।

अस्मिन् यज्ञे महाभागाः सूर्यपावकवर्चसः ॥ १४ ॥

वहींसे आपलोगोंके दर्शनकी इच्छा लेकर मैं यहाँ आपके पास आया हूँ । मेरी यह मान्यता है कि आप सभी दीर्घायु एवं ब्रह्मस्वरूप हैं । ब्राह्मणो! इस यज्ञमें सम्मिलित आप सभी महात्मा बड़े भाग्यशाली तथा सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी हैं ॥ १४ ॥

कृताभिषेकाः शुचयः कृतजप्याहुताग्नयः ।

भवन्त आसने स्वस्था ब्रवीमि किमहं द्विजाः ॥ १५ ॥

पुराणसंहिताः पुण्याः कथा धर्मार्थसंश्रिताः ।

इति वृत्तं नरेन्द्राणामृषीणां च महात्मनाम् ॥ १६ ॥

इस समय आप सभी स्नान, संध्या- वन्दन, जप और अग्निहोत्र आदि करके शुद्ध हो अपने - अपने आसनपर स्वस्थचित्तसे विराजमान हैं । आज्ञा कीजिये, मैं आपलोगोंको क्या सुनाऊँ? क्या मैं आपलोगोंको धर्म और अर्थके गूढ़ रहस्यसे युक्त, अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाली भिन्न-भिन्न पुराणोंकी कथा सुनाऊँ अथवा उदारचरित महानुभाव ऋषियों एवं सम्राटोंके पवित्र इतिहास? ॥ १५-१६ । ।

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ऋषय ऊचुः

द्वैपायनेन यत् प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा ।

सुरैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव श्रुत्वा यदभिपूजितम् ॥ १७ ॥

तस्याख्यानवरिष्ठस्य विचित्रपदपर्वणः ।

सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थेर्भूषितस्य च ॥ १८ ॥

भारतस्येतिहासस्य पुण्यां ग्रन्थार्थसंयुताम् ।

संस्कारोपगतां ब्राह्मीं नानाशास्त्रोपबृंहिताम् ॥ १ ९ ॥

जनमेजयस्य यां राज्ञो वैशम्पायन उक्तवान् ।

यथावत् स ऋषिस्तुष्ट्या सत्रे द्वैपायनाज्ञया ॥ २० ॥

वेदैश्चतुर्भिः संयुक्तां व्यासस्याद्भुतकर्मणः ।

संहितां श्रोतुमिच्छामः पुण्यां पापभयापहाम् ॥ २१ ॥

ऋषियोंने कहा — उग्रश्रवाजी! परमर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायनने जिस प्राचीन इतिहासरूप पुराणका वर्णन किया है और देवताओं तथा ऋषियोंने अपने - अपने लोकमें श्रवण करके जिसकी भूरि- भूरि प्रशंसा की है, जो आख्यानोंमें सर्वश्रेष्ठ है, जिसका एक- एक पद, वाक्य एवं पर्व विचित्र शब्दविन्यास और रमणीय अर्थसे परिपूर्ण है, जिसमें आत्मा- परमात्माके सूक्ष्म स्वरूपका निर्णय एवं उनके अनुभवके लिये अनुकूल युक्तियाँ भरी हुई हैं और जो सम्पूर्ण वेदोंके तात्पर्यानुकूल अर्थसे अलंकृत है, उस भारत - इतिहासकी परम पुण्यमयी, ग्रन्थके गुप्त भावोंको स्पष्ट करनेवाली, पदों-वाक्योंकी व्युत्पत्तिसे युक्त, सब शास्त्रोंके अभिप्रायके अनुकूल और उनसे समर्थित जो अद्भुतकर्मा व्यासकी संहिता है, उसे हम सुनना चाहते हैं । अवश्य ही वह चारों वेदोंके अर्थोंसे भरी हुई तथा पुण्यस्वरूपा है । पाप और भयका नाश करनेवाली है । भगवान् वेदव्यासकी आज्ञासे राजा जनमेजयके यज्ञमें प्रसिद्ध ऋषि वैशम्पायनने आनन्दमें भरकर भलीभाँति इसका निरूपण किया है ॥ १७– २१ ॥ सौतिरुवाच

आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् ।

ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ॥ २२ ॥

असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत्परम् ।

परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम् ॥ २३ ॥

मङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् ।

नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिम् ॥ २४ ॥

महर्षेः पूजितस्येह सर्वलोकैर्महात्मनः ।

प्रवक्ष्यामि मतं पुण्यं व्यासस्याद्भुतकर्मणः ॥ २५ ॥